भारती
अफीम की खेती की जटिलताएँ- नियमों में कुछ बदलाव लेकिन किसान की समस्या बड़ी

औषधि के लिए उपजाए जाने वाली अफीम की खेती में तस्करों की संख्या बढ़ती जा रही है। कभी मालवा के क्षेत्र में शान-शौकत की खेती माने जाने वाली अफीम आज किसानों के लिए आफत बन गई है। तस्करों से एक तरफ किसान परेशान हैं तो दूसरी तरफ सरकार के लिए भी यह चिंता का विषय है।

दिनों-दिन बढ़ रही अफीम तस्करी के पीछे सरकारी तंत्र में गड़बड़ियाँ और किसानों का अधिक मुनाफा कमाने का लालच है। सरकार द्वारा दी जाने वाली कीमत और मादक पदार्थ के रूप में बिकने वाली अफीम की कीमत में ज़मीन-आसमान का अंतर है। परिणामस्वरूप मालवा ही नहीं राजस्थान, उत्तर प्रदेश, कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में इसके तस्करों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है।

अफीम की तस्करी का दीमक

खेती की ज़मीन के मुआयना से लेकर बीज रोपन और कटनी में सरकारी कर्मचारी ही मौजूद रहते हैं, उसके बाद भी तस्करी की बढ़ती संख्या ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

तस्करी के पीछे का कारण सरकार द्वारा किसानों से अफीम की खरीददारी है। सरकार किसानों से अफीम 2,100 रुपये प्रति किलोग्राम के मूल्य पर खरीदती है, जबकि वहीं तस्कर को 1 किग्रा बेचने पर 1 लाख से ऊपर की रकम मिलती है।

लगातार बढ़ती खेती की लागत से किसानों का तस्करी की ओर जाना समझ में आता है। तीन पीढ़ी से अफीम की खेती कर रहे मंदसौर के चिरौंद पिपलिया गांव के वल्लभ पाटीदार स्वराज्य  को बताते हैं, “10 आरी में फसल की बुवाई करने की लागत लगभग 60,000 रुपये है‌ और सरकार पूरे फसल की कीमत ही 14,000 रुपये देती है। अब बताइए, किसान तस्करी नहीं करेगा तो क्या करेगा?”

अफीम की तस्करी

तस्करी से इतर भी अफीम के इस गोरखधंधे में सरकारी महकमा भी संलिप्त है। अफीम की तौल से लेकर इसकी गुणवत्ता जाँच करने में सरकारी अफसर मोटी रकम वसूल करते हैं। इस काम में वे गाँव के ही कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों की सहायता लेते हैं।

इंडिया टुडे  की रिपोर्ट के अनुसार, अफीम की खेती में रिश्वतखोरी का एक बड़ा जाल फैला है। सिर्फ राजस्थान में ही 100 करोड़ रुपये से अधिक का रिश्वत अफीम की खेती में प्रत्येक साल ली जाती है। इसमें अधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधि तक शामिल रहते हैं।

अफीम पैदावार का मौसम अक्टूबर से शुरू होकर मार्च महीने तक रहता है। सरकार हर साल मौसम से पहले न्यूनतम उत्पादन मानदंड तय करती है। इस साल यह 45 किलो प्रति हेक्टेयर रखा गया था। यह मानदंड ही नियंत्रण प्रणाली की बुनियाद है, क्योंकि यदि एक किसान इतना पैदा नहीं कर पाता तो उसका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है।

दिसंबर से केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के अधिकारी खेतों को नापना शुरू करते हैं और यह काम छह हफ्ते चलता है। इस दौरान लाइसेंसधारी किसान और दो गवाह अधिकारी के साथ होते हैं। इसके बाद जिला अफीम अधिकारी वास्तविकता परखने के लिए खेतों से नमूने लेता है। यदि कोई लाइसेंसधारी किसान रिकॉर्ड में दर्ज रकबे से ज्‍यादा जमीन पर खेती करता पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस स्थायी तौर पर रद्द कर दिया जाता है।

सरकार अफीम पैदावार के लिए जिले स्तर पर सबसे पहले सर्वे कराती है। सर्वे के बाद फसल का मापदंड तैयारी करती है। तय मापदंड के बाद किसानों को उसका पट्टा दिया जाता है। यह प्रक्रिया बाहर से जितनी सरल लगती है, उतनी ही जटिल होती है। अफीम को एक नाज़ुक फसल माना जाता है, जिसके लिए अच्छे वातावरण की आवश्यकता होती है।

