भारती
बांग्ला भाषा के लिए पूर्वी पाकिस्तान का संघर्ष मातृभाषा के लिए देता सीख, कुछ विचार

नवंबर 1947 में कराची में राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्धारण के लिए हुई बैठक में उर्दू और अंग्रेज़ी को पाकिस्तान की सरकारी भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा गया जो कि आसानी से मान लिया गया। प्रस्ताव पारित होने के बाद पाकिस्तान लोक सेवा आयोग ने बांग्ला को विषयों की सूची से हटा दिया और पाकिस्तान सरकार ने मुद्रा और सरकारी स्टाम्प से भी बांग्ला को हटा दिया।

इस परिवर्तन के कारण ढाका के लोगों, विशेषतः विद्यार्थियों द्वारा 8 दिसंबर 1947 को ढाका विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन किया गया और बांग्ला को पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की माँग की गई। यह माँग ख़ारिज हुई। 11 मार्च 1948 के दिन ढाका में एक आम हड़ताल की गई जिसका उद्देश्य सरकारी परीक्षाओं, पाकिस्तानी मुद्रा और मोहर के लिए बांग्ला को मान्यता दिलाना था।

उसी दिन दोपहर को ढाका में विद्यार्थियों की भीड़ ने पूर्वी पाकिस्तान के मुख्यमंत्री निवास का घेराव किया। इस विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ख्वाजा नज़िमुद्दीन ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया जिसमें विद्यार्थियों की कुछ माँगें अस्थाई रूप से मान ली गईं लेकिन बांग्ला अभी भी पाकिस्तान की भाषा नहीं बन पाई थी।

19 मार्च 1948 के दिन मोहम्मद अली जिन्ना ढाका आए। 21 मार्च 1948 के दिन उन्होंने ढाका के रेसकोर्स मार्ग मैदान में कहा कि बांग्ला भाषा आंदोलन एक विदेशी षड्यंत्र है और ‘उर्दू, केवल उर्दू’ ही है जिसने इस्लामिक देश की भावना को मूर्त रूप दिया है।

उन्होंने आगे कहा कि जो लोग भी उर्दू के अलावा अन्य किसी भाषा को पाकिस्तान की सरकारी भाषा के रूप में चाहते हैं, वे पाकिस्तान के दुश्मन हैं। 28 मार्च 1948 को ढाका छोड़ने से पहले उन्होंने ख्वाजा नज़ीमुद्दीन और विद्यार्थी संगठनों द्वारा हस्ताक्षरित शांति समझौते को अमान्य घोषित किया और रेडियो पर अपनी ‘केवल उर्दू’ की नीति पर भाषण भी दिया।

इसके तुरंत बाद, मौलाना अकरम खान की अध्यक्षता में पूर्वी बंगाल भाषा समिति का गठन किया गया, जो कि पूर्वी बंगाल सरकार द्वारा भाषा की समस्या पर एक रिपोर्ट तैयार करने के लिए बनाई गई थी। समिति ने 6 दिसंबर 1950 को अपनी रिपोर्ट पूरी की और सरकार ने सुझाव दिया कि भाषा संघर्ष के संभावित समाधान के रूप में बंगाली को अरबी लिपि में लिखा जाना चाहिए, लेकिन बंगालियों को यह स्वीकार्य नहीं था।

21 फरवरी 1952 के दिन শোরবডোলিও কেন্দ্রিয়ো রাষ্ট্রভাষা কোরমি পরিশোদ (सर्वदलीय केंद्रीय भाषा संग्राम समिति) ने ढाका में विरोध प्रदर्शन के लिए आम घोषणा की। पुलिस ने ढाका में धारा 144 लागू कर दी। लेकिन आंदोलन नहीं रुका और भीड़ को रोकने के लिए पुलिस ने गोलियाँ चलाई जिसमें पाँच छात्र (अब्दुस सलाम, रफीकुद्दीन अहमद, शफ़ीउर रहमान, अबुल बरकत और अब्दुल जब्बार) मृत्यु को प्राप्त हुए और आज के बांग्लादेश में इन्हें शहीद माना जाता है।

इसके बाद आंदोलन और अधिक तीव्र हुआ और 7 मई 1954 को मुस्लिम लीग के समर्थन के साथ, विधानसभा में बांग्ला को आधिकारिक दर्जा देने के लिए प्रस्ताव पारित हुआ। बंगाली को अनुच्छेद 214 (1) में उर्दू के साथ पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा के रूप में तब अपनाया गया जब पाकिस्तान का पहला संविधान 29 फरवरी 1956 को लागू किया गया था।

यद्यपि आधिकारिक भाषाओं का प्रश्न 1956 तक सुलझा लिया गया था, लेकिन अयूब खान के सैन्य शासन ने पूर्वी पाकिस्तान की कीमत पर पश्चिम पाकिस्तान के हितों को बढ़ावा दिया। राष्ट्रीय आबादी का अधिकांश हिस्सा होने के बावजूद, पूर्वी पाकिस्तान का नागरिक और सैन्य सेवाओं में प्रतिनिधित्व कम रहा।

