भारती
पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर निर्माणाधीन, 550 किलोमीटर लंबे भाग को चाहिए पीपीपी

हाल ही में मालगाड़ियों के नियंत्रण के लिए प्रयागराज में एशिया का सबसे बड़ा नियंत्रण कक्ष बनकर तैयार हो गया है। रेल मंत्रालय के अधीन आने वाली एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी- डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन (डीएफसीसी) ने इसका निर्माण किया है।

पश्चिमी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के अलावा डीएफसीसी की एक और महत्वाकांक्षी योजना है- पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर। पंजाब के लुधियाना से पश्चिम बंगाल के कोलकाता तक जाने वाला यह मार्ग 1,856 किलोमीटर लंबा है। प्रयागराज स्थित नियंत्रण कक्ष इस मार्ग की मालगाड़ियों पर निगरानी रखेगा।

इस कॉरिडोर के दो प्रमुख भाग हैं- पश्चिम बंगाल के डानकुनी से उत्तर प्रदेश के खुर्जा तक 1,409 किलोमीटर का विद्युतीकृत दो-ट्रैक भाग और लुधियाना-खुर्जा-दादरी का एक ट्रैक वाला 407 किलोमीटर लंबा विद्युतीकृत मार्ग।

मानचित्र (दिसंबर 2018 में प्रकाशित जर्नल से लिया गया है जिस कारण वर्तमान संस्करण से कुछ किलोमीटरों का अंतर संभव है)

इस मार्ग पर मुख्य रूप से पूर्वी कोयला खदानों से उत्तर प्रदेश के उत्तरी भाग, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ भागों के लिए कोयला लाया जा सकेगा। इसके अलावा स्टील और खाद्य सामग्रियों की ढुलाई भी इस फ्रेट कॉरिडोर के द्वारा होगी।

दूसरी ओर राजस्थान से पूर्वी स्टील संयंत्रों के लिए लाइम्स्टोम भेजी जा सकेगी। सीमेंट, नमक और रासायनिक खाद भी पश्चिम से पूर्वी दिशा में जाएँगे। 2021-22 के ट्रैफिक अनुमानों के अनुसार पूर्व से पश्चिम दिशा में प्रतिवर्ष 7.8 करोड़ टन माल और विपरीत दिशा में 9.13 करोड़ टन माल प्रतिवर्ष यातायात करेगा।

वर्तमान में इंफ्रास्ट्रक्चर के अभाव में सड़क द्वारा मालढुलाई होती है जिससे प्रदूषण अधिक होता है। एक अध्ययन बताता है कि 2041-42 तक यह गलियारा 10.48 टन तक ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन करेगा। वहीं इसके अभाव में अनुमानित रूप से 23.29 टन ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता। इस प्रकार यह 55 प्रतिशत उत्सर्जन को कम करने में योगदान देगा।

पर्यावरण के अलावा इस गलियारे के अभाव में दिल्ली-हावड़ा के पूर्वी गलियारे और मुंबई-चेन्नई के पश्चिमी गलियारे पर अत्यधिक भार आने के कारण भारतीय रेल की मालवाहन में भागीदारी 1950-51 में 83 प्रतिशत से घटकर 2011-12 में 35 प्रतिशत हो गई थी। और यही आधार बना डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का।

कई स्थानों पर यह गलियारा पूर्व स्थापित मार्गों के समानांतर पर ही है, वहीं कुछ जगहों पर भीड़ वाले क्षेत्रों से बचने के लिए इसका मार्ग भी परिवर्तित किया गया है। उदाहरण स्वरूप मुगलसराय, प्रयागराज, कानपुर, इटावा, फिरोज़ाबाद, टुंडला, बरहन, हाथरस, अलीगढ़, मेरठ, सहारनपुर, अंबाला, राजपुरा, सरहिंद, दोराहा और साहनेवाल को बाइपास किया गया है।

इस कॉरिडोर में कानपुर तक के निर्माण के लिए वर्ल्ड बैंक ने अक्टूबर 2011 में ही ऋण की स्वीकृति दे दी थी। इसके बाद दिसंबर 2014 में मुगलसराय तक के खंड के लिए ऋण स्वीकृत हुआ। मुगलसराय से सोन-नगर तक के निर्माण के लिए भारतीय रेलवे इक्विटी फंडिंग दे रहा है। इन खंडों की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित है-

1. खुर्जा से भदान- बुलंदशहर स्थित खुर्जा और फिरोज़ाबाद स्थित भदान के बीच 194 किलोमीटर लंबा खंड पिछले वर्ष नवंबर अंत तक बनकर तैयार हो गया था। दिल्ली और कानपुर के बीच स्थित इस खंड पर छह स्टेशन और 249 पुल हैं जिसमें से 17 बड़े पुल हैं।

2. भदान से भाऊपुर- 143 किलोमीटर लंबे इस खंड को पूरा करने के लिए 30 नवंबर 2019 का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही खुर्जा से भाऊपुर तक का मार्ग व्यवसायिक वाहनों के लिए खुल जाएगा जो दिल्ली-कानपुर के रेल मार्ग का भार कम करेगा।

