भारती
हिंदू राष्ट्र को परिभाषित करना चुनौती, जानें अंबेडकर और सावरकर के विचार

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसे विचार या आदर्श के रूप में परिभाषित नहीं किया गया है। जो हिंदू राष्ट्र की माँग करते हैं वे भी स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि भारत के नागरिकों के लिए हिंदू राष्ट्र क्या लेकर आएगा।

जो इस विचार का विरोध करते हैं, उन्हें यही नहीं पता कि वे इसे नापंसद क्यों करते हैं। लेकिन वे इसे बुरा चित्रित करके प्रसन्न हो जाते हैं- प्रायः हिंदू संगठनों के सबसे खराब व्यवहार का उद्धरण देकर या “हिंदू पाकिस्तान” के रूप में सारगर्भित करके इसे एक धर्मशासित राज्य बताकर जहाँ सभी लोगों पर हिंसा से धार्मिक विचार आरोपित किए जाते हों।

हाल ही में हिंदुस्तान टाइम्स में अंग्रेज़ी भाषा के जाने-माने भारतीय लेखक वीर सांघवी ने एक स्तंभ में हिंदू राष्ट्र के समर्थकों से कहा कि वे बताएँ क्या होता यदि 1947 से ही भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाता।

इसके अलावा सांघवी रेखांकित करते हैं कि यदि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाता तो यह किन समस्याओं का सामना करता। वे यह भी पूछते हैं कि इसका विभाजन पर क्या प्रभाव पड़ता? (यदि भारत हिंदू राष्ट्र घोषित कर दिया जाता तो क्या दोनों ओर से समान स्तर पर धर्म-आधारित प्रवासन होता?)

हमारी सरकार कैसे होती? क्या कश्मीर पर हम दावा कर सकते थे? क्या हम कट्टर रूप से किसी दूसरी विचारधारा का अनुसरण कर रहे होते? क्या हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक समझा जाता? पूर्वोत्तर का क्या होता? सिखों का क्या होता? जातिवाद का क्या होता? पुस्तक कहाँ है (जो समझाए कि हिंदू राष्ट्र कैसा होगा)?

ये प्रश्न पूछकर सांघवी ने हिंदू राष्ट्र की माँग करने वालों की सहायता ही की है। लेकिन हमें यह भी देखना चाहिए कि ये प्रश्न सिर्फ इसलिए नहीं उठ रहे हैं क्योंकि एक “हिंदू राष्ट्रवादी” भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है।

इनमें से कई प्रश्न 1940 के दशक में भी उठे थे जब बाबा साहेब अंबेडकर ने पाकिस्तान पर अपनी निबंध पुस्तिका में माना था कि मुस्लिम के अलग देश के अधिकारी हैं। उन्होंने विनायक दामोदर ‘वीर’ सावरकर की हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व की परिभाषा एवं अविभाजित भारत में मुस्लिमों के साथ व्यवहार में तर्कहीनता खोजी थी।

हास्यास्पद है कि उन्होंने ऐसा प्रश्न ईसाई जैसे अन्य अल्पसंख्यकों के लिए नहीं उठाए थे जबकि ईसाइयत में भी विभाजनकारी संवेग हैं। पिछले कुछ दशकों में ही ईसाई दक्षिणी सूडान का विभाजन मुस्लिम सूडान से हुआ था, धार्मिक आधार पर साइप्रस विभाजित हुआ, ईसाई बहुल वाले पूर्वी तिमोर ने मुस्लिम इंडोनेशिया से स्वतंत्रता पाई। भारत में भी ईसाई बहुल वाले पूर्वोत्तर राज्य अलगाववादी राह अपनाते आए हैं जिन्हें प्रायः चर्च से समर्थन मिला है।

लेकिन विभाजन सही या नहीं जैसे प्रश्न जो अंबेडकर ने उठाए थे, अब सांघवी उठा रहे हैं जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता। हिंदू राष्ट्र पर चर्चा 1940 के दशक अंबेडकर-सावरकर की असहमति समझने के बाद करनी चाहिए।

अंबेडकर ने कहा था कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं, इससे जिन्ना और सावरकर भी सहमत थे लेकिन प्रश्न यह था कि क्या देश का धार्मिक आधार पर विभाजन किया जाए या एक ही देश में दोनों को पृथक रूप से क्रियान्वित किया जाए।

यहाँ पर सावरकर की मुद्रा पर अंबेडकर के आलोचनों का उद्धरण आवश्यक है, विशेषकर उनके निष्कर्षों का। वे लिखते हैं-

