भारती
बिजली विधेयक प्रारूप में ऊर्जा सब्सिडी के अंत, शुल्क संरचना जैसे और क्या प्रस्ताव हैं

17 अप्रैल को ऊर्जा मंत्रालय ने बिजली अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2020 का प्रस्ताव सार्वजनिक कर दिया जिसपर 21 दिनों के भीतर सुझाव दिए जा सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र के विकास के लिए यह विधेयक 2003 के बिजली अधिनियम में संशोधन की बात करता है।

अर्थशास्त्रियों और नीति विचारकों के मुँह से आजकल एक वाक्यांश प्रायः सुनने को मिल जाता है कि ‘संकट को व्यर्थ न जाने दें, यह सुधार का एक अवसर है’। बात सही भी है और भारत में सुधार या तो चुपके से होते हैं (मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने ऐसा कहा है) या संकट से प्रेरित होते हैं जैसा 1991 के सुधारों में देखने को मिला था।

मोंटेक सिंह अहलूवालिया

ऐसे में आवश्यक है कि सुधार का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र चर्चा का विषय बने। दशकों से बिजली के मूल्य पर चर्चा चल रही है और अब सरकार बिजली विधेयक 2020 का प्रस्ताव लेकर आई है।

इस विधेयक पर चर्चा शुरू करने से पहले एक रोचक तथ्य जान लें- कई पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाएँ जिन्होंने निर्यात आधारित विकास रणनीति अपनाई थी, उन देशों में एक ऊर्जा नीति है जो आवासीय कनेक्शन पर अधिक शुल्क लगाकर औद्योगिक ऊर्जा शुल्क में छूट देती है। इसका अर्थ हुआ कि औद्योगिक ऊर्जा शुल्क आवासीय ऊर्जा शुल्क से कम होता है।

वहीं दूसरी ओर नेहरूवादी समाजवादी नीतियों के अनुसार चलते हुए हमने आवासीय क्षेत्रों को बिजली शुल्क में छूट दी है और उद्योगों से हम बिजली पर अधिक शुल्क वसूल रहे हैं।

इसके फलस्वरूप हमारे उद्योगों की उनके प्रतिस्पर्धियों की तुलना में लागत बढ़ जाती है। इसपर उच्चतर कर दर (20 सितंबर से इन्हें कम किया गया है), उच्च पूंजी लागत और जटिल विनियमन उद्योगों की समस्या और बढ़ाते हैं।

यह सब जानने के बाद आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जब अन्य पूर्वी एशियाई देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन किया तब हम पीछे क्यों रह गए। पिछले कुछ वर्षों में इनमें से कुछ मुद्दों पर नीति परिवर्तन देखने को मिले हैं। लेकिन इसके बावजूद भी ऊर्जा मूल्य ऐसा प्रमुख क्षेत्र रहा जहाँ सुधारों की आवश्यकता थी।

यूएस-चीन व्यापार युद्ध और अब कोविड-19 के कारण हम देखेंगे कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ अगले कुछ वर्षों में चीन से दूरी बनाएँगी। यह सुधार उत्प्रेरक हो सकता है जो कंपनियों को भारत को एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में देखने के लिए प्रोत्साहित करे।

नया विधेयक या कहें कि इसका प्रस्ताव बिजली वितरण क्षेत्र के पूर्ण कायापलट की चर्चा करता है जो वर्तमान में बिजली वितरण शृंखला का सबसे भेद्य भाग है।

हालाँकि मुख्य बिंदु रियायती बिजली दरों के संदर्भ में है। विधेयक सभी राज्य विनियामक आयोगों से बिना किसी छूट के खुदरा विक्रय के लिए अधिनियम के खंड 65 के तहत शुल्क निर्धारित करने को कहता है।

खंड 65 के अनुसार राज्य सरकार को सब्सिडी देना अनिवार्य है लेकिन राज्य आयोगों द्वारा शुल्क निर्धारित किए जाने में सब्सिडी का कोई उल्लेख नहीं है। अब खंड 65 के सब्सिडी वाले प्रावधान को हटाने का प्रस्ताव है व शुल्क राज्य आयोग ही निर्धारित करेंगे।

साथ ही यह औद्योगिक ग्राहकों पर लगाए गए अधिशुल्क को समय के साथ हटाने का प्रस्ताव देता है। वर्तमान में यह अधिशुल्क कृषि व आवासीय क्षेत्रों में छूट सहित बिजली देने में उपयोगी बनता है।

