भारती
नागरिकता संशोधन अधिनियम पर अब बौद्धिक छलावा और नहीं

आखिर क्या कारण है कि एक खास समूह, एक खास वर्ग और एक खास संप्रदाय के लोगों को नागरिकता संशोधन अधिनियम एवं नागरिकता संशोधन कानून से इतनी अधिक पीड़ा हो रही है। बहुत चिंताजनक बात है कि भारत के मुस्लिम वर्ग में इस बात को लेकर के बहुत भारी उबाल है।

उनमें नाराजगी है कि बांग्लादेश अफगानिस्तान और पाकिस्तान के मुस्लिमों को भारत की नागरिकता क्यों नहीं दी जा रही है। कोई भला उनसे यह पूछे कि पाकिस्तान बांग्लादेश या अफगानिस्तान में राजकीय धर्म इस्लाम है कि नहीं। ऐसे में इस्लाम को मानने वाले वहाँ क्यों प्रताड़ित किए जाएँगे ?

अन्य कारणों से, राजनीतिक कारणों से उनमें प्रताड़ना हो यह बात तो समझ में आती है लेकिन सांप्रदायिक अथवा धार्मिक कारणों से उन्हें प्रताड़ित किया जाए यह बात तो अविश्वसनीय और आश्चर्यजनक होगी। अन्य कारणों से भारत की शरण मांगने वालों का रास्ता तो पहले से ही बदस्तूर खुला है, उसमें कोई बदलाव नहीं है। वह कानून तो वैसे ही लागू है। तो क्या समझें कि उनकी पीड़ा यह है कि हिंदुओं के लिए रास्ता आसान क्यों किया? यानि कि 20-30,000 सताए हुए हिंदुओं को भारत की नागरिकता मत दो, करोड़ों अवैध घुसपैठियों को दो।

वहाँ रह रहे अल्पसंख्यकों को सिर्फ इस आधार पर भारत की नागरिकता दी जा रही है कि वे सांप्रदायिक कारणों से प्रताड़ित किए जा रहे हैं, शोषित किए जा रहे हैं। इसमें तो कोई संदेह नहीं है ना? उनके मूलभूत अधिकार भी वहाँ सुरक्षित नहीं है। सामान्य मानव अधिकारों की घोर अनदेखी की जा रही है।

उनका जीवन नारकीय हो चुका है। उनकी आँखों के सामने उनकी नाबालिग बालिकाओं को उठा लिया जाता है, अपहरण करके बलात्कार किया जाता है एवं अपनी मनचाही जगहों पर उनका निकाह करा कर धर्म परिवर्तन कर दिया जाता है।

यह तो सभी जानते हैं कि एक बार इस्लाम (भले ही जबरन) स्वीकार करने के बाद लौटने की एक ही सूरत है, मौत। इस सबके बावजूद किसी भी थाने पुलिस अथवा कचहरी कोर्ट में उनकी सुनवाई भी नहीं होती है। एक मध्ययुगीन व्यवस्था के तहत वहाँ अल्पसंख्यकों को आज से नहीं, आजादी वाले दिन से ही पाशविक जीवन जीने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

ऐसे में जब उनके पास अपनी आस्था पर चलने वाला अन्य कोई भी मुल्क उपलब्ध नहीं है तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र को यह दरियादिली दिखाना कहाँ से गलत है? आखिर वहाँ के अल्पसंख्यक कहाँ जाएँगे? इनकी पीड़ा को कौन सुनेगा? कौन-सा देश है जो इन्हें नागरिकता देने के लिए तत्पर है?

लेकिन भारत में रह कर भारत को  सैक्यूलरिज्म का पाठ पढ़ाने वाले, देश और भारत में ही रहने वाले बौद्धिक विकलांग भारत को वसुधैव कुटुंबकम का ज्ञान पढ़ाने वाले लोग साफ-साफ क्यों नहीं कह देते हैं कि गैर मुस्लिमों को जीने का कोई हक ही नहीं है, भारत में भी नहीं है। वे यह स्वीकार करने में संकोच क्यों करते हैं कि वर्तमान सरकार ने भारत में दारुल इस्लाम या निजाम ए मुस्तफा की स्थापना में बहुत बड़ी बाधा खड़ी कर दी है?

