भारती
भारत में ईवी का दायरा कैसे बढ़ाया जाए, हितधारकों का दृष्टिकोण अपनाएँ नीति निर्माता
चेतन पटेल - 23rd November 2019

विश्व में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी तेज़ी से बढ़ रही है और भारत में भी इसपर ज़ोर दिया जा रहा है। सरकार ने 2023 तक तिपहिया और 2025 तक 150 सीसी से कम के दुपहिया वाहनों के पूर्ण इलेक्ट्रीकरण का लक्ष्य रखा है। केंद्रीय बजट 2019 में लाए गए खंड 80ईईबी के माध्यम से इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) की खरीद को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

साथ ही फेम के द्वितीय चरण के अंतर्गत 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2022 के तीन वर्षों के समय में ईवी के लिए 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएँगे। लेकिन यदि हम विभिन्न हितधारकों के दृष्टिकोण से नीतियाँ नहीं बनाएँगे तो ये विफल होंगी।

जैसे व्यक्तिगत दृष्टिकोण से कर में बचत का महत्त्व तीन-चार साल बाद महसूस होता है, ऐसे में सब्सिडी देना अधिक उत्साहजनक होगा। सबसे अधिक इलेक्ट्रिक कार की बिक्री वाले देश नॉर्वे में ग्राहक ईवी की खरीद पर 25 प्रतिशत बचाते हैं और उन्हें वैट से छूट मिलती है।

ईवी को प्रोत्साहित कैसे किया जाए यह समझने से पहले हमें इसके व्यवधानों को समझना होगा-

तकनीकी व्यवधान

1. ईवी गाड़ियों के विकल्प बेहतर हो रहे हैं लेकिन अभी भी इलेक्ट्रिक और पारंपरिक गाड़ियों में चुनने के समय ग्राहकों को यही बात सबसे अधिक चिंतित करती है। वर्तमान में भारत में उपलब्ध पूर्ण इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ हैं- महिंद्रा ई वेरिटो और महिंद्रा ई2ओ प्लस जिनकी क्षमता क्रमशः 110 और 140 किलोमीटर है।

महिंद्रा ई2ओ प्लस

लेकिन जब कोई व्यक्ति प्रतिदिन 200 किलोमीटर से अधिक गाड़ी चलाता है तो उसके लिए ये गाड़ियाँ कम उपयोगी हो जाती हैं और इसलिए ग्राहक को लुभा नहीं पातीं। हालाँकि हुंडई कोना और टाटा नेक्सॉन जैसे विकल्प 300 किलोमीटर की क्षमता की बात कर रहे हैं लेकिन वे 2020 तक ही बाज़ार में आ पाएँगे।

2. भारी बैटरियाँ- सबसे बड़ा तकनीकी व्यवधान यह है कि सबसे कुशल बैटरियाँ भी प्रति किलो के हिसाब से बहुत कम ऊर्जा दे पाती हैं जिसके कारण भारी बैटरियों का बोझ उठाना पड़ता है।

3. बैटरी का छोटा जीवनकाल- एक बैटरी लगभग चार-पाँच साल चलती है जिसके कारण उन्हें बार-बार बदलना पड़ता है। इसके अलावा बैटरी पैक का मूल्य भी अधिक होता है। यह लगभग कार के शुरुआती मूल्य का 30-40 प्रतिशत होता है। इसके अलावा त्वरित चार्जिंग से बैटरी का जीवनकाल कम होता है।

4. तकनीक के व्यावहारिक ज्ञान की कमी- पारंपरिक गाड़ियों से इलेक्ट्रिक तकनीक भिन्न है इसलिए ड्राइव तकनीक को भी उसी अनुसार विकसित करना होगा। वाहन में बैटरियों के स्थान, इलेक्ट्रिक मोटर और अन्य यांत्रिकियों को नए सिरे से सोचना होगा। स्टील और एलुमिनियम के स्थान पर हल्के पदार्थ के उपयोग का विकल्प ढूंढना होगा जो मज़बूत हो और भारी बैटरियों को ढोने में सक्षम भी।

आर्थिक सामाजिक व्यवधान

1. चार्जिंग के लिए आवश्यक समय- पारंपरिक वाहनों में पेट्रोल भरवाने में लगने वाले चंद मिनटों की तुलना में ईवी चार्जिंग अत्यधिक समय की मांग करती है। अधिकांश ईवी गाड़ियों को चार घंटे लगते हैं पूर्ण रूप से चार्ज होने में लेकिन कुछ गाड़ियों को 15-20 घंटे का समय भी लगता है जो उन्हें अनाकर्षक बनाता है।

