भारती
रक्षा आधुनिकीकरण- 21वीं सदी के लिए तैयार हो रही भारतीय सेना

नई सरकार के गठन के बाद देश का ध्यान रक्षा तैयारियों की ओर गया है। खासतौर से तीनों सेनाओं के लिए आवश्यक उपकरणों के क्रय की ओर। पहले से चल रही अनेक परियोजनाएँ अलग-अलग चरणों में हैं। अपेक्षा है कि अगले कुछ महीनों में कुछ बड़े निर्णय होंगे। रक्षा तैयारियों के सिलसिले में तीन महत्त्वपूर्ण काम इन दिनों हो रहे हैं। पहला है आवश्यक उपकरणों की खरीद, दूसरा है तकनीकी रूपांतरण और तीसरा है सेना का संरचनात्मक पुनर्गठन। 

भारतीय सैनिक प्रतिष्ठान बड़े परिवर्तन के द्वार पर खड़ा है। कुछ महीने पहले घोषित ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ मॉडल ‘मेक इन इंडिया’ पहल के केंद्र में है। इसपर ही नई पनडुब्बियों, हेलिकॉप्टरों और फाइटर विमानों के कार्यक्रम निर्भर हैं। दो परियोजनाएँ ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ मॉडल पर शुरू भी हुईं हैं। एक परियोजना रक्षा पनडुब्बियों की है। नई पीढ़ी की पनडुब्बियों के निर्माण की परियोजना विचाराधीन है। पनडुब्बी एक्शन प्लान सन 1999 में घोषित किया गया था और वह बरसों पीछे चला गया है। इस प्लान के तहत एक भी पनडुब्बी अभी तक नौसेना में शामिल नहीं हुई है। 

उपकरणों की आवश्यकता

तीनों सेनाओं को करीब 800 हेलिकॉप्टरों की आवश्यकता है। इस दिशा में पहला कदम रिक्वेस्ट फॉर इनफॉर्मेशन (आरएफआई) होता है। नौसेना के लिए 234 हेलिकॉप्टरों का आरएफआई जारी हो चुका है। वायुसेना और नौसेना के लिए भारत-रूस संयुक्त उपक्रम के रूप में 197 कामोव 226-टी हेलिकॉप्टरों का उत्पादन शुरू होने वाला है। अगले 10 वर्षों में वायुसेना के लिए 400 फाइटर जेट विमानों की आवश्यकता है। रक्षा मंत्रालय ने विदेशी सहयोग से 100 सिंगल इंजन जेट विमानों के निर्माण को स्वीकार कर लिया है। इसी तरह 120 स्वदेशी फाइटर जेट तेजस के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च हो चुके हैं। 

सेना का फील्ड आर्टिलरी अभिनवीकरण प्लान सन 1999 में तैयार हुआ था। इसके तहत सन 2027 तक हमें 2,800 तोपें हासिल करनी हैं। यह रक्षा परियोजना अपने समय से बरसों पीछे चल रही है। अभी तक 145 अल्ट्रा लाइट हॉविट्जरों की डिलीवरी शुरू हुई है। इसके अलावा 100 ट्रैक्ड सेल्फ प्रोपेल्ड तोपों के अनुबंध पर दस्तखत हुए हैं। अभी पाइपलाइन में 1,580 टोड तोपों, 814 ट्रक माउंटेड तोपों, 180 पहियों वाले सेल्फ प्रोपेल्ड तोपों की खरीद के प्रस्ताव हैं। पिछले छह महीनों में एटीएजी और धनुष तोपों को सेना में शामिल किया गया है। अब रक्षा मंत्रालय को शेष काम तेजी से करने होंगे। 

