भारती
भारत स्वच्छता अभियान भाग 2- नागरिकता संशोधन विधेयक सत्ता नहीं, संस्कृति के लिए

विपक्ष के विचारहीन विलाप के बावजूद संसद के दोनों सदनों में नागरिकता संशोधन विधेयक का पारित होना भारत स्वच्छता अभियान भाग-2 है। यह भारत के लोकतंत्र के बगीचे में फैली खरपतवार, गाजरघास और अमरबेल की सफाई की अनिवार्य पहल है। यह ‘सेक्युलरिज्म के ओवरडोज़’ के कारण पैदा हुए ‘साइड इफेक्ट’ के उपचार की दिशा में एक उम्मीद भरा कदम है।

इन फैसलों को दलगत संकीर्ण दायरे के बाहर जाकर थोड़ा ठंडे दिमाग से देखा जाना चाहिए। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखने से बात अक्ल में आ जाएगी। भारत की मिट्‌टी, पानी और हवाओं में ही वे तत्व विद्यमान हैं, जो सबको एक दृष्टि से देखते हैं। इसमें धार्मिक आधार पर कोई दुराव कभी रहा ही नहीं।

भारतीय समाज के इसी ‘उदार ईको सिस्टम’ ने सदियों से सबको अपनाया। दोस्तों को भी, दुश्मनों को भी। हमलावरों को भी, कब्ज़ा करने वालों को भी। जिज्ञासुओं को भी, जाहिलों को भी। मंदिर तोड़ने वालों को भी, लूटने वालों को भी। भारत का धैर्य अंतहीन है।

एक गरिमामय बुजुर्ग की तरह वह बाहर से आए उत्पाती शैतान बच्चों को 1,000 वर्ष तक देखता रहा कि ये कर क्या रहे हैं? भारत की किसी किताब में दूसरों को नुकसान पहुँचाने का कोई अंध-दर्शन नहीं है। धार्मिक विद्वेष किसी ऋषि, संत और कवि की वाणी में नहीं है। भारत की विचार परंपरा ने धरती को एक परिवार कहा। पत्थर, पेड़, पानी और पहाड़ तक में परमेश्वर को देखा।

मजहब की खोखली बुनियाद पर देश की भयानक टूट-फूट को भी यह देश सहन कर गया। खंडित होकर स्वतंत्र हुए भारत में अलग से ‘सेक्युलरिज्म’ के नकली आवरण की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन उसे फौरन ‘सेक्युलरिज्म का ओवरडोज़’ पिला दिया गया।

एक ऐसी गलत शुरुआत, जिसमें बहुत खुशी से एक को खुश करने के लिए 100 को हाशिए पर धकेलने की नीति अपनाई गई। यह इसी ओवरडोज़ के साइड इफेक्ट थे कि एलर्जी पैदा करने वाली गाजरघास को हम शुरू से ही फैलता हुआ अपने आसपास देखते हैं। दिल्ली में जेएनयू उसकी ही एक हरी-भरी नर्सरी बनकर सामने आया है।

कश्मीर में वह गाजरघास 370 के रूप में फैलाई गई, जिसने आखिरकार 1990 में लाखों पंडितों को अपने पूर्वजों की ज़मीन से हमेशा के लिए बेदखल कर दिया और घाटी को अलगाव-आतंक की ज़मीन बना दिया। वही सोच सोमनाथ के मंदिर के पुनर्निमाण का विरोधी स्वर बनकर उभरी लेकिन लौहपुरुष के आगे उसे दुम दबाना पड़ा।

अयोध्या, मथुरा और काशी के घावों पर मख्खियाँ भिनभिनाती रहीं। हज सब्सिडी का प्रसाद, मुल्लों को वेतन, कब्रिस्तानों की हिफाजत के लिए ज़मीन और कोष, रोजा इफ्तारी की सरकारी-सियासी रौनकें, देश के संसाधनों पर मुसलमानों का पहला हक मानना, नेताओं के सिर पर जालीदार टोपियाँ, भारत के सनातन प्रतीकों को उपहास में उड़ाने की आत्मघाती प्रवृत्ति और आखिर में हिंदू टेरर थ्योरी, यह सब सेक्युलरिज्म के ओवरडोज़ के साइड इफेक्ट्स की एक लंबी फेहरिस्त है।

कम्युनिस्टों ने इस जहरीले घालमेल में अपने घातक नुस्खे मिलाकर भारत विरोधी सोच का रंग और निखारा। उसी ज़हर ने आज़म-औवेसी जैसे चेहरे गढ़े। अब सबके बेनकाब चेहरे उतरे हुए हैं।

मैं इन घातक दुष्प्रभावों की शुरुआत उस खिलाफत आंदोलन में देखता हूँ, जो महात्मा गांधी की एक भयंकर भूल थी। मुसलमानों के सस्ते समर्थन के लिए देश को दाँव पर लगाने की एक नासमझ पहल। कोई ज़रूरत ही नहीं थी। कहीं तुर्की में किसी खलीफा को खत्म किया गया था, इसका भारत से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं था। किसी को कोई मतलब ही नहीं था।

