भारती
सिराज द्वारा दिल्ली में कत्ल की खबरें- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल भाग 10

आशुचित्र- मिनहाज़ सिराज द्वारा जानें शुरुआती इस्लामी कब्ज़े के दौरान दिल्ली के रक्तरंजित कालखंड में क्या-क्या हुआ।

26 साल तक शम्सुद्दीन इल्तुतमिश दिल्ली में काबिज रहा और लगातार हिंदुओं की बिखरी हुई ताकत को रौंदता रहा। पृथ्वीराज चौहान के हिंदू सामंत अपने राज्यों से दिल्ली का तमाशा देख रहे थे। वे तुरंत और आसानी से तुर्कों के काबू में कभी नहीं आए थे। वे थोड़ी-सी ताकत जुटाकर भी अपने स्वतंत्र इरादे जाहिर करने की हिम्मत दिखाने से चूकते नहीं थे।

इसलिए दिल्ली से बार-बार उनके दमन की कोशिशें भी बराबर होती रहीं। दिल्ली से होने वाली ऐसी हर मुहिम उनके पूरे क्षेत्र को तहस-नहस करके ही लौटती थी। यह स्थाई तौर पर सबक सिखाने जैसा था।

जिन इलाकों और किलों में हिंदू सामंत पीढ़ियों से चौहान राजवंश और उसके पहले के राजवंशों के प्रतिनिधि के तौर पर तैनात थे, वहाँ धीरे-धीरे तुर्क गुलाम तैनात किए जाने लगे।

जैसे- बयाना, जो पृथ्वीराज चौहान के प्रधानमंत्री कैमास की मशहूर जागीर था। अजमेर, सांभर, बंदायू, बुलंदशहर, बठिंडा, हांसी, कोल, कालिंजर जैसे कई प्राचीन दुर्ग इस्लामी लुटेरों के अड्‌डे बनने लगे, जहांँ से भारत के नए इलाकों पर लूट और कब्जों का सिलसिला बिना रुके जारी रहने वाला था।

जैसे-अजमेर में पृथ्वीराज चौहान और आसपास उनके सामंतों को तबाह करते हुए कन्नौज में गहड़वाल वंश के जयचंद का सफाया कर दिया गया और फिर बिहार के सारे बौद्ध विश्वविद्यालय जलाकर राख करते हुए वे बंगाल में फैलते हुए तिब्बत से जा टकराए।

आइए, कुछ समय दिल्ली में मिनहाज़ सिराज के साथ रुककर यहाँ के हाल देखते हैं। इल्तुतमिश की मौत हो चुकी है। उसके बाद रुकनुद्दीन फिरोज़शाह को तख्त पर बैठाया गया। वह एक तुर्क गुलाम औरत जहांशाह तुर्कान का बेटा था, जो हरम में इल्तुतमिश की सबसे चहेती थी।

रुकनुद्दीन तब तक आज के उत्तर प्रदेश में बदायूं की जागीर का मालिक बनाकर बैठाया गया था। दिल्ली पर कब्जा करने के बाद कुतबुद्दीन एबक के समय बदायूं में ही कभी इल्तुतमिश भी रहा था।

दिल्ली और आसपास के इलाकों में बुरी तरह अफरा-तफरी मची हुई है। जामा मस्जिद से बलवे की खबरें हैं। तुर्क गुलामों के ताजे-ताजे कब्जे हुए हैं और चारों तरफ फैली लावारिस लूट के लिए ये सब आपस में मारकाट मचा चुके हैं।

इल्तुतमिश के कब्र में जाने के बाद सिर्फ चार साल के दरम्यान दिल्ली में तीन सुलतानों का कत्ल हो चुका है। आज के एक खोजी पत्रकार की तरह मिनहाज़ सिराज दिल्ली में सक्रिय है। खबरों के उसके स्त्रोत नए पावर सर्कल में हर तबके के उच्च-स्तरीय और भरोसेमंद लोग हैं।

