भारती
दूरसंचार कंपनियों से 92,000 करोड़ रुपये लेने की बजाय इसे माफ कर देना चाहिए
करण भसीन - 1st November 2019

पिछले गुरुवार (24 अक्टूबर) को सुनाए गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने दूरसंचार कंपनियों को आदेश दिया है कि वे सरकार को सभी बकाया तीन महीनों के भीतर चुकाएँ। इस निर्णय के बाद जुर्माने और ब्याज के रूप में दूरसंचार कंपनियों द्वारा दूरसंचार विभाग (डीओटी) को 92,000 करोड़ रुपये दिए जाने होंगे।

डीओटी और दूरसंचार कंपनियों के मध्य के मतभेद पर सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐसा ही निर्णय स्मरण हो आता है जो कुछ वर्षों पूर्व सुनाया गया था। हालाँकि, यह इससे संबंधित नहीं था।

यह दूसरा मामला था 2जी स्पेक्ट्रम का और इसके निर्णय का विश्लेषण आज भी देश-विदेश के कई जर्नलों में आकादमिक दृष्टि से किया जाता है। हाल के निर्णय के लिए इससे खराब कोई और समय नहीं हो सकता था क्योंकि इस क्षेत्र को लगातार दो बाहरी झटके लगे हैं।

पहला झटका 2जी के निर्णय से लगा और दूसरा भारतीय दूरसंचार कंपनियों के बीच चल रहे शुल्क युद्ध से। दूसरे झटके से भले ही ग्रहकों को लाभ मिला हो लेकिन दूरसंचार कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य की ओर देखना भी आवश्यक है।

वह भी उस समय जब पिछले दो वर्षों में इस क्षेत्र में हुई वृद्धि बाहरी ऋण के माध्यम से की गई हो। इसे परखने के लिए कुछ प्रश्न हैं। यदि सरकार इस 92,000 करोड़ रुपये को प्राप्त कर भी लेती है तो क्या होगा और यदि सरकार इस राशि को माफ कर देती है तो उसका क्या असर होगा?

अगर सरकार बकाया लेने पर ज़ोर देती है तो हम देखेंगे कि दूरसंचार क्षेत्र को विकास करने के लिए और बाहरी ऋण लेना होगा जो भविष्य की प्रगति के लिए इसकी निवेश क्षमता में बाधा बनेगा। साथ ही नए स्पेक्ट्रम आवंटनों के लिए इन कंपनियों के बोली लगाने की क्षमता घटेगी।

5जी स्पेक्ट्रम के लिए आधार मूल्य को कम करने के अनेक निवेदन दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र से मिलने वाले लाभ और स्पेक्ट्रम की बिक्री पर सरकार की राजस्व संबंधी अपेक्षाएँ मेल नहीं खाती हैं।

स्वराज्य  पहले भी इसपर तर्क दे चुका है कि 5जी स्पेक्ट्रम के मूल्य को कम से 30 से 50 प्रतिशत तक घटाया जाना चाहिए। इससे न सिर्फ स्पेक्ट्रम के अधिक बैंड बिकेंगे बल्कि ग्राहकों को भी सस्ते शुल्क पर 5जी सेवाएँ दी जा सकेंगी। भविष्य निवेश के लिए दूरसंचार कंपननियों के पास राशि रहेगी और बैंकों पर भी ऋण का भार नहीं आएगा।

यह हमें एक ऐसे मोड़ पर ले आता है जहाँ हम सोंचे कि क्या राष्ट्रीय संसाधनों के आवंटन से किराया (लाभ) कमाया जाना चाहिए? क्या यह पूर्ण रूप से सरकार के पास रहना चाहिए या इसका कुछ भाग निजी क्षेत्र के लिए भी छोड़ दिया जाना चाहिए?

