भारती
जलवायु परिवर्तन का कृषि क्षेत्र पर विकराल प्रभाव, निदानों के क्रियान्वयन की आवश्यकता

जलवायु परिवर्तन का असर पूरे विश्व के साथ भारत में भी दिखाई देने लगा है। इसके कारण भारत का कृषि चक्र प्रभावित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कई सालों में खेती-किसानी का एक नया रूप देखने को मिला है‌।

फसल के लिए आवश्यक मौसम में बदलाव के साथ ही बेमौसम बारिश, सुखाड़ और अत्याधिक ठंड ने किसानों के फसल और कृषि अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान पहुँचाया है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 की मानें तो कृषि विकास दर में जबरदस्त गिरावट देखी गई है। 2016-17 में जहाँ कृषि विकास दर 6.3 प्रतिशत थी, वहीं वर्ष 2018-19 में यह घटकर 2.9 प्रतिशत पर आ गई। यानी दो साल में ही चार प्रतिशत की कमी।

इंटरगवर्नमेंटल साइंस-पॉलिसी प्लैटफॉर्म ऑन बायोडायवर्सिटी एंड इकोसिस्टम सर्विसेज ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि मिट्टी के क्षय-ग्रस्त होने से उसके अंदर का कार्बन बाहर निकलने लगता है, जिससे जलवायु परिवर्तन में बेतहाशा वृद्धि हो रही है और आने वाले वर्षों में यह एक खतरनाक स्थिति में पहुँच जाएगी।

अंधाधुन पेड़ों की कटाई, सड़क और जमीन पर पक्कीकरण निर्माण ने भूमि को और अधिक गर्म कर दिया है। भूमि गर्म होने की वजह से अधिक जल सींचता है, जिससे खरीफ फसल के उत्पादन में अधिक पानी की ज़रूरत पड़ने लगी है।

भारत में पिछले तीन सालों में जलवायु परिवर्तन ने कृषि व्यवसाय को जबरदस्त नुकसान पहुँचाया है। आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार भारत की आधी से अधिक भूमि असींचित है।

पर्यावरण से जुड़ी गैर-सरकारी संस्था सेंटर फॉर साइंस और इनवायरमेंट ने डाउन टू अर्थ पत्रिका के साथ मिलकर एक रिपोर्ट तैयार की। 10 साल की शोध के आधार पर पाया गया कि भारत के अधिकांश राज्यों में खेती लायक ज़मीन और पानी में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक हो चुकी है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि मिट्टी में बहुत मात्रा में नाइट्रोजन के घुलने से उसका कार्बन कंटेंट कम हो जाता है और उसमें मौजूद पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है। नाइट्रोजन प्रदूषण पानी को भी प्रभावित करता है।

पंजाब, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के भूमिगत जल में नाइट्रेट की मौजूदगी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से बहुत अधिक पाई गई है। हरियाणा में यह सर्वाधिक 99.5 एमजी प्रति लीटर है जो डब्ल्यूएचओ के मानक 50 एमजी प्रति लीटर से करीब दोगुना है।

वैश्विक जलवायु जोखिम सूचकांक 2019 के नए आँकड़े के अनुसार भारत 14वें स्थान पर है‌‌। रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल 67 प्रतिशत कृषि भूमि मानसून पर निर्भर है। रिपोर्ट में भारत के चार पड़ोसी देश नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश और पाकिस्तान को भारत से ऊपर रखा गया है।

भारत में खतरा अधिक

आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन का खेती-किसानी पर और भी ज्यादा प्रभाव पड़ सकता है। अगले 10 सालों में जलवायु परिवर्तन से किसानों पर कोई बड़ा प्रभाव पड़ने की क्या संभावनाएँ है? इस प्रश्न के उत्तर में नीति आयोग के पूर्व सलाहकार समिति के सदस्य रहे तंजामुल हक स्वराज्य  को बताते हैं कि जो स्थिति है, उससे उन्हें नहीं लगता है कि आने वाले 10 सालों में किसान रह पाएगा।

तंजामुल इसके पीछे कारण बताते हुए कहते हैं, “बेमौसम बारिश से लगी लगाई फसल बर्बाद हो जा रही है। किसान फसल की बुआई नहीं कर पा रहे हैं। इस स्थिति में किसान क्या करेंगे, बताइए?”

