भारती
देवगिरि में लूटा 9,120 करोड़ रुपये का सोना- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग 15(ब)

अलाउद्दीन दोगुने जोश से कड़ा से निकला लेकिन चंदेरी के लिए नहीं देवगिरि के लिए (उसे इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली जानने के लिए पढ़ें इस कहानी का पहला उप-भाग)। दो महीने में वह वहाँ जा पहुँचा। देवगिरि पर सीधे हमले से पहले वह एलिचपुर में दो दिन रुका। उसने वहाँ अफवाह फैलाई कि वह दिल्ली के सुलतान का एक अमीर है, जो तेलंगाना की तरफ जा रहा है। आधी रात के वक्त एलिचपुर से निकलकर देवगिरि पर हमला कर दिया।

जैसा हमने बंगाल में देखा (यहाँ पढ़ें), वही दृश्य यहाँ देखिए। कोई सीमा विवाद, किसी आपसी प्रतिष्ठा के प्रश्न पर घोषित युद्ध नहीं है। देवगिरि की अपनी कमज़ोरियांँ हो सकती हैं, लेकिन हो क्या रहा है? यह विशुद्ध रूप से एक निर्दोष इलाके को किसी भी सूरत में लूटने बेइज्ज़त करने और बरबाद करने की मुहिम थीं।

लुट-पिटकर नष्ट होने के बाद बचे हुए बेइज्ज़त राजाओं, उनके दरबारियों या आम नागरिकों को कभी समझ में ही नहीं आता होगा कि ये कौन लोग हैं? ये ऐसा क्यों कर रहे हैं? ये इतने बुरे तरीके से पेश क्यों आते हैं? ये कत्लेआम पर उतारू क्यों रहते हैं? इनकी हमारे राज्य से लड़ाई क्या है? हमने इनका बिगाड़ा क्या है? उन्हें इन सवालों के कोई जवाब कभी नहीं मिले।

महाराष्ट्र के लिए यह 1296 का बदकिस्मत साल था, जब देवगिरि में पहला आतंकी हमला हुआ। नए-नए इलाकों की तलाश उन बेरहम बहेलियों को भारत में दूर-दूर तक ले जा रही थी। हर जगह पीढ़ियों से जमा खजाने और समृद्धि उनकी आंखों में खटक रही थी। वे जितना जल्दी और जितना ज्यादा मुमकिन हो उतना माल बटोरकर मालामाल होना चाहते थे। वे जो भी थे, उनके तौर-तरीके नृशंस थे। इंसानियत का कदम-कदम पर कत्ल करने वाले थे।

आज के इतिहासकारों ने उन हमलावरों की वकालत करते हुए हमें बार-बार बताया है कि उन हमलों और लूट का मजहब से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन देवगिरि पर हुए इस भयावह हमले पर बरनी ने इस्लाम की महिमा इन शब्दों में बताई है-

देवगिरि के लोगों ने प्राचीन काल से लेकर अब तक इस्लाम के विषय में कुछ भी सुना नहीं था। मरहठा की जमीन पर इस्लामी सेना पहुँची भी नहीं थी। कोई बादशाह, खान या मलिक भी यहाँ तक नहीं पहुँचा था। देवगिरि में उस समय अपार सोना, चांदी, जवाहरात और बेशकीमती चीजें जमा थीं। रामदेव को इस्लामी सेनाओं के आने के समाचार मिले। अलाउद्दीन के सवार और प्यादे लाजौरा की घाटी में पहुँच चुके थे।

ठीक इसी समय देवगिरि के राजा रामदेव की सेना उनके बेटे के साथ कहीं गई हुई थी। बची-खुची सेना को अलाउद्दीन से निपटने के लिए भेजा गया। लेकिन उसे हराते हुए अलाउद्दीन ने पहली बार देवगिरि के बाहर कदम रखे। पहले ही दिन उसने शाही अस्तबल से 30 हाथी, कई हज़ार घोड़े निकाले। बरनी का ब्यौरा है-

अलाउद्दीन को देवगिरि से इतना सोना, चांदी, मोती, जवाहरात, बेशकीमती वस्तुएँ, रेशमी कपड़े और दुशाले मिले कि वह दो करन (एक करन यानी 10-30 साल का समय) से ज्यादा समय तक इस्तेमाल में लाए गए। लूट के इस माल में लाए गए हाथियों, धन-संपत्ति और जवाहरात में अब भी बहुत कुछ दिल्ली के खजाने में जमा है।

कौन थीं वे दो बहादुर मराठी महिलाएँ?