ये लोग किस पाखंड का दिखावा कर रहे हैं? साफ क्यों नहीं कह देते कि हम हर आतंकी, उन्मादी, जिहादी को भारत में बसाना चाहते हैं और यहाँ की मुस्लिम जनसंख्या को विस्फोटक बढ़ोतरी देना चाहते हैं ताकि लेबनान, लीबिया की तर्ज़ पर पूरी संस्कृति को निगल जाएँगे। ताकि इंग्लैंड, बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी की तर्ज़ पर देश को अन्य धर्मों के लिए जहन्नुम बना देंगे।

नागरिकता कानून पर होने वाली यह प्रतिक्रिया अप्रत्याशित नहीं है। जैसे कीटनाशक का छिड़काव करते ही सभी कीड़े बाहर आ जाते हैं वैसे ही भारत के सभी सैक्यूलर, लिबरल, बहुत से बुद्धीजीवी भी अतिसंवेदनशील हो गए हैं। अब बुद्धिजीवियों की एक अन्य टीम सरकार को वसुधैव कुटुंबकम्  का हवाला दे रही है, बार बार।

इस महान विचार के निर्वहन का पूरा दायित्व भी उन्होंने भारत सरकार के झोले में डाल दिया है। वे यह भी तो बताएँ कि हम भारतीय तो समस्त पृथ्वी को अपना परिवार मानते हैं कि नहीं? पारसियों की एकमात्र नौका भारत में आई थी। तो क्या इस देश में पारसी समुदाय नहीं फला-फूला ?

जामनगर (गुजरात) से करीब 25 किलोमीटर दूर बालाचडी शहर का स्मरण कीजिए। नवनगर (अब जामनगर) के राजा जाम साहेब दिग्विजय सिंह ने 1,000 अनाथ पोलिश बच्चों को तब भारत में शरण दी थी, जब 1942 में जर्मन नाज़ी सैनिकों ने उनके देश पर हमला किया था।

अंग्रेज़ भी तो भारत में व्यापारी बन कर शरण मांगने आए थे। यह बात और है कि धोका हमने खाया, दिया नहीं। सैंकड़ों उदाहरण हैं भारत के पास जब इसने संसार की हर प्रजाति, हर सभ्यता और संस्कृति का स्वागत किया, उन्हें आत्मसात किया। लेकिन कभी धोका दिया नहीं।

वसुधैव कुटुंबकम् को सिर्फ कहा नहीं, हमेशा जिया भी। लेकिन अन्य संस्कृतियाँ तो इसे मानने को तैयार ही नहीं हैं। एक भाई साहब कहते हैं कि सारी दुनिया मुस्तफा या खलीफा की है, दूसरे कह रहे हैं जीज़स की होनी चाहिए। तो हम ख्वामखां ही इस परिवार को ढोए जा रहे हैं। एक परछाईं का पीछा किए जा रहे हैं जो सिर्फ चकमा दे रही है।

वसुधैव कुटुंबकम् का सिद्धांत सापेक्ष है, निरपेक्ष नहीं हो सकता। जैसे भाई भाई के सिद्धांत में दोनों पक्षों का भाई मानना आवश्यक है, सिर्फ एक के मानने से कुछ नहीं होगा, भाई भाई की उपमा मिथ्या हो जाएँगी, अर्ध सत्य और लंगड़ी हो जाएगी।

गएये थे, बहुत बड़े दलित नेता और चिंतक, श्री जोगेंद्र नाथ मंडल। भाई भाई का नारा लेकर ही पाकिस्तान चले गए थे, 70 लाख हिंदुओं को साथ लेकर। बेचारे दो साल तक अकेले ही भाई भाई करते रहे। पलट कर उनको ज़लालत मिली। समाप्त कर दिए गए सारे के सारे।

बेआबरू होकर वतन लौट आए क्योंकि वहाँ भाई की परिभाषा बिल्कुल भिन्न है, सुस्पष्ट है और सदियों से लागू है। वे लोग नहीं जानते हमारे वाले “भाई भाई” का मतलब। हम जानते भी हैं और मानते भी हैं। इस लिए हमारे देश में सभी संस्कृतियाँ सुरक्षित भी है और संरक्षित भी।

