भारती
कुतबुद्दीन के खास हसन के नेतृत्व में दिल्ली पर धर्मांतरित हिंदुओं का कब्ज़ा- भाग 26

जिस तरह अलाउद्दीन खिलजी मलिक काफूर के असर में था, उसी तरह कुतबुद्दीन की जिंदगी में एक शख्स आता है। उसका नाम हसन है। वह गुजरात मूल का है। खिलजी के खानदान के ताबूत में आखिरी कील ठोकने वाले इस गुजराती को जियाउद्दीन बरनी ने बरवार जाति का बताया है।

कुतबुद्दीन ने उसे खुसरो खां की उपाधि दी। मलिक नायब का लाव-लश्कर और अक्ता भी उसे ही दे दी गई। बरनी लिखता है– “नशे और अय्याशी की हालत में उस हसन बरवार बच्चे पर वह इस कदर फिदा हो गया था कि एक पल भी उसके बगैर जी नहीं सकता था।

एक बार फिर दिल्ली में गाने-बजाने वालों, नाचने वालियों, मसखरों, शराबियों और मनचलों की बहार आ गई। ऐसी बेलगाम हालत में भी कुतबुद्दीन मुबारक 4 साल 4 महीने तक हुकूमत में लदा रहा। सबसे पहले उसने गुजरात पर हमला कराया।

एनुलमुल्क मुलतानी नाम के अमीर के साथ एक हमलावर फौज गुजरात भेजी। अलाउद्दीन के समय ही गुजरात पर कब्ज़ा जम चुका था। खिज्र खां का ससुर अलप खां वहीं तैनात था, जिसका कत्ल मलिक काफूर ने कराया।

अब एक बार फिर देवगिरि की बारी थी, क्योंकि हर हमले और लूट के बाद देवगिरि के यादव फिर स्वतंत्र शासक हो जाते थे। दिल्ली के इन आतंकी सुलतानों को यह कुबूल नहीं था कि कोई हिंदू राज्य सिर उठाए। इसलिए कुतबुद्दीन मुबारक खुद देवगिरि रवाना हुआ, जहाँ हरपालदेव की हुकूमत थी।

एक बार फिर महाराष्ट्र के इस ताकतवर राज्य को रौंदा गया। हरपालदेव को कैद कराया गया और उसकी खाल खिंचवा कर देवगिरि के दरवाजे पर मृत शरीर लटका दिया गया। देवगिरि मलिक यकलखी को सौंप दी गई। दो साल के भीतर यकलखी की बगावत होती है। दिल्ली से आई एक फौज इस बगावत को कुचलती है। यकलखी को दिल्ली लाकर उसके नाक-कान कटवाकर बेइज्ज़त किया जाता है। उसके सारे करीबी मार डाले जाते हैं।

देवगिरि से ही माबर (तमिलनाडु) पर हमले की योजना बनाई गई। पहली बार खुसरो खां को यहीं से माबर रवाना किया गया। बरनी ने खुसरो खां को जी-भरकर भला-बुरा कहा है। उसे कई तरह की गालियाँ दी हैं। उसे एक नाजायज़ औलाद, कमीना और व्यभिचारी कहा है, जिसने कुतबुद्दीन मुबारक को अपनी गिरफ्त में ले रखा था। बरनी बता रहा है- “देवगिरि से माबर रवाना होते ही उसने रातों में सभाएँ करनी शुरू कर दीं। वह अपने हिंदू मददगारों, बागियों और मलिक नायब के दोस्तों के साथ साजिश करने लगा।

खुसरो खां को दक्षिण भारत में लूटपाट के लिए भेजने के बाद कुतबुद्दीन देवगिरि से दिल्ली रवाना होता है। वह रास्ते में सागौन घाटी से गुज़र रहा था। उसके लश्कर में मलिक असदुद्दीन नाम का एक शख्स उभरता है। यह आदमी अलाउद्दीन खिलजी के चाचा युगरश खां का बेटा था।

