भारती
ईद के जलसे में तोहफों स्वरूप बँटीं हिंदू राजाओं की बंदी बेटियाँ- भारत में इस्लाम भाग 30

प्रसंग- मुहम्मद तुगलक के शासन में ईद के जश्न का विवरण इब्नबतूता और शिहाबुद्दीन जैसे लेखकों के माध्यम से।

20 मार्च 1334 को इब्नबतूता दिल्ली आया। मोरक्को का रहने वाला यह इतिहास प्रसिद्ध यात्री अपने शहर तांजीर से 1325 में निकला था और मुहम्मद तुगलक के समय दिल्ली पहुँचा। अब तक तुगलक को दिल्ली पर कब्ज़ा जमाए 10 साल हो गए थे।

इब्नबतूता चूँकि बाहर से आया एक मुसलमान यात्री था इसलिए तुगलक ने उसका खास ख्याल रखा। वह आठ साल दिल्ली में रहा और उसके बाद चार साल तक पूरा भारत घूमते हुए मोरक्को लौट गया। वह मुहम्मद तुगलक के साथ दिल्ली से कन्नौज और बहराइच गया। दोनों ईदों के मौके पर दिल्ली की रौनक उसने कई साल तक देखी है।

 इब्नबतूता की सुलतान के ईद के जलसे पर लाइव रिपोर्ट

“ईद से पहले वाली रात सुलतान मलिकों, खास अफसरों, कर्मचारियों, परदेशी मेहमानों, हाजिबों, नकीबों, सेना के अफसरों और गुलामों को उनकी हैसियत के मुताबिक खास खिलअत भेजता है। ईद की सुबह सारे हाथी रेशमी कपड़ों, सोने और जवाहरातों से सजाए जाते हैं।

शाही हाथी के सामने गुलाम और सेवकों की कतार है, जिनके सिरों पर सोने की रोएँदार टोपियाँ हैं। कमर में सोने की पेटी बंधी है, जिन पर जवाहरात जड़े हैं। सुलतान के आगे 300 नकीब हैं। सोने की टोपियों से सजे ये नकीब अपने हाथों में सोने की मूठ का छोटा-सा डंडा लिए चलते हैं।

अजान देने वाले भी आज हाथियों पर सवार हैं और अल्लाहो-अकबर का नारा लगा रहे हैं। हाथियों पर सवार अन्य खास लोग हैं काज़ी कमालुद्दीन गजनवी, नासिरुद्दीन ख्वारजमी और खुरासान, ईराक, मिस्त्र और अफ्रीका से आए मुस्लिम मेहमान।”

“सबसे पहले सुलतान की सवारी आगे बढ़ती है। पैदल गुलाम और सेवक उसके आगे हैं। काज़ी और मुअज्जिन उनके पीछे हैं। सुलतान के पीछे ढोल, तुरही, बिगुल और शहनाई वादकों के साथ पताकाएँ हाथ में थामे लोग हैं। सुलतान के भाई, भतीजे, रिश्तेदार और मलिक अपने गुलामों के साथ शरीक हैं।

इनमें एक मलिक कबूला भी है। वह सुलतान का बहुत खास आदमी है। सुलतान उसकी बड़ी इज्ज़त करता है। उसके एक साहिबे-दीवान से पता चला है कि उसका और उसके गुलामों का सालाना खर्चा 36 लाख तनका है। ईद के जलसे में सारे अमीर सुलतान के आसपास अपनी पताकाओं के साथ मौजूद हैं। सारे लोग हथियारबंद ही जलसे में आते हैं।”

“ईदगाह पर पहुँचते ही सुलतान दरवाज़े पर रुक जाता है और काज़ियों, बड़े अमीरों और परदेशी मेहमानों को भीतर जाने को कहता है। फिर वह खुद उतरता है और इमाम नमाज़ शुरू कर देता है। ईदुज्जुहा के दिन सुलतान एक भाले से ऊँट की गर्दन में एक छेद कर उसकी कुर्बानी देता है। सबसे पहले वह अपने कपड़े पर एक रेशम की चादर डाल लेता है, जिससे कपड़ों पर ऊँट के खून के छींटे न पड़ें। फिर वह हाथी पर सवार होकर अपने महल की तरफ लौटता है।”

