भारती
रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक पदों पर सैन्य अधिकारियों की नियुक्ति सामयिक व तर्कसंगत

देश के रक्षा मंत्रालय में पहली बार संयुक्त सचिव पद पर सैन्य अधिकारियों को नियुक्त किया जाएगा। ये सभी थल, जल और वायु सेना के मेजर जनरल रैंक या समकक्ष अधिकारी होंगे। इससे जुड़ा प्रस्ताव सरकार के पास भेजा गया है।

इस सिलसिले में फैसला कैबिनेट को करना होगा, क्योंकि संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के पदों की नियुक्ति के फैसले कैबिनेट ही करती है। भारत सरकार के वरीयता क्रम में संयुक्त सचिव का स्थान 26वाँ होता है, सेना के मेजर जनरल के बराबर। 

इस निर्णय के पीछे विचार है कि सैनिक अधिकारी अपने बलों से संबद्ध प्रशासनिक कार्य देखेंगे। एक अर्थ में यह बड़ा बदलाव है। इसके लागू होने के बाद सेना की आंशिक प्रशासनिक भूमिका की शुरुआत हो जाएगी, जिसकी माँग वर्षों से की जा रही थी।

पश्चिमी देशों की तरह भारत में भी सेना की भूमिका गैर-राजनीतिक है। देश के राष्ट्रपति सेना के सुप्रीम कमांडर हैं और उससे जुड़े सभी मामलों पर निर्णय नागरिक (सिविल) प्रशासन करता है। 

नागरिक नियंत्रण

आधुनिक समय में कमोबेश यह व्यवस्था अधिकतर देशों में है, और हमारी सेना भी नागरिक नियंत्रण को आवश्यक मानती है। पर हमारे देश में प्रशासन और सेना के बीच की दूरी अपेक्षाकृत ज्यादा है। माना जाता है कि प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों से उसकी सायास दूरी के पीछे राजनीतिक प्रतिष्ठान के मन में बैठा भय था।

एक अरसे तक भारत के राजनीतिक नेतृत्व के मन में बगावत का भय था। भारत के पड़ोस में पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में ऐसा हुआ भी। सन 1962 के युद्ध के दौरान राजनीतिक गफलत के अनेक प्रसंग आज भी याद किए जाते हैं। उसके पहले और राजनीतिक नेतृत्व के बीच के विवाद के प्रसंग आज भी याद किए जाते हैं।

जनरल केएस थिमैया 

इन सब बातों के अलावा सैनिक और नागरिक प्रशासन के बीच एकीकरण की समस्या सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह समस्या तीनों सेनाओं के समन्वय को लेकर भी है। हाल के वर्षों में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के पद की ज़रूरत भी इसीलिए हुई, क्योंकि आधुनिक युद्धों में सैनिक समन्वय सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बनकर उभरा है।

इसलिए ऐसी प्रशासनिक संरचना की आवश्यकता है, जिसमें राजनीतिक नेतृत्व और नागरिक तथा सैनिक प्रशासन के बीच संतुलित समन्वय स्थापित हो सके। यह निर्णय उसी दिशा में एक बड़ा कदम है। 

डीएमए का गठन

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति के अलावा शासन ने एक और निर्णय किया है। यह निर्णय है रक्षा मंत्रालय के अधीन सैन्य कार्यों के विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ मिलिट्री अफेयर्स यानी डीएमए) की स्थापना का।

रक्षा मंत्रालय के अधीन अब डीएमए की संरचना भी धीरे-धीरे सामने आ रही है। इस विभाग में अतिरिक्त और संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्तियों के लिए सीडीएस जनरल बिपिन रावत ने इस आशय का प्रस्ताव सरकार के पास भेजा है।

देश की थलसेना, वायुसेना और नौसेना के अधिकारी इन पदों पर नियुक्त किए जाएँगे। जनरल बिपिन रावत की अगुवाई में डीएमए के अधिकारी संसद के सामने अपने कार्यों का ब्योरा पेश करेंगे। 17 फरवरी से शुरू होने वाली संसद की स्थायी समिति की बैठक में विभाग के प्रस्तुतिकरण की तैयारियाँ भी हो रही हैं। 

विभिन्न सूत्रों से मीडिया में आई जानकारी के मुताबिक, मेजर जनरल टीएसए नारायणन, रियर एडमिरल आरके धीर और एयर वाइस मार्शल एसके झा का नाम संयुक्त सचिव पद के लिए सरकार के पास अनुमोदन के लिए भेजे गए हैं। इनके अलावा अतिरिक्त सचिव के पद पर लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव भी है।

