भारती
लॉकडाउन मानसिकता अर्थव्यवस्था का नाश करेगी, न कि कोरोनावायरस का

भारत में कोविड-19 के मामले बढ़ रहे हैं, और कुछ दिनों में ही 10 लाख का आँकड़ा पार कर जाएँगे। यह आँकड़ा भय उत्पन्न करेगा और मीडिया भी इसपर थाल पीटेगा। केरल जैसे राज्यों को मॉडल बताकर उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया था लेकिन अब वहाँ संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए “तिहरा लॉकडाउन” लागू किया जा रहा है।

कर्नाटक जिसके नाम कम संक्रमण दर की उपलब्धि दर्ज थी, वह अब केरल के तिहरे लॉकडाउन मॉडल को बेंगलुरु में लागू करने पर विचार कर रहा है। एक बात स्पष्ट हो कि कोई ऐसा मॉडल नहीं है जिसे भारतीय राज्य या शहर लागू कर सकें, न भारतीय संदर्ब में, न वैश्विक अनुभव से।

हालाँकि हर अनुभव से छोटी-छोटी सीखें हो सकती हैं और इन सीखों को राज्य और शहर अपना सकते हैं। लेकिन भारत को अपने अनुभवों से ही सीखना होगा। दो पाठ ऐसे हैं जिनकी बात अब कोई नहीं कर रहा जब आँकड़े बढ़ रहे हैं।

पहला, आर्थिक गतिविधियों को रोककर, शहरों और राज्यों को बंद करके आप वायरस को नहीं रोक सकते हैं। लॉकडाउन और कंटेनमेंट क्षेत्र छोटे से छोटे होने चाहिए, जैसे घर, एक गली, न कि पूरे वार्ड या जिले अथवा राज्य पर, न सामान्य परिवहन पर।

फैले हुए लॉकाउन लघु अर्थव्यवस्था की हत्या कर देते हैं और लोगों के मन में अभाव की मानसिकता को बढ़ावा देते हैं। इस प्रकार एक भीड़भाड़ वाले शहर में लोग आवश्यक सामग्रियाँ खरीदने जाते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा और बढ़ता है। लॉकडाउन वर्तमान संक्रमण दर को तो कम रखता है लेकिन भावी बढ़त को प्रोत्साहित करता है।

दूसरा, राज्य के हस्तक्षेप मात्र से ही यह लड़ाई नहीं जीती जा सकती है, हर भारतीय को यह लड़ाई लड़नी है और अपने लिए खतरे का दायित्व भी व्यक्ति को ही उठाना है। राज्य केवल स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को तेज़ी से विकसित करने का काम कर सकता है ताकि गंभीर मामलों में मृत्यु न हो।

यदि उपरोक्त दो प्रस्तावों को हम मान लें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि राज्यों और लोगों को क्या करना चाहिए।

पहला, संवाद- प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों से मुख्यमंत्रियों तथा उनके मंत्रियों तक, नगर निगम आयुक्तों, वार्ड अधिकारियों और नगर पार्षदों से ग्राम पंचायत प्रधान तक, सांसद, विधायक और सामुदायिक नेता, सब एक ही भाषा बोलें ज़ोर से- नागरिक अपना दायित्व उठाएँ।

नागरिक का दायित्व सिर्फ इतना ही नहीं है कि सार्वजनिक स्थलों पर दूरी बनाए रखें, बल्कि हाथ धोने, मास्क एवं ग्लव्स पहनने जैसे दायित्व भी नागरिक के ही हैं। सरकार केवल इन्हें मुफ्त में उपलब्ध करवा सकती है। हर नेता को बार-बार यही संदेश देना चाहिए, भले ही दोहराते हुए रिकॉर्ड की तरह लगे।

दूसरा, संपर्क संरेखण (कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग), जाँच और क्वारन्टाइन के लिए तकनीक का उपयोग- आँकड़े लाखों में पहुँच गए हैं इसलिए व्यक्तिगत कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग प्रभावी नहीं होगी। साथ ही गृह पृथकवास में रहने के लिए कहे गए लाखों लोगों की आवाजाही को ट्रैक करना असंभव है।

