भारती
एपीएमसी एकाधिकार की समाप्ति का निर्णय 1991 के आर्थिक सुधारों से क्यों बड़ा

कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (एपीएमसी) या मंडियों के एकाधिकार को समाप्त करने के नरेंद्र मोदी सरकार के निर्णय को पीवी नरसिम्हा राव सरकार के 1991 के आर्थिक सुधारों से भी अधिक प्रभावशाली माना जा रहा है।

15 मई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की थी कि वर्तमान एपीएमसी अधिनियम में संशोधन किए जाएँगे। उन्होंने कहा, “किसानों को सही मूल्य पर उनका उत्पाद बेचने के लिए उपयुक्त विकल्प मिलेंगे” जो अंतर-राज्य बाधाओं समेत अन्य व्यवधानों से मुक्त होंगे।

“1991 के आर्थिक सुधारों ने लाइसेंस राज को खत्म किया था। एपीएमसी के एकाधिकार को समाप्त करने वाला मोदी सरकार का निर्णय वास्तव में व्यापार सहजता बढ़ाएगा। इस प्रकार इसका प्रभाव अधिक होगा।”, चीनी और कपास बाज़ार पर नज़र रखने वाले कोलकाता आधारित विशएषज्ञ ने बताया।

उन्होंने बताया कि कैसे ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल सरकार पड़ोसी राज्य ओडिशा में किसानों को आलू नहीं बेचने देती थी। “पिछले तीन वर्षों से राज्य में आलू उत्पादन का आधिक्य था लेकिन इसके बावजूद ओडिशा पंजाब से आलू खरीद रहा था क्योंकि बंगाल ने अधिक मूल्य होने के बावजूद पड़ोसी राज्य में किसानों को आलू नहीं बेचने दिया।”, विशेषज्ञ ने कहा।

“अगर किसान राजनीतिक समर्थन प्राप्त कमिशन एजेंट को उत्पाद नहीं देते थे तो उन्हें पीटा जाता था।”, निर्णय के महत्त्व को बताते हुए अनाम रहने की शर्त पर उन्होंने बताया।

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस सरकार ने विधान सभा में एपीएमसी अधिनियम को संशोधित करने के लिए एक विधेयक पारित किया था। इसे किसानों के हित का प्रतिनिधित्व करने वाले शेतकरी संघटना का समर्थन भी प्राप्त था । फिर भी राजनेताओं और व्यापारी लॉबी के जबाव के कारण विधान परिषद में प्रस्तुत होने से पहले ही इस विधेयक को ताक पर रखना पड़ा।

प्रतीक चिह्न

“कुछ राजनेता, विशेषकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस के, वर्तमान एपीएमसी संरचना को ही जारी रखना चाहते हैं।”, मुंबई आधारित कृषि बाज़ार विशेषज्ञ ने बताया। कारण सरल है, महाराष्ट्र के गाँवों में दो सत्ताएँ होती हैं- एक सरपंच की और एक मंडी चलाने वालों की। राजनेताओं के लिए एपीएमसी चुनाव महत्त्वपूर्ण होते हैं क्योंकि मंडी अध्यक्ष सरपंच से भी अधिक शक्तिशाली होता है।

इसी सत्ता संरचना को समाप्त करने के लिए फडणवीस सरकार किसानों के कल्याण के लिए सुधार लाना चाहती थी पर ऐसा हो नहीं पाया। मंबई के दाल आयातकों का कहना है कि राजनेताओं का समर्थन प्राप्त मंडी नेताओं ने उनसे “कई लाख रुपये माँगे थे।”

जब एक आयातक ने प्रश्न उठाया तो नेताओं का जवाब मिला, “तुम्हारे बाप का पैसा नहीं है।” इसका अर्थ था कि “मुझे उन्हें जितने पैसे देने पड़े, वह मैं अपने ग्राहकों से वसूल लूँ।”, एपीएमसी एकाधिकार समाप्ति के निर्णय का स्वागत करते हुए एक आयातक ने बताया।

ऐसे उदाहरण अन्य राज्यों में भी देखे गए। तमिलनाडु के नारियल किसान उत्साहित हैं क्योंकि प्रस्तावित परिवर्तन के बाद वे अपना उत्पाद ओडिशा को बेच पाएँगे। हल्दी और अदरक किसान भी प्रसन्न हैं कि वे अपने जिले की एपीएमसी बंदिश से मुक्त हो पाएँगे।

कुछ और उदाहरण हैं जो दर्शाते हैं कि कैसे राजनीतिक समर्थन प्राप्त लोगों ने किसानों को रिलायंस जैसे बड़े विक्रेताओं को अपना उत्पाद नहीं बेचने दिया या चेन्नई के फूल और फल बाज़ारों पर उनकी पकड़।

अगर एपीएमसी के साथ जुड़ी राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के स्वागत का एक कारण है तो दूसरा कारण है कि यह पहली बार है जब केंद्र किसानों के आउटपुट को संबल देने के लिए कुछ कर रही है।

