भारती
‘ई-नाम’ किसानों को- फसल के बेहतर मूल्य से सुखद भविष्य की आशा देती ई-मंडी

ताज़ा समाचार है कि देश में कृषि उत्पादों का ई-मंडी या ई-नाम के माध्यम से होने वाला कारोबार 91,000 करोड़ रुपये का हो गया है। इस समय देश के 16 राज्यों में 585 कृषि मंडियाँ इस प्लेटफॉर्म से जुड़ चुकी हैं। सरकार का कहना है कि जल्द ही यह धनराशि 1 लाख करोड़ रुपये को पार कर लेगी। 

अगले सप्ताह आम बजट आने वाला है। यह बजट ग्रामीण विकास और उसमें तकनीक की भूमिका के दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण होगा। आर्थिक-संवृद्धि में आ रही सुस्ती को दूर करने के लिए सरकार को कई प्रकार के कदम उठाने हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों की आय में वृद्धि, ताकि उपभोक्ता सामग्री की माँग बढ़े और आर्थिक गतिविधियों में तेज़ी आए।  

इन बातों का जवाब देने के पहले कई सवाल हैं। क्या तकनीकी सहायता से हम ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक विकास को गति देने में सफल हुए हैं? क्या 2022 तक किसानों की आय दुगनी करने में यह कदम सहायक होगा? सवाल यह भी है कि क्या देश की राजनीतिक-संस्कृति को देखते हुए इस प्रकार की केंद्रीय-व्यवस्था को सफलता मिलेगी? अंततः राज्यों को इस कार्यक्रम में शामिल होना है।

कृषि उत्पाद बाज़ार समिति में बदलाव

इस कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि राज्य अपने कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (एपीएमसी) कानून में जल्द से जल्द बदलाव करें और छोटे किसानों को भी अच्छा बाज़ार उपलब्ध कराएँ। किसानों की समस्या यह है कि उनके राज्यों के कानून ही उनकी उपज को बेहतर बाज़ारों में जाने से रोकते हैं। 

एक मायने में कृषि उपज को बाज़ार मुहैया कराने के लिए शुरू किए गए इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) पर विश्वास का संकट है, जिसे फौरन दूर करने की ज़रूरत है। इस पर चिंता जताते हुए केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि देश के छोटे किसानों में इसके प्रति भरोसा पैदा करने की ज़रूरत है।

किसानों के हित में शुरू किया गया ऑनलाइन कृषि बाज़ार आम किसानों का प्लेटफॉर्म नहीं बन पा रहा है। उन्होंने कहा, “छोटे किसानों तक पहुँच होने पर ही कृषि क्षेत्र की विकास दर बढ़ेगी, जिससे आर्थिक विकास के लक्ष्य को हम जल्दी छू लेंगे।”, पर छोटे किसान तक तकनीक पहुँचाना आसान काम नहीं है। 

पिछले नवंबर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि केंद्र सरकार राज्यों से अनुरोध कर रही है कि वे कृषि उत्पाद बाज़ार समिति (एपीएमसी) को खारिज कर दें और इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-नाम) को अपनाएँ। इससे किसानों को अपनी फसल का बेहतर दाम मिलेगा। सीतारमण ने राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक कार्यक्रम में कहा कि केंद्र सरकार ई-नाम का शिद्दत से प्रचार कर रही है। 

18 राज्य शामिल

वित्त मंत्री ही नहीं स्वयं प्रधानमंत्री जब भी किसानों के बीच जाते हैं इस कार्यक्रम का ज़िक्र ज़रूर करते हैं। दूसरी तरफ राज्यों को एपीएमसी को खारिज करने के लिए भी मनाया जा रहा है। एपीएमसी की कभी ज़रूरत होती थी, क्योंकि किसानों को व्यापारियों के हाथों लुटने से बचाने के लिए इसकी ज़रूरत हुआ करती थी। पर अब इसके साथ कई तरह की समस्याएँ जुड़ गई हैं। यह किसानों को फसल की अच्छी कीमत नहीं दिला पा रही है।

