भारती
कोविड-19 से सुरक्षा के लिए सख्ती बढ़ाई जाए, अनलॉक का अर्थ अन’मास्क’ न हो

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय-ऐस्ट्रा ज़ेनेका वैक्सीन को लगा झटका सरकारों को याद दिलाता है कि वे कोविड-19 के किसी त्वरित समाधान की अपेक्षा न रखें। न वैक्सीन, न कोई और समाधान शीघ्र आने वाला है, विशेषकर तब जब हम नियामक सावधानी को जारी रखेंगे।

इस वैश्विक महामारी के प्रभाव, विशेषकर आर्थिक नुकसान के कारण अधिकतर सरकारें और नियामक वैक्सीन ट्रायल पर दृष्टि रखे हुए हैं लेकिन सामान्य सावधानियों को अनदेखा कर रहे हैं। अब जब सबसे तेज़ी से आगे बढ़ रही ऑक्सफॉर्ड वैक्सीन एक रोगी में गंभीर समस्या देखे जाने के कारण अवरुद्ध हो गई है तो आवश्यकता है हम वास्तविकता में जिएँ।

क्लिनिक्ल ट्रायल को रोक दिया गया है, भारत के सेरम संस्थान में चल रहे समानांतर ट्रायल को भी, ऐसे में कोई निश्चिंतता नहीं है कि 2021 के अंत तक हमारे पास वैक्सीन आ जाएगी। वैक्सीन बनाने वाले अन्य दावे भी तब तक विस्तृत रूप से आगे नहीं बढ़ सकते जब तक सभी प्रकार के लोगों और भूगोलों में अधिक क्लिनिकल परीक्षण न हो जाएँ।

भारत में अभी भी कोविड-19 संक्रमण शिखर पर नहीं पहुँचा है (11 सितंबर तक 9.43 लाख सक्रिय मामलों के साथ 45.6 लाख कुल मामले) जिसके दो अर्थ निकलते हैं- भारत को प्रतिदिन 20-30 लाख लोगों का परीक्षण करना चाहिए (वर्तमान में प्रतिदिन मात्र 10 लाख टेस्ट होते हैं) और दूसरा यह कि सार्वजनिक स्थलों में मास्क पहनने जैसी बचाव विधि के अनुपालन पर अधिक ज़ोर होना चाहिए।

यह एक विषमता है कि जब हम सार्वजनिक परिवहन समेत अपनी अर्थव्यवस्था को खोल रहे हैं, तब ही हम मास्क पहनने जैसी बचाव विधि को अनदेखा कर रहे हैं जो नागरिकों को संक्रमण से बचाएगी। कई शहरों में सहस्रों लोग बिना मास्क के या सिर्फ नाम के लिए मास्क (जो कहीं और लटकता रहता है) लगाकर घूम रहे हैं।

यह चिंताजानक है। जब महामारी शुरू होने पर कड़े नियम थे तब उनका सख्ती से पालन हो रहा था लेकिन अब तो कुछ पुलिस अधिकारी समेत अन्य कार्यकारी सार्वजनिक स्थलों पर बिना मास्क के घूम रहे हैं।

हम समझ सकते हैं कि कोविड-19 लॉकडाउन और आवागमन पर रोक से लोग तंग आ चुके हैं लेकिन आर्थिक व्यवस्था खोलने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि लोगों को लापरवाही करके सार्वजनिक स्थलों पर नियमों का उल्लंघन करने दिया जाए।

कम से कम यह किया जा सकता है कि सार्वजनिक स्थलों पर मास्क पहनना अनिवार्य हो और लोगों से अनुपालन करवाने के लिए भारी जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए। घर पर कई बार हाथ धोना आसान है लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर दूरी बनाना, विशेषकर सार्वजनिक परिवहन और बाज़ारों में बहुत कठिन है (सांस्कृतिक कारणों से भी क्योंकि हम पश्चिमी लोगों की तरह व्यक्तिगत जगह को अधिक महत्त्व नहीं देते) क्योंकि यह व्यवहार्य नहीं है।

आर्थिक गतिविधियों के खुलने के साथ कोविड-19 संक्रमण की उछाल के बीच मास्क ही हमारा एकमात्र सुरक्षा कवच हैं। अनलॉक का अर्थ समय से पहले अनमास्क (मास्क-रहित) हो जाना नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।