भारती
चीन-भारत के मध्य लद्दाख व सिक्किम गतिरोध की व्याख्या, चीनी गतिविधियों का विश्लेषण

पिछले सप्ताह भारतीय सेना और चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के जवानों के मध्य पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में तीव्र गतिरोध देखने को मिला लेकिन दोनों पक्षों के बीच यह पहला शस्त्रहीन आमना-सामना नहीं है तथा न ही यह अंतिम होगा।

छोटे-बड़े गतिरोध प्रायः हो जाते हैं और अधिकांश शांतिपूर्ण ही रहते हैं। पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग सो झील और उत्तरी सिक्किम के नाकू ला की तरह केवल कुछ ही गतिरोध शारीरिक हिंसा में परिवर्तित होते हैं।

ये गतिरोध इसलिए होते हैं क्योंकि 4,057 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) गैर-सीमांकित और विवादित है। विवाद मुख्यतः इसलिए है क्योंकि बीजिंग उस भारत-तिब्बत सीमा को नहीं मानता जो 1947 में ब्रिटिश व तिब्बती प्राधिकारियों द्वारा बनाई गई थी।

चीन दावा करता है कि तिब्बत सदैव उसका अखंड भाग रहा है और ब्रिटिश व तिब्बती प्राधिकारियों द्वारा बनाई गई सीमा को तत्कालीन चीनी शासकों से स्वीकृति नहीं मिली थी। बीजिंग का दावा है कि तिब्बत के जो भाग ब्रिटिश इंडिया को दे दिए गए थे, वे सब चीन के हैं। भारत इस दावे से सहमत नहीं है।

1962 के भारत-चीन युद्ध और 1990 के दशक की शुरुआत तक छोटे-मोटे सैन्य संघर्ष इस असत्कारशील सीमा पर होते रहे हैं। सितंबर 1993 में भारत-चीन ने सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए एक समझौता किया था। इसके बाद नवंबर 1996 में एक दूसरा समझौता हुआ था जिसके तहत एलएसी पर विश्वास स्थापित करने के उपाय करने थे।

जनवरी 2012 में एक और समझौता हुआ जो एलएसी मामले पर दोनों पक्षों से परामर्श करने और उनके मध्य समन्वय स्थापित करने की बात करता है। इन समझौतों के फलस्वरूप दोनों पक्ष सीमा विवाद और गतिरोध सुलझाने के लिए स्थापित नियमों का पालन करते हैं।

एलएसी पर पहरा

दोनों पक्ष सीमा पर पहरा देते हैं और ऐसे पहरे प्रायः शस्त्रों के बिना या जवान छोटे हथियारों के साथ ही होते हैं। नियम के अनुसार अगर उनका आमना-सामना हो तो हथियारों को गैर-आक्रामक अवस्था में रखना है जैसे बंदूक की नली को भूमि की ओर रखना होता है।

बिना तार की गैर-सीमांकित सीमाओं की दुर्गम भौगोलिक अवस्था— बर्फ से रेगिस्तान तक, चट्टानी क्षेत्र से थोड़े पेड़-पौधे वाले बड़े रेतीले मैदानी क्षेत्रों तक⁠— होने के कारण कई बार गश्ती दल ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है जिसे विपक्षी दल उसका होने का दावा करता है। ऐसी ही परिस्थिति में आमना-सामना होता है।

सामान्य रूप से जब दोनों पक्षों का आमना-सामना होता है तो वे स्थाई मुद्रा में खड़े हो जाते हैं और ‘बैनर (पताका)’ ड्रिल करते हैं। बैनर लगाकर वे दावा करते हैं कि वह क्षेत्र उनका है और दूसरे पक्ष को वहाँ से जाने के लिए कहते हैं।

चीन द्वारा दिखाए जाने वाले बैनर अंग्रेज़ी व हिंदी में होते हैं एवं भारत द्वारा दिखाए जाने वाले बैनर मैंडरीन व अंग्रेज़ी में। अधिकांश बार ऐसी बैनर ड्रिल घंटों तक चलती है और अधिकारियों, प्रायः मेजर या लेफ्टिनेंट कर्नल पदाधिकारी, के आदेश के बाद जवान गतिरोध समाप्त करते हैं।

हालाँकि कई बार ऐसा भी होता है कि भारतीय सेना और पीएलए जवान आक्रोशित शब्दों या अपशब्दों का आदान-प्रदान भी करते हैं, एक-दूसरे को धक्का देते हैं और पत्थरबाज़ी भी करते हैं। लेकिन ऐसे हिंसक गतिरोध सामान्य नहीं है व कभी-कभार ही होते हैं। और जब गतिरोध इस स्तर पर पहुँच जाता है तब ही बटालियन कमांडर (कर्नल) स्तर के वरिष्ठ अधिकारी हस्तक्षेप करके गतिरोध समाप्त करते हैं।