वह आज के किसी टॉप मीडिया ब्रांड के पॉलिटिकल एडिटर की हैसियत में है, जिसकी पहुँच नॉर्थ-साउथ ब्लॉक, पीएमओ से लेकर संसद तक है। सुलतान तक उसकी पहुँच है। वह हर खुफिया जानकारी से लैस है। दूर-दराज में पत्ता भी हिले तो सिराज के कानों में उसकी सरसराहट आ जाती है। दिल्ली डेटलाइन से वह कुछ ब्रेकिंग न्यूज़ दे रहा है-

हरम में औरतों की हत्या- यह बिल्कुल अंदर की खबर है। रुकनुद्दीन फिरोज़शाह ने सुलतान बनते ही अय्याशी शुरू कर दी है। वह दिल खोलकर खजाने को लुटाने में लगा है। ऐसे में असली ताकत परदे के पीछे उसकी माँ के हाथों में आ गई है।

इल्तुतमिश की यह चहेती मनमाने हुक्म जारी करने लगी है। हुकूमत पर अपने एकाधिकार के लिए इस लालची औरत ने इल्तुतमिश के हरम की दूसरी औरतों तक को मरवा डाला है। खूनखराबा जारी है।

वज़ीर के बेटे समेत सात मरे- नाम मात्र के सुलतान रुकनुद्दीन फिरोज़शाह की दिल्ली का हाल देखकर मुलतान, हांसी, लाहौर, कोल में उसके बाप के फरमान से बैठाए गए गुलाम तुर्कों ने बगावत कर दी है। इनमें शामिल सात बड़े लोगों को बुलाकर धोखे से मंसूरपुर-तराइन के बीच इन्हें मार डाला गया है। मरने वालों में इल्तुतमिश के वजीर निजामुलमुल्क जुनैदी का बेटा जियाउलमुल्क भी शामिल हैं (निजामुलमुल्क दिल्ली में पहले-पहल धर्मांतरित मुसलमानों में से एक है, जो जाति से जुलाहा था)।

दिल्ली में अफरातफरी- सियासी हलचल तेज़ है। इल्तुतमिश की बड़ी बेटी रज़िया भी हुकूमत की दावेदार बनकर सामने आ गई है। उसने रुकनुद्दीन के खिलाफ माेर्चा खोल दिया है। रुकनुद्दीन की धूर्त माँ ने रज़िया को भी बंदी बनाने और उसके कत्ल की साजिश रची है।

दिल्ली में मची अफरातफरी से तंग आकर आम लोग ही सड़क पर उतर आए हैं और उन्होंने हर तरफ से इकट्‌ठा होकर महलों को घेर लिया है। ताज़ा समाचार है कि रुकनुद्दीन की माँ को ही बंदी बना लिया गया है। शहर के तुर्क फौजी रजिया बेगम से मिल गए हैं और अपना समर्थन उसे देखकर तख्त पर बैठा दिया है। अब इस समय दिल्ली में दो सुलतान हैं।

नशे की हालत में सोना लुटाया- उधर किलोखड़ी में तख्त पर बैठने के बाद रंगीनियों में डूबा बेफिक्र रुकनुद्दीन लूट के माल पर मज़े कर रहा है। उसे अपने आसपास की इस हलचल का कोई पता नहीं है। वह एक अलग दुनिया में है।

रज़िया के भरोसेमंद सिपाहियों ने उसे भी पकड़कर कैद कर लिया है। कैद में ही उसकी मौत की खबर है। वह सिर्फ छह महीने 28 दिन सुलतान के लिबास में तख्त पर बैठा रहा। ये पूरा समय उसने अय्याशी में गुज़ारा।

उसके इंतकाल के बाद दिल्ली के लाेग याद कर रहे हैं कि किस तरह वह नशे की हालत में हाथी पर बैठकर बाजारों में सोना लुटाया करता था। लोग सड़कों पर सोना और सोने के सिक्के लूटा करते थे। हिजड़ों, महावतों, गाने-बजाने वालों और विदूषकों ने उसे भरी आँखों से खिराजे-अकीदत पेश की है। ये लोग उसे दिल से याद कर रहे हैं, क्योंकि यही वह तबका है, जिसे पिछले छह महीनों में सबसे ज्यादा इनाम मिले। रुकनुद्दीन इनपर सबसे ज्यादा मेहरबान था।

