भारती
दिल्ली के आसपास काफिरों के कटे सिर पर इनाम- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग 12

दिल्ली पर इस्लामी कब्ज़े की पहली ही सदी दहशत से भरी है। बुरी तरह रक्तरंजित है। दिल्ली के आसपास पहाड़ी इलाकों में पहली बार तुर्क गुलामों के गुलामों ने काफिरों के कटे हुए सिरों पर इनाम बाँटे।

पहले ऐसा करने वाले उलुग खाने आजम का नाम बहुत विस्तार से दस्तावेजों में है। दिल्ली की तरफ से वह पहाड़ों की तरफ गया। 20 जनवरी 1260 को हुए एक भीषण हमले के दौरान पहले ही धावे में ये बेरहम लुटेरे 50 कोस तक पहुँच गए और हिंदुओं पर हमला बोल दिया।

यह कोई घोषित युद्ध नहीं था। यह एकतरफा आक्रमण था, जिसका मकसद सिर्फ लूट, कत्ल और दहशत का राज फैलाना था। उन पहाड़ी, उबड़खाबड़ और नदी-नालाें के किनारे बसे इलाके के निवासियों को मुसलमानों ने तलवार के घाट उतारना शुरू किया। 20 दिन तक लगातार सुबह, शाम, रात पहाड़ी गाँव-कस्बों में हमले होते रहे।

मैदान साफ देखकर एक दिन उलुग खाने आजम का ऐलान हुआ- “मुसलमान सैनिकों में से जो कोई एक कटा हुआ सिर लाए उसे चांदी का एक तनका और ज़िंदा पकड़कर लाने पर दो तनके इनाम में दिए जाएँ।”

यह घोषणा होते ही जिहादी जत्थों को जैसे नकदी का रोजगार मिल गया। फौरन काफिरों के इलाकों पर धावे और तेज़ हो गए। जहाँ, जो नज़र आया, जान से गया। कटे हुए सिरों और ज़िंदा बंदियों को लाने का सिलसिला शुरू हो गया। बड़ी संख्या में इनाम बाँटे गए।

इस इलाके में पहली बार हुए और तीन महीनों तक चले हमले और लूटपाट की इस अफरातफरी में कुछ हिंदुओं का ज़िक्र ध्यान देने योग्य है। इस धावे में 3,000 अफगान लुटेरे शामिल थे, जिनके बारे में मिनहाज़ सिराज ने बताया है कि इनमें से हरेक हाथी और भैंसे के समान था। मिनहाज़ के शब्द हैं-

“जब से इस्लामी झंडे हिंदुस्तान पहुँचे, कभी कोई इस्लामी सेना उस स्थान पर पहुँचकर उसे विध्वंस नहीं कर सकी थी। वह विरोधी हिंदू जिसने ऊँटों को छीन लिया था, अपने परिवार सहित पकड़ लिया गया। करीब 250 प्रतिष्ठित हिंदू सपरिवार बंदी बनाकर लाए गए। 142 घोड़े शाही अस्तबल में भेज दिए गए। 30,000 तनकों से भरे 60 बोरे पहाड़ी हिंदू राजाओं से लूटपाट में मिले। इन्हें खजाने में जमा करा दिया गया।”

अब अगला दृश्य दिल्ली में देखिए। स्थान: हौजे-रानी का मैदान…

मार-काट में माहिर तुर्कों को कतार से नंगी तलवारों सहित बुलाया गया। कुछ गुस्सैल हाथी लाए गए। भारी मजमा जमा हो गया। पहाड़ी इलाकों से पकड़े गए काफिरों को मैदान में लाते ही भारी शोर उठा। वहाँ मौजूद लोगों के दिलों की धड़कनें बढ़ गईं। दहशत का माहौल था।

अब काफिरों को मौत की सज़ा देने की कार्रवाई शुरू हुई। कुछ को हाथियों के नीचे पटककर कुचलवा दिया गया। उनके हाथ-पैर बंधे हुए थे। वे बदहवास थे। हाथियों के पैरों तले कुचले गए लोग लहूलुहान लाश में हड्‌डी-मांस के लोथड़े में बदल गए।

उस भयानक दिन सज़ा दूसरे तरीकों से भी दी गई। अब हाथों में नंगी तलवारें लहरा रहे तुर्क आगे आए। उनके सामने भी हाथ-पैर बंधे हुए हिंदुओं को लाकर खड़ा कर दिया गया, जो अपने गाँव-कस्बों में कैद करने से दिल्ली लाए जाने तक यही नहीं समझ पाए थे कि उनका कुसूर क्या है? उन्हें क्यों इस बेइज्ज़ती और बेरहमी से यहाँ लाया गया है? उन पर आरोप क्या है? वे तो इन्हें जानते भी नहीं? इनका कभी कुछ बिगाड़ा नहीं तो यह बेवजह मारकाट क्यों?

