भारती
कोविड-19 की सीख⁠— रियल-टाइम जनसांख्यिकी डाटा की नितांत आवश्यकता

अब तक न सार्वजनिक स्वास्थ्य अवस्था, न स्वास्थ्य आँकड़ों पर ज़ोर दिया जाता था। पंचायत से कैबिनेट से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के नीति निर्माताओं को कोविड-19 महामारी से होने वाले नुकसान को न्यूनतम स्तर पर रखने के लिए रियल-टाइम और सटीक डाटा की आवश्यकता है।

उच्च गुणवत्ता वाला मृत्यु दर डाटा जो आयु, लिंग और स्थान के आधार पर वर्गीकृत हो, वर्तमान परिस्थिति और कोविड-19 के प्रभाव की भावी रेखा समझने में हमारी सहायता करेगा।

क्या कोविड-19 से भारत में अत्यधिक मृत्यु हो रही है?

कोविड-19 का जनसांख्यिकी आधारित डाटा दर्शाता है कि वृद्धजनों के लिए यह रोग अधिक घातक है और इसी से अपेक्षा की जा रही है कि यह वैश्विक महामारी युवा जनसांख्यिकी वाले कम आय वाले देशों को कम प्रभावित करेगी लेकिन साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि इन देशों का स्वास्थ्य तंत्र जीर्ण है।

लेकिन कोविड-19 के प्रभाव को पूरी तरह समझने के लिए हमें स्वास्थ्य और मृत्यु पर इसके प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभावों को आँकलन करना चाहिए।

कोरोनावायरस के कारण होने वाली मृत्यु को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं-

  1. कोरोनावायरस की पहचान होने के बाद उपचार के दौरान मृत्यु।
  2. कोविड-19 के कारण हुई मृत्यु लेकिन उसे रिपोर्ट नहीं किया गया, या तो मृत्यु तक रोग की पहचान नहीं हो पाई या राजनीतिक परिस्थिति के कारण, जैसा पश्चिम बंगाल में देखा गया।
  3. परोक्ष रूप से कोरोनावायरस के कारण हुई मृत्यु अर्थात कोविड-19 संक्रमण से नहीं अपितु इससे उपजी आपातकाल और तनाव की स्थिति के कारण।

सामाजिक दूरी के नियमों और लॉकडाउन के कारण सामान्य उपचार सुविधा की उपलब्धता और पहुँच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कैंसर और उच्च रक्तचाप जैसी प्राणघातक बीमारियों के कारण होने वाली मृत्यु में तीव्र उछाल आ सकता है क्योंकि गैर-कोविड-19 स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान उत्पन्न हो गया है।

गर्भवती महिलाओं को प्रसव के पूर्व और पश्चात आवश्यक स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पा रही है। यहाँ तक कि प्रसव के लिए भी कई महिलाएँ संस्थागत सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रही हैं जो जच्चा-बच्चा के प्राणों के लिए खतरा है।

बड़े स्तर पर संवेदनशीलता और सरकार एवं प्रशासन की सक्रिय भूमिका से लगता है कि एकीकृत रोग निगरानी योजना (आईडीएसपी), स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना तंत्र (एचएमआईएस) और एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (आईएचआईपी) साथ मिलकर पहले प्रकार की मृत्यु को सही तरह से रिपोर्ट कर रहे हैं।

आईडीएसपी का मुखपृष्ठ

लेकिन इस तंत्र ने 26 अप्रैल तक यानी 93 प्रतिशत मामलों के आयु-लिंग का डाटा सम्मिलित नहीं किया। साथ ही ऐसे डाटा का विश्लेषण भावी संक्रमण और मृत्यु के पैटर्न की सही मॉडलिंग के लिए काफी नहीं है।

इसके अलावा कोविड-19 के कारण हुई परोक्ष मृत्यु को चिह्नित करने के लिए कोई एक तरीका नहीं है। एक और बात ध्यान देने योग्य है कि महामारी के कारण अन्य कारणों (जैसे हत्या, दुर्घटना और आत्महत्या) से होने वाली मृत्यु संख्या को कम किया है।

इसके कारण संभव है कि वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु भी कम हो। ऐसी जानकारी प्राप्त करने के लिए एक आदर्श तंत्र की आवश्यकता है जो मृत्यु के कारण समेत आँकड़ा दे।

लेकिन मृत्यु के कारण के अपर्याप्त डाटा के कारण कोविड-19 के कारण परोक्ष मृत्यु की संख्या का अनुमान लगाना लगभग असंभव है।

कोविड-19 के कारण हुई अतिरिक्त मृत्यु के विश्लेषण का एक वैज्ञानिक तरीका है कि केवल मृत्यु आँकड़ों को देखा जाए और दैनिक या साप्ताहिक अतिरिक्त मृत्यु को जोड़ा जाए।