अजीब लग सकता है लेकिन सावरकर और जिन्ना एक राष्ट्र या दो राष्ट्र के मसले पर एक-दूसरे से पूर्ण रूप से सहमत हैं। दोनों मानते हैं, सिर्फ मानते हीं नहीं हैं बल्कि ज़ोर देते हैं कि भारत में दो राष्ट्र हैं- एक मुस्लिम राष्ट्र और दूसरा हिंदू राष्ट्र।

उनमें मतभेद केवल इस बात पर है कि दोनों देशों को कैसे जीना चाहिए। जिन्ना का मानना है कि विभाजन करके पाकिस्तान और हिंदुस्तान नामक दो राष्ट्र बनाए जाएँ, पाकिस्तान में मुस्लिम रहें और हिंदुस्तान में हिंदू। वहीं सावरकर का मानना है कि भले ही भारत में दो राष्ट्र हैं लेकिन विभाजन नहीं किया जाना चाहिए।

दोनों राष्ट्र एक ही देश में रहें और एक ही संविधान का पालन करें। संविधान ऐसा होगा जो हिंदू राष्ट्र को इसके अनुकूल प्रबल स्थान दे और मुस्लिम राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र के अधीन एक सहयोगी का स्थान दिया जाए।

श्री सावरकर हर व्यक्ति के एक वोट के पक्षधर हैं। इस योजना में मुस्लिमों को कोई ऐसा लाभ न मिलता जो हिंदू को न मिलता। अल्पसंख्यक होना आपको अतिरिक्त लाभों के योग्य नहीं बनाता और बहुसंख्यक होने के कारण आपको कुछ भुगतना नहीं होता।

मुस्लिम धर्म और संस्कृति एक मुस्लिम के लिए सुनिश्चित करने हेतु राज्य राजनीतिक सत्ता के उपाय को परिभाषित करेगा। लेकिन यदि मुस्लिम सभा में सुनिश्चित सीटों की माँग करेंगे तो राज्य यह नहीं करेगा अगर सीटों की संख्या मुस्लिम जनसंख्या के अनुपात से अधिक होगी।

इस प्रकार संख्याबल भार को तय करके श्री सावरकर मुस्लिम राष्ट्र को मिलने वाले सभी अतिरिक्त लाभों को छीन लेते।

अंबेडकर सावरकर को साहसिक और स्पष्ट कहते हैं जिसे कांग्रेस अंधेर में रखना चाहती थी। वे लिखते हैं-

श्री सावरकर ने पाकिस्तान का जो विकल्प बताया है उसमें वाक-स्पष्टता, साहस और निश्चितता है जो इसे अल्पसंख्यक अधिकरों पर कांग्रेस की अनियमितता, अनिश्चितता और अस्पष्टता से पृथक बनाती है।

श्री सावरकर की योजना कम से कम मुस्लिमों को इताना तो स्पष्ट बताती है कि उन्हें क्या मिलेगा और क्या नहीं। मुस्लिम जानते हैं कि हिंदू महासभा के सामने उनका क्या स्थान है। वहीं, कांग्रेस के साथ मुसलमान स्पष्टता नहीं पाते क्योंकि यदि कपट नहीं तो कम से कम अल्पसंख्यक मुद्दे पर कांग्रेस की कूटनीति तो है ही।

लेकिन सावरकर के एक भारत, जहाँ हिंदू और मुस्लिम दो अलग इकाइयों की तरह रहें, के विचार का खंडन करने में अंबेडकर तीखा रुख अपनाते हैं। वे इस विचार को अतार्किक, विसंगत और नए देश के लिए “खतरनाक” भी कहते हैं। वे लिखते हैं-

साथ ही यह कहा जाना चाहिए कि श्री सावरकर का विचार यदि विचित्र नहीं तो अतार्किक है। श्री सावरकर मानते हैं कि मुस्लिम एक अलग राष्ट्र हैं। वे यह भी स्वीकारते हैं कि उन्हें सांस्कृतिक स्वायत्तता का अधिकार है। वे उन्हें एक राष्ट्रीय ध्वज की अनुमति देते हैं।

लेकिन फिर भी वे एक अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग के विरुद्ध हैं जो उनका राष्ट्रीय घर बने। यदि वे हिंदू राष्ट्र के राष्ट्रीय गृह के समर्थन में हैं तो वे मुस्लिम राष्ट्र के राष्ट्रीय गृह की माँग को कैसे नकार सकते हैं?