लेकिन अब फिर से भारत को निगलने की योजना है। फिर से इसके टुकड़े करने की आवाजें उठ रही हैं। वे कहते हैं हमारे लोगों को आने दो, लाखों-करोड़ों की संख्या में आने दो। वे अपने मकसद में कोई मिलावट नहीं करते हैं। वे अपने धार्मिक आदेशों की पालना पूरी शिद्दत और 100 फीसदी ईमानदारी से करते हैं। उनको दोषी करार देना निहायत मूर्खता है।

उन्होंने “हमारे लोगों” की परिभाषा भी छिपाई नहीं है। वे कभी छिपाते भी नहीं हैं। उन्होंने अपनी मंशा भी कभी छिपाई नहीं। कश्मीर, केरल, बंगाल, कहीं भी नहीं छिपाई। पूरे संसार में, जब से वे प्रकट हुए हैं, तब से आज तक कभी भी नहीं छिपाई।

आज भी सड़कों पर खुलकर बता रहे हैं। छिपाने का काम, छद्म आवरण ओढ़ने का काम उन लोगों ने कभी नहीं किया। यह काम तो सिर्फ उनके इकतरफा इश्क में दीवाने “भाई” ही करते रहे हैं जो कहीं पर वामपंथी का चोला ओढ़कर बैठे हैं, कहीं एनजीओ, कहीं लिबरल सैक्यूलर राजनीतिज्ञों का और कहीं प्रोग्रैसिव इंटलैक्चुअल का।

ये वाले भाई कहते हैं कि उनको शरण भी दो, नागरिकता भी दो, मताधिकार भी दो। ज़रूर देना चाहिए। लेकिन जो सताए हुए हिंदू परिवार हैं उनको रोको, उनको मरने दो। पाकिस्तान में भी नहीं, बांग्लादेश में भी नहीं, अफगानिस्तान में भी नहीं। कहीं नहीं, बस समुद्र में फेंक दो, ऐसा चाहते हैं। क्योंकि, उनकी मान्यता पर चलने वाला कोई देश नहीं है। इसलिए या तो वे मान्यता बदलें या मरने को तैयार रहें।

वे कहते हैं कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। बुद्धिजीवी जी! आप भी तो हिंदू ही हैं? कि नहीं? तो आप जैसे और नहीं हैं क्या भारत में? होंगे, लाखों नहीं, करोड़ों होंगे। नहीं तो 80 प्रतिशत की आबादी वाले हिंदू इसे एक दकियानूसी, कट्टरपंथी तथाकथित हिंदू देश बना ही देते, कई बार।

बनाया तो नहीं। इसलिए नहीं बनाया कि हिंदु राष्ट्र का कोई नक्शा ही नहीं बना सकता। कोई संविधान ही नहीं लिख सकता। कोई परिभाषित भी नहीं कर सकता। कुल मिलाकर हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा इतनी सी है कि-

इस देश को खलिफत बनने से बचा सके, इस देश को वैटिकन के विस्तार से बचा सके। इस देश को मार्क्स, लेनिन और नक्सलियों से बचा सके। इस देश को जातिगत, जन्मगत ऊँच-नीच से, छूआ-छूत से बचा सके। बस, फिर जो कुछ बचेगा वो भारत होगा और वह ही हिंदू राष्ट्र होगा जैसा हजारों वर्षों से रहा था।

ऐसे देश से नाहक ही डर रहे हैं, डरा रहे हैं। सांप्रदायिक दैत्यों को रोकने की कोशिश से इतने नाराज़ क्यों हो रहे हैं? भारतीय मुसलमान, ईसाई, सिख या पारसी गर्व से जीवन यापन कर रहे हैं, करते रहेंगे। वे सब खुशहाल हैं। समरस हैं। एक समान हैं और अपने-अपने किरदार में उन्नतिशील हैं। और हाँ, भारत हमेशा अपने अश्फाक उल्लाहों, अब्दुल कलामों, अब्दुल हमीदों और मुहम्मद रफिओं पर बेमिसाल जान न्योछावर करता है, उनपर गर्व करता है और सदैव करता रहेगा।

सुभद्र पापडीवाल एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार हैं। करुणा संस्था एन जी ओ के अध्यक्ष हैं। वे आंपइंडिया व ऋतम में अपने आलेख लिखते रहे हैं।