भारती
खालिस्तानियों और इस्लामी ताकतों में संबंध, दिल्ली की घटना के बाद उजागर

प्रसंग- दिल्ली के मुखर्जी नगर पुलिस थाने के सामने लगे खालिस्तान समर्थक नारों के बीच अल्लाह हू अकबर की गूंज भी थी। खालिस्तानियों और इस्लामी ताकतों में क्या है संबंध?

दिल्ली में एक टेंपो पुलिस की गाड़ी से टकरा जाती है। पुलिसकर्मी जब टेंपो में बैठे सिख पिता-पुत्र को रोकने की कोशिश करते हैं तो उन्हें नंगी तलवार दिखाई जाती है। एक पुलिसकर्मी कुछ कदम दूर स्थित मुखर्जी नगर थाने से अपने साथियों को बुलाता है तो बुजुर्ग सिख व्यक्ति वाकई उन पर तलवार भांजने लगता है। सकपकाए पुलिसकर्मी एक बार के लिए पीछे हट जाते हैं पर सादे कपड़ों में मौजूद एक लंबा चौड़ा पुलिसवाला भिड़ जाता है, बुजुर्ग सिख व्यक्ति तलवार चलाना जारी रखता है और तलवार के दो भरपूर वार पर उस पर कर देता है जिस में से एक पुलिसकर्मी के सिर पर लगता है। फिर भी लहुलुहान पुलिसवाला किसी फिल्म के एक्शन हीरो की तरह बहादुरी दिखाते हुए नंगी तलवार को हाथ से पकड़ लेता है। अब तक डर रहे बाकी पुलिसकर्मी हिम्मत कर आगे बढ़ते हैं और बुजुर्ग सिख को दबोच लेते हैं। इसी समय उस सिख का बेटा दूर खड़े टेंपो को लाकर पुलिसकर्मियों की टोली से टकरा देता है। स्वभाविक तौर पर पुलिसकर्मी बुरी तरह गुस्सा जाते हैं पर फिर भी सिख पिता-पुत्र को किसी तरह काबू करते हैं जिस दौरान बुजुर्ग सिख की पगड़ी सड़क पर गिर जाती है।

कुछ ही देर में घटना का आधा अधूरा वीडियो इस तरह वायरल किया जाता है कि संदेश यह जाए कि एक बेचारे बुजुर्ग सिख की दिल्ली पुलिस बेबात पिटाई कर रही है और उसके धार्मिक चिन्हों का अपमान कर रही है। भीड़ इकट्ठी कर ली जाती है। सिख वोट बैंक पर नजर गड़ाए आम आदमी पार्टी के नेता जरनैल सिंह भोलेपन से ट्वीट कर पूछते हैं कि क्या कुसूर था बेचारे का जो पुलिस ऐसे बर्बरतापूर्वक कार्यवाही कर रही है? बर्बतापूर्वक? माफ कीजिए पर किसी दूसरे देश में पुलिसकर्मी के सिर पर तलवार मारने और पुलिसकर्मियों को वाहन से कुचलने की कोशिश करने पर पुलिस गोली चला देती।

बाद में सामने आया एक और वीडियो दिखाता है कि उनके साथी के सिर पर तलवार से घाव लगने के बावजूद पुलिसकर्मी थाने में सरबजीत सिंह और उसके बेटे को पानी पिलाते हैं। पर नेताओं को इस सब से क्या लेना देना? भीड़ के जरिए दबाव बनाकर सिख पिता-पुत्र को छुड़वा लिया जाता है। अरविंद केजरीवाल पुलिस पर नंगी तलवार से पुलिसकर्मियों को घायल कर लौटे  सरबजीत सिंह से मिलते हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह अभियुक्त के पक्ष में बयान जारी करते हैं और लगातार चुनावी हार झेल रहे अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिरसा तो सरबजीत सिंह को लेकर गुरूद्वारा रकाबगंज पहुँच जाते हैं। इस राजनीतिक दबाव के चलते तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित तक कर दिया जाता है और सरबजीत सिंह पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज नहीं किया जाता है। धर्म के नाम पर अपराधियों के महिमामंडन और संरक्षण का इस जैसा उदाहरण शायद ही आसानी से मिले।

लेकिन इसके बाद का घटनाक्रम कहीं अधिक चिंता में डालने वाला रहा है। पुलिसकर्मियों के निलंबन के बावजूद भीड़ ने अगली रात भी मुखर्जीनगर थाने के बाहर हंगामा जारी रखा और समझाने आए दिल्ली पुलिस के एसीपी और अकाली दल के विधायक मजिंदर सिरसा के साथ धक्का मुक्की की। प्रदर्शन स्थल से सामने आए वीडियो में कई सिख अल्लाह हू अकबर और खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाते देखे गए। इस घटना को लेकर जम्मू कश्मीर के त्राल में हुए प्रदर्शन में तो कुछ सिख युवा पाकिस्तान के समर्थन में भी नारे लगाते देखे गए। जाहिर है केजरीवाल जैसे नेताओं की संकीर्ण राजनीति ने खालिस्तानी तत्वों को हंगामा खड़ा करने का एक मौका दे दिया।


