भारती
मानसून उपरांत हुई अत्यधिक वर्षा से कैसे बढ़ेगा रबी फसलों का उत्पादन

भारत में इस साल मौसम थोड़ा अलग ही रहा है। बीते कुछ वर्षों की तुलना में शायद इस वर्ष सर्वाधिक वर्षा हुई है। देश की कुल वर्षा में 70 प्रतिशत भागीदारी रखने वाला दक्षिणी-पश्चिमी मानसून जून में अच्छा नहीं था लेकिन वर्षा ऋतु के अंत तक देश में सामान्य से 10 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई।

एक ओर जहाँ इस साल जून-सितंबर माहों में देश में अत्यधिक बारिश हुई, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल का गंगा से लगा क्षेत्र, हरियाणा, चंडीगढ़, जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ इलाकों में बारिश में कमी दर्ज की गई।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश को छोड़कर बाकी क्षेत्रों में राहत की बात यह है कि इन क्षेत्रों में खरीफ फसलों का ज़्यादा उत्पादन नहीं होता है। गन्ने का उत्पादन कुछ हद तक इस बात पर भी निर्भर करता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्या परिस्थिति बनती है।

भारत पर इस वर्ष वर्षा के ईश्वरों की दया-दृष्टि रही और इतनी कि आज भी पश्चिमी और पूर्वी तटों पर वर्षा जारी है। वैसे तो पश्चिमी तट पर सितंबर के बाद वर्षा नहीं होती है लेकिन इस बार बादलों को पश्चिमी तटों पर मंडराते हुए देखा गया जो अपने साथ प्रचुर मात्रा में बारिश लाए।

पिछले 40 दिनों में इस क्षेत्र में करीब दो कम दबाव वाले क्षेत्र देखे गए हैं। एक कम दबाव क्षेत्र महा तूफान में बदल चुका है जो गुरुवार (7 नवंबर) को गुजरात तट को पार करेगा।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार मॉनसून उपरांत होने वाली बारिश जो 1 अक्टूबर से 31 दिसंबर के बीच होती है, उसके सामान्य से करीब 39 प्रतिशत अधिक होने के आसार हैं।

और इसी कारण से भारत के मौसमीय क्षेत्रों के 36 मंडलों में से 17 जगहों पर अधिक या अत्यधिक वर्षा हुई है जबकि नौ जगहों पर सामान्य बारिश हुई है। भारत के केंद्रीय हिस्से तो बारिश के पानी में बह से गए हैं। महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान में करीब सामान्य से दोगुनी बारिश हुई है।

कर्नाटक में भी सामान्य से लगभग दोगुनी वर्षा हुई जबकि 1 अक्टूबर के बाद कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से लगभग 50 प्रतिशत से भी अधिक हुई। हालाँकि उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है।

इससे पहले कि हम देखें कि इस अत्यधिक वर्षा में देश और अर्थव्यवस्था के लिए क्या संकेत है, हमें यह देखना चाहिए कि प्रकृति की इस अधिकता ने खरीफ फसलों को क्या हानि पहुँचाई है।

पश्चिमी तट पर वर्षा का एक दुष्प्रभाव रहा कि एक सप्ताह के भीतर प्याज के दाम 40 प्रतिशत बढ़ गए। कुछ राज्यों में खुदरा दुकानों पर प्याज के दाम वर्तमान में 90 रुपये प्रति किलोग्राम तक भी हैं जिसका मुख्य कारण है कि अत्यधिक वर्षा से आपूर्ति में बाधा।

स्काईमेट नामक निजी मौसम विश्लेषक कंपनी के अनुसार मानसून उपरांत हुई वर्षा ने महाराष्ट्र, पंजाब, गुजरात, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में खेतों में लगी खरीफ फसल को नुकसान पहुँचाया है।

प्याज के अलावा सोयाबीन, मक्के और कपास की फसलों पर भी महाराष्ट्र में दुषप्रभाव पड़ा है। इस पश्चिमी राज्य के कम से कम एक-तिहाई बोए हुए क्षेत्र के मानसून उपरांत वर्षा के कारण प्रभावित होने का भय है।