क्षेत्रीय आर्थिक असंतुलन के कारण अनुभागीय विभाजन बढ़े और बंगाली जातीय राष्ट्रवादी अवामी लीग ने प्रांतीय स्वायत्तता के लिए छह सूत्रीय आंदोलन का आह्वान किया। इसके बाद बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध प्रारंभ हुआ और 1972 में भारत के सहयोग से बांग्लादेश का निर्माण हुआ। आज़ाद बांग्लादेश की माँग पर 1999 में 21 फरवरी को यूनेसको ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस आयोजित किया और तब से यह विश्व भर में मनाया जाता है।

विश्व के अलग-अलग स्थानों पर इस भाषा आंदोलन को याद करने के लिए स्मारकों का निर्माण किया गया जिनमें ढाका का शहीद मीनार, ढाका विश्वविद्यालय में মোদের গরব (मेरा गर्व) स्मारक, सिडनी में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस स्मारक, कोलकाता में भाषा स्मृतिस्तंभ और लंदन के अल्ताब अली पार्क में शहीद मीनार की प्रतिकृति प्रमुख हैं।

बांग्लादेश के इस संघर्ष को याद करना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसको बिना जाने वर्तमान भाषाई रिश्तों को समझना कठिन होगा। इस संघर्ष से हमें यह भी ज्ञात होता है कि मज़हबी उन्मादियों द्वारा भाषाई प्रकृति के वैविध्य को नष्ट करने के भरपूर प्रयास किए गए हैं।

अब भारतीय भाषाई वातावरण को समझते हैं। भारतीय लोकव्यवहार में षटमातृका की बात बताई गई है और ये हमारे सामने प्रत्यक्ष है। हमें बचपन से ये संस्कार दिए जाते हैं कि हम भूमि, जननी, गौ, नदी, प्रकृति और भाषा से माता की भाँति व्यवहार करें।

माता इन्हें हम क्यों कहते हैं यह तो इनके गुणधर्म से ही दिखाई देता है लेकिन इन सबमें एक सामान्य कारण है कि ये सब सृजन और पालन की शक्ति रखती है। इसलिए इन्हें माता कहा गया है। भारत में भाषा को भी हम मातृभाषा कहते हैं लेकिन अंग्रेज़ी संदर्भ में इसे ‘मदर टंग’ कहते हैं।

अब भारतीय संदर्भ को पाश्चत्य दृष्टि से देखने की गलती हम हमेशा से कर रहे हैं। ऐसा ही कुछ मातृभाषा के संदर्भ में हुआ है। भारत में भाषा को मातृभाषा इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह भाषा ही है जिससे विचारों और भावों का सृजन तथा पालन होता है। भाषा कोई भी हो यदि उसमें सृजनात्मक कार्य हुआ है तो वह मातृ रूपी भाषा है अर्थात मातृभाषा है।

हाँ यह बात अलग है कि हम बचपन से जिस भाषा में सीखते और सुनते आ रहे हैं उसमें हमारी पकड़ मज़बूत रहती है और उस भाषा में समझना तथा समझाना आसान होता है। ब्रिटिश अंधकारकाल से पहले भारत में कई राज्य होते थे जिनमें अनेक भाषाएँ प्रचलन में थीं लेकिन कभी भी इतिहास में भारतीय भाषाओं के आधार पर द्वंद नहीं दिखता है।

आपसी सदव्यवहार के कारण भारतीय लोग संपूर्ण भारतवर्ष में भ्रमण और संवाद करते थे। जब हम अपनी पैतृक भाषाओं को लेकर जड़ हो जाते हैं तब हम व्यापक से संकुचित मानसिकता पर आ जाते हैं। लेकिन जब हम सभी भाषाओं को मातृभाषा मानेंगे तब हम एक व्यापक और स्वीकार्यतापूर्ण दृष्टिकोण को प्राप्त करेंगे।

भाषा को लेकर समस्या तब होती है जब किसी एक भाषा पर दूसरी भाषा थोपी जाती है। जैसा भारतीय भाषाओं पर यूरोपीय और अरबी भाषाओं ने किया और बांग्ला पर उर्दू ने किया। जब हम भाषा को नैसर्गिक वातावरण नष्ट करने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग करते हैं तब भाषा का यह मातृत्व भाव समाप्त हो जाता है और जिस समुदाय पर अन्य भाषा थोपी जाती है वह समुदाय भी निकट भविष्य में स्वभाषा संवर्धन के लिए संकुचित और सीमित हो जाता है।

इस भाषाई द्वंद से बचने के दो चरण हैं। पहला, किसी भी भाषा को न आक्रमक होना चाहिए और न किसी भाषा को आतंकित होना चाहिए। दूसरा, पाश्चात्य जगत की स्वभाषा संकल्पना को त्यागकर भारतीय मातृभाषा के विचार को अपनाना होगा जहाँ हम भाषा को माता उसकी वैचारिक और व्यवहारिक सृजनात्मकता के कारण मानते हैं।