भारती
क्षेत्रीय हवाई अड्डे विकसित करने के लिए अनुकूल समय, नियोजन होगा महत्त्वपूर्ण

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में 100 क्षेत्रीय हवाई अड्डे विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना की बात कही थी। देश के सभी भागों को एक-दूसरे से जोड़ने के लिए बन रहे इंफ्रास्ट्रक्चर का यह एक भाग है। लेकिन इसे लेकर उद्योग विशेषज्ञ थोड़े संशय में हैं। इसके विरोध में कुछ ठोस तथ्य भी हैं।

हवाई ट्रैफिक की माँग मेट्रो शहरों तक ही सीमित है, क्षेत्रीय हवाई अड्डे विकसित करना एक चुनौती है, क्षेत्रीय हवाई अड्डों से होने वाली आय कम रहती है, भारत ने क्षेत्रीय एयरलाइन विफलताओं का सामना किया है और बढ़ते शहरीकरण का अर्थ है कि अधिक लोग शहरों की ओर जाएँगे, ये कुछ तर्क हैं इस प्रस्ताव के विरोध में।

लेकिन फिर भी विडंबना से भरी और दुर्भाग्यपूर्ण कुछ घटनाएँ हुईं जो इन 100 हवाई अड्डों के विकास में सहायक होंगी। कोरोनावयरस के कारण एयरलाइन उद्योग की बरबादी, रोजगार के अवसरों की कमी की भविष्यवाणी और घरेलू उड्डयन के बढ़ने की अपेक्षा, ये कुछ सहायक घटनाएँ हैं। पहले जो अति महत्वाकांक्षी परियोजना लग रही थी, अब लग रहा है कि वह सटीक है।

क्षेत्रीय हवाई अड्डों के लिए आवश्यक है विशिष्ट व्यापार मॉडल

क्षेत्रीय हवाई अड्डे का अर्थ वह जहाँ वर्ष भर में 10 लाख से कम यात्री आते हों। भारत में अधिकांश ऐसे ही हवाई अड्डे हैं जिनमें से कुछ पर तो वर्ष भर में 7,000 यात्री ही आते हैं। अधिकांश क्षेत्रीय हवाई अड्डे घाटे में चल रहे हैं।

वर्तमान हवाई अड्डे मॉडलों में राजस्व का मुख्य आधार ट्रैफिक है इसलिए कम लोगों का अर्थ हुआ कम कमाई। भारतीय विमानपट्टन प्राधिकरण (एएआई) के आँकड़ों के अनुसार उनके 75 प्रतिशत हवा अड्डे घाटे में चल रहे हैं जिनमें से अधिकांश क्षेत्रीय हवाई अड्डे हैं।

एएआई मुख्यालय

इन सबके बावजूद जिन शहरों को क्षेत्रीय हवाई अड्डे सेवा पहुँचाते हैं उनके लिए वे महत्त्वपूर्ण होते हैं। यहाँ तक कि कई स्थानों पर देखा गया कि संयोजकता ने स्थानीय अर्थव्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाला।

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के साथ कम ट्रैफिक को ध्यान में रखते हुए आवश्यकता है ऐसी रणनीति की जो ट्रैफिक विकास, पर्यटक संख्या में बढ़ोतरी और संयोजकता को बल दे। इस दिशा में कई प्रयास किए जाने शेष हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर विकास मात्र पहला कदम

हवाई अड्डा परियोजनाओं में ग्रहण क्षेत्र, भावी ट्रैफिक अनुमान, विनियमन अनुमतियाँ, परियोजना की वित्त व्यवस्था, भूमि अधिग्रहण और क्रियान्वयन मुख्य भाग होते हैं। विकास में अधिक समय विनियमों की बाधाओं के कारण लगता है। एक बार अनुमति मिलने के बाद निर्माण कार्य में अधिक समय नहीं लगता है।

लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण मात्र पहला कदम है। इसके अलावा हवाई अड्डों को यह भी देखना चाहिए कि माँग कैसे बढ़ाई जाए। छोटे शहरों में शुरुआती स्तर पर माँग कम रहती है और इसे बढ़ने में समय लग सकता है। साथ ही वर्तमान ट्रैफिक प्रोफाइल के अनुसार मेट्रो शहरों की माँग में 60-70 प्रतिशत भागीदारी है और बढ़ते शहरीकरण के साथ यह दूरी बढ़ेगी ही।

इसलिए माँग बढ़ाने के लिए हर हवाई अड्डे को कुछ कारकों पर ध्यान देना होगा। ये कारक कर छूट, होटल क्षमता और मौसम भी हो सकते हैं। इसके अलावा हवाई अड्डे को पर्यटन क्षेत्र से जोड़ने, स्थान का लाभ उठाने और आला माँग प्रोफाइल बढञाने जसे भी कुछ उपाय हो सकते हैं।

प्रतिभा की उपलब्धता बनाती नियोजन के लिए अनुकूल समय

क्षेत्रीय हवाई अड्डों के लिए प्रतिभा को आकर्षित करना और लंबे समय तक संजोकर रख पाना चुनौती रहती है। कुछ भौगोलिक परिस्थिति, कुछ वेतन और कुछ व्यवहार्यता के कारण। सीधे कहा जाए तो कोई भी छोटे शहर में जाकर एक ऐसी हवाई अड्डा परियोजना पर काम नहीं करना चाहता जहाँ विमानों के उड़ने की संभावना कम हो।

