भारती
कोविड-19 से उत्पन्न शहरी स्वास्थ्य संकट क्यों है विकृत नीति प्राथमिकताओं का परिणाम

वैश्विक महामारी कोविड-19 के भारत में प्रभाव को विभिन्न स्तरों पर नीति विफलता के रूप में देखा जा सकता है। स्वास्थ्य सेवा इंफ्रास्ट्रक्चर में अपर्याप्त निवेश, थोक दवाइयों, टेस्टिंग किट और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीपीई) के लिए एक ही स्रोत (चीन) पर अत्यधिक आश्रित होना, सार्वजनिक परिवहन में दरिद्र निवेश और बुरी तरह से प्रबंधित शहरीकरण इस नीति विफलता के कुछ उदाहरण हैं।

भारत में कोरोनावायरस संक्रमितों की संख्या- शहरी परिवहन और बुरी तरह से प्रबंधित वृद्धि- मुख्य कारकों में से एक हैं जो इस महामारी के विरुद्ध हमारी लड़ाई को जटिल बना रहे हैं। इन विफलताओं पर विजय पाना ही भावी प्रगति और रोजगार के अवसरों की कुंजी है क्योंकि शहरी क्षेत्रों में ही रोजगार के अवसर उत्पन्न होते हैं।

इस बात में कोई संदेह न रहे कि भारत में कोविड-19 समस्या मुख्य रूप से एक नगरीय स्वास्थ्य संकट है। यह कोई राष्ट्रीय आपदा नहीं है, अपितु एक ऐसी आपदा है जो मुक्य रूप से शहरी क्षेत्रों में केंद्रित है।

अर्ध-नगरीय और ग्रामीण क्षेत्र जिनमें हाल में कोविड-19 के बढ़ते ग्राफ को देखा गया है, उसे मुख्य रूप से उलटे प्रवासन से समझाया जा सकता है। राष्ट्रीय शहरी लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिक अपने ग्रामों-नगरों की ओर लौटे हैं।

1 मई सुबह 9 बजे तक विभिन्न राज्यों के कोविड-19 मामले

बड़े शहरों के कुछ आँकड़ो को देखें- 1 मई की प्रातः तक के डाटा के अनुसार मुंबई (6,669), पुणे (1,174) और ठाणे (1,051) के संक्रमण आँकड़ों का योग महाराष्ट्र के कुल 9,915 मामलों का लगभग 90 प्रतिशत है।

गुजरात के कुल 4,082 मामलों में 68 प्रतिशत यानी 2,777 अकेले अहमदाबाद में हैं। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ही 3,515 मामलों के साथ देश के 10 प्रतिशत मामले हैं।

तमिलनाडु के कुल 2,162 मामलों का 42 प्रतिशत 905 मामलों के साथ अकेले चेन्नई में है। इंदौर के 1,486 और भोपाल के 508 मामलों का योग मध्य प्रदेश के कुल 2,660 मामलों का 75 प्रतिशत है।

तुलनात्मक रूप से कम प्रभावित राज्य कर्नाटक जहाँ 557 मामले पाए गए हैं, वहाँ भी तीन शहरों- बेंगलुरु, मैसुरु और बेलागावी में ही राज्य के कुल मामलों के आधे से अधिक मामले हैं।

एक दूसरा आँकड़ा भी ध्यान दिए जाने योग्य है- मुंबई के केवल एक झुग्गी बस्ती समूह (स्लम क्लस्टर) धारावी में 369 मामले रिपोर्ट किए गए हैं। इसे एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती माना जाता है।

धारावी, स्रोत- विकिमीडिया

यहाँ मामलों के और बढ़ने की ही संभावना है क्योंकि ऐसी घनी आबादी क्षेत्र में सामाजिक दूरी बनाए रखने के विकल्प काफी सीमित होंगे। स्मरण हो कि ऐसे ही घनत्व वाले क्षेत्रों को वीरत्व के रूप में कुछ ‘गरीबी-वालों’ ने रेखांकित किया था।

जिस बिंदु की ओर आप सबको ले जाने के लिए उपरोक्त चर्चा की गई वह यह है कि भारत का दोषपूर्ण शहरीकरण और दरिद्र परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर यह समझने में केंद्रीय हो जाते हैं कि क्यों कोविड-19 से भारत को बड़ा खतरा है।

यह उस दिशा की ओर भी संकेत करता है कि अब भारत को क्या करना चाहिए। यह मात्र एक संयोग नहीं है कि भारत की व्यावसायिक और आर्थिक राजधानी मुंबई कोविड-19 का प्रमुख केंद्र और संक्रमण से सर्वाधिक पीड़ित है।