ईद के खास दरबार की रौनक का आँखों देखा हाल

“महल में खूबसूरती से सजे फर्श बिछाए गए हैं। दरबार के बड़े कक्ष के बाहर मोटे खंभों के सहारे मंडप (बारगाह) खड़े किए गए हैं। उसके चारों तरफ खेमे लगे हैं। रंगबिरंगे रेशम के फूलदार दरख्त बनाए गए हैं। बड़े कक्ष में इनकी तीन कतारें सजाई गईं हैं।

हर एक वृक्ष के बीच में सोने की एक गद्दीदार कुर्सी लगी है। कक्ष के बीच ठोस सोने का एक विशाल सिंहासन लाया गया है, जो 23 बलिश्त लंबा और इससे आधा चौड़ा है। यह इतना भारी है कि कई लोग उठा पाते हैं। इसके पायों में जवाहरात जड़े हैं। सुलतान के सिर पर जवाहरातों से जड़ा छत्र है।”

“काज़ी, आलिम, सूफी, सुलतान के भाई और रिश्तेदार, वज़ीर, सेना के अमीर, गुलामों के सरदार और बाहर से आए मेहमानों की भारी हलचल है। मुहम्मद तुगलक के आते ही हाजिब और नकीब जोर से नारा लगाते हैं- बिस्मिल्लाह। तब वहाँ मौजूद सारे लोग सुलतान का अभिवादन करते हैं। इसके बाद उनकी हैसियत के मुताबिक भोजन की तैयारी होती है।

एक बड़ी मीनार के आकार का सोने का धूपपात्र लाया जाता है। यह इतना बड़ा और भारी है कि कई-कई लोग ही उठा पाते हैं। इसके कई भाग हैं, जिन्हें आपस में जोड़कर धूपपात्र बना दिया जाता है। इसमें ऊद और अंबर जलाकर इसके धुएँ से माहौल को खुशबूदार कर दिया गया है। नई उम्र के गुलाम सोने और चांदी के पात्रों से गुलाब जल छिड़कने के लिए हरेक के पास जा रहे हैं। सुलतान का विशाल सिंहासन और धूपपात्र दोनों ईद के मौकों पर ही निकाले जाते हैं।”

“कक्ष के बाहर सजे मंडप में भी गज़ब की रौनक है। इसके तीन दरवाज़े हैं। पहले दरवाज़े पर एमादुलमुल्क सरतेज खड़ा है। दूसरे पर मलिक नुकबिया और तीसरे पर यूसुफ बुगरा तैनात है। दोनों तरफ हथियारबंद गुलामों के सरदार खड़े हैं। हर एक अपनी हैसियत के मुताबिक इस जलसे में तय जगह पर मौजूद है।

शहनाए बारगाह मलिक तगी अपने हाथ में सोने का एक डंडा लिए मुस्तैद है। उनके नायब के हाथ में चांदी का डंडा है। वे दरबार में लोगों को सही जगह खड़े होने की हिदायत और समझाइश दे रहे हैं। कतारें सीधी रखने पर उनका ध्यान है ताकि सुलतान की मौजूदगी में किसी तरह की बदइंतजामी न हो।”

वज़ीर अपनी जगह पर हैं और उनके नायब उनके पीछे खड़े हैं। जलसा पूरे शबाब पर है। अब गहमागहमी बढ़ जाती है। दरबार में गायक और नर्तकियाँ दाखिल हो रही हैं। ये लड़कियाँ हिंदू (काफिर) राजाओं की बेटियाँ हैं, जो उस साल के युद्ध में बंदी बनाकर लाई गई हैं।

सबसे पहले इन लड़कियों का एक समूह आकर नाच-गाने में लग जाता है। सबका ध्यान अब इन हुनरमंद कलाकारों पर है। सुलतान नाच गाना पूरा होते ही ये लड़कियाँ अपने अमीरों और परदेश से आए खास मेहमानों में बाँट देता है।

फिर अन्य काफिरों की लड़कियों का दूसरा समूह आकर नाच-गाने में लग जाता है। जब वे नाच-गा चुके होते हैं तो सुलतान अपने भाइयों, रिश्तेदारों और मलिकों के बेटों में इन लड़कियों को बाँट देता है। सुलतान का यह दरबार अस्त्र की नमाज़ के बाद होता है।