लेकिन खिलाफत आंदोलन का वह महान आइडिया हमारे राष्ट्रपिता के दिमाग में आया, जिसने आजा़ादी की लड़ाई में एक बड़ी भूमिका निभा रही पार्टी के हाथों में गाजरघास के बीज के बोरे थमा दिए। उसी दूषित दृष्टि ने बापू को जिन्ना में कायदे-आजम के दर्शन कराए। आजादी के बाद इसी विषैली विरसत ने भारत को दम घोंटू बना दिया।

2019 के अगस्त के महीने से शुरू हुआ यह एक तरह का भारत स्वच्छता अभियान भाग-2 ही है। इसका मंगलाचरण कश्मीर से 370 की सफाई से हुआ। तीन तलाक कानून, एनआरसी और बीच में संयोग से आए अयोध्या के फैसले को भी इसमें जोड़ सकते हैं।

अब नागरिकता संशोधन विधेयक एक बड़ा कदम है। सत्ता के सुहाग से उजड़ी सूनी मांग वाली खानदानी पार्टी अब भी खिलाफत की खुमारी में है। उसकी आँखों की रोशनी मंद है, जिसे देश दिखाई नहीं देता। कानों से सुनाई देना तो काफी पहले से खत्म है। उसकी बुझती नब्ज को देश की नब्ज क्या खाक समझ में आएगी। आती तो वह खुद इस दुर्गति को उपलब्ध नहीं होती।

बटवारे के बाद सरहद पार के मुल्कों में बचे-खुचे हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसियों की नारकीय हालत दुनिया ने देखी है। आंँकड़े सामने हैं। घटनाएँ रोज़ होती हैं। बांग्लादेश के पत्रकार सलाम आजाद ने बेबाकी से अपने मुल्क में इनके खात्मे पर किताबें लिखी हैं। तस्लीमा नसरीन दिल्ली में ही कहीं पनाह लिए हैं।

पाकिस्तान के 23 फीसदी हिंदू कहाँ हज़म होकर दो2 फीसदी से कम बचे, किसे चिंता है? अफगानिस्तान के 25 लाख सिख 5 फीसदी भी नहीं बचे, किसका ध्यान गया? और अपने खंडित कश्मीर से बेदखल एक पूरी जाति तो हमारे सामने ही है, सेक्युलर नेताओं को क्यों यह सब दिखाई नहीं दिया?

जो भारत में हो रहे इन बेहद ज़रूरी बदलावों को किसी मजहबी दायरे से बाहर नहीं देख पा रहे, वे अब भी भारत और भारतीयता को समझने में नाकाम हैं। सत्ता में बने रहने के लिए उसी सस्ते समर्थन की सोच से बाहर नहीं हैं, जो खिलाफत आंदोलन की जड़ थी। वह सोच आज भी जिन्ना में कायदे-आजम के पवित्र दर्शन करके सत्ता का पुण्य प्राप्त करना चाहती है।

जबकि सन् 47 से ही होना यह चाहिए था कि मजहब के आधार पर टूटे इस मुल्क के मुसमलानों को दिशाभ्रम में धकेलने की बजाए उन्हें उनकी खोई हुई सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाई जाती। उन्हें याद दिलाना था कि वे अतीत में बलपूर्वक धर्मांतरित किए गए उन्हीं हिंदुओं और बौद्धों के वंशज हैं, जिनकी वर्तमान पीढ़ी पाकिस्तान और बांग्लादेश में अंतिम सांस ले रही है। हुआ उल्टा। गाजरघास यहाँ अलगाव की अमरबेल बनकर फैला दी गई।

सेक्युलर पार्टियों ने सत्ता में बने रहने के लिए देश को दाँव पर लगा दिया। दुनिया में ऐसे निकृष्ट नमूने न के बराबर होंगे। लेकिन भारत असीम धैर्य वाला देश है। वह 1,000 साल तक उत्पाती शैतान बच्चों को भी खटपट करते देखता रहा। भारत ने खुद को टूटता हुआ भी देखा और घायल अवस्था में स्वाधीनता का स्वाद भी चखा। उसने सेक्युलरिज्म का ओवरडोज़ भी पी लिया, जिसके घातक साइड इफेक्ट तो होने ही थे। इस इलाज की जरूरत कबसे उसे थी। समय सबका इलाज कर देता है।

भारत के धैर्य को प्रणाम किया जाना चाहिए! समान नागरिक संहिता और जनसंख्या नियंत्रण तक यह स्वच्छता अभियान यूँ ही चलना चाहिए! सत्ता क्षणभंगुर है। संस्कृति शाश्वत है। जिन्होंने सत्ता के लिए राष्ट्र और संस्कृति की उपेक्षा की, वे इतिहास के कूड़ेदान में कराह रहे हैं!

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com