देश के 16 राज्य और दो केंद्रशासित क्षेत्र इस मुहिम में शामिल हो चुके हैं। जो महत्वपूर्ण खेतिहर राज्य इससे बाहर हैं, उनमें बिहार, केरल और कर्नाटक के नाम हैं। उम्मीद है कि आगामी मार्च के महीने तक केरल और बिहार भी इसमें शामिल हो जाएँगे।

संभावना है कि आगामी वित्त-वर्ष में इन दोनों राज्यों में भी कृषि-व्यापार इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से होने लगेगा। कर्नाटक में राज्य स्तर का एक पोर्टल पहले से काम कर रहा है, जो ई-नाम के बनने के पहले से काम कर रहा है। केंद्र सरकार प्रयास कर रही है कि कर्नाटक भी जल्द से जल्द केंद्रीय पोर्टल से खुद को जोड़े।

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ई-नाम में अग्रणी राज्य हैं। 16 राज्यों और दो केंद्र-शासित राज्यों की 585 मंडियों के अलावा इस साल 31 मार्च तक 415 और मंडियों को इसमें शामिल करने की योजना है।

अभी तक देश में 1.65 करोड़ किसान और 1.27 लाख व्यापारी ई-नाम में पंजीकृत हैं। साल 2017 तक ई-मंडी से सिर्फ 17,000 किसान ही जुड़े थे। 1.65 करोड़ किसानों का नाम जुड़ना इस कार्यक्रम की सफलता का भरोसा दिलाता है, पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश में करीब 12 करोड़ किसान हैं। 

एग्री-लॉजिस्टिक्स

पिछले साल जून में लोकसभा में जानकारी दी गई थी कि जिन किसानों ने पंजीकरण कराया है उनमें से आधे ही इस सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। सच यह है कि यह पहला कदम है। किसानों और व्यापारियों को यह आकर्षक लगेगा, तो वे खुद आगे बढ़कर आएँगे।

अभी व्यापारियों के पंजीकरण में भी सुस्ती है, कुछ प्रक्रियात्मक दोष भी हैं। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स से जुड़े मसले भी हैं, जिनपर विचार करने के लिए हाल में कृषि मंत्रालय ने एग्री-लॉजिस्टिक्स पर पहली राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन भी किया। 

कृषि लॉजिस्टिक्स की शुरुआत फसल कटाई से शुरू होती है। कटाई के बाद सफाई, छंटाई, गुण के आधार पर छंटाई, गुणवत्ता की जाँच पैकेजिंग और विपणन का कार्य शुरू होता है और इसके बाद कृषि उत्पाद उपभोक्ता तक पहुँचते हैं।

ई-नाम के तहत इन सारे प्रश्नों पर भी विचार होना चाहिए। खेती के साथ तमाम दूसरे विषय भी जुड़े हुए हैं। इनमें भंडारण, सब्सिडी, फसल बीमा और कृषि ऋण जैसे विषय भी शामिल हैं। ई-नाम खरीदारों की मदद माल की ढुलाई में भी करता है। 

हाल में प्रधानमंत्री ने सड़क परिवहन के एक नए स्टार्टअप मॉडल पर भी विचार करने का सुझाव दिया है। इस इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म की सफलता काफी कुछ लॉजिस्टिक्स पर भी निर्भर करेगी। इन विषयों पर समेकित और व्यावहारिक दृष्टिकोण की ज़रूरत है। आगामी बजट को इस नज़रिए से भी देखा जाना चाहिए। निर्मला सीतारमण संभवतः खेती और गाँव पर इस बार खास ध्यान देंगी। सरकार का ध्यान किसान-कल्याण पर रहेगा। 