यह अधिक चिंता का विषय न होती यदि विसंगति ही अकेले श्री सावरकर की त्रुटि होती। लेकिन श्री सावरकर द्वारा उनके पक्ष को पोषित किया जाना देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक स्थिति उत्पन्न कर रही है।

एक ही देश का नागरिक होने और एक ही संविधान को मानने में एक बहुसंख्यक राष्ट्र एक अल्पसंख्यक राष्ट्र से कैसा व्यवहार करेगा इसे इतिहास में दो रूपों में दर्ज किया जा सकता है।

पहला यह कि अल्प राष्ट्र की राष्ट्रीयता नष्ट करके उसका विलय बड़े देश में कर लिया जाए ताकि दो राष्ट्रों को एक राष्ट्र बना दिया जाए। ऐसा करने के लिए अल्प राष्ट्र को उनकी भाषा, धर्म या संस्कृति से वंचित करके उनपर बड़े राष्ट्र की भाषा, धर्म और संस्कृति आरोपित की जाए।

दूसरा यह कि विभाजन करके अल्प राष्ट्र को एक पृथक, स्वायत्त और संप्रभु अस्तित्व दिया जाए जो बड़े राष्ट्र से स्वतंत्र हो। ये दोनों तरीके ऑस्ट्रिया और तुर्की में प्रयोग में लाए जा चुके हैं, पहले के विफल होने के बाद दूसरे को प्रयोग में लाया गया था।

उपरोक्त अनुच्छेद से समझ आता है कि जब दो राष्ट्र एक भूभाग में रहते हैं तो हिंसा एवं बल से दो राष्ट्रों को एक करना पड़ता है। इस प्रकार अंबेडकर सावरकर की आलोचना करते हुए उनके हिंदू भारत के विचार को निरर्थक बताते हैं। अंबेडकर कहते हैं-

श्री सावरकर इन दोनों में से किसी एक को नहीं चुन रहे हैं। वे मुस्लिम राष्ट्र के दमन का प्रस्ताव नहीं दे रहे हैं। इसके विपरीत वे अल्प राष्ट्र को अपना धर्म, भाषा और संस्कृति बनाए रखने की अनुमति दे रहे हैं जो किसी राष्ट्र की आत्म को बनाए रखते हैं।

दूसरी ओर वे देश के विभाजन पर सहमत भी नहीं हो रहे हैं जिससे दोनों राष्ट्र दो स्वायत्त राज्य बनकर अपने-अपने संप्रभु भूभाग के अधिकारी हो सकें। वे चाहते हैं कि एक ही देश में हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्रों की तरह रहें और अपने-अपने धर्म, भाषा और संस्कृति को बनाए रखें।

बड़े राष्ट्र द्वारा अल्प राष्ट्र के दमन के सिद्धांत को हम समझ सकते हैं और कुछ तो इसे सराह भी सकते हैं क्योंकि एक राष्ट्र के निर्माण के लिए यह आवश्यक है। लेकिन हम यह नहीं समझ सकते कि उस सिद्धांत का क्या लाभ होगा जो बिना विभाजन के दो राष्ट्रों को एक-साथ रखने की बात करता है।

इसके तर्कसंगत तब कहा जा सकता है कि जब दोनों देश मित्रवत होकर सहयोगियों की तरह रहें और एक-दूसरे के प्रति आदर व सहमति रखें। लेकिन ऐसा नहीं हा पाएगा क्योंकि श्री सावरकर मुस्लिम राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र के समान दर्जा नहीं दे रहे हैं। वे चाहते हैं कि हिंदू राष्ट्र का प्रभुत्व रहे और मुस्लिम राष्ट्र उसके अधीन रहे।

दोनों राष्ट्रों के बीच शत्रुता का बीज बोने के बाद क्यों श्री सावरकर चाहते हैं कि वे एक देश बनकर एक संविधान के अधीन रहें, यह समझना कठिन है। (उपरोक्त अंश को संपादक द्वारा बोल्ड किया गया है, अंबेडकर द्वारा नहीं।)

यहाँ भले ही अंबेडकर द्वारा सावरकर की विसंगतियों और विरोधाभासी तर्क को रेखांकित किया जाना सही है लेकिन प्रश्न उठना चाहिए कि अंबेडकर किसकी वकालत कर रहे थे- मूल रूप से वे यह कह रहे थे कि हिंसा से ही एक राष्ट्र बनाया जा सकता है और इस प्रकार हिंदू राष्ट्र तब ही बन सकता था जब मुस्लिम राष्ट्रीयता का दमन किया जाए।

