भारती
ई-कॉमर्स कंपनियों का कितना विनियमन हो ताकि खुदरा व्यापार का शोषण न हो?

भारत में काम कर रही ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए पिछले कुछ हफ्तों में एक नया आयाम खुला है। अमेरिकी दिग्गज अमेज़ॉन और फ्लिपकार्ट के माध्यम से वॉलमार्ट जैसी बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों को शिकारी मूल्य निर्धारण पर और बहु-ब्रांड खुदरा विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) नियमों का उल्लंघन न करने के लिए सरकार चेतावनी देती आ रही है।

इस मुद्दे पर एक मीडिया बहस शुरू हो गई है कि नए युग के प्रौद्योगिकी-नेतृत्व वाले व्यावसायिक क्षेत्र में सरकार का हस्तक्षेप क्यों हो। सरकार ने विभिन्न ई-कॉमर्स कंपनियों को मौजूदा नियमों के अनुपालन पर प्रश्नावली भेजी है।

पहले ही बता दें कि ई-कॉमर्स भारत में समग्र खुदरा बाज़ार का एक बहुत छोटा हिस्सा है जिसका मूल्य मात्र 5 प्रतिशत है।

यहाँ तक कि संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) जैसी विकसित अर्थव्यवस्था में भी कुल खुदरा बाज़ार में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी लगभग 15 प्रतिशत ही है। सरकार के आलोचकों का कहना है कि ई-कॉमर्स व्यवसाय बहुत छोटा और अप्रासंगिक है क्योंकि इसे सरकारी नियमों ने बांध रखा है।

हालाँकि, ई-कॉमर्स व्यवसाय लगभग हमेशा खुदरा विक्रेताओं या मध्यम स्तर के व्यापारियों के लिए बाधा बनता है।

भारत में खुदरा व्यापार असंगठित है, चाहे वह राशन हो, छोटा किराना हो या खाद्य और पेय पदार्थ। वर्ग में सबसे नीचे आने वाले व्यापारों पर इसका धीरे-धीरे प्रभाव पड़ता है। बड़े संगठित व्यवसायों के पास आवाज़ होती है और साथ ही लॉबी के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की ताकत।

इसलिए कितना विनियमन अति-विनियमन है? जैसे प्रश्न का उत्तर उभरते व्यवसायों के बीच देना सरकार के लिए और भी कठिन हो जाता है।

एक तरफ, अंतर्राष्ट्रीय दिग्गज कोशिश करेंगे कि जितना संभव हो सके उतनी छूट उन्हें मिले ताकि वे भारत जैसे नए सीमांत में अपने कदम जमा सकें।

दूसरी ओर स्थानीय व्यापार संघ हमेशा पूंजियों से भरपूर ई-कॉमर्स कंपनियों पर अधिक नियंत्रण की बात करते हैं।

विनियमन अपने आप में कोई नई बात नहीं है। सभी देशों में विश्वास-विरोधी कानून मौजूद हैं और वास्तव में इन मामलों को हमेशा ज्यादा गंभीरता से लिया जाता है ना कि वैसे जैसे भारतीय नियामक वर्षों से करते आए हैं। नियमित जाँच के दायरे में ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों क्षेत्र के बड़े व्यापारी आते हैं।

अमेज़ॉन के मामले को देखें। पिछले साल सितंबर में अमेरिका के संघीय व्यापार आयोग (एफटीसी) ने इस बात की जाँच शुरू की थी कि क्या अमेज़ॉन छोटे व्यापारियों की मदद कर रहा है। एफटीसी ने छोटे व्यापारियों से साक्षात्कार कर जाना कि क्या उनके पास वास्तव में अमेज़ॉन के बाहर अन्य मंचों पर बेचने का विकल्प है और उनके राजस्व का कितना प्रतिशत अमेज़ॉन के माध्यम से आता है।

एफटीसी मुख्यालय

अमेरिका में सवाल यह है कि क्या अमेज़ॉन एक खुदरा विक्रेता है या यह ऑनलाइन खरीददारी कंपनी। अमेज़ॉन की कुल खुदरा बाज़ार में 4 प्रतिशत हिस्सेदारी है लेकिन ऑनलाइन खरीदारी में लगभग 40 प्रतिशत की बाज़ार हिस्सेदारी है।

यदि अमेज़ॉन को ऑनलाइन खरीददारी कंपनी के रूप में देखा जाए तो इसे विक्रेताओं से भारी लाभ मिलता है। अपने मंच पर आने वाले विक्रेताओं को अमेज़ॉन नियंत्रित करता है और उनकी परिचालन स्वतंत्रता पर नज़र रखता है। यह विक्रेताओं को निलंबित करने के व्यापक अधिकारों को बरकरार रखता है, हालाँकि इसने एक अपील प्रक्रिया बना रखी है।

