भारती
मेट्रो से आगे हो स्मार्ट शहरों का निर्माण, मोदी 2.0 भुनाए इस अवसर को

अक्टूबर 2013 में दिल्ली के नेहरू स्टेडियम में मैंने एक पावरपॉइंट प्रेज़ेंटेशन द्वारा पुनः जगदगुरु बनने के लिए एक समृद्ध, सशक्त और नैतिक भारत के निर्माण  विषय पर विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए 9,000 विद्यार्थियों से चर्चा की थी।

विशिष्ट वक्ता और सहभागी थे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी व आंध्र प्रदेश विधान सभा के तत्कालीन विपक्षी दल के नेता श्री एन चंद्र बाबू नायडू। अन्य बातों के साथ मैंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती जनसंख्या है जो 1980 के दशक से प्रति वर्ष 1.5-1.9 करोड़ बढ़ रही है और हमने इतना रोजगार कभी उत्पन्न नहीं किया है। पहले हमारे पास अशिक्षित और बेरोजगार लोग थे लेकिन अब शिक्षा का स्तर बढ़ता जा रहा है, फिर भी बेरोजगारी है, या यूँ कहें कि रोजगार हेतु अयोग्य लोग हैं। यह बड़ी समस्या है क्योंकि ये अत्यधिक अपेक्षाओं वाले मतदाता बनेंगे।

इसके अलावा भारतीय कृषि भी ग्रामीण जनसंख्या का सहयोग नहीं कर पाएगी क्योंकि जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ 1950 से प्रति व्यक्ति खेती योग्य भूमि घटती जा रही है। 1951 की जनगणना के अनुसार ग्रामीण जनसंख्या 33 करोड़ थी जो कि अब बढ़कर 80 करोड़ के पार जा चुकी है। शिक्षित ग्रामीण लोग नगरों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों को मात्र कृषि से ही रोजगार नहीं दिया जा सकता है। लाखों कम पढ़े-लिखे लोग जो शहरों की ओर रुख कर रहे हैं, उनके लिए रोजगार उत्पन्न करने का तरीका है 200 नए नगरों का निर्माण।

भारत का कोई भी शहर सुनियोजित नहीं है और जल, मलजल (सीवेज) निपटान, आवास प्रबंधन व सड़कें वर्तमान जनसंख्या के अनुसार उपयुक्त नहीं हैं। शहरों में प्रवासित हुए ग्रामीण लोग झुग्गियों में रहते हैं, किसी खाली भूमि पर कब्ज़ा कर लेते हैं। इससे कानून व्यवस्था तो बिगड़ती ही है, साथ ही शहरों की जीवन गुणवत्ता भी घट जाती है। इन लोगों का लाभ राजनीतिक पार्टियाँ उठाएँगी लेकिन इनका कष्ट समाप्त नहीं होगा।

काम की तलाश में गाँवों से शहर आए लोगों को उपयुक्त रोजगार देने और वर्तमान आर्थिक केंद्रों के इंफ्रास्ट्रक्चर के भार को हल्का करने के लिए आवश्यक है कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करके सुनियोजित नगर बनाए जाएँ। स्थानीय प्रशासन को तकनीकि इंफ्रास्ट्रक्चर से लैस करना उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए आवश्यक है।

नए नगरों के निर्माण से वास्तुकारों, अभियंताओं, वित्तीय जानकारों तथा सबसे ज़रूरी गाँव से शहर को पलायन करने वाले अनिपुण लोगों को रोजगार मिलेगा जो पहले खेतों में मजदूरी और अन्य संबंधित कार्य करते थे।

200 स्मार्ट शहरी क्षेत्रों के निर्माण के बड़े कार्य में पुराने खेतिहर मजदूरों का कौशल विकास कर उन्हें बढ़ई, प्ल्म्बर, इलेक्ट्रिशियन, मिस्त्री, वेल्डर, फर्श बनाने वाला, पेंटर आदि बनाया जा सकता है। नरेंद्र मोदी और चंद्रबाबू नायडू दोनों को ही यह सुझाव बहुत पसंद आया था और भाजपा के घोषणा पत्र में स्मार्ट शहरों के बारे में ऐसा ही उल्लेख था।

परंतु भाजपा के सत्ता में आने के बाद स्मार्ट सिटी का यह विचार विकृत हो गया। जो पैसा स्मार्ट सिटी के लिए प्रयोग में लाया जाना था, उसका उपयोग वर्तमान में अत्यधिक जनसंख्या तथा क्षीण व्यवस्थाओं वाले शहरों के रख-रखाव एवं सुधार में किया जाने लगा है। उदाहरण के लिए हैदराबाद में यह पैसा जवाहर लाल नेहरू शहरी नवीकरण योजना के लिए खर्च किया गया। इसका आशय यह है कि नए स्मार्ट नगरों के निर्माण की बजाय पुराने बसे शहरों के इंफ्रास्ट्रक्चर को पोषित किया जा रहा है। यह पैसों की बर्बादी है क्योंकि अधिकांश वर्तमान नगर स्मार्ट शहर बनने के योग्य ही नहीं हैं। गाँवों से लगातार शहरों की ओर आने वाले लोग झोपड़पट्टीकरण तथा गुणवत्ता की गिरावट में योगदान देते रहेंगे।

कम से कम भाजपा के दूसरे कार्यकाल में तो पुरानी समस्याओं को अच्छे तरीकों से सुलझाने के लिए नए विचारों को लागू किया जाना चाहिए। स्मार्ट सिटी की अवधारणा होनी चाहिए नए शहरों का निर्माण, जो बहुत से बेरोजगार लोगों को रोजगार प्रदान कर सके और उन्हें राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा में शामिल कर सके।

डॉ हनुमान आंध्र प्रदेश सरकार के पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी सलाहकार हैं।