कुतबुद्दीन के अय्याशी के रंग-ढंग किसी को रास नहीं आ रहे थे। सागौन घाटी में असदुद्दीन के लोग कुतबुद्दीन के कत्ल की साजिश करते हैं। कत्ल के बाद वहीं असदुद्दीन को सुलतान बनाना तय होता है।

कुतबुद्दीन हरम की औरतों के बीच शराब के नशे में पूरी मौज-मस्ती के साथ ही चलता था। उसके उसी हालत में कत्ल की योजना बनी। लेकिन एक भेदिए से कुतबुद्दीन को साजिश का पता चल जाता है। फौरन असदुद्दीन, उसके भाइयों और सारे करीबी लोगाें को रातों-रात पकड़वाया जाता है। पूछताछ की जाती है। शिविर के सामने ही सबको बारी-बारी से कत्ल कर दिया जाता है।

क्रूर कुतबुद्दीन दिल्ली यह हुक्म भेजता है कि युगरश खां के बेटों को पकड़वाकर कत्ल कर दिया जाए। वे सब बहुत छोटी उम्र के बच्चे थे। बरनी ने इनकी संख्या 29 बताई है। युगरश खां की सारी दौलत पर कब्जा कर लिया गया। उसके घर की औरतों-बेटियों को गलियों में ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया।

दिल्ली लौटते हुए वह रणथंभौर के पास झायन पहुँचा। वहीं से शादीकत्ता नाम के एक शख्स को ग्वालियर भेजा गया। उसे हुक्म था कि ग्वालियर में कैद खिज्र खां, शादी खां और शहाबुद्दीन, जो कि अंधे कर दिए गए थे और सिर्फ रोटी-कपड़ा ही पाते थे, कत्ल कर दिए जाएँ। उनकी माताओं-औरतों को दिल्ली लाया जाए। ऐसा ही किया गया।

हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि देवल रानी को भी दिल्ली लाया गया होगा। मुमकिन है कुतबुद्दीन ने उसे अपने हरम में रखा हो। अब आप दिल्ली में मुस्लिम शासन के तौर-तरीकों की एक और झलक देखिए। बरनी का ही वर्णन है-

“उसने बड़ी बेरहमी शुरू कर दी। ऐसे काम शुरू कर दिए जो किसी हुक्मरान को शोभा नहीं देते। वह औरतों के लिबास और जेवर पहनकर मजमे में आता था। नमाज़, रोज़ा छोड़ दिए थे। मलिक एनुलमुल्क मुलतानी और मलिक किराबेग जैसे प्रतिष्ठित अमीरों को हज़ार सुतून के महल में सबके सामने औरतों और मसखरों से बुरी-बुरी गालियाँ दिलवाता था।

वह इतना बेशर्म हो गया कि उसने तोबा नाम के एक गुजराती मसखरे को दरबार में बड़ी इज्ज़त से रख लिया। वह मसखरा मलिकों को माँ-बेटियों की गालियाँ देता था। वह कभी नंगा ही शिश्न हाथ में लिए दरबार में घुस आता था। मलिकों के कपड़ों पर मलमूत्र कर देता था। सभा में गंदी गालियाँ देता था।”

दिल्ली के इस्लामी शासन में साजिश, कत्ल, अय्याशी और उठापटक का मौसम हमेशा ही ज़ोर पर था। गुजरात जिस जफर खां को सौंपा गया था, उसे कत्ल कराया गया। उसकी एक लड़की से कुतबुद्दीन ने निकाह किया था। लेकिन रिश्ते-नाते मौकापरस्ती के ही नमूने थे।

अब गुजरात का नायब नियुक्त हुआ खुसरो खां की माँ का भाई हुसामुद्दीन। इसे बरनी ने मुरतद कहा है, मुरतद यानी जिसने इस्लाम को छोड़ दिया। बरनी बता रहा है कि हुसामुद्दीन भी कभी-कभी कुतबुद्दीन के साथ लेटता था। उसने गुजरात पहुँचकर अपने रिश्तेदारों को इकट्‌ठा करना शुरू कर दिया। सारे बरवारों ने बगावत कर दी। गुजरात के मुस्लिम अमीरों ने हुसामुद्दीन को पकड़कर दिल्ली भिजवा दिया। लेकिन खुसरो खां के असर में कुतबुद्दीन उसे सिर्फ तमाचा मारकर छोड़ देता है।

