भारती
तुगलक ने दिल्ली को वीरान कर देवगिरि को बनाया दौलताबाद, हिंदुओं के सर टाँगे (29)

यह भारत के इस्लामी इतिहास के एक बेरहम सुलतान मुहम्मद बिन तुगलक की हुकूमत की शुरुआत है। वह 1325 में उसी दिल्ली में शान से निकला, जहाँ पाँच साल पहले तक खिलजियों के घोड़े साफ कर रहा था और उसने कभी ख्वाब में नहीं सोचा होगा कि एक दिन वह तख्त पर बैठेगा।

दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान अब सिर्फ कहानियों में कैद एक पराजित पात्र थे, जिनके समय के हिंदुओं में से कोई बचा नहीं था। चाैथी-पाँचवी पीढ़ी ने सिर्फ अपने दादा-परदादा से उनके किस्से ही सुने होंगे। तख्त पर काबिज होने के बाद लोगों को खुश करने के लिए सबसे पहले दौलत लुटाना एक फैशन बन गया था। दिल्ली से जियाउद्दीन बरनी की लाइव रिपोर्ट

आलीशान तरीके से वह बदायूं दरवाज़े से दाखिल हुआ। राजभवन में उतरा। अमीर और प्रतिष्ठित लोगों ने हाथियों के हौदों में सोने-चांदी के तनकों से भरे थाल अपने पास रखे हैं। वे मुटि्ठयों में भर-भरकर गलियों और बाजारों में फेंक रहे हैं। तनकों की बारिश हो रही है। कोठों पर बैठे लोग न्यौछावर चुनते जा रहे हैं।

आम लोग, बच्चे, बड़े, हिंदू, मुसलमान, दास, दासियाँ चिल्ला-चिल्लाकर सुलतान मुहम्मद के लिए दुआएँ कर रहे हैं। सोने-चांदी के तनकों से उन्हाेंने अपनी पगड़ियाँ, जेबें और मुटि्ठयां भर ली हैं। ऐसा शाही न्यौछावर किसी के समय नहीं हुआ। बूढ़े लोगों के मन में भी ऐशो-आराम की ख्वाहिश जाग गई है। घरों में ढोल बजाए जा रहे हैं।

तुगलक ने किसको कितना माल दिया, ब्यौरा आँखें चौंधियाने वाला है- “मलिक संजर बदखशानी को 80 लाख तनके, एमादुद्दीन काे 70 लाख, सैयद अजदुद्दौला को 40 लाख, मौलाना नासिर तवील, काजी कासना, खुदावंदजादा गयासुद्दीन, किवामुद्दीन ओर नासिर काफी को लाखों तनकों के साथ अपार सोना दिया। मलिक बहराम गजनी को हर साल 100 लाख तनके। गज़नी के काज़ी को इतनी दौलत और इतने जवाहरात दिए कि उसने कभी सोचा भी नहीं होगा।

दिल्ली को खाली कराया, घरों में आग लगाई

अब दूर इलाकों पर हमलों और लूटमार का पहले जैसा सिलसिला नए सिरे से शुरू हुआ लेकिन मुहम्मद तुगलक के दो फैसलों ने आम लोगों की जिंदगी तबाह कर दी। पहले  उसने तय किया कि राजधानी दिल्ली में नहीं होगी। उस सनकी सुलतान को एक बार जो दिमाग में आए जाए तो बस काम होना ही है। अब दिल्ली की बजाए दिल्ली से 40 दिन की दूरी पर महाराष्ट्र के देवगिरि को राजधानी बनाना तय किया गया। किसी से राय-मशविरा किए बिना फैसला हो गया।

1327 में वह देवगिरि पहुँचा। देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद रखा। मुल्तान की एक बगावत को दबाने के लिए वह फिर दिल्ली आया और अब की बार दिल्ली के सारे सूफियों और आलिमों को भी दिल्ली छोड़ने का हुक्म हुआ। पूरी आबादी को हटाया गया। बरनी बता रहा है