अब सज़ा का अगला चरण शुरू हुआ। तलवारें हवाओं में लहराईं और पूरी ताकत से उन लोगों पर सीधी पड़ीं। एक बार फिर मिनहाज़ सिराज का रोंगटे खड़े कर देने वाले विवरण

“तुर्कों की खून बहाने वाली तलवारों ने दो-दो हिंदुओं के चार-चार हिंदू कर दिए। कई सौ हिंदुओं की खाल चाकू से नोचकर निकाली गई। खालों में घासफूस भर शहर के दरवाजों पर टांग दिया गया। दिल्ली में हौजे-रानी के सामने काफिरों को खुलेआम ऐसी सज़ाएँ पहली बार दी गईं। वह 9 मार्च 1260 का दिन था। जिहाद में इस बहादुरी से दिल्ली में उलुग की इज्ज़त कई गुना बढ़ गई।”

अब यह उलुग खाने आज़म तो कोई सुलतान नहीं था। आखिर यह किस बला का नाम था? यह था कौन? वह तुर्किस्तान के दो भाई में से एक है। एक का नाम है किशली खां सैफुद्दीन एबक। दूसरा यह उलुग खाने आज़म।

तब तुर्किस्तान की आबादी मंगोलों के हमलों से परेशान थी। उसी भगदड़ में ये अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे। लेकिन एक जगह दोनों को मंगोलों ने पकड़कर एक कारोबारी को बेच दिया। इस्लामी कब्ज़े में आए शहरों में तब गुलामों के बाज़ारों की रौनक ज़बर्दस्त थी। इन बाज़ारों में हिंदू औरतों, बच्चों की आवक भी तेज़ी से बढ़ गई थी।

दोनों भाइयों को अच्छे दामों की उम्मीद में इख्तियारुलमुल्क नाम का कोई कारोबारी दिल्ली लेकर आया। यहाँ इल्तुतमिश ने दोनों को खरीद लिया। यह आज के समय की किसी महत्वपूर्ण नई नियुक्ति के लिए उच्च स्तर पर हुए दो चयन थे।

इल्तुतमिश के हाथों बिकने के बाद किशली खां की किस्मत भी चमकी। इल्तुतमिश की मौत के बाद रजिया और नासिरुद्दीन के समय उसे एक के बाद एक नागौर, कड़ा, मेरठ जैसे इलाके अलग-अलग समय पर राज करने के लिए सौंपे गए। इनकी काबिलियत क्या थी? सिर्फ मुसलमान होना, तुर्क होना और पूरी बेरहमी से वह सब करना, जिसकी इजाज़त इस्लामी हुकूमत में है।

किशली खां को पता था कि यहाँ सैकड़ों साल से काफिरों की हुकूमतें रही हैं और एक इस्लामी कब्जेदार होने कारण उसे करना क्या है? 1255 में उसने मेरठ में रहते हुए पहाड़ी इलाकों और रुड़की-मियांपुर तक कब्जे किए। हिंदू राजाओं से धन-संपत्ति लूटी। लेकिन किसी गुप्त बीमारी के चलते वह 1259 में मर गया।

उलुग खाने आज़म को सबसे पहले रेवाड़ी और हांसी मिले। यह आज का हरियाणा है। उसने अपने जैसे दूसरे तुर्क गुलामों की तुलना में सबसे ज्यादा बेरहमी दिखाई और उसी अनुपात में उसे तरक्की और इज्ज़त भी मिली।