एक बार फिर खुसरो खां दृश्य में आता है। वह देवगिरि से माबर रवाना किया गया था। वहाँ के राजा से उसे बेहिसाब दौलत मिली। खिलजी की फौज के पुराने अमीर उसके लश्कर में थे। इतिहास में खुसरो खां को हर समय एक ऐसे शातिर शख्स की तरह पेश किया गया है, जो कुतबुद्दीन मुबारक पर अपने असर का इस्तेमाल अपनी सत्ता कायम करने में करना चाहता है।

लश्कर के अमीरों को उसकी साजिश का पता चलता है कि वह माबर के इलाके में ही जमना चाहता है। जैसे-तैसे वे लोग खुसरो खां को दिल्ली लौटने के लिए राज़ी करते हैं। दिल्ली में कुतबुद्दीन उसके लिए इतना बेकरार है कि वह हुक्म देता है माबर से लौटते हुए देवगिरि से दिल्ली तक खुसरो खां को पालकी में सात-आठ दिन में लाया जाए। यह दूरी करीब 40 दिन की थी। बड़ी तादाद में कहारों की तैनाती होती है।

हम एक बार फिर दिल्ली के हज़ार सुतून महल में आते हैं, जहाँ काज़ी जियाउद्दीन के पास सारे दरवाजों की चाबियाँ हैं। एक दिन वह कुतबुद्दीन के पास पहुँचा। उसने कहा-“हर रात खुसरो खां के महल में बरवार इकट्‌ठा हो रहे हैं। वे कुछ तैयारी में हैं।

मैंने कई लोगों से सुना है कि खुसरो खां साजिश कर रहा है। आपको पता है सुलतान अलाउद्दीन के वक्त कोई अपने घर में ज्यादा पानी भी पी लेता था तो खबर हो जाती थी और कोई समूह महल में ही साजिश कर रहा है और अन्नदाता को इसकी भनक तक नहीं है। कम से कम पूछताछ ही कर लें।

इस काज़ी ने कुतबुद्दीन को लिखना सिखाया था। लेकिन खुसरो खां की बुराई सुनकर कुतबुद्दीन ने अपने उस्ताद को ही लपेट दिया। ठीक उसी समय खुसरो खां वहाँ आ गया। कुतबुद्दीन ने उसे भी बता दिया कि काज़ी खां तुम्हारे बारे में क्या राय रखता है! बरनी की रिपोर्ट

“उस नीचे सोने वाले नामर्द ने रोना शुरू कर दिया। आँसू बहाते हुए बोला कि सुलतान की इतनी मेहरबानी मुझपर है कि सारे लोग मेरी जान के पीछे पड़ गए हैं। मेरा कत्ल करना चाहते हैं। उस रूपवान का रोना-धोना देखकर सुलतान कुतबुद्दीन की कामाग्नि बढ़ गई। उसने उसे चिपटा लिया। उसके होठों का चुंबन लिया। जो चाहता था, वह किया। उसी पागलपन की अवस्था में कहता रहा कि मैं तेरा दीवाना हूँ। इनमें से हरेक को तेरे एक-एक बाल पर न्यौछावर कर दूँगा। तू बेफिक्र रह। तेरे बारे में किसी की एक न सुनूँगा।

उस रात सारे अमीर और मलिक वापस हो गए। काज़ी जियाउद्दीन ने लौटते हुए दरबानों के बारे में नियमित पूछताछ की। भीतर एकांत में कुतबुद्दीन के पास खुसरो खां ही था। उसी वक्त खुसरो खां का मामा रंधौल कुछ बरवारियों के साथ परदों के पीछे छिपता हुआ वहाँ आया। काज़ी को पान का बीड़ा दिया।