2. उच्च शुरुआती मूल्य- एक मध्यम आकार के ईवी को खरीदना, उसी आकार के पारंपरिक वाहन को खरीदने से 40 प्रतिशत महंगा पड़ता है। खरीदने के समय यह उच्च मूल्य कई ग्रहकों को हतोत्साहित करता है। वे गाड़ी के पूरे जीवनकाल का गणित नहीं जोड़ते हैं, जहाँ कम दाम पर पारंपरिक वाहन खरीदने के बाद उसपर अधिक खर्च होता है।

3. क्षमता पर चिंता- ईवी का सामान्य दूरी तय करने की क्षमता उतनी ही है जितनी पारंपरिक गाड़ी में कम ईंधन के सूचक के आने के बाद होती है। उच्च ऑपरेशन व मेंटेनेन्स लागत, कम शीर्ष गति, बची हुई क्षमता को लेकर अनिश्चितता, चार्जिंग लागत जैसी चिंताओं के कारण लोग ईवी से कतराते हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर व्यवधान

1. उपलब्धता- जहाँ ईवी प्रचलित हैं, वहाँ आपको ईवी चार्जिंग स्टेशन मिल जाएँगे लेकिन तब क्या जब आप किसी सड़क यात्रा (रोड ट्रिप) पर जाएँगे जो गैर-शहरी क्षेत्रों से होकर निकलेगी, वहाँ आपको चार्जिंग स्टेशन नहीं मिलेंगे।

2. अंतर-उपयोगिता और चार्जिंग स्टेशन का गैर-मानकीकरण- वर्तमान में ईवी बाज़ार में तीन तकनीकें हैं जिनके अलग-अलग कनेक्टर और संचार नियम हैं जो इनकी अंतर-उपयोगिता को कठिन बनाते हैं।

3. ई-मोबिलिटी पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) का अभाव और ईवी के लिए विशेष लेनों का न होना इसकी सफलता में बाधा हैं।

संस्थागत और नीतिगत बाधक

ईवी के सार्वजनिक और निजी यातायात साधन चलाने वालों के लिए व्यापार मॉडल नहीं हैं, न ही बैटरी बदलने वालों, किराए पर गाड़ी देने वालों या कार शेयरिंग जैसे क्षेत्रों में ऐसा है। उद्योग से अल्प परस्पर संबंध, चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना के लिए अस्पष्ट ई-मोबिलिटी नीति, नियमों और मानकों का अभाव सरकार की ओर से कुछ बाधक हैं।

औद्योगिक व्यवधान

बदलती तकनीक के साथ विनिर्माण कंपनी को शोध एवं विकास के लिए लगने वाली उच्च लागत, सब्सिडी के लिए सरकार पर निर्भरता और उत्पादन पदार्थ में परिवर्तन चिंता का विषय हैं। उद्योग में अस्पष्ट वृद्धि, गैर-समीकृत उत्पादन सुविधा और कम मांग कंपनियों को इसपर काम करने से हतोत्साहित करते हैं। इस कारण से आर्थिक खतरे भी हैं।

इन व्यवधानों का समाधान करके निम्न कार्बन मोबिलिटी की ओर बढ़ने के लिए हमें निम्नलिखित कार्य करने होंगे-

1. ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर- ईवी चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में विकास के लिए निवेश और अक्षय ऊर्जा के साथ समन्वय आवश्यक है। ईवी ऊर्जा के लिए मूल्यवान ग्रिड सेवाएँ, क्षमता के प्रति ग्राहकों की चिंता को कम करना और इलेक्ट्रिक ग्रिड को बल देना होगा। अध्ययन बताते हैं कि भौगोलिक रूप से चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का अच्छा विस्तार इसकी सफलता सुनिश्चित करता है।

ईवी चार्जिंग स्टेशन

2. बैटरी बदलवाना- बैटरी बदलने का अर्थ हुआ कि एक डिस्चार्ज बैटरी को चार्ज बैटरी से हस्तानांतरित करना। इससे स्टेशन पर चार्ज होने की प्रतीक्षा में लगने वाला समय बचाया जा सकेगा। यह मॉडल ईवी की लागत को कम करेगा और ईवी टचार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सहायक सिद्ध होगा।

3. बैटरी विनिर्माण- बैटरियों का मूल्य कम करने के लिए हमें उन्हें भारत में ही निर्मित करना होगा। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे व लोग ईवी को अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी होंगे जो भविष्य में भारत को तेल आयात की बजाय लिथियम आयात की समस्या से बचाएगा।