नियम के अनुसार इस मुद्दे को चयनित स्थानों (पूर्वी सिक्किम का नाथू ला ऐसा ही एक स्थान है) की सीमा बैठकों में उठाया जाता है जब ब्रिगेड या डिविज़न कमांर इसपर चर्चा करते हैं। ऐसी बैठकें प्रायः सौहार्दपूर्ण होती हैं और दोनों पक्ष अपने दावों को दोहराकर यथास्थिति बनाए रखने पर सहमत हो जाते हैं।

नाथू ला सीमा पर चीनी और भारतीय सैनिक

चीन द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों पर कब्ज़ा

लेकिन चीनी हमेशा प्रयास करते हैं, प्रायः असफल प्रयास कि भारतीय भूभाग के छोटे-छोटे भाग पर चुपचाप और चोरी से कब्ज़ा कर ले। वे ऐसा उन क्षेत्रों में अतिक्रमण से करते हैं जो अनाधिकारिक रूप से भारतीय भूभाग का हिस्सा माने जाते हैं।

जब भारतीय पक्ष को इस अतिक्रमण का पता चलता है तो वह अपने जवानों को वहाँ भेजता है और गतिरोध होता है। इसके बाद पीएलए जवान पीछे हट जाते हैं लेकिन पूरी तरह नहीं। सीमा सीमांकित नहीं है और प्रायः कोई भौतिक संरचना भी नहीं है जो अनौपचारिक रूप से वास्तविक नियंत्रण रेखा की पहचान कराए, ऐसे में चीनी पूर्ण रूप से पीछे नहीं हटते हैं।

“अतिक्रमण किए हुए क्षेत्र का कुछ भाग वे (चीनी) हड़प लेते हैं जिसे सिद्ध करना बहुत कठिन हो जाता है। फिर हमें मानचित्रों और सैटेलाइट इमेजरी का सहारा लेकर चीनियों को दिखाना होता है कि वे पूर्ण रूप से पीछे नहीं हटे हैं। यह वरिष्ठ कमांडर स्तर की सीमा बैठकों में होता है।”, पूर्वी कमांड के सेना मुख्यालय कोलकाता के फोर्ट विलियम में नियुक्त एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने बताया।

“कई बार चीनी इस बात को नहीं स्वीकारते और हठ करते हैं। तब हम कुछ नहीं कर सकते और थोड़े भूभाग को देना अस्थाई बात की तरह स्वीकार करते हैं। लेकिन बाद में और जैसे ही पहला अवसर मिले, हम अपने पहरेदारों को वहाँ भेजकर अपना भूभाग पुनः प्राप्त कर लेते हैं।”, अधिकारी ने कहा।

इस प्रकार यह निरंतर चलने वाले चूहे-बिल्ली के खेल के जैसा है। अगर यह मामला गंभीर न होता तो इस चूहे-बिल्ली के खेल को हास्य की दृष्टि से भी देखा जा सकता था।

गश्ती दल जो उस क्षेत्र में घुस जाते हैं जो विपक्षी का माना जाता है, वे अपने उल्लंघन की निशानियाँ भी छोड़े जाते हैं जैसे खाली सिगरेट पैक्ट, चॉकलेट रैपर और यहाँ तक कि समाचार-पत्रों या पुस्तकों के पन्ने भी। भारतीय गश्ती दल को प्रायः ऐसी चीनी वस्तुएँ मिलती हैं और पीएलए भी भारतीय जवानों द्वारा छोड़ी गई ऐसी निशानियों की शिकायत करता है।

पिछले सप्ताह की घटनाएँ

5 और 6 मई की मध्यरात्रि को 15,000 फीट की ऊँचाई से अधिक पैंगोंग सो के उत्तरी तट पर एक विवादित क्षेत्र में चीनी टोली ने भारतीय जवानों की उपस्थिति पर आपत्ति जताई। दोनों पक्षों में बहस हुई जिसने झगड़े का रूप ले लिया।

पैंगोंग सो झील

एक तरुण कैप्टन के नेतृत्व में भारतीय जवान वहीं टिके रहे। पीएलए जवानों ने भारतीय जवानों पर पत्थरबाज़ी शुरू कर दी जिसका भारतीय सैनिकों ने भी कुछ हद तक प्रतिकार किया। कुछ सैनिकों के बीच हाथापाई भी हुई और युवा अधिकारी समेत आधा दर्जन भारतीय जवान घायल हो गए। लगभग सात पीएलए जवान भी घायल हुए।