महाराष्ट्र की पहली भयानक लूटमार के ब्यौरे इतने हैरतअंगेज़ थे कि बरनी के अलावा कुछ और लेखक भी इन्हें दर्ज करना नहीं भूले। इनमें एक बड़ा नाम है- एसामी। एसामी के दादा-परदादा इल्तुतमिश के समय से ऊँचे ओहदों पर थे। एसामी तुगलक का समकालीन है। जब तुगलक ने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि बनाई तब उस काफिले में एसामी भी अपने दादा को लेकर दिल्ली से निकला था। अलाउद्दीन के देवगिरि हमले पर कुछ नई जानकारियाँ उसके पास हैं-

लाजौरा के मुक्ता कान्हा ने रामदेव के पास जाकर कहा कि तुर्कों की फौज हमारे इलाके में आ चुकी है। लाजौरा में कान्हा का मुकाबला अलाउद्दीन के लोगों से हुआ। कान्हा की सेना में दो औरतें शेरनियों के समान बहादुर थीं। उन्होंने जमकर लड़ाई की। लेकिन तुर्कों ने हिंदुओं का विनाश कर दिया।

जब वे दोनों औरतें अलाउद्दीन के सामने लाई गईं तो उसने कहा कि जिस स्थान की महिलाएँ इतनी बहादुर हैं, वहाँ के पुरुष भी ज़रूर बड़े वीर होंगे। अत: हमें चाहिए कि हम पक्के इरादे से आगे बढ़ें और मरहठा प्रदेश का विध्वंस कर दें। जो कुछ लूट में हासिल हो, उसे अपने पास रख लें, चाहे वह कितना ही अधिक क्यों न हो।

रामदेव ने देवगिरि के किले के दरवाज़े बंद कर लिए थे। राय की सेना उसके बेटे भिल्लम के साथ कहीं गई थी। अलाउद्दीन ने किसी खतका नाम की जगह पर कब्जा करते हुए देवगिरि को घेरा। एक हफ्ते में रसद खत्म हो गई तो समझौते की बात हुई। सेना को अत्यधिक धन-संपदा हासिल हुई।

जब भिल्लम को यह खबर मिली तो वह 5 लाख प्यादे, 10,000 सवार और 60 हाथियों के साथ देवगिरि की ओर लौटा। अलाउद्दीन ने रामदेव से कहा, “अपने बेटे को रोको वर्ना सबसे पहले तेरा सिर उड़ा दूँगा। फिर उसको मारूंगा।” तब राय ने अपने पुत्र को एक खत भेजकर कहा, “अगर तू युद्ध करेगा तो मेरी भी हत्या करा देगा और राज्य भी खो देगा।”

सब कुछ अलाउद्दीन के मुताबिक ही हुआ। वह लूट का माल लेकर लौटा। छह महीने बाद अपने इलाके में आया। तीन हफ्ते तक कड़ा में जश्न मनाया गया। अब अलाउद्दीन अवध, बिहार, लखनौती और तिरहुत पर हमले और अपने अलग राज्य के सपने देख रहा था।

अमीर खुसरो ने लिखी हमले की तारीख

अमीर खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के देवगिरि पहुँचने की तारीख 25 फरवरी 1296 दर्ज की है। वह लिखता है– “राय रामदेव जो देवगिरि के उस हरे-भरे बागीचे का एक बेमिसाल दरख्त था, इससे पहले कभी किसी बदकिस्मती के बाण से जख्मी नहीं हुआ था। अलाउद्दीन वहाँ से हाथियों पर बेशकीमती जवाहरात लादकर, सोने के थैलों को ऊंटों और घोड़ों पर लदवाकर हवा की रफ्तार से 1 जून 1296 को कड़ा मानिकपुर पहुँचा। उसने अत्यधिक सोना लुटाया। उस समय मानिकपुर की हरियाली जवाहरातों से जड़ी हुई दिखाई दी।

फरिश्ता के पास लूट का हिसाब

फरिश्ता के नाम से मशहूर लेखक मोहम्मद कासिम हिंदू शाह अस्तराबादी ने अपनी डायरी में लिखा– “दक्षिण के काफिरों ने मुसलमानों का युद्ध कभी नहीं देखा था। उनकी आँखों को मुसलमानों की तलवारों और सीनों को छेद डालने वाले तीरों का कोई तजुर्बा नहीं था। वे पहले ही हमले में मुकाबला नहीं कर पाए और भाग खड़े हुए।