संगठनात्मक बदलाव

इसके समानांतर सेना के पुनर्गठन का काम हो रहा है। विभिन्न चरणों में हो रहे इन बदलावों का लक्ष्य है कि वह चुस्त-दुरुस्त बनने के साथ तेजी से कार्रवाई करने वाली 21वीं सदी की सेना के रूप में विकसित हो। सेना के भीतर बहुत से ऐसे काम जो अलग-अलग संगठन कर रहे हैं, उन्हें एक स्थान पर करने के लिए कुछ संगठनों का विलय किया जा रहा है। छोटे और त्वरित गति से होने वाले युद्धों को संचालित करने के लिए सेना का सही आकार रखने और युद्ध से जुड़ी यूनिटों के समन्वय का काम करने की व्यवस्था भी की जा रही है। 

सेना के भीतर अब कम उम्र को कमांडरों की नई अवधारणा को स्थापित किया जा रहा है। इससे सेना का वज़न कम होगा और आकार सही होगा। करीब 13 लाख सैनिकों की इस सेना ने अपनी रणनीतियों में बदलाव किया है, पर इसका आकार और उस सीमित बजट से मेल नहीं खाता, जो शासन ने आवंटित किया है। चीन ने तीन साल पहले अपनी सेना के पुनर्गठन का काम कर लिया है। इस कार्यक्रम को लागू करने के बारे में पिछले साल अक्तूबर में हुए कमांडरों के सम्मेलन में विचार किया गया था। अब उसकी कुछ चीजें लागू की जा रहीं हैं। उस वक्त करीब दो-दर्जन सिफारिशों पर विचार किया गया था। 

यह तय किया गया है कि सिफारिशों के सभी ऑपरेशनल पहलुओं, मसलन एक इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप के गठन का परीक्षण युद्धाभ्यास के दौरान किया जाएगा। छह बटालियनों पर एक इंटीग्रेटेड बैटल ग्रुप में इनफेंट्री, आर्मर्ड और आर्टिलरी की मिली-जुली भूमिका होगी। इसकी कमांड एक मेजर जनरल के पास होगी, जिसे सीधे कोर के अधीन रखा जाएगा। 

तकनीकी रूपांतरण

सन 2008 में मुंबई, फिर 2016 में पठानकोट, उड़ी और इस साल पुलवामा की घटनाओं के कारण देश में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है। ऐसा कुछ उसके पहले 1999 में करगिल युद्ध के बाद हुआ था। पिछले दो दशक में युद्ध और रक्षा के तौर-तरीकों में काफी बदलाव आया है। अब लंबी लड़ाइयों का वक्त नहीं है। अधिकांश युद्ध छोटे होंगे और उनमें तकनीक की अधिक भूमिका होगी। सेनाओं का सामना अब छाया-युद्धों से है, जैसा कश्मीर में पाकिस्तानी इशारे पर चल रहा है। 

गत 26 फरवरी को बालाकोट में जैश के ट्रेनिंग सेंटर पर हवाई हमला कुछ मिनटों में पूरा हो गया। आने वाले वक्त की लड़ाई में शामिल सारे योद्धा परंपरागत फौजियों जैसे वर्दीधारी नहीं होंगे। काफी लोग कंप्यूटर कंसोल के पीछे बैठकर काम करेंगे। काफी लोग नागरिकों के भेस में होंगे, पर छापामार सैनिकों की तरह महत्त्वपूर्ण ठिकानों पर हमला करके नागरिकों के बीच मिल जाएँगे। काफी लोग ऐसे होंगे जो अराजकता का फायदा उठाकर अपने हितों को पूरा करेंगे। 

अक्तूबर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौसेना, वायुसेना और थलसेना के कमांडरों को संबोधित करते हुए कहा कि अब अंतरिक्ष पर नियंत्रण बनाए रखने की आवश्यकता है। जिस तरह भूमि, हवा और सागर पर नियंत्रण आवश्यक है, उसी तरह अब अंतरिक्ष पर नियंत्रण भी अनिवार्य है। अब पूर्ण युद्धों की सम्भावनाएँ कम होती जाएँगी और सेना की भूमिका निरोधक (डेटरेंट) और आचरण को प्रभावित करने की हो जाएगी। युद्धों की अवधि कम हो जाएगी। 