दूसरे दिन फिर जलसा होता है। फिर इसी तरह गाने-नाचने वाले आते हैं। जब वे नाच-गा चुके होते हैं तो सुलतान अपने खास गुलामों में इन्हें बाँट देता है। तीसरे दिन सुलतान के रिश्तेदारों के निकाह की रौनक इस जलसे में जुड़ जाती है। सात दिन तक दिल्ली में जलसे की रौनक छाई रहती है। सातवें दिन सुलतान दिल खोलकर दान करता है…।”

अय्याशी की इन महफिलों में सूफी क्या कर रहे थे?

इब्नबतूता ने बहुत स्पष्ट बताया कि ईद के जलसों के आखिर में हर रात जिन लड़कियों को अलग-अलग समूहों में वहाँ लाया गया, वे उस साल के युद्ध में बंदी बनाई गई हिंदू राजाओं की बेटियाँ होती थीं। उन्हें तोहफों की शक्ल में उसने अपने अमीरों, मेहमानों और अफसरों में बाँटने की परंपरा बनाई।

हमने खिलजी के समय दिल्ली में गुलामों में बाज़ारों की रौनक देखी, जहाँ अलग-अलग दामों पर हर तरह के गुलाम लड़के-लड़कियाँ बेचे और खरीदे जा रहे थे। मुमकिन है कि वे हिंदू राज्यों से गुलाम बनाए गए आम हिंदू परिवारों के बच्चे होंगे। लेकिन इब्नबतूता हमें सुलतान के खास जलसे में महलों के भीतर लेकर गया और उसने बताया कि ये खास लड़कियाँ राजपरिवारों की हैं, जिन्हें ईद के दिन तोहफे में देने के लिए ही तैयार किया गया। आज की भाषा में कहें तो वीआईपी माल।

इन जलसों में काज़ी, आलिम और मसायख (सूफियों) की भागीदारी का चौंकाने वाला जिक्र है। ये मजहबी रहनुमा यहाँ क्या कर रहे हैं? इससे यह साबित होता है कि जिन सूफियों के बारे में हमारे इतिहासकारों ने एक संत के रूप में बताया, वह मनगढ़ंत है। वे सूफी होंगे। लेकिन संत नहीं।

एक संत कैसे यह सब अपनी आँखों से होते हुए देख सकता है? क्या कोई समाज ऐसा हो सकता है, जिसमें नीति-नियम और मर्यादाएँ न हों। सूफी अगर यह सब होता हुआ देख रहे थे तो वे उन बेरहम सुलतानों के ही हितैषी थे, जो दिन-रात काफिरों के विनाश में खुद को खपाए हुए थे। वे इस लूट में हिस्सेदार थे।

तुगलक ने 26 साल दिल्ली पर कब्ज़ा जमाए रखा। हर साल उसने दूर-दूर तक हमले और लूटमार जारी रखी। ईद के जलसों की सालाना रौनक तो साल में दो बार होती थी लेकिन हर हमलों के बाद बंदी बनाए गए गुलामों में बड़ी तादाद में लड़कियाँ और लड़के होते थे।

लुटेरे मुस्लिम आकाओं या खरीददारों के हिस्से में आते ही अब ये गुलाम भी मुसलमान हो चुके थे। इनकी कोख से पैदा होने वाले बच्चे भी नई पहचान के साथ सुनाई देने वाली किलकारियाँ थीं, जो बड़े होने पर उसी हिंसक झुंड का हिस्सा होती गईं।

हो सकता है उन्हें उनके बचपन में उनकी माताओं ने अपनी आपबीतियाँ सुनाई हों और उन्हें बताया हो कि वे किन राज्यों से किन हालातों में लूट के माल के साथ उठाकर लाई गईं थीं और फिर उनके साथ क्या-क्या हुआ? मगर सात सदियों के हो-हल्ले में अब किसे अपने बेबस मातृपक्ष के आँसुओं की नमी याद होगी?