बड़ी झुग्गी बस्तियों के अलावा भी मुंबई देश का सबसे घनत्व वाला शहर है जहाँ पूरे परिवार यहाँ तक कि मध्यम वर्ग के लोग भी उपयुक्त आवास का प्रबंधन नहीं कर पाते हैं। प्रायः दूरस्थ उप-नगरीय क्षेत्रों में भी दो-तीन पीढ़ियाँ एक साथ एक बेडरूम वाले फ्लैट में रहते हैं।

कुछ तथ्यों को पहले जान लें- अगर हम शहर-जैसी विशिष्टताओं को देखें और नगरों की जनगणना के लिए आधिकारिक वर्गीकरण को नहीं तो पाएँगे कि भारत में शहरीकरण 55 प्रतिशत तक पहुँच गया है, वर्ल्ड बैंक के एक अध्ययन के अनुसार। और इसी कारण से कोविड-19 एक नगरीय स्वास्थ्य सेवा संकट है, न कि राष्ट्रीय संकट।

आवास, सार्वजनिक परिवहन, सड़कों और सामाजिक इंफ्रास्ट्रक्चर में कम निवेश के कारण झुग्गी बस्तियाँ उभर आई हैं और लाखों की संख्या में आवागमन करने वाले लोग अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक परिवहनों में प्रतिदिन यात्रा करते हैं व ऐसा केवल मुंबई में ही नहीं बल्कि लगभग हर मेट्रो शहर में होता है।

भीड़ वाली लोकल ट्रेन (चित्र श्रेय- @bethelocal)

पिछली गलतियों को सुधारने का साधन है निम्नलिखित क्षेत्रों में सुधार और निवेश-

पहला, हमें सार्वजनिक परिवहन में अधिक निवेश करना होगा ताकी यात्रा के दौरान कुछ हद तक सामाजिक दूरी का पालन किया जा सके। इसका अर्थ हुआ कि अभी के लिए तो हम अधिक बसें चला सकते हैं और दीर्घ अवधि के लिए मेट्रो व उप-नगरीय ट्रेनों को विकसित कर सकते हैं। मुंबई, और साथ ही दिल्ली व कोलकाता भी सार्वजनिक परिवहन में बड़े निवेश के बिना सामान्य कामों के लिए शहर को पुनः नहीं खोल सकते हैं।

दूसरा, सड़क और सार्वजनिक परिवहन इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने के साथ-साथ शहरों को विभिन्न स्तरों पर विकसित करने का अवसर दिया जाना चाहिए। यही एक तरीका हो सकता है कि लोगों को बेहतर आवास दिए जा सकें। ऐसा करने के लिए फ्लोर स्पेस इंडाइसेज़ बढ़ाकर भूमि मूल्य में भारी गिरावट की जा सकती है जिससे अधिक निम्न और मध्यम वर्गीय नागरिक छोटे घर खरीद पाएँगे।

शहरी क्षेत्र नवाचार, उद्यम और नौकरियों के केंद्र होते हैं क्योंकि घने नेटवर्कों में रहने के कारण मानव संपर्क, सहयोग और विचारों के आदान-प्रदान को बल मिलता है।

तीसरा, अब समय आ गया है कि झुग्गी बस्तियों को वीरत्व के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करना बंद किया जाए। धारावी की झुग्गी बस्तियों और इससे उत्पन्न होने वाले उद्यम पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है।

लेकिन इसके नकारात्मक परिणाम अब प्रत्यक्ष हैं क्योंकि स्वच्छता और स्वास्थ्य के मानकों को यहाँ पूरा करना एक चुनौती है। साथ ही शारीरिक दूरी बनाए रखना लगभग असंभव क्योंकि एक कमरे वाले घर के लिए भी भारी किराया (मासिक 5,000 रुपये या कुछ मामलों में उससे भी अधिक) भरना पड़ता है।

चरणबद्ध तरीके से धारावी झुग्गी बस्ती को हटाया जाना चाहिए और वहाँ रह रहे लोगों को संपत्ति रख-रखाव कंपनियों के माध्यम से सामान्य मासिक किराए व मेंटेटेंस शुल्क पर ऊँची इमारतों में फिर से बसाया जाना चाहिए।

झुग्गी बस्तियों को बसने देने वाली अवधारणा को कोविड-19 ने नष्ट कर दिया है। परिवहन और आवास में ये निवेश मुंबई का जीर्णोद्धार करेंगे, आर्थिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टि से। ऐसा ही प्रबाव अन्य मेट्रो व मिनी मेट्रो शहरों पर भी देखने को मिलेगा।

शहरीकरण का पक्ष मजबूत है लेकिन जर्जर शहरीकरण का पक्ष अस्तित्वहीन है। कोविड-19 ने चुनौती खड़ी करने के साथ-साथ एक अवसर भी प्रदान किया है।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।