कालिंजर और कड़ा के आसपास के हिंदू राज्यों से जमकर जिहाद, रणथंभौर में बड़ी तादाद में हिंदुओं के खात्मे और बेहिसाब लूटपाट से खुश होकर 1249 में उसे सुलतान ने वैवाहिक संबंध में ले लिया। उसे उलुग खां की उपाधि और दिल्ली की नियाबत मिली।

नियाबत यानी नायब होना। सुलतान के बाद दूसरा अहम ओहदा। कल तक के एक गुलाम के लिए यह जिंदगी की सबसे बड़ी तरक्की थीं। यह दूसरे जाहिल जिहादियों के लिए एक सक्सेस-स्टोरी थी, जिससे यह सीख मिलती थी कि इस तरीके से काम करो और तेज़ी से आगे बढ़ाे।

अब उलुग खां ने नए सिरे से कालिंजर और मालवा पर हमलों का सिलसिला शुरू किया। बुंदेलखंड में किसी जाहर अजारी नाम के हिंदू राजा से इसके टकराने का ब्यौरा है। जाहर अजारी के इलाके को तबाह करके उसकी संपत्ति को लूटा गया।

इसके बाद उसे आज के राजस्थान में नागौर भेजा गया। यहीं से उसने रणथंभौर, बूंदी और चित्तौड़ के बिखरे हुए हिंदू राजाओं पर लगातार हमले किए। रणथंभौर के राजा नाहरदेव की सेना हारी तो बड़ी तादाद में हिंदुओं का कत्लेआम हुआ। अपार धन संपत्ति, घोड़े और हिंदू गुलाम लेकर वह नागौर लौटा। बयाना, कोल, जलेसर और ग्वालियर भी उसके कब्जे में दिए गए। हिंदू काफिरों के खिलाफ उसकी क्रूरता के किस्से हर हमले में हैं। वह कभी चैन से बैठा नज़र नहीं आता।

इल्तुतमिश के पास ऐसे 40 तुर्की गुलाम थे, जो दिल्ली पर इस्लामी कब्ज़े के बाद सिंध से लेकर बंगाल तक के प्राचीन हिंदू राज्यों के बड़े-बड़े शहरों के मालिक बनाकर भेजे गए। इन्होंने भारत के महान सूर्यवंशी और चंद्रवंशी सम्राटों के सिंहासन धूल धूसरित कर दिए। उनके महलों, रनिवासों की औरतों और बेबस बच्चाें पर कब्ज़े कर लिए। मंदिरों को मिटा दिया गया।

एक जगह ऐसा करने के बाद इन्होंने फिर अपने इलाकों में दूर-दूर तक हमलों, लूट, कब्जा, कत्ल और धर्मांतरण की कहानियाँ दोहराईं। जब एक का दौर खत्म हुआ तो दूसरा झुंड झपटकर आया। उस मारामारी में एक इंसानी याददाश्त भी कब तक अपने अतीत की चमक को संभालकर रखती?

दिल्ली से सटा उत्तर प्रदेश का इलाका शुरुआत से आतंक की चपेट में बना ही रहा। इनमें बदायूं का जिक्र सबसे पहले और बार-बार आता है, जहाँ कुतबुद्दीन एबक के समय इल्तुतमिश को अक्तादार (एक तरह से जागीरदार) बनाकर भेजा गया। आज के रामपुर, बरेली, मुरादाबाद, संभल का इलाका उस दौर में कटेहर कहलाता था, जहां पृथ्वीराज चौहान के भी काफी पहले से स्थापित छोटे-छोटे हिंदू राज्य थे, जहाँ चौहान साम्राज्य के सामंतों का राज था।

दिल्ली से दहशत की हुकूमत को आगे ले जाने के लिए गुलामों के गुलाम तुर्क कतार में खड़े हैं। मिनहाज़ सिराज इन बेरहम कातिलों से हमारा परिचय करा रहा है-

ताजुद्दीन संजर कजलक खां- इल्तुतमिश ने उसे किसी ख्वाजा अली बास्ताबादी से खरीदकर अपने बड़े बेटे नासिरुद्दीन के हवाले कर दिया। वह बाद में इल्तुतमिश का रसोइया बनाया गया। सिंध की एक जंग में फतह के बाद इस रसोइए को सिंध के उच्च नगर के आसपास के इलाके सौंप दिए गए। वह 1231 में मर गया।

