भारती
मुंबई सब-अर्बन रेल को केवल रुपये आवंटन नहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता

मुंबई का सब-अर्बन (उप-नगरीय) रेल नेटवर्क जिसे आम भाषा में मुंबई लोकल कहते हैं, अपनी क्षमता से अधिक यात्रियों को सेवा देकर आज भी मुंबई के नगरीय यातायात की रीढ़ की हड्डी बना हुआ है। बेहतर सेवा देने के लिए इसे आवश्यकता है विस्तार और सुधार की।

हाल ही में बीजिंग में मुख्यालय वाले एशिया इंफ्रास्ट्रक्चर इनवेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी), जिसमें 7.5 प्रतिशत भागीदारी के साथ भारत दूसरा सबसे बड़ा शेयरहोल्डर है, ने मुंबई अर्बन ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट (एमयूटीपी)-3 को 50 करोड़ डॉलर का दीर्घावधि ऋण की स्वीकृति दी है। दीर्घ समय के लिए ऋण देकर एआईआईबी भारत के शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में रुचि रखता है।

इसके अलावा 2019 के पूर्वार्ध में मुंबई सब-अर्बन रेल के विस्तार और अद्यतन के लिए नरेंद्र मोदी सरकार ने भी विभिन्न परियोजनाओं के लिए कुल 33,690 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की थी। ये परियोजनाएँ एमयूटीपी-3 का भाग हैं जिसकी कुल लागत 54,777 करोड़ रुपये अनुमानित है।

पृष्ठभूमि

लगभग 160 अरब डॉलर की सकल घरेलु आय (जीडीपी) वाला शहर मुंबई भारत के जीडीपी में कुल 6 प्रतिशत का भागीदार है। इसके अलावा आयकर राजस्व के एक-तिहाई हिस्से में भी मुंबई का ही योगदान है।

आर्थिक राजधानी होने के कारण कई लोग यहाँ रोजगार के लिए आते हैं। इस प्रकार सुबह और शाम क्रमशः उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर में भारी संख्या में लोग यात्रा करते हैं। मुंबई विश्व के सबसे प्रतिस्पर्धात्मक शहरों में से एक है लेकिन कुछ मामलों में पीछे रह जाती है जिनमें से सबसे बड़ा है यातायात। मुंबई के सार्वजनिक परिवहन में अत्यधिक भीड़ है और सड़क नेटवर्क पर भी जगह नहीं है क्योंकि यह मांग और आपूर्ति में भारी अंतर है।

1920 के दशक में शुरू हुई यहाँ की सब-अर्बन रेल एशिया के शुरुआती शहरों में से एक थी। 1925 में विक्टोरिया टर्मिनस (अब छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस) से कुरला तक पहली सब-अर्बन रेल चली थी। अब कोलकाता के बाद लंबाई के अनुसार यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। साथ ही यह सबसे जटिल, सर्वाधिक घनत्व वाला व अत्यधिक उपयोग किया जाने वाला तंत्र भी है।

पश्चिमी रेलवे व केंद्रीय रेलवे मिलकर इस 390 किलोमीटर लंबे तंत्र का संचालन करते हैं। यह 2,342 रेल सेवाओं के साथ 80 लाख यात्रियों को प्रतिदिन सेवा देता है। कुल मिलाकर भारतीय रेल सेवाओं का एक-तिहाई उपयोग अकेला मुंबई सब-अर्बन रेल के माध्यम से होता है।

विस्तार का इतिहास

1990 के दशक के मध्य तक सब-अर्बन रेल बिखरने की कगार पर आ गया था। इसके बाद रेल मंत्रालय व महाराष्ट्र सरकार ने पूंजी निवेश कर इसे विकसित करने का निर्णय लिया। मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र (एमएमआर) का व्यापक अध्ययन किया गया व परियोजनाओं को क्रियाशील करके मुंबई शहरी परिवहन योजना (एमयूटीपी) की नींव डाली गई।

1999 में मुंबई रेल विकास निगम लिमिटेड की स्थापना हुई। परियोजनाओं को विभिन्न चरणों में पूरा किया जा रहा है और वर्ल्ड बैंक के ऋणों ने भी इसमें सहायता की है। एमयूटीपी के प्रथम चरण को 2003-04 के संसदीय बजट में स्वीकृति मिली थी। इस परियोजना को मार्च 2012 तक 4,450 करोड़ रुपये की लागत से पूरा किया गया था।