ई-गवर्नेंस की सफलताएँ

भारत के राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस कार्यक्रम की अवधारणा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और प्रशासनिक सुधार तथा लोक शिकायत विभाग ने तैयार की थी। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में ई-गवर्नेंस को लेकर काफी सुझाव थे। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत एक व्यापक कार्यक्रम देशभर में चल रहा है। इसके अंतर्गत ई-ऑफिस मिशन मोड परियोजना (इलेक्ट्रॉनिक कार्य प्रवाह) पर काम चल रहा है।

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा वर्ष 1997 से प्रत्येक वर्ष सूचना प्रौद्योगिकी विभाग एवं एक राज्य सरकार के सहयोग से ई-गवर्नेंस पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। इसका 22वाँ सम्मेलन 8-9 अगस्त को शिलांग में हुआ। केंद्र तथा राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के अलावा उद्योगों और तकनीकी क्षेत्र के विशेषज्ञों की भागीदारी के कारण यह सम्मेलन महत्वपूर्ण है।  

भारत सरकार ने अप्रैल 2016 में कृषि उत्पादों के लिए ऑनलाइन बाज़ार की शुरुआत की थी। किसानों को इस अवधारणा के साथ खुद को जोड़ने में शायद समय लगे, पर मंडियों में व्याप्त बदइंतजामी का यह एक साफ-सुथरा विकल्प है। इसके दरवाज़े राज्य सरकारों को भी खोलने होंगे।

सरकार इसे 22,000 ग्रामीण बाजारों से जोड़ना चाहती है। इसकी सफलता के पीछे भी बुनियादी ताकत तकनीक की है। पर इसके साथ राज्यों के कृषि कानूनों में बदलाव की जरूरत भी है। ट्रेडर्स अब खरीदारी से पहले जिंस की गुणवत्ता को चैक कर सकें इसके लिए सरकार ने देश की सभी मंडियों में क्वालिटी चैक लैब बनाने का भी फैसला किया है। 

देश के कॉफी बोर्ड ने ब्लॉक चेन पर आधारित ई-बाज़ार की शुरुआत की है। यह एक प्रायोगिक परियोजना है, जिसका उद्देश्य है कि कॉफी उत्पादकों को सही कीमत मिल सके। इसके कारण बिचौलियों की श्रृंखला घट जाएगी। इस प्लेटफॉर्म पर भारतीय और विदेशी किसान, आयातक-निर्यातक और खुदरा व्यापारी जुड़ रहे हैं।

कॉफी ब्लॉकचेन का उद्घाटन करते वाणिज्य सचिव डॉ अनूप वाधवान

बाज़ार के अलावा किसान को खेती, मौसम और उपकरणों की जानकारी देने के लिए रेडियो, टीवी और अखबारों के साथ-साथ इंटरनेट की भूमिका बढ़ रही है। डिजिटल इंडिया और इसके साथ भारतनेट और ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जिनकी शहरों से ज्यादा अब गाँवों में ज़रूरत महसूस की जा रही है। 

यह तकनीकी विस्तार हमें रोजमर्रा की दिक्कतों से बचा रहा है। सरकारी कामकाज को आसान कर रहा है और ज्ञान का विस्तार कर रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़ना एक ज़माने तक दुष्कर था, पर तकनीक ने अब यह काम आसान कर दिया है।

इस महीने के प्रारंभ में हुए 107वें भारतीय विज्ञान कांग्रेस की थीम थी- ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी : ग्रामीण विकास’, जहाँ प्रधानमंत्री ने कहा कि केवल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के कारण ही सरकार के कार्यक्रम ज़रूरतमंद लोगों तक पहुँचे हैं।

यह ज़रूरत अभी बढ़ेगी और तकनीक उसका निराकरण भी करेगी। सरकार से सीधा संवाद करने का तरीका हमारे पास है। बेशक व्यवस्था से जुड़े कई तरह के दोष सामने आ रहे हैं और आएँगे। उनका परिष्कार यही व्यवस्था करेगी।   

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।