ऐसे में कई मायनों में अंबेडकर सावरकर से अधिक कट्टरवादी थे लेकिन सही जगह पर नहीं। उनके विचार रेनन की “राष्ट्र” की परिभाषा से आए थे जिसका मूल विचार है ऐसे लोग जिन्होंने संयुक्त रूप से संघर्ष किया हो और वे सुपरिभाषित भूभाग में रहते हों जो रक्षा करने योग्य और अलग हो।

संक्षिप्त में कहा जाए तो राष्ट्र-राज्य का यह विचार वेस्टफैलियन (संप्रभुता को महत्त्व देने वाला अंतर्राष्ट्रीय तंत्र) का और अब्राह्मिक है जो ईसाई पश्चिमी यूरोप में विकसित हुआ और जहाँ भूभाग ने राष्ट्रवाद की भावना को जन्म दिया।

भारत में कई “राष्ट्र” हैं (रेनन की परिभाषा के अनुसार) जो एक ही राज्य में रहे हैं, ऐसे ही कई “राज्य” अलग-अलग रहे हैं जो एक ही “राष्ट्रीयता” की भावना से प्रेरित थे। यहाँ राष्ट्रीयता का अर्थ है- एक सामान्य सांस्कृतिक समझ और एक पवित्र भूगोल (भारत पर लिखा डायना एक की पुस्तक का शीर्षक) की साझेदारी। भारत की राष्ट्रीयता सभ्यता से जुड़ी हुई है और यह रेनन की राष्ट्र की परिभाषा के अनुसार नहीं है।

ध्यान से देखें तो एकत्रित भारत जिसपर हिंदुओं का राजनीतिक प्रभुत्व हो, उतना विवादास्पद नहीं है जितना लगता है। ऐसा ही मलेशिया (जबाँ मलयों का प्रभुत्व है लेकिन हिंदुओं और चीनियों को भी अधीनस्थ आवाज़ दी गई है) और सिंगापुर (जहाँ चीनीयों का प्रभुत्व है और मुस्लिम एवं हिंदू अधीनस्थ भूमिका में हैं) में है। इस प्रकार हिंदू राष्ट्र का सावरकर का सपना मलेशिया और सिंगापुर जैसा होता जो आज सफल देश हैं।

भारत में इस प्रकार की व्यवस्था का निकटतम प्रतिरूप केरल में देखने को मिलता है जहाँ राजनीति धर्मों से चित्रित है, प्रबल मुस्लिम और ईसाई पार्टियाँ अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रही हैं। इसमें जिस वस्तु की कमी है, वह है हिंदुओं का प्रभुत्व क्योंकि वहाँ हिंदुओं का प्रतिनिधित्व निर्बल जाति आधारित पार्टियाँ कर रही हैं (नायरों और एज्हावाओं की अपनी पार्टियाँ हैं)।

इस प्रकार सावरकर जो चाहते थे, केरल उसका उलट है क्योंकि वहाँ अल्पसंख्यक बहुसंख्यकों पर शासन करते हैं। समस्या है कांग्रेस का सेक्युलरिज़्म जिसपर स्वयं अंबेडकर ने आपत्ति जताई थी।

आदर्श रूप से कांग्रेस को एक हिंदू पार्टी होना चाहिए था जिसके अधीन अन्य धर्मों की पार्टियों के साथ गठबंध होता लेकिन अंततः अब यह किसी का प्रतिनिधित्व करने योग्य नहीं बची है। ऐसे में पिछले दो चुनावों से एक क्षेत्रीय पार्टी जितने इसके संख्याबल पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

हिंदू राष्ट्र की बात करें तो अंबेडकर ने रेनन और वेस्टफैलियन की राष्ट्रीयता की परिभाषा को स्वीकारा था और थोड़े धुंधले लेकिन उपयुक्त भारत के राष्ट्रीयता के विचार को अनदेखा किया था जो सभ्यता पर आधारित है।

इसलिए हिंदू राष्ट्र का पुराना या नया विचार पवित्र भूगोल की समझ से उत्पन्न होना चाहिए और यही सावरकर ने हिंदुत्व को परिभाषित करने में किया था। हिंदू राष्ट्र की परिभाषा का कार्य अभी तक अधूरा है और हम आशा करते हैं कि हमें एक बेहतर चित्र मिल पाए जो मात्र यह न बताए कि ये है क्या, बल्कि यह भी बताए कि ये कैसा होना चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।