कबीर खां अयाज अलमुइज्जी हजारमर्दा- यह गोर-गजनी के एक मलिक का गुलाम था। मलिक की हत्या हो गई तो दिल्ली आ गया, जहां उसे इल्तुतमिश ने खरीदा। 1227 में जब इल्तुतमिश ने मुलतान पर कब्जा किया तो मुलतान का वाली (प्रदेश का हाकिम) इसी कबीर खां को बनाया। बाद में उसे दिल्ली बुलाकर गुजारे के लिए पलवल उसे दे दिया। उसके बेटे ने सिंध पर कब्जा जमाया।

नासिरुद्दीन एतमुर बहाई- वह सुलतान मुइज्जुदीन के एक गुलाम बहाउद्दीन तुगरिल का भी गुलाम था। इल्तुतमिश ने उसे अजमेर, लावा, कासली और सांभर नाम के इलाके दे दिए। अजमेर में उसने हिंदुओं के खिलाफ जिहाद किया। बूंदी के हिंदुओं से जिहाद के लिए निकला तो एक नदी पार करते समय डूबने मौत हो गई।

सैफुद्दीन एबक- उसे जमालुद्दीन खूबकार से बंदायू में खरीदा गया था। उसे सरजानदार का पद दिया गया, जिससे उसे 3 लाख जीतल मिलते थे। लेकिन इससे वह खुश नहीं था। उसे पटियाला के पास नारनौल, फिर बरन और सिंध में उच्च नगर की अक्ता दी गई।

नुसरतुद्दीन तायसी मुइज्जी- वह मुहम्मद गोरी का गुलाम था। लेकिन देखने में कुरूप था। उसे बयाना और हांसी का मुक्ता बनाया गया। ग्वालियर की शहनगी (प्रबंधन) का जिम्मा उसे दिया गया और चंदेरी और कालिंजर पर हमलों का हुक्म दिया गया। ग्वालियर से ही उसने कालिंजर पर हमला बोला। वहाँ का हिंदू राजा भाग निकला।

तायसी ने वहाँ के कस्बों को रौंद डाला और अत्यधिक धन  संपत्ति लूटकर लाया। 50 दिन में 25 लाख लूटे। झाँसी के पास उसे राणा जाहर ने टक्कर दी। मिनहाज सिराज  को उसी ने बताया कि इस जंग में बड़ी तादाद में हिंदू कत्ल किए गए और वह लूट की दौलत के साथ ग्वालियर लौटने में कामयाब रहा। रजिया सुलतान ने उसे अवध का इलाका सौंप दिया था।

इज्जुद्दीन तुगरिल तुगान खां- इल्तुतमिश ने इस गुलाम को साकिए-खास बनाया। फिर वह दावातदार और रसोइया रहा और अस्तबल में घोड़ों की देखभाल का काम दिया गया। इस गुलाम ने भी तरक्की की ऊंची छलांगें लगाईं। वह बंदायू का मुक्ता बनाया गया। फिर बिहार और बंगाल तक के इलाके उसे सौंप दिया गया।

कमरुद्दीन कीरान तिमूर खां- इल्तुतमिश ने उसे 50 हजार जीतल में खरीदा था। उसे भी अस्तबल में घोड़ों की साफ-सफाई का काम दिया गया। सुलतान रजिया ने उसे कन्नौज का मुक्ता बना दिया। फिर उसे कड़ा की अक्ता दी गई, जहाँ उसने कई जिहाद किए। उसे और तरक्की मिली, जब उसे अवध के इलाके सौंप दिए गए। कई हिंदू राजाओं की संपत्तियाँ लूटीं। वह अपने जैसे दूसरे तुर्क कब्जेदारों की तरह लगातार हिंदू राजाओं पर हमले करता ही रहा।

हिंदू खां मुबारक- इल्तुतमिश ने उसे किसी फखरुद्दीन इस्फहानी से खरीदा था। वह खजांची बना। फिर शिकार किए गए पशुओं की देखरेख का काम किया। फिर सुलतान की सवारी के समय रोशनी करने का जिम्मा मिला। फिर तश्तदार बनाया गया, जिसका काम सुलतान के नहाने के इंतजाम का था। रजिया सुलतान ने सिंध में उच्च के किले से राज करने उसे वहां भेज दिया। उसने जालंधर में भी राज किया। वहीं मरा।