मलिक का कटा सिर दिल्ली भेजा- दिल्ली में हर दिन कुछ नया हो रहा है। अब रज़िया सुलतान के खिलाफ बगावत की खबरें आ रही हैं। इल्तुतमिश के वज़ीर निजामुलमुल्क जुनैदी, मलिक जानी, मलिक कूची, मलिक कबीर खां, मलिक इज्जुद्दीन मुहम्मद सालारी जैसे ताकतवर मलिक उसके खिलाफ खड़े हो गए हैं। इन्हें गिरफ्तार करने का हुक्म दिया गया है। लेकिन इससे पहले ही भनक लगने पर ये सब दिल्ली से भाग निकले हैं।

सुलतान ने इनका पीछा करके जिंदा या मुर्दा पकड़कर लाने का हुक्म जारी किया है। मलिक कूची अपने भाई फखरुद्दीन के साथ पकड़ा जा चुका है। दोनों को कत्ल कर दिया गया है। मलिक जानी को पटियाला के पास पायल नाम के गाँव में मार डाला गया है। सबूत के तौर पर उसका कटा हुआ सिर दिल्ली लाया गया है।

धर्मांतरित हिंदू निजामुलमुल्क जुनैदी सिरमूर की तरफ भागा और वहीं उसकी मौत के समाचार हैं। मौत का कारण अज्ञात है। जानमाल बचाने के लिए लाहौर के मलिक कबीर खां ने पाला बदलकर रातों-रात रजिया को अपना समर्थन दे दिया है।

रज़िया सुलतान का कत्ल- यह अब तक की एक बड़ी खबर है। पता चला है कि तबरहिंदा में मलिक अल्तूनियां बागी हुआ तो उसे कुचलने के इरादे से रजिया ने खुद फौज लेकर हमला करने का फैसला लिया। लेकिन उसका दाव उल्टा पड़ गया। जल्दबाज़ी में की गई इस मुहिम के दौरान रज़िया कैद कर ली गई। अल्तूनियां ने उससे निकाह कर लिया। एक तरह से कहा जा सकता है कि अब इल्तुतमिश की बेटी और दिल्ली की सुलतान उसके हरम की रौनक है।

जानकारों का कहना है कि अल्तूनियां की निगाह दिल्ली के तख्त पर जा टिकी है। अपनी ताजपोशी के लिए वह इस उथलपुथल का पूरा फायदा उठाना चाहता है। इससे पहले कि देर हो और कोई और दिल्ली पर कब्ज़ा जमा ले, वह तबरहिंदा से अपनी फौज लेकर निकला है। लेकिन यह जल्दबाज़ी उसे जल्दी ही महंगी पड़ी।

कैथल के पास 13 अक्टूबर 1240 को रज़िया और अल्तूनियां को स्थानीय हिंदुओं ने घेरकर पकड़ लिया। उसके साथ रज़िया सुलतान के मारे जाने की भी खबरें आ रही हैं। दिल्ली पर कब्जा जमाने का उसका ख्वाब रास्ते में ही दम तोड़ चुका है। मिनहाज़ सिराज ने दिल्ली में हिसाब लगाकर बताया है कि रज़िया तीन साल छह महीने छह दिन सुलतान रही।

नायब का कत्ल- रज़िया की मौत के बाद ताबड़तोड़ मुइज्जुद्दीन बहरामशाह को सुलतान बनाया गया। इख्तियारुद्दीन एतगीन नाम का एक और गुलाम तुर्क उसका नायब नियुक्त हुआ। इस नायब ने सुलतान की एक बहन से निकाह किया था। उस बहन की पहली शादी एक काजी के बेटे से हो चुकी थी।