तभी जहारिया बरवार नाम के एक आदमी ने वहीं काज़ी का कत्ल कर दिया। भारी शोर मच गया। शोरगुल वहाँ भी सुनाई दिया, जहाँ कुतबुद्दीन अपने प्रिय खुसरो खां के साथ अंतरंग स्थिति में था। उसने हंगामे की वजह पूछी। खुसरो दीवार तक गया और लौटकर बोला कि खासे के घोड़े छूट गए हैं। वे आंगन में दौड़ रहे हैं। लोग घेरकर पकड़ रहे हैं।

तभी जहारिया बरवार अपने लोगों के साथ वहाँ जा पहुँचा। इब्राहिम और इशहाक नाम के दो दरबानों को वहीं कत्ल दिया गया। अब कुतबुद्दीन को लगा कि कुछ गड़बड़ है। वह जूतियाँ पहनकर जनानखाने की तरफ भागने को हुआ।

खुसरो खां भांप गया कि अगर वह जनानखाने में चला गया तो मुश्किल होगी। वह पीछे दौड़कर उसके बाल पकड़कर खींच लेता है। झूमा-झटकी में वह गिर जाता है। सुलतान उसके सीने पर सवार है। जहारिया अपने साथियों के साथ वहाँ पहुँचा तो खुसरो चिल्लाया कि मुझे छुड़ा!

जहारिया बरवार ने सुलतान के सीने पर एक तीर मारा। बाल पकड़कर ज़मीन पर खींचा। उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। तब तक पूरे महल में बरवारों का कब्ज़ा हो गया था। दरबान भागकर कोने में छिप गए।

सुलतान का शव हज़ार सुतून के महल के आंगन में फेंक दिया गया। इस हत्याकांड के समय खुसरो खां का मामा रंधौल, उसका भाई हुसामुद्दीन और जहारिया समेत कई बरवार जनानखाने में जा पहुँचे। फरीद खां और उमर खां की माँ को कत्ल कर दिया गया। वह अलाउद्दीन खिलजी की औरत थी। भयावह उत्पात और चीख-पुकार से भरी उस रात हज़ार सुतून के महल से बरनी बता रहा है

महल अंदर और बाहर तक बरवारों और हिंदुओं से भरा हुआ है। खुसरो खां को फतह मिली है। अब यहाँ उसका कब्ज़ा है। सारी व्यवस्था भंग हो चुकी है। दूसरे ही रंग-ढंग शुरू हो गए हैं। वह बरवार बच्चा हिंदुओं की मदद से अलाउद्दीन की हुकूमत पर काबिज हो गया।

कुतबुद्दीन के भरोसेमंद लोग कत्ल कर जा रहे हैं। उनके घर-बार, धन-दौलत, औरतें और गुलाम बरवारों और हिंदुओं में बाँट दिए गए हैं। काजी जियाउद्दीन का घर रंधौल को मिला है। उसके औरत-बच्चे रात में ही भाग गए थे।

रंधौल को रायरायां की उपाधि दी गई। सुलतान के हत्यारे जहारिया को सोने और जवाहरात से सजाया गया। तख्त पर बैठने के पाँच दिन के भीतर महल में मूर्तिपूजा होने लगी है। बरवारों और हिंदुओं ने कुरान का कुर्सी के स्थान पर इस्तेमाल शुरू कर दिया। मस्जिद के ताकों पर मूर्तियाँ रखी हैं। कुफ्र और काफिरी परवान चढ़ रही है।

यह घटना कब की है और खुसरो खां असल में था कौन, जिसे बरनी ने बार-बार “बरवार बच्चा कहा है। महाकवि अमीर खुसरो ने तारीख दर्ज की है- 8 जुलाई 1320। वह बता रहा है-

हसन हिंदू खानदान से था। कुतबुद्दीन ने उसे खुसराे खां बनाया। उसे झंडे और निशान दिए। वज़ीर और नायब के ओहदे पर रखा। दोनों दो जिस्म एक जान थे। हसन का दिल साफ नहीं था। लेकिन इश्क में किसी का ज़ोर नहीं चलता।