दिल्ली और आसपास के कस्बों में कोई कुत्ता-बिल्ली भी नहीं छोड़ा गया। हरेक बाशिंदे काे रवाना किया गया। दिल्ली से देवगिरि की लंबी यात्रा में कई लोग मारे गए। वे अपनी मातृभूमि से वियोग बर्दाश्त नहीं कर सके। देवगिरि में जो कि प्राचीन काल से कुफ्र का स्थान था, मुसलमानों की कब्रें बन गईं।

एसामी का आँखों देखा ब्यौरा है- उसने गुप्त रूप से तय किया कि एक महीने में शहर को खत्म कर दिया जाए। उसने दूर-दूर तक यह आदेश जारी कराया कि जो कोई भी सुलतान का हितैषी हो, मरहठा प्रदेश की तरफ निकले। जो मानेगा, उसे इनाम मिलेगा। जो नहीं मानेगा, उसका सिर काट दिया जाएगा।

शहर में आग लगा दी जाए। सबको शहर से बाहर निकाला जाए। लोगों ने रोते-पीटते अपने घर छोड़े। परदे वाली औरतों और सूफियों को बाल पकड़कर घरों से निकाला गया। शहर के बाहर शिविर लगाए गए। लोग ऐसे चीख-पुकार मचाते हुए शहर से निकले, जैसे जिंदा इंसान को कब्र में दफन किया जाए। हर पड़ाव पर कब्रें बनती गईं। मृतक बड़ी तादाद में थे।

दिल्ली से देवगिरि के बीच बहुत से बच्चों की मौत बिना दूध के हो गई। कई प्यास के कारण मारे गए। कई नाजुक और खूबसूरत लोग फटे कपड़ों में गिरते-पड़ते रास्ते में थे। जिनके पैर बागीचों के बाहर कहीं पड़े नहीं थे, उनमें जंगल और बियाबानों के कारण छाले पड़ गए। उस लंबे काफिले का 10वाँ भाग ही देवगिरि तक पहुँच पाया। एसामी लिख रहा है-

दिल्ली बरबाद कर दी गई। जब सारे लोग निकल गए तो शहर के दरवाज़े बंद करा दिए गए। सबके घर भूतों के ठिकाने बन गए। खाली घरों में आग लगा दी गई। देवगिरि की तरफ निकले काफिले को छह हिस्सों में बाँटा गया। किसी के पास कोई सामान नहीं था। काफिले में लोग सुलतान के गुस्से और अत्याचार के कारण निकले थे।”

विद्रोह दबाने के लिए हिंदुओं के कटे सिर बुर्जों पर टाँगे

मुहम्मद तुगलक राजधानी देवगिरि बनाने के बाद भी दो-तीन साल दिल्ली में रहा। यह वह समय था जब दिल्ली के आसपास के गाँवों, दोआब, बरन (बुलंदशहर), कोल (अलीगढ़) और मेरठ के कस्बों से लगान के अलावा दूसरे कर (अबवाब) भी वसूल किए जाते थे। यह इतने ज्यादा थे कि लोगों को चुकाना मुमकिन नहीं था। इनकी वसूली बेरहमी से ही होती थी। इसलिए लोगों से कठोरता से पेश आने वाले ‘जानदार और मुहसिल’ नियुक्त किए गए।

लोगों को कठोर दंड दिए गए। हालत इतनी बदतर हो गई कि लोग तुगलक के इन कठोर तरीकों को बर्दाश्त नहीं कर सके। परेशानहाल लोगों ने हर तरफ ‘मंडल’ बना लिए। वे 10-10, 20-20 किलोमीटर के दायरे में संगठित होकर अपने गाँव-घर छोड़कर जंगलाें और तालाबों के किनारे जाकर रहने लगे। यह तुगलकी हुकूमत के खिलाफ दिल्ली की नाक के नीचे आम जनता का विद्रोह था। अब आप बरन यानी बुलंदशहर से जियाउद्दीन बरनी की यह लाइव रिपोर्ट पढ़िए