नीति आयोग के अर्थशास्त्री रमेश चंद्र के नेतृत्व में 2018 में एक पत्र जारी किया गया, जिसके अनुसार 1971 की तुलना में कृषि में रोजगार की संख्या अनुपातिक आधार पर नहीं बढ़ा है।

नाबार्ड ने वर्ष 2015-16 में देश के 245 जिले में एक सर्वेक्षण कर रिपोर्ट तैयार की, जिसके अनुसार वर्ष 2012-13 के मुकाबले 2015-16 में 8 प्रतिशत किसान खेती छोड़ कर दूसरे व्यवसाय में चले गए। 2012-13 में जहाँ खेती कर रहे किसान 57 प्रतिशत पर थे, वहीं यह संख्या 2015-16 में घटकर 49 प्रतिशत पर आ गई।

16वीं लोकसभा के दौरान प्राक्कलन समिति के सामने कृषि मंत्रालय ने प्रतिवेदन देते हुए कहा था कि जल्द स्थिति नहीं सुधरी तो आने वाले सालों में दुग्ध उत्पादन क्षेत्र में भी भारी कमी हो जाएगी। भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक भारत में दुग्ध उत्पादन 10 गुना तक बढ़ जाएगा। वर्तमान में दुग्ध उत्पादन की क्षमता भारत में 1.6 मेट्रिक टन है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि 2020 तक धान की उपज में 4-6 प्रतिशत, आलू में 11 प्रतिशत, मक्का में 18 न और सरसों की उपज में 2 प्रतिशत तक की कमी संभावित है। इसके अलावा एक डिग्री सेल्सियस तक तापमान वृद्धि के साथ गेहूँ की उपज में 60 लाख टन तक कमी आ सकती है।

सरकार ने इस समस्या से निजात पाने के विकल्प पर काम करना शुरू कर दिया है। ऊर्जा और संसाधन संस्थान (टेरी) ने जलवायु परिवर्तन से फसलों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर इससे निपटने की योजना तैयार करेगी।

टेरी के महानिदेशक अजय माथुर के अनुसार, विभिन्न राज्यों द्वारा जलवायु परिवर्तन को प्रमुख फसलों और बुवाई के पैटर्न को प्रभावित करने के तरीके को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाई गई फसल पद्धति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा कि हम कृषि क्षेत्र का सामना करने वाले मुद्दों से अवगत हैं जिन्हें संबोधित करने की आवश्यकता है और मुझे उम्मीद है कि हम उनपर काम करेंगे।

जलवायु परिवर्तन को कम कर कृषि विकास को फिर से पटरी पर लाने के लिए नए उपाय करने होंगे। के देवांगन ने मौसम विभाग को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक रिपोर्ट सौंपी‌। रिपोर्ट के अनुसार किसान शुष्क फसलों की खेती पर ज्याद जोर दें, जिससे पानी की कमी से निजात पाया जा सकता है। इतना ही नहीं, कृषि गतिविधियों को बढ़ाना होगा जिससे ग्रीन हाउस गैस पर लगाम लगाया जा सके।

केंद्र सरकार ने शुष्क फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। इसका संकेत इस वर्ष खरीफ हेतु घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य में देखा जा सकता है जहाँ दलहन फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

खरीफ 2019-20 के लिए घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य

इसके फलस्वरूप देखा जा सकता है कि दलहन उत्पादन में 8.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 2018-19 तक उत्पादकता में पिछले पाँच वर्षों में 3.18 प्रतिशत की वृद्धि रही। इस काल में खरीफ दालों का उत्पादन 11.5 प्रतिशत बढ़ा है जबकि उपज वृद्धि दर 4.56 प्रतिशत ही है, वहीं 2013-14 तक पाँच वर्षों में यह 5.95 प्रतिशत थी।

जलवायु परिवर्तन का निदान ढूँढने के बजाय जिस तरह सभी देश आपस में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, वह काफी चिंताजनक है। स्थिति अगर ऐसी ही रही तो वो दिन दूर नहीं जब किसान खेती करना छोड़ देंगे। जलवायु परिवर्तन एक विभीषक रूप लेते जा रही है, अगर सभी देश मिलकर जल्द से जल्द इसका हल नहीं ढूँढा तो इसके परिणाम अत्यंत ही गंभीर हो सकते हैं।