विडंबना है कि कोरोनावायरस के कारण हवाई सेवाएँ लगभग बंद हो गई हैं और ऐसे में प्रतिभा उपलब्ध है जो हवाई अड्डे और एयरलाइन्स के सोच के बीच की खाई को पाट सके।

पारंपरिक रूप से हवाई अड्डे यह सोचते हैं कि एयरलाइन्स क्या करती है, यह नहीं कि वे क्या सोचती हैं। ऐसे में दूसरे शहरों को प्रतिनिधि के रूप में प्रयोग में लाया जाता है और यही हर हवाई अड्डे को विशिष्ट बनाती है।

प्रायः छोटे शहर संयोजकता की चाह में कई सब्सिडी और छूटें देते हैं लेकिन यह योजना एयरलाइन्स के अनुकूल नहीं होती क्योंकि क्षेत्रीय मार्गों पर नकद प्रवाह, ट्रैफिक और नेटवर्क एकीकरण की समस्या रहती है। जब छँटनी करनी होती है तो सबसे पहले क्षेत्रीय मार्गों को ही काटा जाता है।

ऐसा न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए इन बातों को पहले से सोचकर ही नियोजन करना चाहिए और माँग को बनाए रखने पर विचार करना चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में सही प्रतिभा सहायता कर सकती है।

पूंजी पर प्रतिफल की पहेली

क्षेत्रीय हवाई अड्डों की सबसे बड़ी चुनौती आय होती है। व्यापार मॉडल के सही न होने के कारण उपयुक्त आय नहीं हो पाती। इस प्रकार हवाई अड्डे आवंटन और सब्सिडियों के माध्यम से पैसा खोते रहते हैं। ऐसा करना आवश्यक नहीं है।

क्षेत्रीय हवाई अड्डों को लाभ में चलाने के लिए लागत और राजस्व पर पुनर्विचार करना होगा। पूंजी खर्च और संचालन खर्च को स्थाई मान लिया जाता है और नवाचार व तकनीक से इनमें बचत के तरीकों पर अधिक विचार नहीं किया जाता।

प्री-फैब्रिकेटेड इकाइयों, मोबाइल इकाइयों और पारंपरिक तरीकों से कुछ बचत की जा सकती है। साथ ही वित्तीय व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए खतरा साझाकरण और गुच्छन (जैसा आईसीएओ की 39वीं आम सभा में सुझाया गया था) जैसे नए तरीके अपनाए जा सकते हैं।

राजस्व बढ़ाने के लिए केवल ट्रैफिक से राजस्व को जोड़कर देखना गलत होगा। आसपास की भूमि, पार्किंग, 24X7 दुकानें, प्रचार, विमान घर, सामान्य उड्डयन, प्रशिक्षण केंद्र और बैठक स्थली विकसित की जा सकती है। नियोजनकर्ताओं को केवल विमान पट्टन नहीं, संपूर्ण हवाई अड्डे के दृष्टिकोण से सोचना होगा।

संयोजकता के साथ समुदाय के विषय में सोचें

छोटे शहर के लिए एक हवाई अड्डा संयोजकता के लिए जितना आवश्यक होता है, उतना ही समुदाय के लिए भी। कई क्षेत्रीय हवाई अड्डे शहर को आर्थिक बल भी देते हैं। लेकिन यहाँ हवाई अड्डा विकास, शहर नियोजन और विकास माँग में विस्वरता देखने को मिलती है।

शहर और समुदाय के परिदृश्य से नियोजन की आवस्यकता है। ऐसे में रेखीय तरीके की जगह एकीकरण के दृष्टिकोण से सोचना चाहिए। योजना में कानून, स्थानीय व्यापार इकाइयों, होटल वालों, स्थानीय संग्रहालयों और निकटवर्ती शहरों को जोड़ा जाना चाहिए।

पूंजी पर प्रतिफल मात्र पहला कदम है, इसके लिए हवाई अड्डे से परिवहन, उपयुक्त होटल क्षमता और लाइटिंग से शुरुआत की जा सकती है। वर्तमान हवाई अड्डों जैसी योजनाएँ थोपने से बेहतर है कि क्षेत्रीय हवाई अड्डों के अनुसार ही नियोजन हो।

तकनीक और संचार के साथ आगे बढ़ रहे कोयंबतूर और सूरत जैसे कुछ हवाई अड्डे सेवाओं के लिए एयरलाइन्स से वार्ता स्थापित करने में सफल हुए हैं।

कोयंबतूर हवाई अड्डा

औरंगाबाद का व्यापार समुदाय एयरलाइन्स से संपर्क में है और कुछ सुझाव देता रहता है। त्रिची का एक समूह हवाई अड्डे, ट्रैफिक और संयोजकता का डाटा और विश्लेषण साझा करता है।

इस प्रकार धीरे लेकिन सक्रिय संपर्क स्थापित हो रहा है। यह तत्व क्षेत्रीय हवाई अड्डों की सफलता में बड़ी भूमिका निभा सकता है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जब फिर से उभरेगी और भारत जब खुद को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करना चाहेगा तो पर्यटन, व्यापार, प्रतिभा और तकनीक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।

ऐसे में छोटे शहरों के लिए हवाई अड्डा ही इन चीज़ों को संभव बना सकता है। संयोजकता के साथ समुदाय को भी बल मिलेगा। 100 क्षेत्रीय हवाई अड्डे विकसित करने का यह सही समय है।