भारती
एफपीओ के आने से क्या परिवर्तन आएगा कृषि पद्धति में और कैसे लाभान्वित होंगे किसान

प्रसंग- एफपीओ के अस्तित्व में आने से कैसे लाभान्वित होंगे किसान।

पिछले सप्ताह (29 फरवरी को) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर में 10,000 किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) बनाने की महत्वाकांक्षी योजना शुरू की जिसका प्राथमिक उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों की सहायता करना है।

ये 10,000 एफपीओ 2024 तक, पाँच वर्षों के काल में खोले जाएँगे और इसके लिए केंद्र ने 4,496 करोड़ रुपये आवंटित कर दिए हैं। एफपीओ योजना का लक्ष्य 86 प्रतिशत किसानों को लाभ पहुँचाना है जिनके पास 1 हेक्टेयर से कम की भूमि है।

19 फरवरी को प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के कथन में कहा गया कि आर्थिक मामलों से संबंधित कैबिनेट समिति ने इस कार्यक्रम को स्वीकृति दे दी है और उन्होंने 2019-20 के बजट की ओर इशारा किया जहाँ 10,000 एफपीओ की स्थापना का बात कही गई थी।

2011-12 में एफपीओ की अवधारणा की गई थी और राज्य सरकारों के साथ साझेदारी में एक पाइलट परियोजना शुरू हुई थी। इस परियोजना को लघु किसान एग्री बिज़नेस कंसर्टियम (एसएफएसी) के माध्यम से लागू किया गया था।

एफपीओ गठन के लिए 6 मार्च 2020 को हुई एसएफएबी की एक बैठक

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, शहरी क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय सब्जी पहल और 60,000 वर्षा पूर्ण गाँवों में दलहन विकास कार्यक्रम के 250 एफपीओ स्थापित किए थे जिसमें 2.5 लाख किसान जुड़े थे। यह पाइलट परियोजना प्रभावशाली सिद्ध हुई और ग्राम-स्तर पर 3 लाख किसान किसान-हित समूहों से जुड़े।

31 अक्टूबर 2019 तक 822 एफपीओ से 8.28 लाख छोटे और सीमांत किसान जुड़ चुके थे।

क्या हैं एफपीओ?

एफपीओ सदस्य आधारित संगठन है जिसका अर्थ यह है कि किसान इसके सदस्य होंगे। एफपीओ के नेता चुने जाएँगे और वे अपने संगठन के सदस्यों के लिए जवाबदेह होंगे।

एफपीओ में सोसायटी, न्यास, सहकारी संगठन, सहयोग सोसायटी और किसान उत्पादक कंपनियाँ होंगी। एफपीओ को कंपनी अधिनियम 2013 के तहत पंजीकृत किया जा सकता है और ये एकत्रीकरण का कुशल माध्यम बनेंगे।

तीन एजेंसियों को एफपीओ की स्थापना व प्रचार के लिए चुना गया है। ये तीनों हैं- एसएफएबी, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)।

राज्य भी परियोजना को लागू करने के लिए कृषि सहकारी और किसान कल्याण (डीएसीएफडब्ल्यू) से परामर्श कर अपनी ओर से एजेंसी नियुक्त कर सकती है।

डीएसीएफडब्ल्यू इन तीन एजेंसियों के लिए राज्य और क्लस्टर तय करेंगे। उसके बाद क्ल्स्टर स्तर पर व्यापार संगठन स्थापित किए जाएँगे।

इन क्ल्स्टर स्तर के संगठनों में फसल किसानी, कृषि बाज़ार, मूल्यवर्धन और प्रसंस्करण, सामाजिक सक्रियता, विधि एवं खाता और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञ होंगे जो हर समस्या का समाधान दे पाएँगे।

सरकार इन्हें क्यों स्थापित कर रही है?

10,000 एफपीओ स्थापित करने की यह योजना मोदी सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के प्रयासों क ही भाग है। इससे पहले सरकार ने 2022 तक 7,000 एफपीओ स्थापित करने की योजना बनाई थी।

इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह कि सरकार किसानों सशक्त करना चाहती हैं। छोटे और सीमांत किसानों के पास उत्पादन तकनीक, सेवाएँ, बाज़ारीकरण और मूल्यवर्धन के लिए आर्थिक सामर्थ्य नहीं होता है।

एफपीओ के स्थापित होने से किसानों को बेहतर इनपुट गुणवत्ता, तकनीक, मशीनीकरण, ऋण और बाज़ार तक पहुँच मिलेगी। इससे किसान अपनी लागत बचा पाएँगे और एफपीओ सामूहिक रूप से मोल-भाव करके उन्हें फसल का बेहतर दाम भी दिलाएगा।

