भारती
ई-गवर्नेंस की सफलता और सामाजिक जीवन पर इसका प्रभाव

प्रसंग- कैसे ई-गवर्नेंस ने नीतिगत लाभों को ज़मीनी स्तर तक पहुँचाया है।

हाल में पेश आम बजट के पहले संसद के पटल पर रखी गई आर्थिक समीक्षा में ‘कल्याणकारी योजनाओं के लिए प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग- मनरेगा का मामला’ शीर्षक से एक अध्याय है, जिसमें ई-गवर्नेंस से जुड़े कुछ तथ्यों पर रोशनी डाली गई है। हालाँकि महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी (मनरेगा) योजना वर्ष 2006 से प्रभावी हुई, पर उसके क्रियान्वयन से जुड़ी कई तरह की शिकायतें थीं।

वर्ष 2015 में इसके साथ प्रौद्योगिकी को जोड़ने के बाद इसके क्रियान्वयन में कुशलता आती चली गई है। दूसरी बातों के साथ-साथ इसमें प्रत्यक्ष लाभांतरण (डीबीटी) के कार्यान्वयन को सम्मिलित किया गया और इसे आधार संबद्ध भुगतान (एएलपी) से जोड़ दिया गया। इस प्रकार जन-धन, आधार और मोबाइल फोन की त्रि-शक्ति (ट्रिनिटी) ने काम को आसान और बेहतर बना दिया। 

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार सन 2015 तक देश की करीब 50 प्रतिशत जनसंख्या के पास बैंक खाते नहीं थे। इनमें से ज्यादातर लोग मनरेगा के लक्षित समूह में शामिल थे। मार्च 2014 तक ग्रामीण क्षेत्र में कुल बैंक कार्यालयों की संख्या 1,15,350 थी। तब से मार्च 2018 तक इन कार्यालयों की संख्या पाँच गुना बढ़कर 5,69,547 हो गई है।

दिसंबर 2015 तक देश में आधार नामांकन की कुल संख्या एक अरब से अधिक हो चुकी थी। प्रत्यक्ष लाभांतरण के लिए सक्रिय बैंक खातों को आधार संख्या से जोड़ना आवश्यक था। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री जन धन योजना शुरू की गई, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रत्येक परिवार के पास कम से कम एक बैंक खाते की सुविधा प्राप्त हो। 

मोबाइल फोन का विस्तार

मोबाइल भुगतान के विकल्प का विस्तार करते हुए सरकार कनेक्टिविटी की समस्या को सुगम बनाने में सफल हो गई थी। इस प्रकार जन-आधार-मोबाइल त्रयी (जैम) का जन्म हुआ, जो देश में ई-गवर्नेंस की सफलता की प्रतीक बनी है। समय पर मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 2016 में राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक निधि प्रबंधन प्रणाली (एनईएफएमएस) शुरू हुई। इसके तहत केंद्र सरकार, राज्य सरकारों द्वारा खोले गए एक विशिष्ट बैंक खाते में रियल टाइम कामगारों की मजदूरी जमा करने लगी। इस प्रणाली के लागू होने के बाद ई-भुगतान, जो 2014-15 में 77.34 प्रतिशत था, 2018-19 में 99 प्रतिशत हो गया है। 

सन 2015 में देश के 300 ऐसे जिलों में जहाँ बैंक की बेहतर सेवाएँ उपलब्ध थीं, मनरेगा में आधार-संबद्ध भुगतान होने लगा। सन 2016 में शेष जिलों में यह व्यवस्था लागू हो गई। बायोमेट्रिक्स के कारण ऐसा भुगतान सही लाभार्थी को ही मिल सकता है। इससे लालफीताशाही कम हुई।

डीबीटी और एएलपी की मदद से मनरेगा को लागू करने के अलावा दूसरे कार्यक्रमों में भी तकनीक ने मदद की है। मसलन नकद लाभों (छात्रवृत्ति, पेंशन), कीमत सब्सिडी (केरोसीन, एलपीजी), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), उर्वरक सहायता वगैरह। भविष्य में इस तकनीकी नेटवर्क का इस्तेमाल अब माइक्रो-इंश्योरेंस, माइक्रो-पेंशन और माइक्रो-क्रेडिट में किया जा सकेगा। 

डिजिटल स्वास्थ्य ब्लूप्रिंट 

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने हाल में राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य ब्लूप्रिंट (एनडीएचबी) जारी किया है। एनडीएचबी का उद्देश्य सरकार के स्वास्थ्य कार्यक्रम आयुष्मान भारत के मार्फत तैयार होने वाले डेटा के प्रबंध और विश्लेषणकी व्यवस्था करना है। आज भी देश के बड़े-बड़े अस्पतालों तक में मरीजों को उनके चिकित्सक कागजों पर हाथ से लिखकर सलाह देते हैं।