उत्पादन के साथ परेशानी

फसल उत्पादन के बाद अफीम फसलों के कई नियम किसानों के लिए परेशानी का कारण बन जाता है। नारकोटिक्स विभाग मापदंड के साथ ही उसके गुणवत्ता जाँच के भी कई भाग है। अगर किसान के फसल की गुणवत्ता खराब हो जाए तो उसे ‘बी ग्रेड’ में डाल दिया जाता है और उसके अनुसार बढ़े हुए अफीम किसान को देना पड़ता है।

फसल रख-रखाव और उसे बचाने में भी किसानों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। कभी प्राकृतिक आपदा तो कभी जानवरों द्वारा फसल का नुकसान कर दिया जाता है, जिसकी भारपाई भी किसानों को ही करनी होती है। फसल के लगने की प्रक्रिया के दौरान किसी भी तरह की चूक होने पर किसानों के ऊपर तस्करी का तलवार लटकी रहती है।

अफीम की फसल में मार्फिन की मात्रा ही उपज और आगे मिलने वाले पट्टे तय करती है। अगर अफीम में मार्फिन की मात्रा कम रहती है तो नारकोटिक्स विभाग अगली बार किसान को पट्टा नहीं देता है‌ ‌।

केंद्र सरकार अफीम फसलों की गुणवत्ता जाँच के लिए नए नियम बनाने जा रही है। केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि अब गुणवत्ता की भी जाँच तौलस्थल पर ही होगी, जिससे किसानों को परेशानी का सामना न करना पड़े।

बाएँ अनुराग ठाकुर, दाएँ राष्ट्रपति कोविंद

केंद्र सरकार ने इसके साथ ही नई अफीम नीति घोषित की है। नए नियमों के अनुसार किसानों को अब छह से 12 आरी (25 आरी में एक बीघा होता है) तक के पट्टे दिए जाएँगे।

सरकार ने अफीम के नीति में सबसे बदलाव करते हुए पट्टा देने का आधार मार्फिन को बनाया है। न्यूनतम मार्फिन औसत को 5.9 प्रति किलो हेक्टेयर से घटाकर 4.5 कर दिया है। इस बार जिन किसानों का मार्फिन औसत 4.5 तक आया, वे ही पट्टे के लिए पात्र होंगे। नई नीति में पट्टाधारी की मौत के बाद वारिस को पात्र माना जाएगा। 2017-18 व 2018-19 में पूरी पोस्ता फसल को हंकाई कराने वाले भी इस साल बोवनी के पात्र होंगे।

समस्या के लिए प्रभावी समाधान नहीं

अफीम की तस्करी सहित फसल लागत और क्रय का समाधान पूछने पर किसान यमुना दीन स्वराज्य  को बताते हैं, “इसका कोई स्थाई हल नहीं है, सरकार अगर कीमत बढ़ा भी दें तो तस्कर भी कीमत दुगुनी कर देंगे। इसमें कम पट्टे वाले किसान मारे जाएँगे।”

सरकार किसानों की सहूलियत के लिए हर बार नए नियम बनाती है, लेकिन कई नियम ज़मीन पर उतर नहीं पाते हैं और अगर उतर भी गए तो किसानों को उससे सहूलियत नहीं मिल पाती है।

मंदसौर-नीमच में अफीम किसानों के लिए 40 वर्षों से लड़ाई लड़ रहे अमृतलाल पाटीदार स्वराज्य  को बताते हैं, “अब यह मान लीजिए कि बस अफीम के किसान खेती से अपनी जीविका चला रहे हैं। पहले इसमें जो लाभ था, वो अब नहीं रहा।”

लाभ खत्म होने के कारण पूछने पर कहते हैं, ” मेरे यहाँ चार पीढ़ी से अफीम की खेती हो रही है। मैं 20 साल का था तबसे यह खेती कर रहा हूँ, लेकिन अब नियम बदल गए हैं। मेरे पूर्वज लोग 12 बीघा में इसकी खेती करते थे, लेकिन इसबार के नए नियम से खेती के लिए बस छह आरी मिलेगी।”

लगातार घट रही अफीम की खेती ने सरकार के सामने चुनौती खड़ी कर दी है। कभी लाभ की फसल माने जाने वाली अफीम की खेती पर संकट के बादल छा गए हैं। स्थिति यह है कि जिस अफीम खेती का पट्टा लेने के लिए किसान रात-रात भर जागते थे, अब वह इसके हानि को देखकर और इसके नियमों से तंग आकर सो गए हैं। मुनाफे की कमी और नियमों की मकरजाल ने किसानों को अफीम खेती के प्रति मोहभंग कर दिया है।