डिफेंस स्पेस एजेंसी

सरकार ने तीनों सेनाओं के स्पेस से जुड़ी गतिविधियों के संचालन के लिए डिफेंस स्पेस एजेंसी बनाने का फैसला किया है। इसके तहत एंटी-सैटेलाइट अस्त्रों का काम होगा साथ ही अपने प्लेटफॉर्मों तथा एसेट्स की रक्षा का दायित्व भी इनका होगा। सन 2012 में नरेश चंद्रा समिति ने राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तीन नए कमांड स्पेशल ऑपरेशंस, सायबर और स्पेस के गठन का सुझाव दिया था। इस समिति को सरकार ने इस विषय पर सुझाव देने की जिम्मेदारी दी थी कि दुनिया में तेजी से बदलते युद्ध-परिदृश्य में देश के सुरक्षा प्रबंधन में उच्च-स्तर पर किस प्रकार की फाइन ट्यूनिंग की जाए।

अप्रेल 2013 में इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ, नई दिल्ली ने ‘टेक्नोलॉजी पर्सपेक्टिव एंड कैपेबिलिटी रोडमैप’ नाम से एक दस्तावेज प्रकाशित किया। इस दस्तावेज में इस बात का बुनियादी विचार पेश किया गया था कि भारतीय सेनाएं अगले पंद्रह वर्ष में आधुनिकीकरण की किस तरह की प्रक्रिया से गुज़रने की योजना बना रही हैं। इसमें जितनी अवधारणाओं और शस्त्र प्रणालियों का विवेचन किया गया था, उससे इस बात की झलक मिल जाती है कि सेनाओं का डिजिटल रूपांतरण एक वास्तविकता है। 

आईटी और कंप्यूटर के क्षेत्र में संवृद्धि इतनी तेजी से हो रही है कि सेनाओं के पास डिजिटल रूपांतरण को तेजी से सुनिश्चित करने के अलावा, दूसरा विकल्प ही नहीं है। विकसित देशों के सैनिक प्रतिष्ठान डिजिटल माहौल में काम करने लगे हैं। आधुनिक युद्धक्षेत्र को अब डिजिटल-युद्धक्षेत्र कहा जाने लगा है। 

नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर

इन दिनों तीनों सेनाओं के बीच सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द है नेटवर्क-सेंट्रिसिटी। युद्धपोत हों या पनडुब्बियाँ, टैंक या फाइटर जेट विमान या पैदल सैनिक सब किसी न किसी नेटवर्क से जुड़े हैं या जुड़ रहे हैं। वे सभी संचार और नेवीगेशन उपग्रहों से जुड़े होते हैं। नेटवर्क्ड युद्धक्षेत्र में निर्णय तुरंत होने चाहिए, इसलिए ऐसे सिस्टम्स ज़रूरी हैं। सन 2017 के तीनों सेनाओं के संयुक्त डॉक्ट्रिन में भारतीय सेना के विभिन्न निदेशक सिद्धांतों का विवरण दिया गया है। इसमें बदलते युद्धक्षेत्र और एकीकृत सामरिक संरचना की आवश्यकता को साफ तौर पर बताया गया है। 

पिछले दसेक साल में भारतीय वायुसेना ने नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध-क्षमता हासिल करने में लंबी छलांग लगाई है। उसके पास अपना उपग्रह है, विशेष ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क है, जिसके कारण अब वह जमीन पर तैनात सैनिकों, विमानों और हेलिकॉप्टरों के पायलटों, समुद्र में विचरण कर रहे युद्धपोतों और पनडुब्बियों के कैप्टनों को रियल टाइम वीडियो और तस्वीरें उपलब्ध कराने में समर्थ है।

नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर सेना को कंप्यूटरों की प्रोसेसिंग क्षमता और नेटवर्किंग संचार तकनीक की मदद से जानकारियाँ शेयर करने का जरिया है। इस जानकारी से कमांड, कंट्रोल का साझा अनुभव होत है, जिससे निर्णय करने, रणनीतियाँ बनाने, समन्वय करने और सुदूर सम्पर्क रखने और जटिल सैनिक ऑपरेशंस को अंजाम देने में मदद मिलती है। तीनों सेनाओं को इसकी आवश्यकता है। खासतौर से वायुसेना और नौसेना को नेटवर्क-सेंट्रिसिटी की काफी आवश्यकता है। थलसेना को युद्धक्षेत्र के हाल जानने की आवश्यकता होती है। उसके यूएवी लाइव तस्वीरें प्रेषित करने में समर्थ हैं। वे खासतौर से तोपखाने को अचूक गोलाबारी के लिए भौगोलिक स्थिति का पता बताते हैं। इतना ही नहीं ब्रह्मोस जैसे मिसाइलों को दागने के लिए इस प्रकार की सूचनाओं की आवश्यकता होती है। यूएवी यह जानकारी देते हैं। 

सैनिक उपग्रह

वायुसेना, नौसेना और थलसेना की सामर्थ्य को बढ़ाने के लिए सैनिक उपग्रहों की आवश्यकता भी है। पिछले वर्ष दिसम्बर में भारत ने अपने दूसरे सैनिक उपग्रह जीसैट-7ए का प्रक्षेपण किया। पहला उपग्रह रुक्मिणी-जीसैट-7-सितम्बर 2013 में प्रक्षेपित किया गया था। इन दो के अलावा एक दर्जन के आसपास ऐसे उपग्रह और हैं, जो सर्विलांस का काम कर रहे हैं और अंतरिक्ष से तस्वीरें भेज रहे हैं। जीसैट-7ए मुख्यतः वायुसेना के लिए और आंशिक रूप से थलसेना के लिए काम करेगा। एक संचार उपग्रह लाइव फीड उपलब्ध कराता है और सैकड़ों किलोमीटर दूर उड़ान भर रहे विमान के साथ संपर्क बनाए रखने में मददगार होता है। 

रुक्मिणी का इस्तेमाल नौसेना करती है। यह उपग्रह अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और मलक्का जलडमरूमध्य के संकरे मार्ग पर नजर रखता है। जीसैट-7ए वायुसेना के विभिन्न ग्राउंड रेडार स्टेशनों, ग्राउंड एयरबेस आकाश में उड़ान भर रहे एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंट कंट्रोल (अवॉक्स) विमानों को जोड़कर रखता है।  

भारत का अपना ग्लोबल पोज़ीशनिंग सिस्टम (जीपीएस) देश के सामरिक हितों से जुड़े क्षेत्र को कवर करता है। यानी कि पश्चिम में होर्मुज की खाड़ी से लेकर मलक्का की खाड़ी के पूर्व तक। आईआरएनएसएस नाम से सात उपग्रहों का समुच्चय अंतरिक्ष में काम कर रहा है और एस-बैंड पर इसके सिग्नल अचूक नेवीगेशन की सुविधा प्रदान कर रहे हैं। 

यूएवी का इस्तेमाल

दुश्मन की निगहबानी करने या सम्भावित हमले से बचाव करने में अनमैंड एरियल वेहिकल्स (यूएवी) के इस्तेमाल से युद्धक्षेत्र का नक्शा बदलता जा रहा है। यूएवी की कई तरह की भूमिकाएँ हैं। वे हथियार ले जा सकते हैं, सर्विलांस कर सकते हैं, मिसाइलों को दिशा-निर्देश दे सकते हैं, लाइव वीडियो फीड प्रदान कर सकते हैं और यहाँ तक कि दो यूनिटों के बीच संचार के ट्रांज़िट पॉइंट का काम भी कर सकते हैं।

यूएवी

अगले एक दशक में भारतीय सेनाओं को करीब 3,000 अनमैंड एरियल प्लेटफॉर्म्स की ज़रूरत होगी। इनमें सशस्त्र और निःशस्त्र दोनों प्रकार के यूएवी होंगे। जैसे-जैसे इनकी नई भूमिकाएं तय होती जाएंगी और भारतीय सेनाओं की भूमिका बढ़ेगी, यूएवी के काम का दायरा भी बढ़ता जाएगा। ये यूएवी सटीक इंटेलिजेंस और अचूक प्रहार-क्षमता की क्षमता प्रदान करेंगे।

