भारती
भारत को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आक्रामकता दिखाकर नहीं होगा चीन का कोई लाभ

आशुचित्र- चीन भारत को कई बार 1962 से सीखने को कह चुका है लेकिन बेहतर होगा अगर वह स्वयं 1967, 1986 और डोकलाम 2017 से सीखे।

लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर लद्दाख में भारतीय और चीनी सेनाओं का आमना-सामना जारी और यह एकमात्र ऐसी घटना नहीं है और न ही अंतिम ऐसा आमना-सामना होगा।

ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसे सामनों को उकसाना बीजिंग की अशुभ रचना है जिसमें वह अपने सैनिकों को गैर-सीमांकित एलएसी के दक्षिणी छोर पर आक्रामक गश्ती के लिए भेजता है। उसका उद्देश्य है भारत को चिढ़ाना, इसका मनोबल गिराना और फिर एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास कार्य को रोकने के लिए विवश करना।

कहा जा रहा है कि चीन एलएसी पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए भारत को एक प्रस्ताव देने के लिए तैयार है। इस प्रस्ताव में भारत को सड़क, पुल, उन्नत लैंडिंग मैदान, गढ़बंदी और लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक 3,488 किलोमीटर लंबे एलएसी पर अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर विकास को रोकने के लिए कहा जाएगा।

अपनी ओर से चीन सीमा पर आक्रामक गश्ती रोकने और पूर्व यथास्थिति बनाए रखने का प्रस्ताव देगा। एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए भारत के प्रयासों से बीजिंग आक्रोशित है और भारत उसकी बराबरी करना चाह रहा है, इससे अप्रसन्न है। चीन अपनी ओर पहले ही अच्छी सड़कें और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण कर चुका है और वह चाहता है कि इस मामले में उसकी बढ़त बनी रहे।

शीर्ष सेना सूत्रों के अनुसार चीन की आक्रामकता तब से बढ़ी है, जब से पिछले वर्ष 255 किलोमीटर लंबी दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल सड़क को भारत ने क्रियाशील किया। एलएसी के निकट अन्य रणनीतिक सड़कों और इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण भी भारत ने तेज़ कर दिया है जिससे अपने क्षेत्रीय आधिपत्य के लिए चुनौती देखकर वह व्याकुल हो गया है।

इसलिए चीन चाहता है कि भारत एलएसी पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास रोक दे। यह भारत की परियोजनाओं का विरोध करता आया है लेकिन नई दिल्ली ने इन विरोधों को मनोयोग से अनदेखा कर दिया है। चीनी नेतृत्व ने महसूस किया कि भारत को बल दिखाना पड़ेगा ताकि वह रुक जाए।

बीजिंग जानता है कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (टीएआर) (जिसे चीन अधिकृत तिब्बत कहा जाता है) में एलएसी पर पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की कम टुकड़ियाँ हैं और उसके सैन्य हार्डवेयर भी इस क्षेत्र में कम हैं। वहीं एलएसी पर भारत की कई सैन्य टुकड़ियाँ हैं, विशेषकर पश्चिमी और पूर्वी सेक्टर में।

पैदल सेना के अलावा एलएसी पर भारत के पास काफी तोपें भी हैं। इन क्षेत्रों में वायु ऊर्जा भी भारत को विशिष्ट लाभ देती है। पीएलए वायुसेना कितनी ही सशक्त हो लेकिन 14,700 फीट की औसत ऊँचाई वाले तिब्बती पठार से उड़ान भरने में उनका प्रदर्शन प्रभावित होता है। यहाँ पर भारत बेहतर स्थिति में है।

तिब्बत में चीन के पास काफी सेना आरक्षित है लेकिन ये विद्रोहियों को शांत करने के लिए तैनात की गई है। चीन को भय है कि यदि यह एलएसी पर आक्रामकता बढ़ाएगा तो नई दिल्ली तिब्बत में विरोधियों को भड़का सकता है।

तिब्बत चीन के लिए दशकों से सबसे भेद्य बना हुआ है क्योंकि क्रूर सैन्य दमन के बावजूद यह प्रांत विरोधियों से पूर्णतः मुक्त नहीं हो पाया है। बीजिंग को संदेह है कि जिन तिब्बती शरणार्थियों को भारत ने आश्रय दिया है, उनके माध्यम से नई दिल्ली का इस विरोध में हाथ है। इसे भय है कि यदि पीएलए एलएसी पर आक्रामकता बढ़ाता है तो भारत तिब्बत में विद्रोहियों और विरोधियों को प्रोत्साहित करेगा।