6 मई की भोर में स्थानीय कमांडरों के एक-दूसरे से बात होने के बाद दोनों पक्षों ने गतिरोध रोका। शनिवार (9 मई) को उत्तरी सिक्किम में हुए गतिरोध के साथ इस गतिरोध पर भी अगली सीमा बैठक में चर्चा होगी।

16,400 फीट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित उत्तरी सिक्किम के नाकू ला पास में यह गतिरोध हुआ। शनिवार सुबह भारतीय और चीनी गश्ती दलों का आमना-सामना हुआ। जब चीनी जवानों ने भारतीय सैनिकों को पीछे धकेलने का प्रयास किया तो उन्होंने अपने स्थान पर खड़े होकर एक मानव शृंखला बना ली।

गतिरोध जारी रहा तो घटनास्थल पर दोनों ओर से अतिरिक्त सैन्यबल आ गया। दोनों पक्षों में हाथापाई हुई और उन्होंने एक-दूसरे पर पत्थर भी बरसाए। पाँच भारतीय जवान और सात पीएलए सैनिक घायल हुए। स्थानीय कमांडरों की आपस में वार्ता के बाद कुछ घंटों में विवाद सुलझ गया।

भूतकाल में ऐसे गतिरोध लद्दाख सेक्टर में कई बार हिंसक हुए हैं जैसे पिछले वर्ष के सितंबर में दोनों पक्षों के बीच शारीरिक लड़ाई हुई थी लेकिन हाल के वर्षों में सिक्किम में ऐसा देखा नहीं गया था।

अरुणाचल प्रदेश की तरह सिक्किम पर चीन अपना दावा नहीं करता है। और इसलिए सिक्किम सेक्टर के निकट एलएसी पर चीन की पहरेदारी आपत्तिजनक नहीं है। लेकिन पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग सो पर चीन अपना कब्ज़ा जमाता है और 1962 में इसने झील का दो-तिहाई यानी 604 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्रफल हड़प लिया थाय़

एलएसी झील को पार करती हुई गुज़रती है लेकिन इसकी सटीक मार्गरेखा पर दोनों पक्षों की सहमति नहीं है। 45 किलोमीटर लंबा झील का पश्चिमी तट भारत के नियंत्रण में है। हालाँकि खारे पाने की इस झील का कोई सामरिक लाभ नहीं है लेकिन ‘चुशुल पहुँच’ के लिए यह आवश्यक है यानी इसके सहारे चीन झीले के उत्तरी और दक्षिणी छोरों से आक्रमण कर सकता है।

1962 के युद्ध में भी चीन ने अपना मुख्य आक्रमण इसी छोर से किया था। चुशुल घाटी को जाने वाले रेज़ांग ला पास पर भारतीय सेना के साहसी युद्ध पर चेतन आनंद ने 1964 में हक़ीक़त नामक फिल्म बनाई थी जिसमें बलराज साहनी और धर्मेंद्र मु्य अभिनेता थे।

झील के तट पर चीन ने हर मौसम क्रियाशील रहने वाली मोटर वाहनों के लिए उपयुक्त सड़कों का निर्माण कर लिया है। 1999 में कारगिल के लिए जब पैंगोंग सो में तैनात भारतीय सेना की टुकड़ी को स्थानांतरित किया गया था, तब चीन से इसका फायदा उठाते हुए भारतीय भूभाग में 5 किलोमीटर लंबी सड़क बना दी थी।

इस क्षेत्र में चीनी सड़कों का नेटवर्क जी2019 काराकोरम राजमार्ग से जुड़ता है। इन सड़कों के एक स्थान से चीनी सेना पैंगोंग सो के उत्तरी छोर पर स्थित भारतीय सेना पर निगरानी रखती है।

कुछ वर्ष पहले भारतीय सेना ने झील में तीव्र गति वाली गश्ती नावों की शुरुआत की थी जिससे चीन आक्रोशित हो गया और फलस्वरूप चीन ने उल्लंघन की घटनाओं को बढ़ा दिया है।

पिछले पाँच वर्षों में एक बड़ा परिवर्तन देखने को मिला है जब चीन के आक्रामक रवैये से भी भारत पीछे नहीं हटता है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण 2017 की डोकलाम घटना है जब दोनों सेनाओं के बीच लंबे गतिरोध के बाद चीन को भूटानी भूभाग से पीछे हटना पड़ा था।

जयदीप मज़ूमदार स्वराज्य में सहायक संपादक हैं। वे @joyincal09के माध्यम से ट्वीट करते हैं।