मीडिया रिपोर्टों की मानें तो मुखर्जी नगर पुलिस स्टेशन के बाहर भीड़ बढ़ाने के लिए पंजाब से बसों में भर कर लोग लाए गए थे। सिख प्रतीकों की इस प्रकार की राजनीति और खालिस्तानी तत्वों का पोषण कर कांग्रेस और अकाली दोनों 1980 और 1990 के दशक में अपने हाथ जला चुके हैं। जब इंदिरा गांधी ने अकालियों पर बढ़त हासिल करने के लिए भिंडरावाले को प्रश्रय दिया था और राजनीतिक लड़ाई पिछड़ते अकालियों ने भिंडरावाले को अपने पाले में लाने के लिए उन्हें और उनके हथियारबंद साथियों को स्वर्ण मंदिर में आमंत्रित किया था। इसके बाद जो काला इतिहास रचा गया वह सबको मालूम है। पंजाब में आतंकवाद का इतिहास अगर कुछ सीख देता है तो वह यह कि खालिस्तानियों की राजनीतिक सवारी करने की कोशिश हर राजनीतिक दल को भारी पड़ी है। मुखर्जी नगर थाने के बाहर मनजिंदर सिरसा के साथ इन तत्वों के द्वारा की गई धक्कामुक्की इसी की एक बानगी है।

इस सबको हाल ही में गुजरी आपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर खालिस्तानियों द्वारा स्वर्ण मंदिर में हंगामे की नाकाम कोशिश से भी जोड़कर देखने की ज़रूरत है। तब तो यह देश विरोधी तत्व सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी के चलते सफल नहीं हो पाए पर मुखर्जी नगर की घटना को जिस तरह धार्मिक रूप दिया गया उससे खालिस्तानियों को भारत विरोधी दुष्प्रचार का एक सुनहरा मौका हाथ ज़रूर लगा है जिसका वह भरपूर फायदा उठाएँगे और उठा भी रहे हैं।

अगर आप इन तत्वों को इस्लाम और पाकिस्तानपरस्त नारे लगाते देख अचरज में हैं तो जान लीजिए कि सिखों को हिंदू समाज से दूर ले जाना और सिख धर्म के इस्लाम से कपोलकल्पित रिश्ते तलाशना खालिस्तानीयों का मुख्य एजेंडा रहा है। इस साजिश में अंग्रेजों से लेकर वामपंथी इतिहासकारों और लिबरल बुद्धिजीवीयों ने पूरी ताकत लगाई है। उदाहरण के लिए खालिस्तानियों द्वारा सिख समाज में फैलाई गई एक भ्रांति यह है कि स्वर्ण मंदिर की नींव एक सूफी फकीर मिंया मीर ने रखी थी। यह झूठ खुशवंत सिंह तक ने फैलाने की कोशिश की थी लेकिन प्रख्यात इतिहासकार सीताराम गोयल द्वारा संडे आब्जर्वर में लिखे एक लेख में इस दावे की ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर धज्जियाँ उड़ाए जाने पर पीछे हट गए थे।

क्योंकि खालिस्तानियों के आईएसआई से जगजाहिर रिश्ते रहे हैं तो उनके लिए इस्लामिक ताकतों से गठजोड़ का नैतिक आधार तलाशना जरूरी रहता है। वरना जिस पाकिस्तान के बनने के दौरान लाखों सिखों को निर्ममता से कत्ल कर दिया गया था उस पाकिस्तान से गठजोड़ का सिख समाज को क्या औचित्य बता पाएँगे? अहमद शाह अब्दाली ने 1762 में पंजाब पर हमला करके 30000 सिखों का कत्ल किया था और स्वर्ण मंदिर को विध्वंस कर दिया था। अगर खालिस्तानी यह सब भूल गए हों तो स्मरण करा दें कि यह सिख इतिहास में वड्डा घल्लूघारा या बड़ा नरसंहार करके प्रसिद्ध रहा है। इतना ही नहीं अब्दाली ने स्वर्ण मंदिर के अमृत सरोवर में गायों को काट काट कर फेंक दिया था। ऐसे में खालिस्तानीयों से आम सिखों को कुछ सवाल पूछने की ज़रूरत है। पहला यह कि स्वर्ण मंदिर को दो बार विध्वंसक करने वाले अब्दाली के नाम पर अपनी मिसाइल का नाम रखने वाले पाकिस्तान के समर्थन में वह नारे कैसे लगा रहे हैं? हर साल ब्लू स्टार के जख्मों को कुरेदने वाले खालिस्तानियों को दो बार अब्दाली द्वारा गुरु अर्जुन देव के बनाए स्वर्ण मंदिर का विध्वंस कैसे याद नहीं रहता? अगर सिख मान्यताएँ हिंदू मान्यताओं से इतनी अलग रही हैं तो अब्दाली ने स्वर्ण मंदिर को अपवित्र करने के लिए गोमांस को ही क्यों चुना?

यह सब बहुत ही उद्वेलित करने वाला है। मुगल साम्राज्य के उस इस्लामी कट्टरपंथ को, जो गुरु अर्जुन देव, गुरू तेगबहादुर, गुरु गोविंद सिंह जी के पुत्रों के बलिदान के लिए जिम्मेदार था, सहेजे बैठे पाकिस्तान के पक्ष में खालिस्तानी कैसे नारे लगा लेते हैं?

बहरहाल मुखर्जी नगर मामले के बाद सामने आया घटनाक्रम यह दर्शाता है कि खालिस्तानीयों ने हाल के वर्षों में सिखों से जुड़े किसी भी आंदोलन में घुसपैठ करने की अपनी क्षमता में इतनी वृद्घि तो की है कि पंजाब में आतंक के कालखंड के समय मिले सबक भूलकर मुख्यधारा के राजनीतिक दल भी कहीं ना कहीं उनकी खींची रेखा पर चलने पर मजबूर हो रहे हैं।