अंगूर, केले, सब्ज़ियाँ, संतरे, मोसंबी आदि महाराष्ट्र की इस मूसलाधार वर्षा से प्रभावित हुए हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि राज्य फलों के उत्पादन में अव्वल है। गुजरात में मूंगफली व कपास की फसल प्रभावित हुई है। मध्य प्रदेश में सोयाबीन व दलहन का नुकसान हुआ है।

पंजाब और कर्नाटक में धान की खड़ी फसल पानी में डुबी हुई है। कपास की फसल के साथ समस्या यह है कि जनवरी तक इसकी तीन बार चुनाई होनी है। बोए हुए क्षेत्रों में दूसरी चुनाई में समस्या आएगी क्योंकि पानी कपास के गुलरों में घुस गया होगा। बड़ा प्रश्न यह है कि तीसरी चुनाई में क्या होगा।

गन्ना, चावल और अरहर अन्य खरीफ फसलें हैं जो प्रभावित होंगी। नुकसान का अभी भी पूर्ण आँकलन नहीं किया गया है क्योंकि पश्चिमी क्षेत्रों पर अभी भी वर्षा की मार पड़ रही है।

खरीफ फसल के साथ एक और समस्या जो इस वर्ष रही वह देरी से बुआई की है क्योंकि मानसून की शुरुआत में वर्षा कम हुई थी। इससे कटाई में देरी हुई और खेतों में लगी फसलें मानसून उपरांत वर्षा से प्रभावित हुईं।

दूसरी ओर ये वर्षा रबी फसल के लिए अच्छे संकेत लेकर आ सकती है जिसकी बीज बुआई का अभी समय आ गया है और मार्च के अंत तक इसकी कटाई होगी। सबसे बड़ा लाभ रबी की बुआई में मिट्टी की नमी का मिलेगा।

इस वर्षा से मिट्टी की आर्द्रता बढ़ी है और संभावना है कि इस कारण से किसान जल्दी बुआई करने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इससे किसानों के पास रबी और खरीफ के बीच छोटी अवधि की एक और फसल लगाने का विकल्प खुलेगा। गुजरात में किसान मानसून से पूर्व मूंगफली बोते हैं। हम आशा करते हैं कि जनवरी-मार्च के बीच अच्छी वर्षा किसानों को इस विकल्प की ओर जाने के लिए प्रोत्साहित करे।

दूसरा सुखद समाचार देश के 120 प्रमुख जलाशयों में संचयन का स्तर है। केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, वर्तमान में जलाशयों में जल संचयन स्तर 90 प्रतिशत है। यानी 170.238 अरब क्यूबिक मीटर (बीसीएम) की क्षमता में 153.299 बीसीएम जल। यह स्तर पिछले वर्ष की तुलना में 22 प्रतिशत अंक अधिक और पिछले दस वर्षों के औसत की तुलना में 20 प्रतिशत अंक अधिक है।

पंजाब, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे रबी की फसल उगाने वाले प्रमुख राज्यों में जलाशयों का स्तर सामान्य से 20 प्रतिशत अधिक है।

जलाशय के ये स्तर रबी के अच्छे भविष्य की ओर संकेत करते हैं और तेलंगाना, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लिए और अच्छा संकेत है क्योंकि संभवतः पूर्वोत्तर मानसून के प्रभाव में इन्हें और वर्षा मिलेगी।

देश को अत्यधिक वर्षा से चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह अगले वर्ष खरीफ फसल के समय भी काम आएगी क्योंकि जलाशयों में जल रहेगा। “झीलों, तालाबों और नदियों में पानी भरा देखकर अच्छा लग रहा है क्योंकि अंततः यह अर्थव्यवस्था को बल देगा।”, एक कृषि विशेषज्ञ ने कहा।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की पूंजी कृषि है और इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था की भी। वाहनों, सफेद वस्तुओं और जल्द उपयोग में लाई जाने वाली उपभोक्ता वस्तुओं की ग्रामीण खरीद औद्योगिक उत्पादन और विनिर्माण को प्रोत्साहित करती है जो शहरी अर्थव्यस्था को बल देता है।

भले ही मानसून उपरांत वर्षा के कारण खरीफ फसल प्रभावित हुई है लेकिन इससे रबी फसल का भविष्य प्रबल होगा। अगर अच्छी रबी फसल होगी तो अप्रैल के आसपास हम आर्थिक गतिविधियों में एक नया जीवन देख पाएँगे।