यह सिर्फ अमेरिका में नहीं है कि अमेज़ॉन सवालों के घेरे में है। इस वर्ष की शुरुआत में विभिन्न यूरोपीय देशों में अमेज़ॉन के व्यापार मॉडल की जाँच की गई थी।

विक्रेताओं को प्रबंधित करने के लिए अमेज़न द्वारा नए नियमों को लागू करने के बाद जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने कंपनी के खिलाफ अपनी जाँच समाप्त कर दी।

हालाँकि, अन्य देश छोटे व्यवसायों से अमेज़ॉन के व्यवहार पर अधिक जानकारी प्राप्त करना जारी रखेंगे।

नियामकों को इस बात की भी चिंता है कि अमेज़ॉन अपने मंच के आँकड़ों का उपयोग कैसे करता है जो कि कंपनी के पास बड़ी मात्रा में है और जिसका उपयोग कंपनी अपने विक्रेताओं को विज्ञापित करने और प्राथमिकता देने के लिए करती है। यह लिस्टिंग प्राथमिकताओं  और उपभोक्ताओं को दिखाए जाने वाले ऑफ़र नियंत्रित करता है।

समय के साथ, यह मॉडल अपने लेबल को बढ़ावा देने के लिए छोटे व्यवसायों के विरुद्ध उच्च व्यावसायों के समक्ष संभावित भेदभाव का कारण बन सकता है।

हालाँकि यह समस्या केवल अमेज़ॉन के साथ नहीं है। यहाँ तक ​​कि मूल रिटेल दिग्गज वॉलमार्ट से भी अधिकारियों ने समय-समय पर पूछताछ की है।

इस मामले में सबसे प्रसिद्ध उदाहरण 2005 का है जब नियामकों ने वॉलमार्ट और नेटफ्लिक्स पर जुर्माना लगाया था कि वे अमेरिका में डीवीडी बाज़ार को चलाने के लिए कैसे मिलकर काम कर रहे थे। अन्य देशों जैसे कि मेक्सिको ने भी वॉलमार्ट के व्यापार चलाने के तरीकों के खिलाफ कार्रवाई की थी।

इस साल की शुरुआत में भारत ने ई-कॉमर्स कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई की थी जिसमें उन्हें संबंधित ब्रांडों से इन्वेंट्री को हटाने के लिए कहा गया था। इसकी व्यापक आलोचना हुई थी।

भारतीय बहु-ब्रांड एफडीआई विनियम ई-कॉमर्स मंच को इन्वेंट्री का स्वामित्व या प्रबंधन करने की अनुमति नहीं देते हैं। संबंधित ब्रांड संभवतः इन नियमों के अनुसार नहीं थे।

भारतीय नियामकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ई-कॉमर्स कंपनियों पर शिकारी मूल्य निर्धारण के आरोप हैं। कंपनियों ने ज़ोर देकर कहा कि उनके मंच पर लागू कोई भी छूट सीधे उनके विक्रेताओं द्वारा प्रदान की जाती है।

हालाँकि, नियामकों को लगता है कि यदि कंपनियाँ इन्वेंट्री का प्रबंधन करती हैं या वे अपने मार्केटिंग खर्च का इस्तेमाल छूट देने के लिए करती हैं तो यह भारतीय कानूनों का उल्लंघन है।

व्यापार संगठनों के साथ-साथ बड़े विदेशी खुदरा व्यापारी जो भारत में दुकान स्थापित करने के विकल्पों का मूल्यांकन करते हैं, ने कई बार शिकायत की है कि ई-कॉमर्स कंपनियाँ अपने नकारात्मक नकदी प्रवाह को निवेशों से वित्त पोषित कर रही हैं।

अपनी ओर से ई-कॉमर्स कंपनियाँ दावा करती हैं कि उन्होंने 5 लाख से अधिक विक्रेताओं के लिए नया बाज़ार बनाया है।

जैसे-जैसे ई-कॉमर्स का प्रभाव बढ़ रहा है और नए वर्गों को अपने अंतर्गत ले रहा है, विशेषकर जल्दी खराब होने वाले किराना और भोजन सामग्रियों को, विनियमन पर बहस जारी रहेगी। भारतीय प्राधिकारी अपने अधिकारों में सुनिश्चित करें कि इस स्थान पर कोई प्रतिबंधात्मक व्यापार प्रथाओं को तो बढ़ावा न दिया जा रहा हो।

इन मंचों का नए बाज़ार बनाना और रोजगार प्रदान करना मौजूदा बहु-ब्रांड खुदरा नियमों का अनुपालन न करने की भरपाई नहीं कर सकता।

यह भारतीय व्यवसायों का दायित्व है जिन्हें प्रासंगिक बने रहने के लिए नए मंच विकल्पों के साथ काम करने के लिए अधिक चपलता का प्रदर्शन करना होगा।