भारती
भारत-अमेरिका के सामरिक रिश्ते हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं, आगे बहुत कुछ

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के बाद एक बात स्पष्ट है कि दोनों देशों के बीच आर्थिक विषयों को लेकर भले ही विवाद हों, पर सामरिक सहयोग पर पूरी सहमति है। यह बात विशेषतः रक्षा-तकनीक पर खरी उतरती है।

वर्ष 2008 तक भारत ने अमेरिका से नाम मात्र के शस्त्रास्त्र खरीदे थे, पर 2019 आते-आते भारत करीब 18 अरब डॉलर के उपकरण अमेरिका से खरीद चुका है। इस हफ्ते हुए 3 अरब डॉलर के समझौतों को भी इसमें जोड़ लें, तो यह राशि 21 अरब डॉलर हो जाती है। लगभग 7 अरब डॉलर के समझौतों पर बातचीत अभी चल रही है। 

अमेरिकी विशेषज्ञ एशले जे टैलिस का कहना है कि लंबे समय तक भारत रक्षा-तकनीक के लिए रूस पर आश्रित था, पर अब भारत हाईटेक शस्त्रास्त्र के लिए अमेरिका की तरफ रुख कर रहा है। यह रिश्ता केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि दोनों के वैश्विक संबंधों में भारी बदलाव है। 

अमेरिकी ड्रोन

केवल शस्त्रास्त्र की दृष्टि से देखें, तो इस हफ्ते दोनों देशों ने जिन दो प्रकार के हेलिकॉप्टरों के सौदों पर हस्ताक्षर किए हैं, उनकी तुलना में आने वाले समय में भारत ऐसी तकनीक प्राप्त करने जा रहा है, जो अमेरिका किसी को नहीं देता। इनमें सशस्त्र ड्रोन भी शामिल हैं।

ये ड्रोन नौसेना, वायुसेना और थलसेना तीनों के लिए प्राप्त किए जाएँगे। इनकी संख्या और कीमत के विवरण तैयार किए जा रहे हैं, पर भारत इन्हें हासिल करेगा, यह बात डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में कही है। 

अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स के एमक्यू-9 या प्रिडेटर-बी ड्रोन को लेकर दोनों देशों के बीच लंबे समय से बातचीत चल रही है। भारतीय नौसेना का आग्रह रहा है कि हिंद महासागर में गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हाई अल्टीट्यूड लांग एंड्युरेंस (एचएएलई) ड्रोन की जरूरत है। नौसेना को इस समय ड्रोन के अलावा अच्छे माइन स्वीपर पोतों और एंटी सबमरीन कार्रवाइयों के लिए पी-8आई विमानों की ज़रूरत है।

भारतीय नौसेना का पी-8आई

विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वर्ष के अंत तक 3 अरब डॉलर की लागत से 30 ड्रोन की खरीद का सौदा होना संभव है। यानी तीनों सेनाओं के लिए 10-10 ड्रोन खरीदे जा सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन इसकी स्वीकृति दे चुका है। ये ड्रोन तीनों सेनाओं की आवश्यकताओं के अनुरूप उपकरणों से लैस होंगे।

इस सिलसिले में एक्सेप्टेंस ऑफ नैसेसिटी (एओएन) पत्र शीघ्र ही जारी हो जाएगा। जिन ड्रोनों की खरीद की बात चल रही है वे 40,000 फुट की ऊँचाई पर लगातार 35 घंटे तक उड़ान भरने में समर्थ हैं और उनपर करीब ढाई टन के शस्त्रास्त्र तैनात किए जा सकते हैं। जून 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा को दौरान अमेरिकी प्रशासन ने इनपर स्वीकृति दे दी थी। 

सामरिक कारण

भारत और अमेरिका के भावी रिश्तों की दिशा समझने के लिए एक नज़र अतीत पर डालनी होगी। सन 1998 के नाभिकीय परीक्षणों के बाद दोनों देशों के संबंध बहुत खराब हो गए थे। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण हमारे तेजस विमान के विकास में बाधाएँ पड़ीं और अंतरिक्ष अनुसंधान के कार्यक्रम भी प्रभावित हुए। दूसरी तरफ दोनों के बीच उस दौरान गंभीर विचार-विमर्श भी हुआ और शीत युद्धोत्तर विश्व की वास्तविकताओं के परिप्रेक्ष्य में अपनी भूमिकाओं को समझने की कोशिश भी की गई। 

राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर के कार्यकाल में आधुनिक भारत-अमेरिका रक्षा-संबंधों की बुनियाद पड़ी। इसमें दो बातों की बड़ी भूमिका थी। एक, अमेरिका पर 9/11 को हुए आतंकी हमले और चीन के उदय ने अमेरिकी प्रतिष्ठान को सोचने पर मजबूर कर दिया। उसी दौर में भारत-अमेरिका रक्षा समझौता और फिर उसके बाद नाभिकीय समझौता हुआ। बुश के बाद बराक ओबामा और अब डोनाल्ड ट्रंप भी उसी रणनीति पर चल रहे हैं। 

मूलतः ये रिश्ते सामरिक कारणों से ही विकसित हुए हैं और अब इसके व्यापारिक आयाम विकसित होने का अवसर आ रहा है। इस दौरान अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्य बनाने का समर्थन किया।

नाभिकीय शक्ति से जुड़ी चार संस्थाओं में भारत की सदस्यता सुनिश्चित करने भरोसा भी अमेरिका ने दिलाया। ये हैं न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम, 41 देशों का वासेनार अरेंजमेंट और चौथा है ऑस्ट्रेलिया ग्रुप। ये चारों समूह सामरिक तकनीकी विशेषज्ञता के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। एनएसजी की सदस्यता चीनी प्रतिरोध के कारण अभी तक नहीं मिल पाई है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता में भी चीनी अवरोध है। 

सहयोग की पृष्ठभूमि

भारत के बदलते रक्षा-राजनय की भूमिका 15 साल पहले सन 2005 में हुए भारत-अमेरिका सामरिक सहयोग समझौते से बन गई थी, जिसे अब 10 साल के लिए और बढ़ा दिया गया है। उसी वर्ष दोनों देशों के बीच विज्ञान और तकनीकी सहयोग का समझौता भी हुआ था।

यों सामरिक सहयोग की शुरुआत सन 1992 से हो गई थी, जब दोनों देशों की नौसेनाओं ने ‘मालाबार युद्धाभ्यास’ शुरू किया था। सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के एक साल बाद। 1998 के एटमी परीक्षण के बाद मालाबार युद्धाभ्यास भी बंद हो गया, पर 11 सितंबर 2001 को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर हुए हमले के बाद दोनों देशों की विश्व-दृष्टि में बदलाव आया। सन 2002 से यह युद्ध अभ्यास फिर शुरू हुआ और भारत धीरे-धीरे अमेरिका के महत्वपूर्ण सहयोगी के रूप में उभर रहा है। 

सन 2002 के बाद से भारत, जापान और अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय सामरिक संवाद चल रहा है। सन 2007 में शिंजो एबे की पहल पर अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के बीच ‘क्वाड्रिलेटरल डायलॉग’ शुरू हुआ है। यह संवाद अभी परिभाषा के दौर में है।

चीन ने जिबूती में अपना सैनिक अड्डा बना लिया है। श्रीलंका और मालदीव में उसने अपनी गतिविधियाँ बढ़ाई हैं। इन बातों के बरक्स भारतीय गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं और बढ़ेंगी। अमेरिका ने भारत को मेजर डिफेंस पार्टनर घोषित किया। इस समझौते के तहत भी रक्षा-तकनीक के हस्तांतरण की व्यवस्थाएँ हैं। 

तकनीकी हस्तांतरण

भारत केवल हथियार ही नहीं खरीदेगा, उनकी तकनीक का हस्तांतरण भी चाहता है। इतना ही नहीं भविष्य में शस्त्रास्त्र बाजार में अपनी उपस्थिति भी। अमेरिका के साथ 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (लेमोआ) के बाद कम्युनिकेशंस कंपैटिबिलिटी एंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट (कोमकासा) हुआ।

यह समझौता 10 साल के लिए हुआ है। इसके माध्यम से अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमांड और भारतीय नौसेना के बीच संपर्क कायम हुआ है। भारत ने अपना एक अटैशे (प्रतिनिधि) बहरीन में नियुक्त किया है, जो अमेरिकी सेना के साथ समन्वय बनाएगा। 