इसके अंतर्गत बोरीवली-विरार, कुरला-ठाणें और सैंटाक्रूज़-बोरीवली के बीच अतिरिक्त सब-अर्बन रेल गलियारे बनाए गए। इसके अलावा 559 नई रेल सेवाएँ चलाई गईं व 1,216 सेवाओं को नौ डब्बों से बढ़ाकर 12 डब्बों का किया गया। इस प्रकार व्यस्त घंटों में रेलों की क्षमता में 36 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

एमयूटीपी के द्वितीय चरण को 2008-09 में संसद ने स्वीकृति दी। इसका अनुमानित व्यय 8,087 करोड़ रुपये है और इसे एमयूटीपी-2ए व एमयूटीपी-2बी नामक दो चरणों में पूरा किया जाएगा। 4,713 करोड़ रुपये वाली एमयूटीपी-2ए का आंशिक खर्च वर्ल्ड बैंक के ऋण से उठाया जाएगा। एमयूटीपी-2बी का पूरा खर्च रेल मंत्रालय व महाराष्ट्र सरकार उठाएगी।

इसके अंतर्गत अंधेरी-गोरेगाँव और मुंबई सेंट्रल-ठाणे के बीच एक अतिरिक्त व ठाणे-दीवा के बीच दो अतिरिक्त लाइनें डाली जाएँगी। इसके अलावा 200 अतिरिक्त सब-अर्बन सेवाएँ शुरू करके यात्री क्षमता को 20 प्रतिशत तक बढ़ाने की भी योजना है। 2012-13 में हार्बल लाइन पर 12 डब्बों वाले रेक चलाने की अनुमति मिली जिसे एमयूटीपी-2सी का नाम दिया गया।

हाल में हो रहा विस्तार

2015-16 के रेलवे बजट में मोदी सरकार ने एमयूटीपी-3 के लिए 11,441 करोड़ रुपये आवंटित किए। इसके अंतर्गत विरार-दहाणू रोड के बीच तीसरी और चौथी रेल लाइन, कर्जत-पनवेल को बीच नया सब-अर्बन गलियारा व एरोली-कलवा के बीच ज़मीन से ऊपरी स्तर पर (एलिवेटेड) पर एक नया गलियारा बनाया जाएगा। 300 अतिरिक्त सब-अर्बन सेवाओं की भी योजना है।

इस वर्ष स्वीकृत हुए 33,690 करोड़ रुपये से वर्चमान सब-अर्बन रेल नेटवर्क का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर किया जाएगा। इसमें नया संचार आधारित सिग्नलिंग सिस्टम (सीबीटीसी), 19 स्टेशनों का उन्नयन, 191 एसी ईएमयू की खरीद, कल्याण-बदलापुर, कल्याण-आसनगाँव, बोरीवली-विरारा, आदि के बीच नई रेल लाइनें सम्मिलित है।

एमयूटीपी-3ए का 13,345 करोड़ रुपये खर्च रेल मंत्रालय व इतना ही महाराष्ट्र सरकार भी उठाएगी। इसके अलावा 7,000 करोड़ रुपये ऋणों के माध्यम से प्राप्त किए जाएँगे। भारतीय रेलवे 16,000 करोड़ रुपये की लागत से सीएसएमटी-ठाणे के बीच एमयूटीपी के चौथे चरण के अंतर्गत तीव्र गति गलियारा बनाने की भी योजना में है।

सब-अर्बन रेल विस्तार परियोजनाओं की व्यवहार्यता

मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र पर किए गए व्यापक परिवहन सर्वेक्षण के अनुसार क्षेत्र में रोजगार के अवसर 2005 के 75 लाख से दोगुने होकर 2031 तक 1.5 करोड़ हो जाएँगे। इसी प्रकार औपचारिक रोजगार भी 56 प्रतिशत से बढ़कर 80 प्रतिशत हो जाएगा। काम पर पैदल जाने वालों की संख्या 40 प्रतिशत से घटकर 30 प्रतिशत हो जाएगी।

प्रति व्यक्ति आय और जनसांख्यिकी लाभांश बढ़ेगा यानी अधिकांश लोग कामकाजी होंगे जिससे सार्वजनिक परिवहन की मांग बढ़ेगी। इस प्रकार सब-अर्बन विस्तार परियोजनाओं की व्यवहार्यता सुनिश्चित होती है।