एफपीओ को एक जिला, एक उत्पाद कार्यक्रम के साथ बढ़ावा दिया जाएगा। इस कार्यक्रम का उद्देश्य एक क्लस्टर में किसी एक उत्पाद की विशेषज्ञता, प्रसंस्करण, बाज़ारीकरण, ब्रांडिंग और निर्यात को बेहतर करना है। 1 फरवरी को अपने बजट वक्तव्य में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी इस कार्यक्रम की बात कही थी।

हैदराबाद में हुई एक जिला, एक उत्पाद की कार्यशाला

एफपीओ का वित्तीय आधार बढ़ाने के लिए सरकार इक्विटी ग्रांट का भी प्रावधान लाएगी। नाबार्ड में 1,000 करोड़ रुपये का ऋण गारंटी कोष होगा जिसमें नाबार्ड और डीएसीएफडब्ल्यू का समान योगदान होगा।

डीएसीएफडब्ल्यू के समान योगदान से एनसीडीसी में भी 500 करोड़ रुपये का क्रेडिट गारंटी फंड बनेगा। इससे इन एफपीओ को ऋण देने वाली वित्तीय संस्थाओं का खतरा घटेगा।

इसी प्रकार राज्य और केंद्र-शासित प्रदेश भी किफायती दरों पर एग्री-मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के तहत ऋण ले सकते हैं। प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए भी सरकार एफपीओ और क्लस्टर स्तर के संगठनों की सहायता करेगी।

किसानों का कैसे होगा लाभ?

सबसे पहली बात ये कि किसानों का बीज, कीटनाशक और ऊर्वरर्कों पर होने वाला खर्च बचेगा क्योंकि ये सारी चीज़ें थोक में खरीदी जाएँगी। खुदाई, बुआई और कटाई के लिए आवश्यक उपकरणों को भी थोक में किराए पर लिया जाएगा, इससे उनकी लागत और बचेगी।

इसका अर्थ एक मेकैनिकल हार्वेसटर के उदाहरण से समझें। प्रति घंटे का किराया पूरे समूह के लिए तय होगा, न कि एक किसान के लिए। इससे खेतों पर मशीन का उपयोग करना भी उन्हें सस्ता पड़ेगा।

किसान कटाई के बाद होने वाले नुकसान को भी नियंत्रित कर पाएँगे क्योंकि एक समूह के रूप में वे बेहतर भंडारण सुविधाओं या मूल्यवर्धन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं। जब दाम गिरते हैं तब एफपीओ उन्हें दबाव में आकर सामान बेचने से भी रोक पाएगा क्योंकि उनके पास सामान रखने की व्यवस्था होगी।

अनुबंधित खेती में किसानों के प्रवेश में भी एफपीओ सहायता कर सकता है। इससे बुआई के पहले ही किसानों के पास एक निश्चित आय होगी और किसान मूल्य व माँग-आपूर्ति के विषय में भी जानकारी रख पाएँगे।

एफपीओ के माध्यम से किसान अपने उत्पाद पर ऋण भी ले सकते हैं। इससे किसान कम आपूर्ति वाले समय में अपना उत्पाद बेचकर अधिक दाम कमा सकते हैं।

एफपीओ अपने सदस्यों के उत्पाद के बदले में दूसरे उत्पाद भी खरीद सकते हैं या इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-नाम) के माध्यम से भी उत्पाद बेच सकते हैं।

ये संगठन विकसित देशों जैसे यूएस और ऑस्ट्रेलिया में हैं। वहाँ ये संगठन किसानों को वाहन समेत कई वस्तुएँ कम राशि (डिस्काउंट) पर उपलब्ध करवाते हैं और उनके उत्पाद का अच्छा मूल्य भी सुनिश्चित करते हैं।

लेकिन इन एफपीओ के सामने कई चुनौतियाँ भी हैं जैसे किसानों को सक्रिय करना, अच्छा प्रबंधन, हर शुरुआती परियोजना में जिन समस्याओं का सामना किया जाता है, वह, सीमित सदस्यता, नीतियाँ, स्वायत्तता और ऋण बाधाएँ।

नर्तमान में देश में 5,000 एफपीओ हैं और 30 प्रतिशत कुशलतापूर्वक काम कर रहे हैं वहीं अन्य 20 प्रतिशत अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। शेष 50 प्रतिशत अभी भी शुरुआती स्तर पर ही हैं।

एफपीओ की स्थापना ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल देने के लिए भी है क्योंकि अगर किसानों को उत्पाद पर अधिक राशि मिलेगी तो उनके हाथों में अतिरिक्त नकद रहेगा जिसका व्यय वे कई वस्तुओं की खरीद पर कर सकते हैं जैसे वाहनों से लेकर आभूषण जैसे उपभोक्ता उत्पाद।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।