एतगीन इस ताज़ा हासिल ताकत में इतना गाफिल हुआ कि सुलतानों की तरह महल के दरवाजे पर हाथी बांधने लगा। नौबतें बजवाने लगा। इसका मतलब था कि वह शाही तौर-तरीके अपनाने लगा है। अल्तूनियां की तरह वह भी अपने सुलतान बनने के ख्वाब देखने लगा।

यह नए-नए सुलतान बने मुइज्जुद्दीन के लिए खतरे की घंटी लगी। एक बार फिर साजिशों का बाज़ार गर्म है। सुलतान ने अपने इस जीजा और नायब को एक भरे दरबार में भाषण के दौरान अपने आदमियों के हाथों चाकू से हत्या करवा दी। दिनदहाड़े हुई इस वारदात में एक और आदमी घायल हो गया। दिल्ली और आसपास के इलाकों में ये खबरें पूरे मसाले के साथ फैली हुई हैं। चारों तरफ दहशत कायम है। लोग डरे-सहमे हैं।

दिल्ली में भगदड़ का माहौल- मुइज्जुद्दीन बहरामशाह के सुलतान बनने के बाद मलिक बद्रुद्दीन सुनकर को अमीर हाजिब नियुक्त करने के आदेश हुए हैं। लेकिन दरबार के ही कुछ तुर्क इस फैसले से नाराज़ हैं और अब उसके खिलाफ साजिश शुरू हो चुकी हैं।

किले के भीतर से ताजा खबर है कि सुनकर और जलालुद्दीन मूसवी नाम के एक और अफसर को कैद करके मार डाला गया है। दिल्ली का आलम यह है कि आए दिन की कत्लोगारत के चलते कई लोग डर के मारे शहर छोड़कर भाग गए हैं। दिल्ली से बाहर जाने वाले रास्तों पर भीड़ है।

सियासी और कारोबारी लोगों को लग रहा है कि कोई कभी भी कहीं भी निशाने पर लिया जा सकता है। किसी के खिलाफ कोई कहीं भी साजिश रच सकता है। दिल्ली के बुजुर्ग हिंदू अपने बचे-खुचे परिवारों में पृथ्वीराज चौहान और अनंगपाल तोमर के दिनों की दिल्ली और अजमेर की याद करते हुए आँसू बहा रहे हैं।

बहुत समय नहीं हुआ है जब तराइन की दूसरी लड़ाई में पृथ्वीराज और चंदावर की लड़ाई में कन्नौज के जयचंद का सफाया हुआ है। ये लोग अपने मुस्तकबिल को लेकर भारी फिक्र में हैं। हर दिन किसी साजिश, हमले या कत्ल की एक नई खबर इनके स्याह चेहरों पर मुर्दगी बनकर छा जाती है।

सुलतान रुकनुद्दीन की हत्या- महल से लेकर मस्जिद तक हर जगह फसाद चल रहे हैं। ऊँचे ओहदों पर बैठे बचे-खुचे तुर्कों ने भी बागी तेवर अपना लिये हैं। दिल्ली के कई इमाम इन्हें शांत करने के लिए तैनात किए गए हैं।

1242 में 9 मई काे दिल्ली की जामा मस्जिद में नमाज़ के बाद बलवे की खबर है। अमन कायम कराने की कोशिशों के लिए इमामों के साथ नियुक्त किए गए मिनहाज़ सिराज पर भी मस्जिद के भीतर तलवार से हमला हो गया है।

खुदा का शुक्र है सिराज अपनी छुपी हुई कटार निकालकर बच निकला है और दूसरे दिन यानी 10 मई को यह सबसे ताज़ा खबर हमें दे रहा है कि बागियों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया। राजमहल से उसके सूत्र बता रहे हैं कि भीतर भारी गड़बड़ मची है। सुलतान को भी बंदी बना लिया गया है। 20 मई को उसे भी मार डाला गया। वह दो साल डेढ़ महीना तख्त पर रहा।