इख्तियारुद्दीन कराकश खां एतगीन- इल्तुतमिश ने इस गुलाम को अपना साकी बनाया। यह एक पद था, जिस पर रहते हुए वह कई साल शाम की महफिलों में पीने-पिलाने का इंतजाम करता रहा। एक दिन उसकी भी किस्मत चमकी। वह एक के बाद एक मुलतान, लाहौर, बयाना और कड़ा के तख्त पर बैठाया गया। कड़ा में मारा गया।

इख्तियारुद्दीन अल्तूनिया- इल्तुतमिश ने इसे खरीदकर शराब पीने के इंतज़ाम का काम दिया। काम से खुश होकर उसे सुलतानी छत्र का काम सौंपा गया। रजिया के समय उसे बरन और तबरहिंदा के इलाके सौंप दिए गए। फिर वह बगावत पर उतारू हुआ। एक जंग में उसने रजिया सुलतान को कैद करके शादी कर ली। आपसी झगड़ों में ही मारा गया।

 बद्रुद्दीन सुन्कर रूमी- सुलतान ने जब उसे खरीदा तो सबसे पहले अपना तश्तदार बनाया। फिर बहलादार, जिसका काम सुलतान के निजी खर्चों का हिसाब रखने का था। इसके बाद उसे भी बदायूं में हथियारों के गोदाम की देखरेख में लगाया गया और सुलतान के अस्तबल का प्रबंधक रहा। वह सुलतान के हमलों के दौरान साथ जाता था। वह इन गुलामों की आपसी साजिशों में भी शामिल रहा। 1241 में दिल्ली में उसकी हत्या कर दी गई।

ताजुद्दीन संजर कुतलुक- वह किसी ख्वाजा जमालुद्दीन से खरीदा गया था। उसे इल्तुतमिश के कपड़ों की देखरेख का काम दिया गया। फिर अस्तबल में रहा। रजिया सुलतान बनी तो उसे बरन की जागीर दे दी गई। वह ग्वालियर से मिनहाज़ सिराज की किताबों के दो बक्से दिल्ली लेकर आया था।

बदायूं और कटेहर में हिंदुओं का जीना हराम करके रखा। कई मस्जिदें बनवाईं। बढ़ती ताकत देखकर उसके खिलाफ भी साजिशें हुईं। उसे पान में मिलाकर ज़हर दे दिया गया। जब मिनहाज सिराज लखनौती गया तब उसका परिवार इसी गुलाम के पास बदायूं में रुका रहा था।

ताजुद्दीन कुरेत खां- इस्लामी हमलावरों के जत्थे में यह बहुत जोशीला और करतबबाज था। वह दो घोड़े रखता था। दौड़ते हुए वह एक घोड़े से दूसरे पर सवार हो जाता था। आला दरजे का शिकारी। उसके चेहरे पर एक झगड़े के दौरान पड़े तलवार के घाव थे। वह हाथियों की देखभाल के काम में लगाया गया। उसे बरन और अवध की जागीरें मिलीं। अवध से उसने बिहार तक हमले किए। एक हमले में किसी का तीर निशाने पर लगा। वह मारा गया।

ताजुद्दीन तबर खां- इसने काफिरों को कठोर दंड दिए। काफिरों की संपत्तियों पर कब्जे किए। वह बदायूं और अवध की अक्ता का मालिक बनाया गया। उसने मेवात में हिंदुओं के खिलाफ जमकर जिहाद किया और दिल्ली में उसका सम्मान किया गया।

इख्तियारुद्दीन युजबक तुगरिल खां- यह गुलाम ग्वालियर पर हमले के दौरान सुलतान का भोजन चखने के लिए रखा गया था। इसका पदनाम था नायब चाश्नीगीर। वह तबरहिंद, लाहौर, कन्नौज, अवध और लखनौती पर राज करने के लिए भेजा गया।

जब वह लखनौती में था तब उसने बंगाल और उड़ीसा के हिंदू राजाओं से युद्ध किए। हिंदू भी जितना जहाँ संभव था, टक्कर दे रहे थे। कामरूप के हिंदू राजा ने योजनाबद्ध ढंग से अपने लोगों से इलाके का सारा अनाज खरीदने को कहा।