तुगलक ने इस बगावत से क्रोधित होकर चढ़ाई की। विद्रोहियों के इलाके बरबाद कर दिए गए। सुलतान फिर दिल्ली लौटा। अब उसने बरन की तरफ कूच किया। इस इलाके का विध्वंस कर दिया गया। मृत लोगों की लाशों के खलिहान लग गए। रक्त की नदियाँ बह गईं। बरन के किले के सभी बुर्जों पर प्रजा को जिंदा लटका दिया गया।

ऐसे कठोर दंड के डर और आतंक से लोगाें की नफरत और बढ़ गई। उसने हुक्म दिया कि बरन प्रांत को नष्ट कर दिया जाए और हिंदुओं के कटे हुए सिरों को बरन के किले की अटारियों पर लटका दिया जाए। कुछ गाँवों के मुकद्दमों को भी मार डाला गया। कुछ को अंधा बना दिया गया। जो बच जाते थे वे इकट्‌ठे होकर बचने के लिए जंगलों में पनाह लेते थे। दोआब नष्ट हो रहा था।

दिल्ली के आसपास के ये इलाके वर्तमान उत्तर प्रदेश के हैं। हमने अब तक देखा कि किस तरह कुतबुद्दीन ऐबक के बाद बीते इन 125 सालों में हुए मुस्लिम सुलतानों की क्रूर हुकूमत में यह इलाका बुरी तरह पिसता रहा।

हिंदुओं के प्रतिकार भी जारी रहे। वे जहाँ लड़ सकते थे, लड़ रहे थे या अपनी जान बचाने के लिए जंगलाें और पहाड़ों की शरण ले रहे थे। लगातार हर तरफ अफरातफरी मची थी। भारत में गंगा-जमुनी संस्कृति की यह असल शुरुआत थी, जब हुकूमत के आतंक से परेशान लोगाें ने मजहब बदलने में ही राहत की आखिरी उम्मीद की होगी।

धीरे-धीरे हिंदू आबादी हिंदू-मुस्लिम आबादी में बदलती गई। कहीं कोई कम, कहीं कोई ज्यादा। वे हिंदू भी जो अपना धर्म बचाकर जिंदा रह पाए और वे मुस्लिम भी जो अपनी जान और दौलत बचाने के लिए धर्म छोड़ बैठे।

धर्म परिवर्तन भी बचाव का एक तात्कालिक वहम ही था, क्योंकि एक सुलतान के राज्य में मजहब बदलकर मुसलमान हुए लोग दूसरे सुलतान के कहर से बच नहीं पाते थे। कत्लेआम और मारकाट में सब मारे जाते थे।

हम कल्पना ही कर सकते हैं कि तुगलक के समय मारे गए मुसलमानों ने कभी यह सोचा होगा कि खिलजी के समय धर्म बदलकर भी वे क्या बचा पाए? जो मूर्ख आज सीधे अपनी बल्दियत उन मुस्लिम हमलावरों से जोड़ते हैं, जरा उनके दावों की सचाई 1330 के इन कत्लेआमों की कसौटी पर ही करके देखें।

 हिंदुओं के मालामाल होने की तोहमत

खज़ाने में चारों तरफ से लूट का बेहिसाब धन आता था। तुगलक ने हर दिन दान के नाम पर लुटाना शुरू कर दिया तो हालत खराब हो गई। तब उस उलट खोपड़ी ने तांबे के सिक्के ढालने का फैसला किया और हुक्म हुआ कि चांदी की तरह तांबे के सिक्के भी प्रचलन में लाए जाएँ। इस फैसले ने आर्थिक तबाही के हालात पैदा कर दिए और इस मौके पर हमारे खबरनबीस बरनी के टारगेट पर हिंदू हैं। वह बता रहा है