एनएचडीबी

रक्त की जाँच, एक्सरे, अल्ट्रासाउंड से लेकर ईको टेस्ट तक सारी रिपोर्टें डिजिटल होने के बावजूद मरीज उनकी हार्डकॉपी फाइलों में लादे-लादे फिरते हैं, तमाम कागज खो जाते हैं, जबकि ऐसी तकनीक उपलब्ध है कि वे एक क्लिक पर उस मरीज का कई साल का विवरण देख सकते हैं। 

सरकार चाहती है कि आयुष्मान भारत के तहत लाभ उठाने वालों से जुड़े तथ्यों के विवरण से राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की जाए। दुनिया में डिजिटल तकनीक स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। बीमार व्यक्ति के स्वास्थ्य से जुड़ी ज्यादा से ज्यादा जानकारियाँ एक ही जगह मिल जाएं, तो उसके इलाज में आसानी होती है। सैकड़ों कागजों की छानबीन के बाद भी जो काम सम्भव नहीं था, वह अब मिनटों में पूरा किया जा सकता है। 

स्थानीय निकायों में भूमिका

भारत जैसे विशाल और बहुल प्रकृति के देश में गवर्नेंस बहुत बड़ी चुनौती है। खासतौर से समाज कल्याण के लिए मुकर्रर साधनों को आम जनता तक पहुँचाने के काम में तकनीक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभानी शुरू की है। इसे ई-गवर्नेंस का नाम दिया गया है। तमाम तरह की आपत्तियों के बावजूद भारत का बायोमीट्रिक्स आधार दुनिया में अपने किस्म की अनोखी परियोजना है। 

अर्थशास्त्री ईशर जज अहलूवालिया ने भारत में शहरीकरण की समस्याओं पर अध्ययन किया है। उसके सिलसिले में उन्होंने शहरों और कस्बों में यात्रा करके ज़मीनी वास्तविकता को देखकर यह समझने का प्रयास किया कि किस तरह भारत के शहर और कस्बे सार्वजनिक सेवाओं की ज़रूरत से रूबरू हैं। उनके आलेख दो अंग्रेज़ी अखबारों में ‘पोस्टकार्ड्स ऑफ चेंज’ के नाम से छपे और बाद में उन्होंने ‘ट्रांसफॉर्मिंग अवर सिटीज़’ शीर्षक से एक किताब भी लिखी। इस किताब में पूरा एक अध्याय ‘सार्वजनिक सेवाओं में ई-गवर्नेंस की भूमिका’ पर है। 

पुस्तक कवर

उन्होंने लिखा है कि सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था करना स्थानीय निकायों के सामने बड़ी समस्या के रूप में आ रहा है। कचरे का निस्तारण, सड़कों की बत्तियों का प्रबंधन, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र देने, इमारतों के निर्माण की अनुमति, पानी और बिजली के शुल्क का या संपत्ति कर की वसूली। सार्वजनिक सेवाओं को पारदर्शी और जवाबदेही समाधान बनाने में सूचना-प्रौद्योगिकी यानी आईटी एक बहुत बड़ी भूमिका निभा सकती है। 

उन्होंने देश के कुछ शहरी निकायों का उदाहरण दिया है, जिन्होंने सार्वजनिक सेवाओं को सुधारने के लिए आईटी का सफलतापूर्वक उपयोग किया। आंध्र के मी-सेवा केंद्रों, बेंगलोर वन, अहमदाबाद और सूरत के सिटी सिविक सेंटर, कल्याण-डोंबीवली और पिंपली-चिंचवड के सिटिजन फैसिलिटेशन सेंटर सभी में सार्वजनिक सेवाओं को ऑनलाइन बनाया गया है। सूरत में नए-नए माता-पिताओं को बच्चों के टीकाकरण के लिए निजी रूप से एसएमएस भेजा जाता है। दिल्ली के कुछ हिस्सों में बिजली की चोरी रोकने के लिए जियोग्रैफिक इनफॉर्मेशन सिस्टम (जीआईएस) इस्तेमाल किया गया। 

पिंपरी-चिंचवड में एक वास्तविक इंटीग्रेटेड ई-गवर्नेंस तंत्र स्थापित किया गया, जो वित्तीय गड़बड़ियों की बहुत कम गुंजाइश छोड़ता है। आंध्र प्रदेश बेहतर प्रबंधन के लिए ई-गवर्नेंस को लागू करने वाला पहला राज्य था। नवंबर 2011 में आंध्र सरकार ने ई-गवर्नेंस को ग्रामीण क्षेत्रों में भी लागू किया।