जब अलाउद्दीन देवगिरि पहुँचा तो उसी दिन कोंकण के कारोबारी 2,000-3,000 नमक के बाेरे लाए थे। वे इन्हें किले के पास छोड़कर भाग गए थे। अलाउद्दीन ने देवगिरि नगर के प्रतिष्ठित लोगों, महाजनों, ब्राह्मणों, व्यापारियों और आमजनों को बंदी बना लिया। लूटमार शुरू हुई। 40 हाथी और रामदेव के अस्तबल से कई हज़ार घोड़े ले लिए। यह बात उसने फैलाई कि पीछे 20,000 मुसलमान इस तरफ आ रहे हैं। इसके बाद उसने किले को घेरा।

राजा रामदेव ने कुछ ब्राह्मणों को अलाउद्दीन के पास भेजकर कहलवाया, तुमने अक्ल से काम नहीं लिया। खाली शहर में कब्जा करके मनमानी की। जल्दी ही दक्षिण के चारों ओर से असंख्य सेना इकट्‌ठा होंगी और तुममें से कोई जिंदा वापस नहीं जाएगा। तकदीर से जिंदा निकल गए तो मालवे का राजा, जिसके पास 40,000 प्यादे हैं, खानदेश और कोंदवाड़ा के राजे तुम्हारा रास्ता रोक देंगे। किसी को जिंदा नहीं छोड़ेंगे। इसलिए बेहतर है कि तुम महाजनों और आम लोगों से धन-संपत्ति लेकर उन्हें छोड़ दो और लौट जाओ।

अलाउद्दीन ने यह बात कुबूल कर ली। उसे बंदियों से 50 मन सोना, कई मन मोती और बेशकीमती कपड़े मिले। यहाँ आने के 15वें दिन सुबह उसने यहाँ से जाने का फैसला किया। लूट के माल की पैकिंग ज़ोरों पर थी। इतना भी उसे उम्मीद से ज्यादा मिला था।

वह इसपर ही लौटने के लिए राजी था। लेकिन भारत की बदकिस्मती भी पूरे ज़ोर पर थी। तभी रामदेव के बड़े बेटे को यहाँ का यह हाल पता चला। वह एक बड़ी सेना लेकर ठीक उसी वक्त लौटा, जब अलाउद्दीन यहाँ से सब समेटकर जाने की तैयारी में था।

रामदेव का बेटा देवगिरि से 3 कोस की दूरी तक आ चुका था। रामदेव ने उसके पास संदेश भेजा, जो कुछ होना था, हो गया। मुझे कोई नुकसान नहीं हुआ इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद है। प्रजा को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई किसी अच्छे तरीके से कर दी जाएगी। उनसे युद्ध मत करो। तुर्क बड़े ही विचित्र लोग हैं। उनसे युद्ध करना उचित नहीं है। लेकिन रामदेव के बेटे ने अपनी सैन्य ताकत के बूते पर युद्ध का फैसला लिया और अलाउद्दीन को अपना संदेश भेज दिया।

अलाउद्दीन आगबबूला हो गया। उसने देवगिरि में रामदेव के बेटे के आदमियों को पकड़वाया और उनके मुँह काले करके सेना में घुमाया। उसने मलिक नुसरत खां को 1,000 लोगों के साथ किले के घेराव में छोड़ा और खुद फौरन रामदेव के बेटे की फौज से मुकाबले के लिए निकला।

उसकी हार तय थी। उसके पैर उखड़ने ही वाले थे कि पीछे से नुसरत बिना उसकी इजाज़त अचानक यहाँ आया। दक्षिण की सेना को लगा कि वे 20,000 मुसलमान इनकी मदद के लिए आ गए। इस धोखे में वे अफरातफरी में पड़ गए और भागने लगे। अलाउद्दीन ने बाज़ी जीत ली।

अलाउद्दीन ने अब अपनी बेरहमी का पहला परिचय महाराष्ट्रवालों को कराया। उसने बंदी बनाए गए महाजनों और ब्राह्मणों को कत्ल करा दिया। रामदेव के बहुत से रिश्तेदारों को जंज़ीरों से बांधकर किले के सामने खड़ा कर दिया।

किले में अनाज खत्म हो चुका था। खिलजी के हमलावरों ने घेरा डाला था। कोई सामान लेकर अंदर आ नहीं सकता था। अनाज की कमी की बात छुपाकर रामदेव ने एक बार फिर अलाउद्दीन से समझौते की बात शुरू की। उसने इस बिलावजह फसाद के लिए अपने बेटे को कुसूरवार मानकर यह गुज़ारिश की कि इस भूल की सज़ा उसे न दी जाए। हालाँकि अलाउद्दीन को पता चल गया कि किले में अनाज खत्म है। अब उसने समझौते में देर करना शुरू किया।