इसलिए अगर सीमित रूप से भी भारत से उसके संबंध शत्रुतापूर्ण हुए तो चीन को अपनी आरक्षित सैन्य टुकड़ियों को तिब्बत से एलएसी पर तैनात करना होगा। इस प्रकार प्रांत पर इसकी पकड़ कमज़ोर पड़ जाएगी, भले ही अस्थाई रूप से। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तिब्बत में उपज रहे विद्रोह चीन के लिए लज्जाजनक होंगे।

इसलिए बीजिंग सोचता है कि यदि एलएसी पर, विशेषकर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में, इंफ्रास्ट्रक्चर कमियों से भारत जूझता रहे तो यह उसके हित में है। इससे भारत स्थाई रूप से पीछे रहेगा और चीन का आधिपत्य बना रहेगा।

बीजिंग की बड़ी भूल

चीन ने इस बार गलती कर दी है। सबसे बड़ी गलती यह थी कि इसने नरेंद्र मोदी शासन को पूर्ववर्ती शासनों के समान ही आँका। पूर्व में भारत अधिकांश रूप से चीनी आक्रामकता के आगे हथियार डाल दिए हैं और चीन अपेक्षा कर रहा है कि भारत हमेशा की तरह झुकता रहे।

लेकिन पिछले छह वर्षों में नई दिल्ली चीन के दबाव के आगे कभी झुका नहीं है और बीजिंग से बराबरी के स्तर पर वार्ता की है। पिछले कुछ वर्षों में सीमा पर हुए सामनों में भारत के सैनिक कभी चुपचाप पीछे नहीं हटे।

डोकलाम भारत के बदले व्यवहार का उत्कृष्ट उदाहरण है। 2017 में डोकलाम पर चीन को पीछे हटना पड़ा था और बीजिंग को इससे कुछ सीखना चाहिए। लेकिन चीन ने अपनी आक्रामकता इस आशा में जारी रखी कि यह भारत को झुका पाएगा और अपनी शर्तें मानने के लिए तैयार कर लेगा।

बीजिंग को आशा थी कि एलएसी पर आक्रामक गश्ती बढ़ाकर, भारतीय भूभाग में और घुसपैठ करके यह सीमा पर आमने-सामने आने की घटनाओं को बढ़ाकर भारत को उकसावों से थका देगा। बीजिंग ने यह भी आँका था कि कोरोनावायरस महामारी के प्रबंध और अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने के प्रयासों में नई दिल्ली इतनी व्यस्त होगी कि वह एलएसी पर निरंतर होने वाले सामनों को झेल नहीं पाएगी।

लेकिन बीजिंग वर्तमान सरकार की इच्छाशक्ति का आँकलन करना भूल गया। भारत ने बीजिंग के धौंस के विरुद्ध खड़े होने के संकल्प को दर्शाया है और यह दूसरे मोर्चों पर चीन के विरुद्ध आक्रामक भी हो गया है, जैसे ताइवान और कोरोनावायरस उद्भव के लिए अंतर्राष्ट्रीय जाँच।

एलएसी पर चीन की आक्रमकता गलत समय पर हुई है। विश्व के कई भागों में चीन-विरोधी भाव है और दक्षिण चीन सागर में इसकी आक्रामकताओं ने कई तटीय देशों को इसके विरुद्ध कर दिया है। यूएस की आक्रामकता का सामना तो यह कर ही रहा है, साथ ही कोरोनावायरस को लेकर इसकी अपारदर्शिता के कारण कई देश मुखर रूप से या छिपकर इसका विरोध कर रहे हैं।

ऐसे में एलएसी पर भारत का विरोध बढ़ाना इसकी भूल लगती है। कोई तरीका नहीं है जिससे समझौता करके भारत सीमा पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास स्थगित करके चीन के यथास्थिति बनाए रखने के प्रस्तावों को स्वीकार कर ले।

चीन के लिए अब एक ही मार्ग शेष है कि डोकलाम में ढाई वर्ष पहले की तरह वह पीछे हट जाए। हालाँकि इस पीछे हटने को वह क्रोधित वचनों और तेवरों से छुपाना चाहेगा लेकिन उसके अभिमान को बहुत बड़ी क्षति पहुँचेगी।

चीन भारत को कई बार 1962 से सीखने को कह चुका है। भारत सीखा है और इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर विकास कर रहा है तथा एलएसी पर अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा रहा है। लेकिन लगता है चीन 1967 के सीमा विवादों, 1986 के ऑपरेशन फाल्कन और मुख्यतः 2017 के डोकलाम से कुछ नहीं सीखा है। बेहतर होगा कि इन घटनाओं से बीजिंग कुछ सीखे और भारत के प्रति अपनी मुद्रा को सही करे।

जयदीप मज़ूमदार स्वराज्य में सहायक संपादक हैं। वे @joyincal09के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।