खज़ाने से बेहिसाब दान के चलते बदइंतजामी फैल गई। हिंदू मालामाल हो गए। वजह यह है कि वे खरीद-फरोख्त में तांबे के सिक्कों का इस्तेमाल करने लगे। जब सुलतान ने तांबे के सिक्कों को चांदी की तरह चलाने के आदेश दिए तो हिंदुओं के घरों में टकसाल खुल गईं। हर सुनार अपने घर में तांबे की मुद्राएँ ढालने लगा।

हिंदुओं ने लाखों-करोड़ों की तांबे की मुद्राएँ बनवाईं। वे उसी से खराज अदा करने लगे और घोड़ों समेत तरह-तरह की बेशकीमती सामान खरीदने लगे। हालात यह हो गए कि तांबे की मुद्राएँ कंकड़ और ठीकरे के समान हो गईं। उनकी कीमत मिट्‌टी के ढेलों जितना रह गया और वह किसी काम की नहीं रहीं। तब मुहम्मद ने पुराना आदेश रद्द कर दिया।

आज भी भारत में ऊलजलूल फैसलों के समय बोलचाल में तुगलकी फरमान, मुहम्मद बिन तुगलक के ऐसे फैसलों की वजह से कहा जाता है। उसने यह भी आदेश दिया कि जिनके पास तांबे के सिक्के हों, वह खजाने में जमा करके सोने की मुद्राएँ ले जाए। हालत यह हो गई कि हज़ारों लोग तांबे के सिक्कों के ढेर लेकर पहुँचने लगे। ये सिक्के इतनी बड़ी मात्रा में जमा हो गए कि तुगलकाबाद में तांबे के ढेर पहाड़ जैसे हो गए।

यह हाल 1329-30 से 1331-32 के बीच का है। इन दो सालों में दिल्ली और दिल्ली के आसपास के गाँव-कस्बों के हज़ारों लोग अलग तरह की आफतें झेलते रहे। ये आफतें लगातार हमलों और लूटमार से अलग एक सनकी सुलतान की खामख्याल नीतियों के कारण आईं।

इन नाकाम नीतियों ने मुहम्मद तुगलक को भी बुरी तरह परेशान कर दिया। इन मूर्खतापूर्ण कदमों के कारण एक तरह से वह अपनी नाकाबिलियत ही ज़ाहिर कर रहा था। आखिर अब तक उसने खिलजियों के घोड़े ही तो धोए-पौंछे थे। कौन-सा प्रशासनिक अनुभव उसने हासिल किया था?

हम आगे देखेंगे कि किस तरह आए दिन चारों तरफ से उसके अपने लोग बगावत करने लगे। अब उसे फौज की ज़रूरत थी ताकि तलवार के जोर पर इन फसादों को दबा सके। यह सीधा खेल था- बेरहमी से मारो या बेरहमी से मरो।

अक्ल के काम में खुद के हाथों खुद ही मात खाने के बाद मुहम्मद तुगलक को अब अपनी बेरहमी की नुमाइश का शानदार मौका मिला। वह इसमें कैसे पीछे रह सकता था? यही तो इन सुलतानों की खूबी थी। बेरहमी भी क्या खूब काबिलियत हो सकती है, यह दिल्ली के सुलतानों के क्रूर कारनामें हर सदी में हर जगह बताते हैं।

4 लाख 70 हजार लुटेरों की भर्ती में खजाना खाली

आइए, एक महत्वपूर्ण खुलासा करते हैं। यह फौज की पहली बड़ी भर्ती की चयन प्रक्रिया का मामला है। आज]eद भारत की राजधानी दिल्ली में 70 साल तक जिनके नाम की सड़क कायम रही तो ऐसे गुणवान सुलतान तुगलक की फौज की पहली भर्ती भी कमाल की ही होनी चाहिए। जियाउद्दीन बरनी लाइन पर हैं। देखिए क्या बता रहे हैं-