तुगरिल जैसे लोग हमलावर लुटेरे थे। उनकी प्रशासनिक समझ शून्य थी। अगली फसल के समय राजा ने बांध खुलवा दिए और जवाबी हमला कर दिया। तुगरिल की फौज को खाने के लाले पड़ गए। कहीं अनाज तक नहीं मिला। वह इसी लड़ाई में मारा गया। इस लड़ाई में इस इलाके के हिंदुओं ने संगठित होकर जवाब दिया था। लेकिन ये कहानियाँ इतिहास से गायब हैं।

ताजुद्दीन इरसलान खां- इसे एक हब्शी से खरीदा गया था। वह इल्तुतमिश की निजी सेवा में कई साल रहा। बाद में उसने कई जगहों से राज किया। बयाना, तबरहिंदा, अवध, कड़ा में रहा। कड़ा से उसने मालवा और कालिंजर तक हमले किए।

मनमाने ढंग से लखनौती पर हमला कर दिया। तीन दिन तक घेरकर रखा। कब्जा किया। लूटमार करता रहा। ये ब्यौरे बताते हैं कि गुलामों के गुलाम पूरे भारत में शिकारियों की तरह छोड़ दिए गए थे। हिंदू राजाओं और सामंतों के पुराने राज्यों पर तो वे हमले और लूट मचाए ही रहे, आपस में भी लड़-भिड़ रहे थे। एक दूसरे के खिलाफ साजिशों में मर या बच रहे थे।

इनमें से कई तुर्क दिल्ली, अवध, लखनौती और मुलतान तक हमारे मार्गदर्शक मिनहाज़ सिराज के सीधे संपर्क में थे। सिराज ग्वालियर के बाद दिल्ली का भी काजी रहा और अवध होकर लखनौती होकर वापस दिल्ली आया था, इसलिए ज्यादातर गुलाम तुर्क उसकी आला दरजे की हैसियत से बखूबी वाकिफ थे।

वह एक बार अपनी किसी ज़रूरतमंद बहन की मदद के लिए दिल्ली से मुलतान भी होकर आया था। उसने अपने मददगारों के नाम भी बताए हैं। इससे हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि अपनी आँखों के सामने घट रही इन सब घटनाओं का वह बहुत भरोसेमंद सूत्र है।

दिल्ली में बेचे जाने के बाद ये गुलाम तुर्क वैसे ही अपना कत्लो-गारत का कॅरियर शुरू कर रहे थे, जैसे सीरिया पर इस्लामिक स्टेट (आईएस) के कब्ज़े के बाद दुनिया भर से हजारों जोशीले नौजवान मुस्लिम जिहाद के लिए सिर पर कफन बांधकर स्वयंभू खलीफा अबू बक्र के गुर्गों के बुलावे पर दमिश्क में दाखिल हुए थे।

हमने कुछ ही साल पहले वे वीडियो देखे हैं जब आईएस ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए हज़ारों लोगों को मौत के घाट उतारा, यजीद औरतों को गुलाम बनाकर बेचा, उनके साथ बलात्कार हुए, सदियों पुराने स्मारक मिट्‌टी में मिलाए।

सारी दुनिया की आँखों के सामने आए ये सबसे ताज़ा दृश्य हैं। वे भी यह सब इस्लाम के नाम पर खुलेआम कर रहे थे और वही नारे गूंजते हुए सारी दुनिया ने सुने हैं, जो 1235 में उज्जैन-विदिशा के लोगों ने सुने थे। दुनिया में सिर्फ भारतीय ही बता सकते हैं कि इस्लामिक स्टेट का यह मॉडल नया नहीं है।

भारतीयों से बड़ा भुक्तभोगी दुनिया में कोई नहीं है, जो टूट-फूटकर ही सही 1,000 साल के उस नर्क से ज़िंदा बचकर निकला हो। अगर कभी संसार की किसी अदालत में पहली सदी के भारत के कातिलों पर मुकदमे दायर हुए तो ये 40 अपराधी अपने सरगना के साथ सबसे ऊपर होंगे।

पिछला भाग- उज्जैन के महाकाल मंदिर पर आतंकी हमला- भारत में इस्लाम की पड़ताल भाग 11

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com