“अभी तक सरकार केवल इनपुट जैसे उर्वरक, बिजली, ईंधन, बीज, कीटनाशक आदि पर ही ध्यान देती थी। कृषि का बाज़ार विकसित करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया था।”, कृषि बाज़ार विशेषज्ञ ने बताया।

एपीएमसी एकाधिकार को समाप्त करना ऐतिहासिक निर्णय क्यों है इसका तीसरा कारण है कि अभी तक किसान बाज़ार से अधिक बिचौलिए से जुड़ा हुआ था। ऐसे में बिचौलिए मुनाफा कमा रहे थे।

विशेष रूप से सीमांत किसानों को तुरंत राशि का आवस्यकता होती है। उदाहरण स्वरूप, अगर एक छोटा किसान निकटतम मंडी में व्यापारी के पास 50 टन अनाज लेकर जाता है  तो उसे तुरंत रुपये मिलने चाहिए।

“किसान खाली हाथ घर वापस नहीं जा सकता इसलिए विवश होकर उसे बिचौलिए को उत्पाद बेचना पड़ता है। इसके अतिरिक्त किसान लंबे समय तक अनाज अपने पास बी नहीं रख सकता क्योंकि वह खराब हो जाएगा।”, मुंबई आधारित विशेषज्ञ ने बताया।

चौथा कारण है कि एपीएमसी एकाधिकार को समाप्त करने के लिए दो प्रयास किए गए थे। एक प्रयास ने परिणाम दिए लेकिन दूसरा और प्रचारित किया गया इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-नाम) का प्रयास विफल रहा।

फडणवीस के नेतृत्व में महाराष्ट्र में कृषि व्यापार और ग्रामीण परिवर्तन के लिए स्मार्ट नामक एक पाइलट परियोजना शुरू की गई थी। कृषि मूल्य शृंखला में सुधार करने के इस प्रयास को वर्ल्ड बैंक का सहयोग मिला था। महाराष्ट्र सरकार ने आवश्यकताओं, विशेषकर किसान उत्पादक संघों (एफपीओ) और गोदामों को पक्का बनाने के लिए पैसे खर्च किए।

वर्ल्ड बैंक के सहयोग से स्मार्ट कार्यक्रम की शुरुआत करते तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (23 जुलाई 2019)

कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के तहत परियोजना से उद्योगों को जोड़ा गया जहाँ वे दोनों की सहमति पर तय मूल्यों पर किसानों का उत्पाद खरीदते थे। इस प्रयास के अंतर्गत 1,400 एफपीओ शुरू किए गए। इनमें से 400 सक्रिय हैं और निजी लिमिटेड कंपनियों के रूप में पंजीकृत हो चुके हैं।

एफपीओ बनाने के एकल उद्देश्य के साथ कम से कम 10 किसान साथ आए और कुछ एफपीओ ने तो अपने गोदाम भी बनाए। स्मार्ट प्रयास 1,000 गाँवों तक पहुँचा। इस परियोजना के कुछ लाभ भी हुए जैसे सक्रिय एफपीओ महाराष्ट्र भर के साप्ताहिक फल और सब्ज़ी बाज़ारों का प्रबंधन कर रहे हैं।

यह तब संभव हो पाया जब फल और सब्ज़ियों को एपीएमसी की बंदिश से पिछली सरकार ने मुक्त किया। उद्देश्य था एपीएमसी में व्यवसायी समूहन को खत्म करना।

इससे लाभ हुआ कि सब्ज़ी व फल विक्रेता इन साप्ताहिक बाज़ारों से ताज़ा उत्पाद खरीद सकते हैं। व्यवसायी समूहन के समाप्त होने से किसानों और उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचा। दूसरा, किसानों को बेहतर मूल्य मिलने से समूहन का लाभ समझ आ गया। दूसरी पीढ़ी के कुछ किसानों ने हल्के माल वाहन खरीद लिए हैं। वे सबकी फल और सब्ज़ी लेकर इन साप्ताहिक बाज़ारों में पहुँच जाते हैं और उत्पाद का बेहतर मूल्य पाते हैं।

इसमें एक नुकसान हुआ कि कुछ बिचौलियों ने अपना एफपीओ बनाकर सरकारी प्रयासों पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया था। इसी कारण इन 1,400 में से अधिकांश एफपीओ आज कागज़ पर ही हैं।

दूसरी ओर मोदी सरकार का ई-नाम जो किसानों को उनका उत्पाद देश में कहीं भी बेचने में सहायता करता है, अधिक लाभ नहीं दे पाया। कई बाज़ार इस प्रयास से जुड़े हैं लेकिन यह अब भी बाधारहित नहीं हो सका है।

मुंबई आधारित विशेषज्ञ के अनुसार सभी राज्य अब तक ई-नाम से जुड़े नहीं हैं और मंडियों के बीच डिजिटल भुगतान नहीं हो रहा है। “ई-नाम को पूर्ण रूप से क्रियाशील करना एक बड़ी चुनौती है क्योंकि कृषि विभाग और कृषि बाज़ार विभाग एक-साथ मिलकर काम नहीं करते हैं। महाराष्ट्र जैसे राज्यों में इन्हें एक करने में समस्या है।”, कृषि बाज़ार विशेषज्ञ ने कहा।