जहाँ उच्च गुणवत्ता वाला और निरंतर डाटा उपलब्ध है, वहाँ कोविड-19 के कारण हुई अतिरिक्त मृत्यु को साप्ताहिक मृत्यु संख्या से तुलना करके जोड़ा जा सकता है। लेकिन यह खेदपूर्ण है कि भारत में मृत्यु पंजीयन तंत्र संतोषजनक नहीं है और सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की उपयुक्त जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जिलावार भी प्रतिदिन का डाटा जारी नहीं किया जाता है। भारत के मृत्यु आँकड़ों की खराब अवस्था के समक्ष कोविड-19 की सही मृत्यु दर का आँकलन असंभव है।

कोविड-19 और प्रवासन पर सूचना का अभाव

कोविड-19 ने व्यक्तिगत स्तर के साथ-साथ स्थानीय और केंद्र सरकारों को भी अंतर-राज्य प्रवासन जानकारी के प्रति संवेदनशील किया है। लाखों की संख्या में भारतीय देशभर में घूमते हैं लेकिन बड़ी संख्या के इस आवागमन का कोई सांख्यिकीय तंत्र नहीं है।

प्रवासी समस्या दर्शाता बांद्रा का चित्र

जनगणना में प्रावसन डाटा लिया जाता है लेकिन यह 10 वर्ष में एक बार ही होता है और जनगणना का डाटा कई वर्षों बाद प्रकाशित हो पाता है। आपातकाल की स्थिति में ऐसा डाटा उपयोगी नहीं रह जाता।

एक बेहतर डाटा तंत्र वह होगा जिसमें निवासियों की रियल-टाइम जनसंख्या पंजीकृत हो, बेहतर होगा यदि यह पंचायत या नगरीय स्तर पर किया जा सके।

इस तंत्र के अधीन यदि कोई भी व्यक्ति किसी पंचायत या नगर निगम के दायरे में रहना चाहेगा तो उसे स्वयं को इस स्थानीय प्रणाली में पंजीकृत करना होगा। यह डाटा न सिर्फ प्रवासन का आँकड़ा बताएगा अपितु वर्तमान समय में स्थानीय स्तर पर जनसंख्या का भी सही आँकड़ा देगा जिसकी आवश्यकता जन्म और मृत्यु दर की गणना के लिए पड़ती है।

स्थानीय स्तर के इस डाटा को जिला और राज्य के स्तर पर एकीकृत किया जा सकता है जिससे हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ने पर निवासी और प्रवासी डाटा सरलता से उपलब्ध रहेगा।

जनसंख्या रजिस्टर नामक यह तंत्र उन्नत और कल्याणकारी देशों जैसे नीदरलैंड, जर्मनी व अन्य नॉर्डिक देशों में उपलब्ध है। भारत का

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को द्वार-द्वार सर्वेक्षण से हर पाँच वर्ष में अद्यतित करना वास्तविक डाटा भेद को नहीं भर सकता जो भारत कोरोनावायरस के समय झेल रहा है।

संपूर्ण नागरिक पंजीयन तंत्र और गतिशील राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर की तत्काल आवश्यकता

हाल के दशकों में डाटा क्रांति के बावजूद भारत का जनसांख्यिकी डाटा तंत्र आदर्श से बहुत दूर है। वर्तमान में भारत में कई अतिछादी डाटासेट हैं जो स्थानीय स्तर के सटीक मृत्यु और प्रवासन आँकड़े नहीं दे सकते हैं।

निर्धन और ज़रूरतमंदों तक विकास पहुँचाने के लिए ऐसे डाटा अति आवश्यक हैं। नागरिक पंजीयन तंत्र (सीआरएस) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) भारत में पहले से ही अस्तित्व में हैं लेकिन वे इतने योग्य नहीं हैं जो महामारी का विश्लेषण कर अतिरिक्त मृत्यु का डाटा दे सकें।

भारत को एक सक्षम सीआरएस और रियल-टाइम गतिशील एनपीआर में निवेश करने की आवश्यकता है। तकनीक के उन्नत होने के साथ मृत्यु आँकड़ों को संचित करके साप्ताहिक या मासिक रूप से एकीकृत किया जा सकता है, वहीं एनपीआर को कम से कम हर छह महीने में संकलित किया जाना चाहिए।

सरकारी सुविधाओं और सरकार के संरक्षण के लिए हर नागरिक को ऐसे तंत्र में सहयोग करना चाहिए। मोबाइल फोन आधारित तकनीक से इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

डिजिटल क्रांति के युग में ए योग्य और गतिशील सीआरएस एवं एनपीआर नागरिकों के हित में पहला कदम होना चाहिए। साथ ही सरकार को व्यक्तिगत जानकारी की निजता और सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए।

यह वैश्विक महामारी रियल टाइम और निरंतर जनसांख्यिकी डाटा तंत्र की आवस्यकता के प्रति हमारी आँखें खोलती है। ऐसा डाटा कोविड-19 से लड़ने में हमारी सहायता करेगा और भविष्य की महामारियों के लिए हमें तैयार करेगा।