अब बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (बेका) और होने वाला है। इस समझौते के बाद दोनों देशों को सैटेलाइट तथा अन्य माध्यमों से प्राप्त सामरिक सूचनाएँ रियल टाइम में एक-दूसरे को मिलने लगेंगी। दोनों देशों के बीच समुद्री बंदरगाहों के इस्तेमाल तथा अन्य सुविधाओं में सहयोग करने के समझौते भी हैं। भारत की नौसेना अब दक्षिण चीन सागर तक जा रही है। वहाँ हमें अमेरिकी सहयोग की ज़रूरत होगी। 

रूसी तकनीक

भारत एक तरफ अमेरिका के साथ सामरिक समझौते कर रहा है, वहीं उसकी रूस से दूरी बढ़ती नज़र आ रही हैं। पर यह इतना सरल नहीं है, जितना नज़र आ रहा है। भारत की सामरिक शक्ति का तीन-चौथाई भाग रूसी तकनीक पर आश्रित रहा है। भले ही अब उसमें कमी आई हो, पर वह एकदम से समाप्त भी नहीं हो सकता। तमाम गोपनीय कोड और सूचनाएँ रूसी हैं।

अमेरिका के साथ उन्हें न तो हाथों-हाथ जोड़ा जा सकता है और न मिटाया जा सकता है। आज भी भारत को जो तकनीक चाहिए, वह पूरी तरह अमेरिकी भरोसे पर पूरी नहीं हो सकती। मसलन हवाई हमलों से रक्षा के लिए भारत जिस एस-400 प्रणाली को खरीद रहा है, उसके समकक्ष अमेरिकी प्रणाली एक तो उतनी प्रभावशाली नहीं है, दूसरे वह काफी महंगी है। भारत ने अमेरिका के सामने यही दलील दी है कि हमारे सामने विकल्प क्या है?

एस-400 विमान के कुछ अंग

ट्रंप की इस यात्रा के ठीक पहले की खबर थी दिल्ली की सुरक्षा के लिए भारत अमेरिका की एनएएसएएमएस-2 हवाई सुरक्षा प्रणाली खरीद सकता है। दिल्ली के सुरक्षा कवच की तीन परतें तैयार हो रही हैं। सबसे भीतर अमेरिकी प्रणाली, उसके बाहर भारत की ‘आकाश’ प्रणाली और उसके बाहर रूस की एस-400 प्रणाली काम। यह एक नया सामरिक गणित है, जो भारतीय विदेश नीति की दिशा को भी बताता है। पर इसमें दो राय नहीं कि भारत सामरिक दृष्टि से अब अमेरिकी खेमे में है। 

हाल में लखनऊ में हुए डेफएक्सपो-2020 में अमेरिका ने सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। एमएमआरसीए कार्यक्रम के तहत राफेल सौदा रद्द होने के बाद अब अमेरिका चाहता है कि उसके एफ-21 या एफए-18 विमान को भारत स्वीकार करे। हाल में खबर है कि अमेरिका ने बोइंग के लड़ाकू विमान एफ-15ईएक्स की पेशकश भी भारत से की है। नौसेना के लिए 57 लड़ाकू विमानों का सौदा भी शायद अमेरिका को मिलेगा। 

‘टू प्लस टू’ वार्ता 

गत दिसंबर में दोनों देशों के बीच दूसरी ‘टू प्लस टू’ वार्ता हुई, जिसमें भारत की तरफ से राजनाथ सिंह और एस जयशंकर तथा अमेरिका की तरफ से माइकेल पॉम्पियो तथा मार्क टी एस्पर शामिल हुए। हालाँकि ‘टू प्लस टू वार्ता’ का दायरा काफी बड़ा है, पर मूलतः इसमें टकराव के बिंदुओं के समाधान की कोशिश की जाती है। इसमें रूस और ईरान के मुद्दे भी उठे हैं। 

चीन की बेल्ट एंड रोड पहल के समांतर अमेरिका ने ब्लू डॉट नेटवर्क (बीडीएन) पहल शुरू की है, जिसमें जापान और ऑस्ट्रेलिया को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निजी निवेश को बढ़ावा देना है। भारत के साथ चारों देशों की चतुष्कोणीय सुरक्षा योजना क्वाड धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है।