तकनीक ही एकमात्र विकल्प है जैसे आरोग्य सेतु ऐप। सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए निजता की चिंता को अभी के लिए छोड़ देना चाहिए। इस ऐप के माध्यम से संपर्क संरेखण किया जा सकता है, साथ ही लोगों को पृथकवास अपनाने या जाँच कराने की चेतावनी इस माध्यम से दी जा सकती है।

लेकिन यह ऐप काफी नहीं है। हमें सस्ते गैजेट और जीपीएस ट्रैकिंग उपकरणों की आवश्यकता है जिसे पृथकवास में रह रहे लोगों को पहनने के लिए दिया जा सके ताकि वे उल्लंघन करने से बचें और आसपास घूमकर लोगों अनजाने में संक्रमित न करें।

तीसरा, डाटा पर ध्यान, विश्वलेषण- कुल मामलों की संख्या देखने से राज्य सरकारें और जनता लॉकडाउन का समर्थन करने लग जाते हैं। मीडिया को सक्रिय मामले ही शीर्षक में बताने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए न कि कुल मामले।

उदाहरण देखें कि 9 जुलाई तक कुल मामले 7,93,802 थे लेकिन सक्रिया मामले काफी कम, सिर्फ 2,76,685 थे। बड़े आँकड़े देखकर हमें स्वयं को भयभीत नहीं करना चाहिए। ठीक होने की दर और मृत्यु दर को भी ट्रैक करना आवश्यक है। ठीक होने वालों की संख्या पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। जब मृत्यु दर बरसाती बीमारियों से काफी कम है तो लोगों को डराना निरर्थक है।

चौथा, कार्यालयों, परिवहन एवं व्यावसायिक अधिष्ठानों को मानक कार्यविधि (एसओपी) का अनुसरण करने और अपने कर्मचारियों के नाम पर कोविड-19 बीमा लेने के लिए कहना चाहिए। कार्यालय में कितने लोग काम करें यह बताना अनाव्श्यक लघु-प्रबंधन है। कंपनियों और मॉल से कोविड-19 मामले के कारण जुर्माना नहीं वसूलना चाहिए बल्कि एसओपी का पालन न करने पर जुर्माना लगाना चाहिए।

पाँचवाँ, स्वास्थ्य सेवा में वृद्धि- कोविड-19 वैश्विक महामारी को हम खतरे या अवसर के रूप में देख सकते हैं जैसे संसाधनों पर खर्च या भविष्य के लिए आवश्यक निवेश के रूप में। नगरों, कस्बों और गाँवों में स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने का भारत के पास एक सुनहरा अवसर है।

70 वर्षों में जिस चीज़ की कमी रह गई थी, उसे अगले दो वर्षों में पूरा कर दिया जाना चाहिए। यह सदा हमारे काम आएगा, भविष्य में टिकने वाली नौकरियाँ भी देगा। हमारे पास उच्च-मूल्य की माँग करने वाले अस्पतालों और चिकित्सकों के एकाधिकार को नष्ट करने का भी अवसर है।

आयुर्वेदिक चिकित्सकों को, जिन्हें भी मानव शरीर की उतनी ही समझ है जितनी एक एमबीबीएस डॉक्टर को, क्यों कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में सम्मिलित नहीं किया जा रहा है, उन्हें आधारभूत ऐलोपैथिक दवाइयों के सुझाव और गंभीर मामलों में विशेषज्ञों के पास भेजने की अनुमति दी जानी चाहिए।

उच्च मूल्य वाले स्वास्थ्य तंत्र के वर्चस्व को समाप्त करना है। साथ ही लॉकडाउन मानसिकता को भी त्यागना है जो कि रक्षात्मक और स्वयं को हार की ओर ले जाने वाली है। हमें कोविड-19 के विरुद्ध आक्रामक होना है, टीका, उपचार और सेवा से।

लॉकडाउन हमारी लड़ने की आर्थिक और भौतिक क्षमताओं को कम आँकते हैं। तिहरा लॉकडाउन उस राज्य में लागू किया जा सकता है जहाँ थोड़ी आर्थिक गतिविधियाँ ही होती हैं लेकिन कर्नाटक जैसे राज्य में नहीं जो हमारे विकास को चालित कर रहा है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।