उपरोक्त में से अंतिम विकल्प ही सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि यह क्षेत्र की प्रगति सुनिश्चित करने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी मूल्यवर्धक सिद्ध होगा। इसलिए आधार मूल्य और नीलामी प्रक्रिया को दूरसंचार क्षेत्र के लिए एक व्यापक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि 5 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के विज़न को पूरा करने में इस क्षेत्र की कितनी भूमिका रहेगी।

यह सुनने-पढ़ने में जितना जटिल लगता है, इसे लागू करना इसके आधे से भी कम जटिल है। इसके लिए आवश्यकता है कुछ विशेषज्ञों की जो इसके लिए क्रियाविधि नियोजित करेंगे। इससे हम स्पेक्ट्रम आवंटन के लिए सर्वश्रेष्ठ बोली प्रणाली विकसित कर पाएँगे।

तथ्य यह है कि यह क्षेत्र अपनी ही परेशानियों से जूझ रहा है और उसपर 92,000 करोड़ रुपये का यह अतिरिक्त भार लघु से मध्यम अवधि में इसकी प्रगति के लिए कष्टदायक होगा।

हम यह कदापि नहीं चाहेंगे कि अगले दो वर्षों में दूरसंचार कंपनियाँ गैर-निष्पादित परिसंपत्तियाँ बन जाएँ (एनपीए)। इन सबसे एक सरल बात समझी जा सकती है कि 92,000 करोड़ रुपये की राशि को माफ करने से अधिक भारी पड़ेगा इसे वसूल करना।

इस निर्णय से स्पष्ट हो गया है कि राजस्व में क्या-क्या आता है और इससे भविष्य में सरकार को लाभ मिलेगा। इसलिए 92,000 करोड़ रुपये की इस अप्रत्याशित आय को जाने देना दूरसंचार उद्योग के लिए आवश्यक निर्णय होगा।

साथ ही हमें सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (पीएसयू) भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलिकॉम निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) को दिए जा रहे कई हज़ार करोड़ के बेलआउट पैकेजों की तरफ भी देखना चाहिए।

इस पैकेज में एक अच्छी बात है स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वीआरएस) जो इन कंपनियों में कार्यरत लोगों की संख्या कम करके कंपनी का भार हल्का करेगी। समय के साथ-साथ इन दोनों कंपनियों का विलय करने की भी योजना है।

कंपनी के आकार को छोटा करने से यह लाभ होगा कि सरकार के पास उतनी ही कंपनी बचेगी जितनी रणनीतिगत दृष्टिकोण से आवश्यक है और शेष का निजीकरण किया जा सकता है। हालाँकि निजीकरण की संभवानाएँ अभी दूर दिख रही हैं। साथ ही उन्हें जीवंत करने के लिए 4जी स्पेक्ट्रम आवंटन की भी योजना है।

पैकेज की घोषणा के बाद से ही कंपनी की बाज़ार में खोई हुई भागीदारी को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी की अपनी सीमाएँ होती हैं।

और इसलिए मेरे जैसा एक आशावादी व्यक्ति भी इन दोनों पीएसयू की पलटी काया की कल्पना नहीं कर पा रहा है। लेकिन फिर भी यदि इन कंपनियों का काया पलट हुआ तो यह एक रोचक कहानी होगी जो दुनिया भर के प्रमुख व्यापार विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जानी चाहिए।

बीएसएनएल को जीवंत करने के लिए सुझावों की रिपोर्ट बनाने वाले प्रोफेसरों में से एक रेखा जैन ने भी स्वराज्य  को दिए एक साक्षात्कार में माना था कि वर्तमान में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों से कंपनी को जीवंत करना कठिन होगा।

हालाँकि इसकी अधिक संभवाना है कि यह लाभ की आशा में एक खराब वित्त को सुधारने के लिए निवेश किए गए अच्छे वित्त की अन्य कहानियों जैसी ही होगा। चमत्कार होते हैं लेकिन इसकी संभाव्यता पर प्रश्न करना भी नैसर्गिक ही है।

आने वाले दशकों में चिंता का विषय बनने वाली डिजिटल असमानताओं को मिटाने के लिए दूरसंचार क्षेत्र की बहुत आवश्यकता है। डिजिटल असमानताओं से निपटने के क्षेत्र में भारत ने अन्य देशों की तुलना में अब तक अच्छा प्रदर्शन किया है। लेकिन इस बढ़त को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि इस क्षेत्र की प्रगति सुनिश्चित की जाए।

ऐसा करने के लिए हमें अपनी बोली प्रणाली का पुनः अवलोकन करना होगा, जुर्माने और ब्याज की बकाया राशि को जाने देना होगा और अगले दशक के लिए एक आशानुसार नीति व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।