भारती
समुदाय का दायित्व उठाना शौर्य का पर्याय है, मज़ाक में भी न करें शत्रुता- कुरल भाग 38

प्रसंग- 16-23 अगस्त 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित कवि तिरुवल्लुवर के शत्रु से व्यवहार और समुदाय के सदस्यों पर चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

चयनित कुरलों की शृंखला के अंतिम अंक को लिखते हुए मुझे अपेक्षा है कि 1,500 वर्षों पूर्व तमिल प्रांत में लिखे गए इन कुरलों मेंउत्कृष्ट सभ्यता की परछाई दिखी होगी। अगर सभ्यता न होती तो तिरुवल्लुवर की पुस्तक ऐसा रूप न ले पाती। कुरल सिर्फ कहावतों की पुस्तक नहीं है। इसमें मनुष्य के जीवन के हर आयाम को संबोधित किया हुआ है।

शत्रु

मज़ाक में भी किसी को शत्रु बनाने की कामना न करें।

किसी से शत्रुतापूर्ण संबंध स्थापित करना सदैव बुरा होता है।

सिपाहियों की शत्रुता उतनी बुरी नहीं होती जितनी उन लोगों की जिनका हथियार ही उनके शब्द हैं।

बिना सहयोगियों के शत्रु बनाना पागलपन से भी बुरा है।

अगर आपका कोई सहयोगी नहीं हैं और दो शत्रु हैं तो तुरंत उन दोनों में से किसी एक को मित्र बना लें।

जब आपका भाग्य बुरा चल रहा हो तो किसी को न मित्र बनाएँ, न शत्रु। भले ही आप किसी के प्रतिविश्वास या अविश्वास का भाव रखते हों लेकिन सबके प्रति तटस्थ रहें।

अपने शत्रुओं के समक्ष अपनी कमियाँ न उजागर करें, न अपने मित्र से राहत माँगने के लिए अपनी समस्याएँ बताएँ, अगर उन्हें पहले से नहीं पता है तो।

सफल कूटनीति वह होती है जिसमें आप अपनी समस्याएँ उजागर किए बिना सहायता माँगने में सफल हो जाते हैं।

किसी वस्तु को टालना मूर्खता है, काँटे को तब ही निकाल फेंके जब वह तरुण हो। अगर बड़ा होने के बाद आप उसे बटाने का प्रयास करते हैं तो उससे आपका हाथ ही आहत होगा।

अपने शत्रुओं के बल को समय पर कम करने में जो असफल हो जाते हैं, उनका विनाश निश्चित है।

नागरिक

समुदाय की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहने वाले व्यक्ति से अधिक प्रतिष्ठित व्यक्ति और कई नहीं होता।

समुदाय तब विकसित होता है जब इसके सदस्य परिश्रमी और ज्ञानवान हों।

अगर आप स्वयं को समुदाय की सेवा में लगाते हैं तो भाग्य आपका दास हो जाएगा।

अपने लोगों के मान के लिए पूरा श्रम करें और आप देखेंगे कि यह आपकी अपेक्षा से भी अधिक फल देगा।

जो अपने लोगों की सेवा करता है उसका मित्र संसार बनना चाहेगा और लोग उसे घेरे रहेंगे।

जिस समुदाय में आपका जन्म हुआ है, उसका दायित्व उठाना भी शौर्य का पर्याय ही है।

शूरवीर होते हैं वे लोग जो मात्र रणभूमि में ही नहीं बल्कि शांतिकाल में भी अपने लोगों का दायित्व उठाते हैं। समुदाय के लिए कार्य करने वाले लोगो अधिक साहसी और सक्षम होते हैं।

जो व्यक्ति समुदाय की सेवा के लिए प्रतिबद्ध है, वह उचित समय और स्वयं को मिलने वाली प्रतिष्ठा पर विचार करके ऊर्जा व्यर्थ नहीं करता।

जो व्यक्ति अपने समुदाय में सुधार लाने की ठान चुका है, उसे कष्ट झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। दूसरों के लाभ के लिए उसे अपने शरीर को शोक और कष्ट का पात्र मान लेना चाहिए।

समर्पित लोगों के पवित्र बलिदानों पर ही समाज के सुधार की आधारशिला स्थापित होती है।

जिस समुदाय में सार्वजनिक हित के लिए बलिदान देने वाले लोग नहीं होते हैं, उसपर दुर्भाग्य मंडराता है।

शृंखला समाप्त।

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