ई-नाम से जुड़े राज्य और मंडियों की संख्या

इस निर्णय को सीमाचिह्न के रूप में देखे जाने का पाँचवा कारण है कि पहली बार को निर्णय समयानुसार है। कोरोनावायरस कृषि बाज़ार सुधारों की माँग करता है क्योंकि उपभोक्ता अपने द्वारा पर खाद्य की डिलिवरी चाहते हैं। चेन्नई का कोयंबदु, दिल्ली का आज़ादपुर और महाराष्ट्र के नवी मुंबई के बाज़ार जैसे कोरोनावायरस का केंद्र बने हैं, उपभोक्ता बाज़ार नहीं जाना चाहते।

“यहीं पर पिछले दो वर्ष से प्रचलित कृषि के लिए पुणे बाज़ार को सफलता मिली है। पुणे में एीएमसी के मार्ग से आने की बजाय किसान सीधे आवासीय कॉलोनियों में उत्पाद बेचते हैं।”, मुंबई आधारित विशेषज्ञ ने बताया।

अन्य विशेषज्ञों और किसानों का भी मानना है कि एपीएमसी की अपनी सीमाएँ थीं और उन्हें खोलने के लिए सुधारों की बहुत आवश्यकता थी। “बिचौलियों ने पूरी कृषि प्रणाली को जकड़ रखा था।”, बिचौलियों की भूमिका समाप्त होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कोलकाता आधारित विशेषज्ञ ने कहा। हालाँकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये बिचौलिए अब एकत्रित करने वालों की भूमिका ले लेंगे।

मध्य प्रदेश में एपीएमसी एकाधिकार की समाप्ति के निर्णय पर इंदौर से 50 किलोमीटर दूर स्थित किसान सुनील मुखाटी ने कहा, “इस वर्ष हमारी राज्य सरकार ने उत्पाद मंडी पर ले जाने से हमें छूट दे दी है। अधिकांशतः मैं देवास स्थित सरकारी खरीद केंद्र पर अपने गेहूँ बेचने जाता हूँ।”

इससे वे प्रति क्विंटल उत्पाद तौलवाने के 15 रुपये के शुल्क से बच जा रहे हैं। एपीएमसी में कमिशन एजेंट का शुल्क, ढुलाई शुल्क होता है और ऊपर से किसानों को कई घंटों तक प्रतीक्षा भी करनी पड़ती है। मुखाटी ने बताया कि इस वर्ष उनके गाँव के किसान निकट स्थित अडानी सायलो की ओर रुख कर रहे हैं।

केंद्र सरकार की ओर से सायलो को अडानी समूह संचालित कर रहा है और वहाँ उन्हें गेहूँ का इस वर्ष के लिए तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) मिल रहा है। “सायलों को अनाज बेचने के लिए तीन दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। बाज़ार में भी यही स्थिति है।”, कहते हुए एक किसान ने अच्छा मूल्य मिलने पर विश्वास जताया।

मध्य प्रदेश जैसे राज्य में एपीएमसी से छूट मिलने के बाद किसान उत्तम श्रेणी के गेहूँ को और अधिक मूल्य पर बेच सकेंगे, मुखाटी ने बताया। उदाहरण के लिए यहाँ उपजने वाला शरबती गेहूँ पास्ता और पिज्ज़ा के लिए उपोयग किया जाता है और इसे श्रेष्ठ माना जाता है।

आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले के तेंचु वेंकटेश्वरलु एक अच्छा उदाहरण बताते हैं कि कैसे एपीएमसी से छूट किसानों को लाभ पहुँचाएगी, “पिछले 10 वर्षों से मैं अपनी मिर्ची आईटीसी को बेच रहा हूँ  जो अपने अभियान के तहत से हमें निर्यात गुणवत्ता वाली मिर्ची उगाने में सहायता कर रहे हैं। वे मुझे बाज़ार मूल्य से अधिक राशि देते हैं।”

पहले वेंकटेश्वरलु को गुंटुर बाज़ार में अपना उत्पाद बेचने के लिए 200 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। “कई बार वापस लौटने में पाँच दिन लग जाते थे।”, उन्होंने बताया।

परिवहन के अलावा उन्हें कमिशन एजेंट का शुल्क व अन्य बाज़ार गतिविधियों के लिए भी राशि देनी पड़ती थी। “मान लो अगर मिर्ची 10,000 रुपये प्रति क्विंटल पर बिकी तो अतिरिक्त खर्चों में 1,000 रुपये लग जाते थे।”, आंध्र प्रदेश के किसान ने बताया।

मोदी सरकार के निर्णय से आशाएँ तो बढ़ गई हैं लेकिन विशेषज्ञ एपीएमसी के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए केंद्र द्वारा लाए जाने वाले कानून की बारीक रूपरेखा देखना चाहते हैं।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।