भारती
कुशलता के लिए संकल्पबद्ध मस्तिष्क पहली आवश्यकता है- तिरुवल्लुवर के कुरल (35)

प्रसंग- 26 जुलाई और 8 अगस्त 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित कवि तिरुवल्लुवर के भरे हुए कोष और कृत्यों की कुशलता के महत्त्व पर चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

एक भरा हुआ कोष

  1. संपत्ति से अधिक प्रभावी कोई वस्तु नहीं है, यह मूल्यहीन व्यक्ति को भी मूल्य प्रदान करती है।
  2. अगर सही तरह से धन कमाया जाए तो संपत्ति धर्म और सुख दोनों के मार्ग पर ले जाती है।
  3. सहानुभूति और प्रेम भाव के बिना कमाया गया धन तुच्छ है।
  4. राजकोष में व्यक्ति की आय का छठा भाग, स्वामिहीन संपत्ति, आयात पर शुल्क और युद्ध की कमाई ाली जानी चाहिए।
  5. धन होने का सबसे बड़ा लाभ इससे मिलने वाली सुरक्षा है। व्यक्ति सभी सुख बिना किसी चिंता के भोग सकता है।
  6. धन अर्जित करें क्योंकि युद्ध के लिए इससे बड़ा कोई हथियार नहीं है। इसे धारदार कोई तलवार नहीं है जो शत्रु का गौरव और आत्म-विश्वास चीर सके।

कृत्यों में कुशला

7. कुशलता के लिए संकल्पबद्ध मस्तिष्क पहली आवश्यकता है, बाकी बातें बाद में आती हैं।

8. राजनीति में दो कार्यों को स्वीकार किया गया है। पहला, कोई भी ऐसा कार्य शुरू न करें जो सफल न हो सके और दूसरा यह कि कोई कार्य करते हुए अगर कुछ गलत हो जाता है तो क्षुब्ध न हों, बल्कि निर्भीकता से समस्याओं का सामना करें।

9. किसी चीज़ को सफल करना है तो उसके पूरे होने के साथ ही उसे उजागर करें। पहले से उजागर होने पर बाधाएँ खड़ी हो सकती हैं।

10. कोई भी व्यक्ति योजना बना सकता है लेकिन असाधारण मनुष्य ही उस योजना को पूरा कर पाते हैं।

11. कुछ लोग दिखने में साधारण होते हैं लेकिन उनके मस्तिष्क और कृत्यों में दृढ़ता होती है, उसी प्रकार जैसे एक छोटी कील रथ में पहियों को जोड़े रखती है। रूप एक छलावा है। बाहरी रूप के अप्रभावी होने के कारण किसी व्यक्ति का आँकलन करें।

12. एक स्पष्ट मस्तिष्क के साथ योजना बनाएँ और जब निर्णय लेकर आप उस कार्य को करने लगें तो विषमताओं से नहीं डिगें और अपने कार्यों को विलंबित न करें।

13. अन्य बातें लाभकारक नहीं हैं यदि आप कृत्यों में कुशलता पर ध्यान नहीं देते हैं। जो इसे अपना नहीं पाता वह जग में अपना नाम नहीं कर सकता।

अगले अंक में जारी…

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