हसन ने बगावत के इरादे से ब्रादो जाति के हिंदुओं को इकट्‌ठा कर लिया। ब्रादो जाति हिंदुओं में युद्ध करने का ही काम करती है। ये लोग हिंदू राजाओं के लिए अपनी जान पर खेल कर युद्ध करते हैं। हसन ने उन्हें धन-संपत्ति देकर इकट्‌ठा किया था। उस रात तुर्कों में हंगामा मच गया कि हिंदुओं को फतह हासिल हो गई है।

अमीर खुसरो के अनुसार कुतबुद्दीन की हत्या के समय उसके पाँच भाई जिंदा थे। 15 साल का फरीद खां, 14 साल का अबू बक्र खां, आठ-आठ साल के अली खां और बहादुर खां, पाँच साल का उस्मान खां।

कुतबुद्दीन कुल मिलाकर 4 साल 4 महीने ही दिल्ली में कब्जा जमाए रख पाया। यानी अलाउद्दीन खिलजी के खात्मे के समय उसका सबसे छोटा बेटा उस्मान आठ महीने का ही रहा होगा। खुसरो खां ने इन सबके कत्ल का हुक्म दिया। जनानखाने में मची चीखपुकार के बीच दो बड़े बेटों को कत्ल कर दिया गया। तीन छोटे भाइयों की आँखों में सलाई फेरकर उन्हें अंधा बना दिया गया।

खिलजियों का खेल सही मायने में आज खत्म हुआ। दिल्ली में अब खुसरो खां हेडलाइन में था। उसी के नाम के चर्चे थे। वह एक हिंदू खानदान से था। उसके मामा का नाम रंधौल मिलता है, जिससे जाहिर है कि ननिहाल पक्ष से वह मुसलमान नहीं बना था।

हम नहीं जानते कि हसन धर्मांतरण के पहले कौन था, किस परिवार से था और किन हालातों में उसने कब इस्लाम कुबूल किया था। एसामी ने अपनी खोजी नजर से पता लगाया है कि खुसरो खां पराव वंश का था और गुजरात का रहने वाला था।

इब्नबतूता कुतबुद्दीन के कत्ल के समय का एक अलग और बेहद दिलचस्प ब्यौरा दे रहा है। सुलतान के महल में 1,000 पहरेदार थे। हर रात 250-250 पहरा देते थे। बाहर के दरवाजे से भीतर के दरवाजे तक दो कतारों में हथियार लिए खड़े रहते थे। अंदर जाने वाले को इसी कतार के बीच से गुजरना होता था। सुबह दिन के पहरेदार इनकी जगह लेते थे। इनके ऊपर एक मुंशी इनकी हाजिरी पर नजर रखता था।

एक दिन खुसरो खां ने सुलतान से कहा कि कुछ हिंदू इस्लाम कुबूल करना चाहते हैं। उस समय यह रिवाज़ था कि जब कोई हिंदू मुसलमान होना चाहता था तो सबसे पहले वह बादशाह को सलाम के लिए हाज़िर होता था। बादशाह की तरफ से खिलअत और सोने के जेवर उसकी हैसियत के मुताबिक तोहफे के बतौर दिए जाते थे। सुल्तान ने उन लोगों को लाने के लिए कहा। उसने जवाब दिया कि वे लोग अपने रिश्तेदारों और हिंदुओं के डर से दिन में नहीं आ सकते। वह गर्मी के दिन थे। सुल्तान ने उन्हें रात में लाने को कहा।

8 जुलाई 1320 को दिल्ली में वह रक्तरंजित रात अलाउद्दीन खिलजी के खानदान की आखिरी रात थी।

अगले भाग में हम खुसरो खां को कत्ल होता हुआ देखेंगे और दिल्ली के दृश्य में एक नया किरदार सामने आएगा। इसका नाम है गाज़ी मलिक। खिलजियों के अहसान उस पर थे। वह बदला लेने आया। एक खूनी मुकाबले के बाद दिल्ली उसके हिस्से में आने वाली है।

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विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com