जिस साल सेना की बहुत बड़ी संख्या भर्ती की गई, तब न किसी का हुलिया लिखा गया, न तलवार आदि चलाने का कोई इम्तहान हुआ। घोड़े के मूूल्य और दाग पर ध्यान नहीं दिया गया। केवल उनके सिरों की गिनती करके दिल्ली, कस्बों और प्रदेशों से उन्हें नकद वेतन दिया गया।

उस साल 4 लाख 70 हज़ार सवारों की सूची दीवाने अर्ज द्वारा सुलतान के समक्ष पेश हुई। एक पूरा साल इसी चयन प्रक्रिया में लग गया। इतने बड़े लश्कर को किसी स्थान की विजय के लिए न भेजा जा सका, जिससे लूट की धन संपत्ति द्वारा दूसरे साल सेना का काम चल सकता।

दूसरा साल आ गया। तनख्वाह देने के लिए न खज़ाने में धन था, न अक्ताओं में, जिससे सेना स्थाई रूप से रह सकती। सेना छिन्न-भिन्न हो गई। सब अपने काम में लग गए। लेकिन इनकी भर्ती में ही खजाने से लाखों-करोड़ों खर्च हो गए।

यह बहुत कमाल की डिटेल है। सबसे पहले हम बरनी साहब का शुक्रिया अदा करते हैं। बरनी की काबिलियत पर आगे बात करेंगे। गौर कीजिए बरनी ने क्या बताया। यह दिल्ली में इस्लामी कब्ज़े के बाद के अत्यंत दुर्लभ अंदरुनी दृश्यों में से एक है।

ज़रा सोचिए, ये चल क्या रहा है? फौज क्यों भर्ती की जा रही है? जॉब के ये नए अवसर क्या तब भारत को विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने का इशारा कर रहे थे? राज्य में चारों तरफ सब नए-नए युवकों को भर्ती करने में ही लग गए तो इसका नुकसान क्या हुआ?

बरनी का विश्लेषण है कि सबसे बड़ा नुकसान यह हो गया कि उस दौरान किसी हिंदू राज्य पर हमले-लूट नहीं हो पाए। हमले-लूट नहीं हो पाए तो आय शून्य हो गई। राजस्व नहीं आया। माली हालत खराब हो गई। वे लड़ने लायक भी नहीं बचे। भाड़े के लुटेरों की यह विशालकाय फौज बिखर गई।

तुगलक अब एक नए अवतार में सामने आता है। इस्लाम में इसे कहते हैं हुकूमत करना। अब उसकी बेरहमियों का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। चारों तरफ से बगावत उठी तो बौखलाए तुगलक के कारनामे रूह कंपाने वाले हैं।

आप आज के अफगानिस्तान और सीरिया जैसे बरबाद मुल्कों से तब के हिंदुस्तान की तुलना करेंगे। मुझे हैरत है कि आज़ाद भारत के इतिहास के सेक्युलर लेखकों को 1,000 साल के अतीत के इस भयावह और दमघोंटू नर्क में देश का ऐसा इतिहास नज़र आया कि जाहिलों को तो छोड़िए, आज के पढ़े-लिखे और अपने असल इतिहास की तरफ से पीठ फेरकर खड़े मुसलमान तक बेशर्मी से यह मानते हैं कि इस्लाम के आने के पहले न यह देश था, न देश में कुछ था और हमने तो इस मुल्क पर 1,000 साल तक राज किया!

अगले भाग में तुगलक की बेरहमी के रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य हैं, जहाँ अपने ही साथी मुसलमान लुटेरों से नाराज़ तुगलक ने उन ईमान वालों के सिर कटवाए और खानदान सहित खात्मे किए।

पिछला भाग- गयासुद्दीन तुगलक के सुलतान बनने के बाद तेलंगाना पर दो हमले, बंगाल में लूटमार (28)

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com