आईआईएम बेंगलुरु के एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि कर्नाटक में इन सेवाओं के शुरू होने के बाद भ्रष्टाचार की दर में 97.5 प्रतिशत की कमी आई है। गुजरात सबसे पहला राज्य था जिसने सन 2001 में राज्य भर में ई-गवर्नेंस की आधारशिला रखने के लिए राज्य व्यापी नेटवर्क स्थापित किया। सन 2004 में अहमदाबाद को ई-गवर्नेंस की बेस्ट प्रैक्टिसेज के लिए मेलबर्न में अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। 

ई-गवर्नेंस का दायरा

भारत के राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस कार्यक्रम की अवधारणा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग और प्रशासनिक सुधार तथा लोक शिकायत विभाग ने तैयार की थी। दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की रिपोर्ट में ई-गवर्नेंस को लेकर काफी सुझाव थे। राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना के तहत एक व्यापक कार्यक्रम देशभर में चल रहा है। इसके अंतर्गत ई-ऑफिस मिशन मोड परियोजना (इलेक्ट्रॉनिक कार्य प्रवाह) पर काम चल रहा है।

प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा वर्ष 1997 से प्रत्येक वर्ष सूचना प्रौद्योगिकी विभाग एवं एक राज्य सरकार के सहयोग से ई-गवर्नेंस पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाता रहा है। इसका 22वाँ सम्मेलन 8-9 अगस्त को शिलांग में होने जा रहा है। इसमें केन्द्र तथा राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के अलावा उद्योगों और तकनीकी क्षेत्र के विशेषज्ञों की भागीदारी भी होती है। 

भारत सरकार ने अप्रेल 2016 में कृषि उत्पादों के लिए ऑनलाइन बाज़ार की शुरुआत की थी। किसानों को इस अवधारणा के साथ खुद को जोड़ने में शायद समय लगे, पर मंडियों में व्याप्त दुष्प्रबंधन का यह एक साफ-सुथरा विकल्प है। इसके दरवाजे राज्य सरकारों को भी खोलने होंगे। इलेक्ट्रॉनिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट ई-नाम का जिक्र इस बार बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने किया। यह पोर्टल 16 राज्यों और दो केंद्र शासित राज्यों की कृषि मंडियों से जुड़ा है। इसमें इस वक्त 114 जिंसों का 50,000 करोड़ से ज्यादा का कारोबार हो रहा है। 

सरकार इसे 22,000 ग्रामीण बाज़ारों से जोड़ना चाहती है। सवा करोड़ किसानों, सवा लाख व्यापारियों और करीब 65,000 कमीशन एजेंटों का यह बाजार निजी क्षेत्र और सरकार के सहयोग का प्रतीक भी है। इसकी सफलता के पीछे भी बुनियादी ताकत तकनीक की है। पर इसके साथ राज्यों के कृषि कानूनों में बदलाव की ज़रूरत भी है। ट्रेडर्स अब खरीदारी से पहले जिंस की गुणवत्ता को चैक कर सकें इसके लिए सरकार ने देश की सभी मंडियों में क्वालिटी चैक लैब बनाने का भी फैसला किया है। 

देश के कॉफी बोर्ड ने ब्लॉक चेन पर आधारित ई-बाजार की शुरुआत की है। यह एक प्रायोगिक परियोजना है, जिसका उद्देश्य है कि कॉफी उत्पादकों को सही कीमत मिल सके। इसके कारण बिचौलियों की श्रृंखला घट जाएगी। इस प्लेटफॉर्म पर भारतीय और विदेशी किसान, आयातक-निर्यातक और खुदरा व्यापारी जुड़ रहे हैं।

बाज़ार के अलावा किसान को खेती, मौसम और उपकरणों की जानकारी देने के लिए रेडियो, टीवी और अखबारों के साथ-साथ इंटरनेट की भूमिका बढ़ रही है। डिजिटल इंडिया और इसके साथ भारतनेट और ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं, जिनकी शहरों से ज्यादा अब गाँवों में जरूरत महसूस की जा रही है। 

यह तकनीकी विस्तार हमें रोजमर्रा की दिक्कतों से बचा रहा है। सरकारी कामकाज को आसान कर रहा है और ज्ञान का विस्तार कर रहा है। मसलन आयकर रिटर्न दाखिल करने और रिफंड प्राप्त करना अब ज्यादा आसान है। अपराधियों की धर-पकड़ के लिए अब बेहतर उपकरण हमारे पास हैं। सरकार से सीधा संवाद करने का तरीका हमारे पास है। ई-गवर्नेंस की इन परियोजनाओं के समांतर व्यवस्था से जुड़े कई तरह के दोष सामने आ रहे हैं और आएँगे। उनके परिष्कार के बारे में भी हमें विचार करना होगा। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वारज्य में सहयोगी संपादक हैं।