टीएसए नारायणन

सीडीएस में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी भी हैं। इनमें डीएमए में कार्यरत राजीव सिंह ठाकुर और शांतनु सहित अन्य नागरिक कर्मचारी हैं, जो वहाँ महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं। खबरें हैं कि युवा आईएएस अधिकारी डीएमए का हिस्सा बनना चाहते हैं।

विभागीय समन्वय

विभाग के पास कई प्रकार के कार्य होते हैं। दूसरे मंत्रालयों या अन्य विभागों के जरिए होने वाले कार्यों के अलावा संसद में पूछे गए प्रश्नों का जवाब देना होता है। सेना के तीनों अंगों से जुड़े कार्य डीएमए देख रहा है।

इनके अलावा रक्षा विभाग में संयुक्त सचिव (सशस्त्र बल) के पास शेष कार्य हैं। रक्षा मंत्रालय में डीएमए के अलावा चार विभाग और हैं। ये हैं रक्षा विभाग, रक्षा अनुसंधान, रक्षा उत्पादन और विकास तथा पूर्व सैनिकों का कल्याण। 

वस्तुतः ज्यादा महत्वपूर्ण फैसला सीडीएस की नियुक्ति का है। उसकी नियुक्ति के लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति का सवाल भी था, क्योंकि नौकरशाही के दबाव और राजनीतिक संशय इस फैसले को रोक रहे थे।

सशक्त सीडीएस की नियुक्ति के लिए उससे जुड़े कुछ दूसरे बड़े निर्णयों की ज़रूरत थी। भारत सरकार ने एलोकेशन ऑफ बिज़नेस रूल्स (एओबी), 1961 और ट्रांजैक्शन ऑफ बिज़नेस रूल्स (टीओबी), 1961 में संशोधन किए हैं, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 77 के तहत राष्ट्रपति ने अधिसूचित कर दिया है और अब रक्षा मंत्रालय के अधीन सैनिक कार्यों के एक नए विभाग की नियुक्ति हो गई है। 

विशेषज्ञता की दरकार

संयुक्त सचिव पद पर सैनिक अधिकारियों की नियुक्ति के पीछे बुनियादी तौर पर विचार यह है कि विषय के अनुरूप विशेषज्ञता के लिए इसकी जरूरत है। यह केवल रक्षा से जुड़े मामलों की बात ही नहीं है। भारत सरकार ने पिछले कुछ समय से दूसरे विभागों में भी बाहरी विशेषज्ञों की नियुक्ति संयुक्त सचिव के पदों पर करने की मुहिम शुरू की है। प्रशासनिक व्यवस्था को चुस्त बनाने और गति प्रदान करने के लिए इसकी जरूरत महसूस की गई है। 

हांगकांग की संस्था पोलिटिकल एंड इकोनॉमिक रिस्क कंसल्टेंसी भारतीय नौकरशाही को बार-बार एशिया की सबसे खराब व्यवस्थाओं में शामिल करती रही है। रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर और राज्यसभा के मनोनीत सदस्य विमल जालान ने सुझाव दिया था कि संयुक्त सचिव पद के समकक्ष नियुक्तियों को खुला रखा जाए, यानी बाहरी विशेषज्ञों की नियुक्ति भी की जाए।

मोदी सरकार के आने के बाद नीति आयोग ने भी उच्च शासकीय पदों पर विशेषज्ञों की लेटरल एंट्री को बढ़ावा देने की बात कही है। ऐसा करने से उनके अनुभव का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जा सकेगा। सन 2018 में जब मोदी सरकार ने संयुक्त सचिव पद पर बाहर से नियुक्तियाँ करने का फैसला किया, तब यही बात कही गई थी कि बाहर से विशेषज्ञों को शासन का हिस्सा बनाया जाए। 

तब यह भी कहा गया कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी सरकार में बाहर से आए थे। इसके बाद पिछले साल देश में पहली बार निजी क्षेत्रों के नौ विशेषज्ञों को केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में संयुक्त सचिव के पदों पर तैनाती के लिए चुना गया। एक प्रकार से यह निर्णय प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक कदम है। सैनिक अधिकारी अपने विषय के विशेषज्ञ हैं और उनकी सहायता से प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर ही होगी। 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे @pjoshi23 द्वारा ट्वीट करते हैं।