4. साझी मोबिलिटी सेवाएँ- इलेक्ट्रिक वाहनों के कार शेयरिंग जैसे व्यवसायिक मॉडल ईवी को केवल स्वामित्व से उपयोगिता तक लेकर आएँगे। उच्च लागत और निम्न क्षमता की समस्या को भी इससे हल किया जा सकता है क्योंकि स्वामित्व की लागत कई लोगों में बँट जाएगी। सार्वजनिक परिवहन के रूप में यह स्थानीय और लंबी दूरी वाली यात्राओं में सहायक बन सकता है।

5. चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्ट्रक्चर का स्थान और मार्ग बताने वाले ऐप व सॉफ्टवेयर- इस व्यवसायिक मॉडल से ईवी चालक उस स्टेशन तक पहुँच पाएँगे जो बैटरी बदलने, फास्ट चार्जिंग, स्लो चार्जिंग आदि विक्लपों में उनके अनुकूल होगा। यह उपभोक्ता की क्षमता को लेकर चिंता को कम करेगा।

6. चार्जिंग पॉइंट सेवाएँ- ऐसे व्यवसायिक मॉडल भी आने चाहिए जो घर या कार्यालय में चार्जिंग पॉइंट इंस्टॉल करें व इनका रख-रखाव भी करें। इससे मांग के अनुसार चार्जिंग पॉइंट बन सकेंगे और ग्राहकों के असमंजस का समाधान बनेंगे।

7. घर या कार्यालय में चार्जिंग पॉइंट- इससे चार्ज होने के लिए लगने वाले लंबे समय की समस्या का निवारण किया जा सकेगा क्योंकि उपभोक्ता बिना समय व्यर्थ किए चार्ज कर पाएँगे। चार्जिंग पॉइंट की निश्चित उपलब्धता चिंता से मुक्त करेगा।

8. अंतर-उपयोगी परिवहन डाटा- अंतर-उपयोगी डाटा इंफ्रास्ट्रक्चर, व्यवसायों, उपभोक्ताओं व परिवहन बाज़ार को जोड़ सकेगा। यदि ऐसा कोई मंच बनाया जाए जहाँ एक-दूसरे के डाटा का उपयोग किया जा सके तो यह बाधारहित मल्टीमोडल योजना, बुकिंग और लेन-देन में सहायक सिद्ध होगा।

9. स्मार्टचार्जिंग- शीर्ष मांग वाले चार्जिंग काल और कम मांग वाले काल के लिए शुल्क अलग हों जिससे शीर्ष मांग के कुछ भाग को निम्न मांग वाले समय में लाया जा सके। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के इलेक्ट्रिक वाहन अभियान के अनुसार विभिन्न शुल्क होने चाहिए क्योंकि ये उपभोक्ताओं को एक संदेश देगा और वे उसके अनुरूप ढल जाएँगे।

10. हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहन- अभी तक शहरों में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित नहीं हो पाया है, ऐसे में तब तक विकल्प के रूप में हाइब्रिड वाहन प्रयोग में लाए जा सकते हैं। हाइब्रिड वाहन वे होते हैं जो इलेक्ट्रिक व ईंधन दोनों से चलते हैं।

11.चार्जिंग सेवाएँ- चार्जिंग स्टेशन पर ग्राहकों का कोई कार्ड या खाता होना चाहिए जिससे अबाधित भुगतान हो सके। सेवा प्रदाता को लेन-देन और बिलिंग सिस्टम पर कार्य करते रहने होगा जिससे उपभोक्ता ने चार्जिंग के लिए जो बिजली उपयोग की है, उसका बिल उसे सौंपा जा सके।

12. खरीददारी पर लाभ- इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद पर सब्सिडी दी जानी चाहिए।

13. उपभोक्ता जागरूकता अभियान

14. वायरलेस चार्जिंग- इससे चिंता और कम की जा सकेगी क्योंकि ट्रैफिक में फँसे वाहन और राजमार्ग पर चलते वाहन भी चार्ज किए जा सकेंगे।

15. त्वरित चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर

16. चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का मानकीकरण- इलेक्ट्रिक वाहनों का मानकीकरण अभी भी कठिन है। सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि बाज़ार एक चार्जिंग मानक तय कर ले, इससे पहले कि बाज़ार में कई प्रकार आ जाएँ।

चेतन एनआईटी सूरत में सहायक प्राध्यापक हैं।