रक्षा मंत्रालय मीडियम अल्टीट्यूड लांग एंड्युरेंस श्रेणी के यूएवी खरीदने पर विचार कर रहा है। यह परियोजना ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत भारतीय कम्पनियों के लिए होगी। डीआरडीओ का रुस्तम-2 इसी श्रेणी का यूएवी है। यह भी प्रत्याशी है। डीआरडीओ इस यूएवी की परीक्षण उड़ानें कर चुका है। अडानी डिफेंस ने इजरायली कम्पनी एल्बिट के साथ समझौता किया है। इन्होंने हैदराबाद में एक निर्माण केंद्र स्थापित किया है। 

देश को करीब 1500 मिनी यूएवी की आवश्यकता है। भारतीय सेना ने बटालियन स्तर तक को यूएवी से लैस करने की योजना बनाई है। वायु सेना ने सर्विलांस यूएवी का पूरा स्क्वॉड्रन तैयार करने का विचार किया है। नौसेना ने अपने युद्धपोतों के डैक पर यूएवी तैनात करने का कार्यक्रम बनाया है। नौसेना और कोस्टगार्ड को पोतों पर आधारित 50 मिनी यूएवी की आवश्यकता है। इनकी ज़रूरत समुद्री मार्गों की मॉनिटरिंग, संचार, सर्च एंड रेस्क्यू तथा एंटी-पायरेसी भूमिकाओं के लिए होगी। इन यूएवी के अलावा प्रिडेटर ड्रोन की तैनाती से पी-8आई और एंटी सबमरीन वॉरफेयर हेलिकॉप्टरों के माध्यम से समुद्री गश्त के काम को बेहतर बनाया जा सकेगा। 

हथियारबंद ड्रोन

हाल की खबर है कि अमेरिका से 30 हथियारबंद सी गार्जियन (या प्रिडेटर बी) ड्रोन खरीदने का फैसला हो गया है। ये 10-10 ड्रोन तीनों सेनाओं के लिए खरीदे जाएँगे। इस सौदे को अभी रक्षा खरीद परिषद की मंजूरी की जरूरत होगी। नौसेना को हिंद महासागर में सर्विलांस के लिए भी ड्रोन चाहिए। ये ड्रोन लगातार 24 घंटे तक बगैर दुबारा ईंधन भरे उड़ान भर सकते हैं और 50,000 फुट की ऊँचाई पर उड़ान भर सकते हैं। 

नौसेना ऑटोनॉमस अंडरवॉटर वेहिकल्स (एयूवी) हासिल करने के बारे में विचार कर रही है। ये वाहन एक प्रकार से मिनी चालक रहित पनडुब्बियाँ हैं, जिनका इस्तेमाल खास तरह के समुद्री-अभियानों में किया जाता है। नौसेना इनका इस्तेमाल एंटी-सबमरीन युद्धों, माइन काउंटर मैजर्स, इंटेलिजेंस, सर्विलांस और रिकोनेसां (टोही) अभियानों तथा समुद्र-विज्ञान से जुड़े तथ्यों के संकलन के लिए करना चाहती है। 

चूँकि भारतीय नौसेना को अब हिंद महासागर में ज्यादा बड़ी भूमिका निभानी है, इसलिए ज्यादा लंबे समय तक काम करने वाले सिस्टम्स की व्यावहारिक जरूरत समझ में आती है। भारतीय कम्पनियों ने इस सिलसिले में काफी सफलता प्राप्त की है और वे अपने एयूवी विकसित कर रहीं हैं। डीआरडीओ और नेशनल टेक्नीकल लैबोरेटरी (एनएसटीएल) के एयूवी के भी परीक्षण हुए हैं। इनका परीक्षण नौसेना ने किया है।