उदासीनता और उपेक्षा का शिकार सब-अर्बन रेल

मेट्रो जैसे सार्वजनिक परिवहन के विकल्प आने के बावजूद सब-अर्बन ट्रेनों की भीड़ में कोई कमी नहीं आई है क्योंकि ये विकल्प अब तक प्रभावी नहीं हुए हैं। कई स्टेशनों पर सुविधाओं का विस्तार नहीं हुआ लेकिन यात्री संख्या अवश्य बढ़ी है। इससे कानून-व्यवस्था को भी खतरा है और पहले भगदड़ की कुछ घटनाएँ भी हो चुकी हैं।

प्रतिवर्ष ट्रैक पार करते समय या भीड़ वाली ट्रेन से गिरने के कारण सहस्रों लोग अपनी जान गँवा देते हैं। 2018 में 2,734 लोगों ने अपने प्राण गँवाए, जिसका अर्थ हुआ प्रतिदिन सात लोगों की मौत हुई। सब-अर्बन रेल नेटवर्क केवल भौतिक भार ही नहीं, आर्थिक भार भी महसूस कर रहा है।

भीड़ वाली लोकल ट्रेन (चित्र श्रेय- @bethelocal)

अत्यधिक भीड़ वाला यह तंत्र घाटे में चल रहा है। 2013-14 में इसने 1,500 करोड़ रुपये कमाए व 2,600 करोड़ रुपये खर्च किए, यानी 1,100 करोड़ रुपये का घाटा। सामाजिक कर्तव्य के नाते भारतीय रेलवे ने कुछ चीज़ें बढ़ाने का प्रयास किया लेकिन बढ़ती मांग के आगे यह बहुत छोटा प्रयास था।

सब-अर्बन तंत्र का व्यापक स्तर पर कभी विस्तार इसलिए नहीं हुआ क्योंकि इसमें अत्यधिक पूंजी निवेश की आवश्यकता है और इससे लाभ कमाने की अपेक्षा कम है। इसलिए केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति ही इसका उन्नयन और विस्तार कर सकती है।

भविष्य की राह

आधुनिक मुंबई मेट्रो नेटवर्क एक विकल्प बन सकता है जो मुंबई लोकल का भार कम करे। लेकिन यह वर्तमान तंत्र का स्थान नहीं ले सकता है इसलिए आवश्यकता है सब-अर्बन रेल नेटवर्क को अधिक सुरक्षित व आरामदायक बनाते हुए इसका विस्तार व उन्नयन किया जाए।

नरेंद्र मोदी सरकार ने इस कार्य के लिए पर्याप्त राशि आवंटित की है लेकिन कार्य प्रगति की गति धीमी है। 2018 में जहाँ चीन ने अपने बुलेट ट्रेन नेटवर्क में 4,100 किलोमीटर जोड़े, वहीं भारत अपनी आर्थिक राजधानी के सामान्य रेल नेटवर्क में मुश्किल से 40 किलोमीटर जोड़ पाया। यह तुलना दर्शाती है कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए कोई तत्परता नहीं है।

आर्थिक रूप से भी मुंबई सब-अर्बन रेलवे नेटवर्क को उत्थान की आवश्यकता है। इसके किराए बढ़ती महंगाई के आगे कम हैं। 2002 से 2012 के बीच यात्री किराए में कोई वृद्धि नहीं की गई। किराया बढ़ाने से राजनीतिक रोश का सामना करना पड़ता है इसलिए कोई पार्टी यह नहीं करना चाहती।

इस समस्या को कमाई के दूसरे माध्यम खोजकर हल किया जा सकता है। वर्तमान में इसकी किकट के अलावा अन्य कमाई, कुल कमाई की मात्र 6.5 प्रतिशत है। इसे प्रचार स्थानों को किराए पर देकर, स्टेशन पुनर्विकास और रेलवे भूमि के व्यवसायिक उपयोग से बढ़ाया जा सकता है।

लक्ष्य होना चाहिए कि मुंबई के सब-अर्बन रेलवे को भौतिक और आर्थिक दृष्टि से प्रबल बनाया जाए क्योंकि मुंबई के विकास इंजन का ईंधन यही है। इसके लिए केंद्र, राज्य और स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय व सामंजस्य आवश्यक है। सभी राजनीतिक इकाइयों को अपने मतभेद भुलाकर इसके लिए आगे आना चाहिए।