इसके अलावा नया विधेयक बिजली विभागों को राजस्व वसूली की टाल-मटोली रोकने के लिए प्रतिबद्ध भी करेगा।

सीधे शब्दों में कहा जाए तो यह विधेयक बिजली मूल्य में एक बड़े परिवर्तन का प्रस्ताव रखता है जहाँ ग्राहकों से वह शुल्क देने को कहा जाएगा जो आदर्श रूप से उन्हें देना चाहिए। अब तक बिजली का जो न्यूनतम शुल्क दिया जाता था अब उसका वास्तविक मूल्य पता चलेगा।

यह एक महत्त्वपूर्ण सुधार है और पारंपरिक नीतियों से एक बड़ी छलांग है जो हमें सार्वजनिक सुविधाओं को चुनावी लोभ के रूप में उपयोग किए जाने से दीर्घ अवधि में क्षेत्र के लिए होने वाली समस्याओं से दूर ले जाती है।

हालाँकि इस सुधार जितना ही महत्त्वपूर्ण होगा शासन को सशक्त करना जो ऊर्जा अनुबंधों को प्रभावी रूप से लागू कर पाए। पहले कई राज्यों ने इन्हें त्याग दिया है जिसके कारण इस क्षेत्र में भारी निवेश कर चुकीं कई कंपनियों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

बिजली वितरण लाइसेंसधारक और फ्रैन्चाइज़ी के मध्य भी अनुबंध होगा। बिजली उत्पन्न करने वाली कंपनी या लाइसेंसधारक को भी बिजली आपूर्ति, खरीद और प्रसारण के लाइसेंसधारी से दोनों पक्षों की अनुमति पर अनुबंध करना होगा।

नए अधिनियम के तहत कुछ विनियामक परिवर्तनों का भी प्रस्ताव है। हालाँकि पिछले अनुभवों को देखते हुए उनकी सफलता का निर्णय नहीं किया जा सकता है।

सुझाए गए परिवर्तनों में से एक है बिजली के लिए अपीलीय ट्रिब्युनल का गठन जिसके अधिकार एक सिविल न्यायालय की तरह ही हों। साथ ही एक नया विवाद सुलझाने वाले प्राधिकरण का भी गठन किया जाए। ये प्राधिकरण विनियमन, बिजली शुल्क और लाइसेंस संबंधी विवाद सुलझाएगा।

इस ट्रिब्युनल के सदस्यों के चयन के लिए जो आयोग होगा उसका अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा चयनीत सर्वोच्च न्यायालय का ही कोई न्यायाधीश होगा। इसके अतिरिक्त एक सदस्य केंद्र सरकार द्वारा चयनित केंद्रीय मंत्रालय का प्रभारी सचिव होगा। दो सदस्य दो राज्य सरकारों के मुख्य सचिव होंगे और एक अन्य सदस्य केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय का प्रभारी सचिव होगा।

यह प्राधिकरण अनुबंधों के अनुपालन को सुनिश्चित करेगा। अनुपालन बढ़ाकर ही बिजली क्षेत्र में निवेश को आकर्षित किया जा सकता है।

एक सरल ऊर्जा शुल्क को सैंद्धांतिक रूप से मुकदमेबाज़ी और विवादों को कम करना चाहिए। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन जो राज्यों की ओर से कड़े प्रतिरोध का सामना करेगा वह है बिजली आपूर्ति से पहले राज्यों द्वारा भुगतान के निरीक्षण के लिए भार प्रेषण केंद्रों की स्थापना।

विभिन्न राज्य सरकारों से भुगतान में अनुशासन स्थापित करना आवश्यक है।

नया अधिनियम प्रस्ताव उत्साहजनक है और उन सभी प्रमुख मुद्दों पर चर्चा करता है जो पिछले वर्षों में रेखांकित होते आए हैं।

ऊर्जा क्षेत्र को पंगु बनाने वाले और पिछले कई वर्षों से हमारे उद्योगों के विकास में बाधा बने हुए कुछ बहु-विलंबित मुद्दों को यह प्रस्तावित अधिनियम सुलझा सकता है।

यह प्रस्ताव उपयुक्त अवसर पर आया है जहाँ इसे आगे बढ़ाना तुलनात्मक रूप से सरल है।

हालाँकि आवश्यक यह होगा कि इस प्रस्ताव के साथ आगे बढ़ा जाए और सुनिश्चित किया जाए कि जो-जो इसमें प्रस्तावित किया गया है उसका अधिकांश भाग अंतिम अधिनियम में बना रहे।