आखिरकार एक आँखें चौंधियाने वाला लेन-देन तय होता है, जो हर भारतीय के संज्ञान में होना चाहिए। फरिश्ता ने इस्लामी आतंकियों के हाथों भारत के इतिहास की इस महालूट को अपने बहीखाते में इन आँकड़ों के साथ दर्ज किया-

रामदेव 600 मन सोना, 1000 मन चांदी, 4000 रेशमी कपड़ों के थान, अन्य ऐसा सामान जिसका ज़िक्र बहुत लंबा है और अक्ल जिसपर भरोसा भी न करे, अलाउद्दीन को देगा, एलिचपुर और उसके आसपास का इलाका भी देगा और इस इलाके का सालाना वसूली कड़ा भेजेगा। (उस समय का एक मन 40 सेर के बराबर था।)

देवगिरि पर हमले के 25वें दिन अलाउद्दीन ने इसी बेहिसाब लूट को लेकर कड़ा का रुख किया। लूट का यह माल लेकर लौटते हुए अलाउद्दीन ने ज़रूर विदिशा वालों का शुक्रिया अदा किया होगा। जब वह रास्ते में था तब जलालुद्दीन खिलजी ग्वालियर में था और लूट की खबरें उस तक पहुँच रही थीं।

उसके आदमी उसे चंदेरी चलने पर ज़ोर दे रहे थे ताकि आगे बढ़कर अलाउद्दीन से लूट का माल वहीं ले लिया जाए। उसे किसी हालत में लूट का माल लेकर कड़ा न पहुँचने दिया जाए। लेकिन किस्मत जलालुद्दीन को ग्वालियर से लौटाकर दिल्ली ले गई थी। एक तरह से देवगिरि की दौलत ने उसकी मौत तय कर दी थी। यह दौलत अलाउद्दीन को विदिशा के ‘जागरूक नागरिकों’ की बदौलत हासिल हो सकी थी।

एक मन में 40 सेर होते हैं। अलाउद्दीन को देवगिरि से मिला 600 मन सोना। यानी 24,000 सेर। एक सेर आज के एक किलोग्राम के लगभग बराबर होता है। इसका मतलब है कि 24,000 किलो सोना। आज के भाव से इसकी कीमत आँकिए।

आज करीब 38 लाख रुपए लगभग एक किलो सोने की कीमत है। इस हिसाब से लूटे गए सिर्फ सोने की कीमत ही 9,120 करोड़ रुपए होगी। सिर्फ सोने की कीमत। इसमें चांदी और दीगर कीमती जवाहरात तो शामिल ही नहीं हैं। हमें समझना चाहिए कि किसी और मुल्क को सोने की तो दूर चांदी या तांबे की चिड़िया भी क्यों नहीं कहा जाता…

अब आप कल्पना कीजिए कि भारत के इतिहास की यह महालूट कर कौन रहा है? यह कोई बगदाद का खलीफा या दिल्ली का सुलतान लुटेरों की अपनी लाखों की फौज लेकर महाराष्ट्र नहीं आया था। दिल्ली के मातहत इलाहाबाद के पास कड़ा-मानिकपुर जैसी मामूली रियासत का एक हाकिम देवगिरि जैसे सदियों पुराने समृद्ध साम्राज्य से लूट में यह हासिल कर रहा है।

उसे देवगिरि की इस दौलत की जानकारी विदिशा के लोगों ने दी थी और वह वहाँ भी लूटने ही पहुँचा था, रिश्तेदारी करने नहीं। दोनों ही जगह वह ज़िंदगी में पहली बार आया था। विदिशा की लूट से उसने सिर्फ 7,000-8,000 लुटेरों का एक झुंड तैयार किया था, जिसकी दम पर वह देवगिरि तक चला आया था। लेकिन यहाँ मौत ने घर देख लिया था। महाराष्ट्र तक उस अमावस की काली छाया आ चुकी थी, जिसने सौ साल पहले दिल्ली को अपनी चपेट में लिया था और बंगाल तक काे डस चुकी थी।

अगले अंक में देखिए, अलाउद्दीन देवगिरि की इस महालूट की दम पर किस तरह दिल्ली पहुँचता है और इस लूट की कैसी बंदरबाँट करता है? अब देवगिरि बार-बार लूटा जाने वाला था।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com