वज़ीर को हलाक किया- मरहूम सुलतान रुकनुद्दीन के बेटे अलाउद्दीन मसऊदशाह, नासिरुद्दीन और जलालुद्दीन अब तक कैदखाने में पड़े हुए थे। अचानक इन तीनों को बाहर निकाला गया है और अलाउद्दीन मसऊदशाह की किस्मत का सितारा अचानक बुलंद हो गया है। उसे सर्वसम्मति से तख्त पर बैठा दिया गया है।

उसका वज़ीर निजामुलमुल्क मुहज्जबुद्दीन बनाया गया है। वज़ीर बनने के पहले वह कोल (आज के अलीगढ़) का मालिक बनाकर बैठाया गया था। वज़ीर बनने के बाद दिल्ली की ताकत ने उसका भी दिमाग घुमा दिया। अपने महल के दरवाजे पर हाथी बंधवाना और नौबत बजाना, उन लोगों को रास नहीं आया, जिन्होंने उसे वज़ीर बनाया था।

उसकी इस हरकत से माना जा रहा है कि दिल्ली के तख्त पर उसकी नजर है। उससे खफा तुर्क अमीरों के एक झुंड को यह नाकाबिले-बर्दाश्त लगा। ये सारे तुर्क अमीर इकट्‌ठे हो गए हैं। उन्होंने अपने इस बददिमाग वजीर काे ही हलाक कर दिया है।

ये सुलतान कैद में मर गया- कैद से छूटकर सुलतान बनाए गए अलाउद्दीन मसऊदशाह ने भी मजा-मौज और अय्याशी को अपनी सबसे पहली प्राथमिकता बनाया। उसने सुलतान बनाने वाले तुर्क समूह को निराश कर दिया है।

उसको इस हालत में देखकर हर तरफ बागी तुर्कों के मनमाने लूट और कब्जे तेज हो गए हैं। भारी अनिश्चितता से भरे माहौल में 10 जून 1246 को इस सुलतान को भी कैद कर लिया गया। कैदखाने से ही खबर आई है कि सुलतान अल्लाह को प्यारे हो गए हैं। उसने चार साल एक महीना दिल्ली में राज किया।

पुराने दौर के किसी टेलीप्रिंटर से आती खूनी खबरों की यह फेहरिस्त लंबी है। इन खबरों में हमलावर लुटेरों का अपना खून भी है और इनसे ज्यादा हिंदुस्तानियों का खून भी है, जो ज्यादातर हिंदू थे या नए-नए धर्मांतरित मुसलमान।

आज भी जब आप मिनहाज़ सिराज के साथ चलते हुए शुरुआती इस्लामी कब्ज़े की दिल्ली के इस रक्तरंजित कालखंड में दाखिल होते हैं तो अपने दामन में खून के गरम छींटे महसूस कर सकते हैं।

कोई गर्दन कटकर आपके ही सामने आकर गिरती है। कहीं काफिरों की कटी हुई गर्दनों के ढेर लग जाते हैं। कहीं दूर तक आग के शोलों और धुएंं के सिवा कुछ दिखाई नहीं देता। धूल उड़ाते हुए घुड़सवारों की फौज लूट के माल और गुलाम औरतों-बच्चों को ढो रही है।

कहीं उजाड़ गाँव-कस्बों के घर और गलियों में बिखरा हुआ खून और लाशें से रातों की नींद हराम है। सदियों के हुनर से बनकर तैयार हुए शानदार मंदिरों में जमकर तोड़फोड़ जारी है। इस क़हर का कोई अंत नहीं है। मगर वे इसे काफिरों पर इस्लाम की फतह बताकर अल्लाह का शुक्रिया अदा कर रहे हैं…

(अगली बार चलेंगे उज्जैन, जहाँ इल्तुतमिश की फौज ने महाकाल मंदिर पर हमला किया है और विदिशा, जहाँ 105 गज ऊँचे विजय मंदिर को मिट्‌टी में मिला दिया गया है।)

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com