भारती
डॉक्टर दिवस विशेष- हमारी संस्कृति और समाज में क्या है चिकित्सकों का स्थान

प्रसंग- हाल ही में डॉक्टरों के साथ हुई घटनाओं के बीच डॉक्टर दिवस पर हमें इसपर चर्चा करनी चाहिए कि हमारे समाज और संस्कृति में क्या महत्त्व है चिकित्सकों का।

याभिः शचीभिवृर्षणा परावृजम प्रान्धम श्रोणम चक्षस एतवे कृथ:
याभिर्वृतिकाम ग्रसितामुन्चतम ताभिरु षु युतीभिरश्विना गतम।
(ऋग्वेद , प्रथम मंडल)

“हे अश्विनीकुमार, तुमने जिन उपायों से पंगु परावृज को चलने में समर्थ, अंधे ऋजाश्व को देखने में कुशल, प्राणरहित श्रोण को चपल बनाया, उन समस्त साधनों को लेकर पधारो।“

ऋग्वेद में देव वैद्य अश्विनी कुमार का स्वागत करते हुए लिखा गया है। प्रकृति को बूझने में और प्रकृति से जूझने में प्रयासरत वैदिक मनुष्य के पास प्रकृति के कोप से बचने का साधन चिकित्सक ही थे अतः उचित ही रहा जो उन्होंने चिकित्सकों को देव-तुल्य जाना। यह आश्चर्य नहीं है कि सामान्य सुखों का लोभ त्याग कर जीवन को अनजान शारीरिक आपदाओं से बचाने के साधनों पर शोध करने वाले वैद्यों और चिकित्सकों के देव-रूप अश्विनी कुमार बन्धुओं सम्मान एवं आमंत्रण देते हुए इतने श्लोक हैं जो संभवतः देवराज इंद्र और अग्नि के सम्मान में लिखे गए श्लोकों से कुछ ही कम हैं।

डॉक्टर्स डे या चिकित्सक दिवस के अवसर पर यह लेख लिखते हुए उचित ही है कि प्रारंभ इस स्वीकारोक्ति से हो कि 1990 के दशक में जब इंजीनियरिंग एवं मेडिकल के व्यवसाय में प्रवेश कठिन होता था और व्यवसाय की कीमत आज से कहीं अधिक, अभियांत्रिकी एवं चिकित्सा के छात्रों में एक सहोदर स्पर्धा सी रहती थी। हमें अभियांत्रिकी के यथार्थ ज्ञान के आगे चिकित्सा अनिश्चित विज्ञान लगती थी। आयु के साथ और परिपक्वता के साथ एक डॉक्टर का संघर्ष, परिश्रम एवं समाजिक आवश्यकता खुलती चली जाती है।  

ऐसा नहीं है कि इस बीच चिकित्सा का व्यवसायीकरण नहीं हुआ। हुआ और वैसा ही हुआ जैसा वृहद् रूप में समाज का हुआ। समाज की सोच को बहुत हद तक समाज का संवाद परिभाषित करता है और साहित्य प्रतिबिम्बित करता है। जब आप किसी के जीवन को ऐसी निकटता से छूते हैं तो आपके देव या दानव बनने की संभावना पढ़ ही जाती है। एक बढ़िया से बना बांध भी एक अकाल को भयभीत भाव से देखते वर्ग के जीवन पर प्रभाव डालता है किन्तु उतनी निकटता से नहीं छूता कि देव या दानव के खांचे में फंसे। एक डॉक्टर वहीं जीवन को व्यक्तिगत स्तर पर छूता है और इस दैवीकरण और दानवीकरण के खतरे को प्रतिदिन जीता है।

ऐसा व्यक्तिगत मूल्यांकन जहाँ व्यक्तिगत अपेक्षाएँ इतनी निकटता से आपको प्रतिदिन कई बार देखें, एक मानस पर कैसी कठिनाई प्रस्तुत करती है, संभवतः एक चिकित्सक ही समझ सकता है। ऐसी अपेक्षाओं के सामने और व्यावहारिक प्रश्नों के परिपेक्ष्य में जब भरे हुए बिस्तरों के आधार पर हॉस्पिटल कारखानों के मॉडल पर आपका पारितोषिक तय करें, मानसिक सामंजस्य को संतुलित रखना आसान नहीं है।  युद्ध क्षेत्रों में भी डॉक्टर एक पौरुषिक नायकत्व से दूर अपने कर्त्तव्य निर्वहन में लगे होते हैं। ऐसे विरोधाभासों के बीच एक वस्तुनिष्ठता के साथ काम करने के लिए अवश्य ही चरक के गुण होने चाहिए जैसे चरक चरक संहिता में चिकित्सक के विषय में लिखते हैं

“रजस्तमोभ्या निर्मुक्ता तपोज्ञानबलेन ये।
येषां त्रिकालममलं ज्ञानमव्याहतम सदा।।
आप्ता शिष्टाः विबुद्धास्ते तेषां वाक्यसंशयं।
सत्यम वक्ष्यन्ति ते कस्मादसत्यं नीरजस्तमा:।।
-चरक संहिता

“यह व्यक्ति हैं जिन्होंने स्वयं को आवेग और अनुराग के विकार और अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के द्वारा मुक्त किया है; जिनकी समझ- भूत, भविष्य और वर्तमान को सम्मिलित करते हुए- शुद्ध और स्पष्ट रहती है- यही व्यक्ति हैं जो प्रामाणिक है, ज्ञानवान हैं; इनके कथ्य अकाट्य हैं, सत्य हैं; ऐसे व्यक्ति जो द्वेष अनुराग से दूर हैं, क्यों असत्य भाषण करेंगे?”

