भारती
फडणवीस की असफलता दर्शाती है कि भाजपा प्रतिक्रिया की विपरीत दिशा में खड़ी है

यदि फडणवीस की असफलता से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बेइज़्ज़ती हुई है, जहाँ कुछ दिनों में मुख्यमंत्री को त्याग-पत्र देना पड़ा क्योंकि वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का समर्थन नहीं जुटा पाए तो इसमें दोष केवल भाजपा का है। अब यह निश्चित हो चुका है कि सरकार शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस की बनेगी।

पार्टी को सीखना होगा कि किसी भी मूल्य पर सत्ता प्राप्त करना इसका उद्देश्य नहीं है। इसे यह भी समझना होगा कि इसका क्षेत्रीय प्रभाव 2014-19 के समान नहीं है। यदि ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के नारे ने भाजपा के पहले कार्यकाल में इसकी महत्वाकांक्षाएँ बढ़ाईं तो अब अन्य पार्टियों के पास प्रेरणा है कि वे साथ आकर भाजपा को सत्ता से बाहर रखें।

भाजपा के कम होते प्रभाव को देखना होगा जहाँ अब केवल उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक ही प्रमुख राज्य हैं जहाँ इसका शासन अपने दम पर है। पार्टी को न्यूटन के तीसरे सिद्धांत को पढ़ना चाहिए- प्रत्येक क्रिया के समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

एक केंद्र पर मज़बूत होती पार्टी की प्रतिक्रिया में ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं कि विरोधी पार्टियों का मज़बूत गठबंधन इसके बदले में उभरकर आता है। राज्यों में अभी यही हो रहा है जहाँ क्षेत्रीय और कमज़ोर पार्टियाँ एक साथ आकर भाजपा को सत्ता से बाहर रखना चाहती हैं।

इस ट्रेंड का प्रतिरोध करना बेवकूफी होगी जब तक कि यह स्वाभाविक रूप से न हो। यह तब ही होगा जब भाजपा के मज़ूबत क्षेत्रीय नेता उभरें जो अपने दम पर वोट जीत पाएँ।

भाजपा को ईश्वर से कोई अधिकार नहीं मिला है भारत पर शासन करने का। विकल्पों का अभाव किसी लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। यही प्रवाह है जिसके विरुद्ध भाजपा खड़ी है और न नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की लोकप्रियता, न अमित शाह का संगठनात्मक सामर्थ्य इससे लड़ सकता है।

भारतीय जनता ने छह माह पहले ही मोदी को एक प्रबल जनादेश दिया था और इसके बदले केंद्र सरकार भी अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए प्रगति के लिए बड़े परिवर्तन और सुधार कर रही है। इस जनादेश के लिए हर राज्य में जीतना आवश्यक नहीं है।

पिछले वर्ष कर्नाटक की तरह ही महाराष्ट्र में भी भाजपा के पास इतना जनादेश नहीं था कि वह अपने दम पर सरकार बना ले। बहुमत के आँकड़े की पूर्ति निर्दलियों से भी नहीं की जा सकती थी। इसका लाभ उठाने का प्रयास शिवसेना ने किया।

भाजपा के पास दो विकल्प थे- बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद की शिवसेना की मांग को मान ले या अपने सिद्धांत पर खड़ा रहकर विपक्ष में बैठे। दो सप्ताह पहले फडणवीस ने दूसरा विकल्प चुन लिया था। लेकिन इस सप्ताह में क्या बदल गया?

जब सेना, कांग्रेस और एनसीपी के समझौते पूरे होने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे, तब ही फडणवीस ने एनसीपी के नेतृत्व से स्पष्ट समर्थन के बिना मैदान में छलांग लगा दी। जब केवल अजित पवार ही आपके समर्थन में थे तो शरद पवार के विरोध के समक्ष बहुमत का दावा करना मूर्खता थी।

आँकड़ों के बिना सत्ता की इस दौड़ को स्वीकारा नहीं जा सकता। इस प्रक्रिया में केवल केंद्रीय और राज्य स्तर पर ही भाजपा अपमानित नहीं हुई है, बल्कि जब फडणवीस ने त्याग-पत्र दिया था, तब इसके खाते में आए नैतिक और सहानुभूति के कारक भी फीके पड़ गए हैं।

सत्ता में बने रहने के लिए हर संभव प्रयास करके फडणवीस ने- 1. सेना को एक नया जीवन और सत्ता में बने रहने की अतिरिक्त इच्छशक्ति दे दी, 2. शरद पवार की विश्वसनीयता बढ़ा दी, और 3. कांग्रेस को भारत के सबसे समृद्ध राज्य की सत्ता में भागीदार बना दिया।

भाजपा के अनपेक्षित गठबंधन ने इन तीनों पार्टियों को पहले की अपेक्षा से अधिक समय तक अपने मतभेद भुलाकर सत्ता में रहने का कारण दे दिया। मतभेदों की तनातनी के कारण इस गठबंधन को किसी दिन कमज़ोर होना ही था, लेकिन अब केवल अभिमान के आधार पर ही ये एक वर्ष तक शासन कर लेंगे।

सेना भाजपा को कुछ सिद्ध करना चाहती है और इसे सिद्ध करने के लिए उद्धव ठाकरे कई बलिदान देने के लिए भी तैयार हो जाएँगे। मोदी का दूसरा कार्यकाल उनके पहले कार्यकाल से दो तरीकों से अलग होगा-

पहला, पहले कार्यकाल के विपरीत पार्टी के लिए विपक्ष को खंडित करना आसान नहीं होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि उनका अस्तित्व साथ रहने से बेहतर होगा।

दूसरा, भाजपा उन क्षेत्रों में लाभ अवश्य कमा सकती है जहाँ यह पारंपरिक रूप से मज़बूत नहीं है। राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और संसाधनों के बल पर जिन राज्यों ने भाजपा को पहले कभी अवसर नहीं दिया, वे अब इसके लिए इच्छुक हो सकते हैं। सरकार बनाने का जनादेश नहीं लेकिन सीटों में कुछ बढ़त तो भाजपा को मिल ही सकती है।

भाजपा के लिए जो बातें उन राज्यों में काम नहीं करती हैं जहाँ वह मज़बूत है, वही बातें इसके कमज़ोर क्षेत्रों में काम करेंगी जहाँ क्षेत्रीय पार्टियों से लोग परेशान हो चुके होंगे, जैसे पश्चिम बंगाल।

यह बेहतर होगा यदि मोदी और शाह हर राज्य को जीतने पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय राष्ट्रीय विपक्ष से समर्थन का पुल बनाएँ, ताकि लंबित पड़े हुए आर्थिक, राजनैतिक और न्यायिक सुधार किए जा सकें। इन सुधारों से मिलने वाले चुनावी समर्थन का लाभ बाद में राज्यों में उठाया जा सकता है।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।