आज जब मैं अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश और टूट-फूटकर आज़ाद हुए भारत के विशाल मुस्लिम जनसमाज की तरफ निगाह करता हूँ तो मुझे इस भीड़ में वही किलकारियाँ सुनाई देती हैं। लेकिन दस्तावेजों में दर्ज यह शर्मनाक हकीकत कितने आम और कितने पढ़े-लिखे मुसलमानों को मालूम है।

अल्लाह ही जाने वे किस खुमारी में सीना तानकर यह कहते हैं कि उनके पुरखों ने 700 साल तक हिंदुस्तान पर राज किया। कुतुबमीनार और ताजमहल बनवाए। वास्तविकता यह है कि जिन्होंने मंदिरों के मलबे पर कुतुबमीनार और अनगिनत मस्जिदें खड़ी कीं, उन जाहिल हमलावरों ने भारत के हिंदू राज्यों को सदियों तक लूटा। उनके औरतों-बच्चियों को अपने हरम और बिस्तर की रौनक बनाया, वे अतीत की उन्हीं किलकारियों की शर्मनाक और नाजायज उपज हैं।

 शिहाबुद्दीन अल उमरी की डायरी देख लीजिए

शिहाबुद्दीन अल उमरी नाम के एक लेखक ने भी तुगलक के जलवों का हाल भारत जाने-आने वाले 12 खास यात्रियों और कारोबारियों के हवाले से लिखा है। वह दमिश्क और काहिरा में पढ़ा है। देखिए उसने अपने सूत्रों के हवाले से हमें क्या बताया है-

सुलतान जेहाद में ढीला नहीं है। उसने इस्लाम के फैलाव के लिए काफी कोशिशें की हैं। मंदिर मिटा दिए गए हैं। बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ दी गई हैं। देश को उन लोगों से मुक्त कर दिया गया है, जिन्होंने जिम्मी बनना कुबूल नहीं किया। वह इस्लाम की पताकाएँ वहाँ ले गया, जहाँ कुरान का कोई सूरा और आयत नहीं पढ़ी गई थी। उसने मुसलमानों को काफिरों के गढ़ों की ओर निर्देशित किया।

अल्लाह की मेहरबानी से उन्हें काफिरों की दौलत और ज़मीन का उत्तराधिकारी बना दिया गया। कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जबकि हज़ारों बंदी गुलाम अत्यधिक संख्या के कारण सस्ते दामों पर नहीं बेचे जाते। दिल्ली में एक कनीज की कीमत 8 तनका से ज्यादा नहीं है। जो खास खिदमत और रखैल बनने के लिए तैयार हैं, वे 15 तनके में मिल जाती हैं।

दिल्ली के बाहर ये और भी सस्ती हैं। खूबसूरती के लिहाज से हिंदुस्तानी लड़की तुर्की और किपचाक की लड़कियों से कहीं बढ़कर हैं। उत्तम नस्ल और दीगर काबिलियतों के कारण भी वे मशहूर हैं। उनमें से अधिकांश सुनहरे रंग की होती हैं। कोई भी हिंदुस्तानी खूबसूरत लड़की के अलावा किसी को पसंद नहीं करता। जबकि वहाँ तुर्की, किपचाकी और रूमी समेत दूसरे इलाकों की लड़कियां भी पाई जाती हैं।

ये ब्यौरे लंबे और रुला देने वाले हैं। बाहरी मुसलमानों को, वे चाहे हमलावर हों, कारोबारी, यात्री या लेखक, हिंदुस्तान में क्या आकर्षण नजर आ रहा है? उन्हें यहाँ के मालामाल और आपस में बिखरे हुए हिंदू राज्यों पर हमलों में हासिल दौलत नज़र आ रही है। वे उन गुलामों पर भी नज़र रखे हुए हैं, जो लगातार लूट में हासिल हो रहे हैं। इतने ज्यादा कि उनके दाम 6-10 तनके ही हैं।

दिल्ली से बाहर और भी सस्ते। वे दूसरों से ज्यादा खूबसूरत लड़कियाँ हैं। इन हज़ारों-लाखों गुलाम माँ-बेटियों ने अपने जीते-जी किस नर्क को झेला और भोगा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे ऐशोआराम के लिए खरीदी और बेची गईं। उनकी औलादें कहाँ गईं? वे आज किस शक्ल में कहाँ होंगी? उन्हें किस बात पर शर्म करनी चाहिए और किस बात पर फख्र?

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com