इस श्लोक में जिस सत्यनिष्ठता, जिस वीतरागी विचारशीलता का चरक जिक्र करते हैं आज के संदर्भ में अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है जब विचित्र सा संगठित प्रलाप सभी बौद्धिक व्यवसायों पर बढ़ रहा हो चाहे वो शिक्षा हो या चिकित्सा।   

1970 के दशक में सिनेमा की कहानियों में अक्सर जब बच्चों से पुछा जाता था तो उनका उत्तर डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर होता था। अब बच्चे बड़े आदमी बनना चाहते हैं। एक समय सिनेमा में नायक आदर्शवादी डॉक्टर या शिक्षक होता था। आज डॉक्टर लालची, हृदयहीन होता है, इंजीनियर भ्रष्ट होता है, नायक व्यवसायी होता है। जिस युग में माता पिता बच्चों को और बच्चे माँ बाप को उनकी अर्थक्षमता पर मापते हों, डॉक्टर की (और चिकित्साकर्मियों की) सुश्रुषा मरीज और चिकित्सक के मध्य एक भावनाहीन, निस्पृह व्यवस्था के रूप में देखी जाए।

  

कोलकाता में डॉक्टर परिबाहा मुखोपाध्याय पर हमला और मुजफ्फरपुर में तमाम कठिनाइयों से जूझते डॉक्टरों पर मीडिया हमला इसी विचारधारा का सूचक है, सेवा को एक सौदे के रूप में देखने की भावना है। टिंग कार्ड इंडस्ट्री आज भावनाओं की दिशा और तीव्रता निर्धारित करती है, ऐसे में हर दूसरे दिन कोई न कोई दिवस होता है। ऐसी बाज़ार-संचालित दिवसों की धक्का-मुक्की के बीच ऐसा क्यों आवश्यक है कि हम 1 जुलाई के विषय में कुछ गंभीरता से सोचें। स्वास्थ्य सेवाओं के संदर्भ में हमारी स्थिति बहुत बुरी है। गाँव में सुविधाएँ न के बराबर हैं। हमारी सामाजिक अदूरदर्शिता ऐसी है कि हम तमाम विषयों पर सड़क पर उतर पड़ते हैं पर स्कूल, कॉलेज और अस्पताल की मांग पर काम ही प्रदर्शन होते हैं। चुनावी दावे भी होते हैं तो ऐसे संकेतों पर होते हैं जिनका मापदंड ही संभव न हो, हो भी तो उनकी प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न हों। मसलन 3 प्रतिशत जीडीपी का स्वास्थ्य पर होगा परन्तु कितने अस्पताल बनेंगे, कितने मेडिकल कॉलेज बनेंगे, इसे अस्पष्ट छोड़ दिया जाता है। अगर हम स्पष्ट मापदंड पर मापते तो क्या मुजफ्फरपुर के गायब बाल- वार्ड पर प्रश्न न उठाते और चमकी बुखार पर 135 निरीह बच्चों की मृत्यु के बाद डॉक्टरों को धमकाने पहुँचते?

अमेरिका में 1933 से चिकित्सक दिवस मनाया जाता है। 1991 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 30 मार्च को डॉक्टर्स डे घोषित किया।  भारत में वही चिकित्सक दिवस 1 जुलाई को मनाया जाता है। यह भी एक विरोधाभास और विडंबना है कि जिस बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री और भारत रत्न बिधान चंद्र रॉय के जन्मदिन को चिकित्सक दिवस मनाया जाता है उनके कर्म राज्य में एक 24 वर्षीय डॉक्टर चोटिल होकर, सरकारी उलाहने और उपेक्षा झेलते हुए मृत्युप्राय अवस्था से वापस जीवन की और लौटने को प्रयासरत है और उन्हीं श्री बीसी रॉय का जन्म राज्य 100 से अधिक बच्चों की स्वस्थ्य सेवाओं के अभाव में हुई दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु के दुःख में कलप रहा है। विलाप बंगालऔर बिहार से उठ रहा है लेकिन स्थिति बाकि जगह भी बहुत बेहतर नहीं है। 

चिकित्सक संवेदना अधिक और सम्मान काम माँग रहे हैं। दैवीकरण और दानवीकरण से परे एक मूलभूत मानवीय संवेदना की अपेक्षा डॉक्टर परिबाहा को भी है और पसीने में लथ पथ कई रातों के जगे हुए, पत्रकार के चीखते अपमान से अपने उधड़े हुए सम्मान और थके हुए व्यक्तिगत अपेक्षा को बचाते मुजफ्फरपुर के सुविधाओं की कमी से जूझते डॉक्टर को भी। प्रश्न यह है की एक स्वास्थ्य सेवाओं में शासकीय उपेक्षता और प्रशासनिक अभाव के कैंसर का उत्तर कबतक हम आकस्मिक संवेदना के बैंडऐड से करते रहेंगे? क्या हम इस चिकित्सा दिवस पर सोचेंगे कि हम अपने आज के अश्विनी कुमारों को सम्मान, सुरक्षा और सुविधाएँ दे सकेंगे कि वे समाज को वह सुविधा दे सकें जिसका वे जीवन के पाँच वर्ष एक कठिन शिक्षा में झोंकने के बाद प्राण लेते हैं? ऋग्वेदिक काल की हर दिन की प्रार्थना आज एक तारीख में सिमट गई है किंतु चिकित्सक की आवश्यकता और प्रासंगिकता पहले से काम न हो कर बढ़ी ही है और एक व्यक्ति और चिकित्सक का संबंध व्यावसायिक संबंध से अधिक है, इसे समाज और चिकित्सक दोनों को समझना आवश्यक है।