इससे सवारी गाड़ियों को ट्रैक पर अधिक समय मिलेगा जिससे उनकी समय की पाबंदी तो सुनश्चित होगी ही लेकिन साथ ही टुंडला में बहुप्रतीक्षित नॉन-इंटरलॉकिंग का कार्य किया जा सकेगा। दिल्ली-कोलकाता मार्ग में टुंडला सबसे बड़ा यार्ड है जहाँ आज भी हाथ से लीवर संचालित किया जाता है जिसे इलेक्ट्रॉनिक होना चाहिए।

3. भाऊपुर से मुगलसराय- 417 किलोमीटर लंबे इस खंड को 30 नवंबर 2020 तक पूरा किया जाना है। इसके निर्माण कार्य का दायित्व 5,080.77 करोड़ रुपये में जीएमआर इंफ्रास्ट्रक्चर और स्यूज़ इंफ्रास्ट्रक्चर के संयुक्त उद्यम को मिला है। इसमें 29.13 किलोमीटर लंबाई में एक ट्रैक और 388.1 किलोमीटर लंबाई में दो ट्रैक बनाए जाएँगे।

भाऊपुर से मुगलसराय की मार्गरेखा

4. मुगलसराय से सोन-नगर- 126 किलोमीटर लंबे इस भाग में 101 किलोमीटर पर बीएससी व सी एंड सी के संयुक्त उद्यम को 660 करो़ रुपये की लागत में निर्माण कार्य मिला है। इस खंड में सोन नदी पर 3.06 किलोमीटर लंबा पुल भी बनाया जाना है जिसकी अनुमानित लागत 250 करोड़ रुपये होगी।

  • मुगलसराय से सोन-नगर की मार्गरेखा

    अगले तीन खंडों में एक ही ट्रैक बनाया जाएगा।

5. खुर्जा से दादरी- 46 किलोमीटर लंबे इस खंड के निर्माण का दायित्व जीआईएल और टीपीएल के संयुक्त उद्यम को 511.3 करोड़ रुपये की लागत पर मिला है। दादरी यार्ड को नए बोराकी डीएफसी यार्ड से जोड़ने के लिए 4.54 किलोमीटर की लाइन भी डाली जाएगी।

6. पिलखनी से साहनेवाल- जीआईएल और टीपीएल का संयुक्त उद्यम ही इस 175 किलोमीटर लंबे खंड को भी बना रहा है जिसके लिए 1769.4 करोड़ रुपये का अनुबंध किया गया है। पिलखनी सहारनपुर व साहनेवाल लुधियाना में स्थित है।

7. खुर्जा से पिलखनी- प्रतिष्ठित लार्सेन व टूब्रो को 222 किलोमीटर लंबे इस खंड पर 2,863 करोड़ रुपये की लागत से निर्माण कार्य करने का अनुबंध मिला है। साथ ही सितंबर के अंतिम सप्ताह में ही न्यू खुर्जा जंक्शन नाम से इस फ्रेट कॉरिडोर के पहले स्टेशन का निर्माण भी पूर्ण हो गया है।

  • सोन-नगर से दानकुनी तक का भाग पब्लिक प्राइवेट पार्टनर्शिप (पीपीपी) मॉडल के तहत बनाया जाएगा। इसमें निवेश करने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों को 25 वर्षों तक लाभ मिलेगा। इस मार्ग पर भूमि अधिग्रहण लगभग पूर्ण हो चुका है व जल्द ही निर्माण कार्य के लिए टेंडर बाँट दिए जाएँगे।

8. सोन-नगर से गोमो- इस 260.74 किलोमीटर लंबे मार्ग की लागत लगभग 10,000 करोड़ रुपये होगी। इस खंड के लिए वित्तीय सलाहकार के लिए अक्टूबर 2018 में चार कंपनियों को छाँटा गया था। इसके आगे की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।

9. गोमो से दानकुनी- ऐसा ही 282.22 किलोमीटर लंबे इस परियोजना के अंतिम खंड के लिए है। लगभग 7,500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले इस खंड को क्रियान्वित होने में पाँच-छह वर्षों का समय लग सकता है।

घनी आबादी वाले गंगा क्षेत्र में अधिकांश लोग ट्रेनों से यात्रा करते हैं। इस मार्ग पर चलने वाली ट्रेनों को प्रायः देर लगती है क्योंकि कई बार दूसरी गाड़ियों को गुज़ारने के लिए ट्रेन रोककर रखनी पड़ती है। इस कॉरिडोर का निर्माण न सिर्फ मालवाहनों की सहायता करेगा बल्कि यात्रियों के भी समय की बचत करेगा।

इंफ्रास्ट्रक्चर ही भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का पथ प्रशस्त करेगा। यह परियोजना अपनी पिछली समय-सीमा से पीछे चल रही है क्योंकि योजना एवं क्रियान्वयन में कुछ त्रुटियाँ रह गई थीं। आशा है कि वर्तमान में तय की गई समय-सीमा को यह पूरा कर पाए।