भारती
चित्तौड़ में 30,000 हिंदुओं का कत्ल- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल भाग 21

28 जनवरी 1303 को अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर कब्ज़ा करने का निर्णय किया। आज के सीरिया में उभरे इस्लाम के स्वयंभू खलीफा के इस्लामिक स्टेट (आईएस) की तरह उसके झंडे का रंग भी काला था। काले बादलों की तरह ये झंडे एक बड़ी लुटेरी फौज के साथ दिल्ली से चित्तौड़ के लिए रवाना हुए।

सबसे खास बात यह है कि महाकवि अमीर खुसरो भी चित्तौड़ की इस मुहिम में अलाउद्दीन के साथ है। चितौड़ पहुँचते ही हमलावरों को दो तरफ से किला घेरने का हुक्म होता है। हमलावर अपने शिविर लगाकर बैठ जाते हैं। किसी चत्रवारी नाम की पहाड़ी पर अलाउद्दीन अपना शिविर लगाता है। अमीर खुसरो यहीं से बता रहा है-

“फौज दो महीने तक चित्तौड़ पर हमले करती रही लेकिन फतह हासिल नहीं हो सकी। तब तक सुलतान पूर्वी पहलवानाें को पश्चिमी पहलवानों से लड़ाता रहा। आखिरकार चित्तौड़ के जिस किले में जहाँ चिड़िया भी दाखिल नहीं हो सकती थी, सुलतान वहाँ 25 अगस्त 1303 को दाखिल हो गया।

चित्तौड़ का राय उसकी सेवा में माफी मांगने के लिए हाज़िर हुआ। उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया, लेकिन सुलतान भारी गुस्से में था और वहाँ के 30,000 हिंदुओं को कत्ल कर दिया गया।

चित्तौड़ का नया नाम खिज्राबाद रखा गया और खिज्र खां के सिर पर लाल छत्र रखा गया। उसने जवाहरात जड़े हुए लिबास पहने। काले और हरे रंग के झंडे लगाए गए। खिज्र खां को सम्मानित करने के बाद फौज को दिल्ली लौटने का हुक्म हुआ।”

खिज्र खां खिलजी का बेटा था। अब चित्तौड़ उसके बाप की जागीर थी, जिसे एक झटके में उसके नाम ही कर दिया गया। पहली बार खिलजी ने किसी शहर का नाम बदला है। पहचानें सिर्फ इंसानों की नहीं बदल रही थीं। गाँव और शहरों के भी इस्लामी नामकरण संस्कार शुरू हो गए थे।

एसामी के मुताबिक चित्तौड़ में आठ महीने तक जंग छिड़ी रही थी। इससे हम यह अंदाज़ा ही लगा सकते हैं कि हिंदुओं ने किस कदर जी-जान लगाकर इतने लंबे तक खिलजी के संगठित लुटेरों का मुकाबला किया होगा। हिंदुओं की बहादुरी की कई कहानियाँ भी होंगी, लेकिन आखिरी नतीजे क्रूर विजेताओं के महिमामंडन में मददगार साबित हुए।

मांडू और मालवा तहस-नहस, महलकदेव काे मारा

मध्य प्रदेश में राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा से सटे इस इलाके में 300 साल से परमार वंश का राज्य था। राजा भोज इस राजवंश में सबसे प्रसिद्ध हुए हैं। पहले इनकी राजधानी उज्जैन थी, लेकिन भोज ने धारा को अपनी राजधानी बनाया, जो आज का धार शहर है।

परमारों ने उज्जैन, धार और मांडू में संस्कृत की शानदार पाठशालाएँ और सरस्वती के मंदिर बनवाए थे। परमारों के पहले मगध के गुप्त और मौर्य वंश के सम्राटों ने भी इस इलाके को सदियों तक रौनकदार बनाया था। संस्कृत के महाकवि कालिदास यहीं के थे और खगोलशास्त्री वराहमिहिर भी उज्जैन के पास के थे। यह अवंतिका जनपद था।

पहली बार 1235 में इल्तुतमिश ने उज्जैन में महाकाल मंदिर को मिटा डाला था। अब 70 साल बाद अलाउद्दीन खिलजी ने पूरी तरह इस इलाके पर कब्जे की नीयत से एनुलमुल्क नाम के अमीर को हमले की जिम्मेदारी दी। धार और मांडू में इस्लाम के अनुयायियों का यह पहला परिचय होने वाला था। उज्जैन के पतन के समाचार उन्हें इल्तुतमिश के ही समय मिल गए होंगे। अब एक नए शिकार के लिए दिल्ली से एक बार फिर खिलजी की लुटेरी फौजें बाहर निकलीं। अमीर खुसरो की रिपोर्ट

“मालवा का राय महलकदेव और कोका प्रधान, जिनके पास 30-40,000 सवार थे, घमंड का सुरमा आँखों में लगाए रहे। सुल्तान ने चुनी हुई फौज इनसे जंग के लिए भेजी, जिसने हिंदू सैनिकों की बुरी तरह हत्या की। कोका भी तीर से घायल होकर मारा गया। उसका कटा हुआ सिर सुलतान के दरबार में भेज दिया गया।

सुलतान ने मालवा एनुलमुल्क को ही सौंप दिया। उसे हुक्म दिया गया कि वह मांडू पर भी कब्ज़ा करे। महलक देव अपने किले में था। एनुलमुल्क ने मालवा में विरोधियों का खात्मा कर दिया और महलक देव के किले पर हमला बोला। महलक देव मारा गया। फतह का हाल लिखकर सुल्तान के पास भेजा गया। सुलतान ने मांडू भी उसे सौंप दिया। इस फतह की तारीख है 23 नवंबर 1305।”

1307 में देवगिरि पर दूसरा हमला

अलाउद्दीन के हाथों देवगिरि की महालूट को 10 साल हो चुके थे। तब तो वह दिल्ली में भी नहीं था। लेकिन इन 10 सालों में यादव वंश के राजा रामदेव को दिल्ली से आने वाली खबरों में खिलजी के तौर-तरीकों और इरादों की जानकारी मिलती ही रही होगी।

इसी देवगिरि की लूट में हासिल बेहिसाब दौलत ने इलाहाबाद के पास कड़ा-माणिकपुर के मामूली हाकिम अलाउद्दीन खिलजी को दिल्ली पर कब्ज़ा करने की ताकत दी थी। दिल्ली पर कब्ज़ा जमाने के बाद 1299 में गुजरात पर राजा कर्ण पर हमला बोला गया था और कर्ण ने भागकर देवगिरि की ही शरण ली थी। यानी तीन साल बाद ही रामदेव को अलाउद्दीन के कारनामे अपने जैसे गुजरात के एक और भुक्तभोगी कर्ण ने सुनाए हाेंगे।

आज 24 मार्च 1307 की तारीख है। हमें यहाँ से अमीर खुसरो बता रहा है– “राय रामदेव एक जंगली घोड़े जैसा था, जो एक बार वश में किया जा चुका था और उसका राज्य उसे ही सौंप दिया गया था। लेकिन वह लगाम को भूल गया था।

मलिक बारबक को उसे फिर से वश में करने के लिए भेजा गया। इस्लामी सवारों ने राय की सेना पर हमला बोला। उसकी आधी सेना उसके बेटे के साथ भाग गई। राय और राज परिवार को पकड़ लिया गया। लूट के माल में से सुलतान का हिस्सा अलग कर बाकी सेना में बांट दिया गया। राय को दिल्ली लाया गया। छह महीने तक उसे दिल्ली में रखा गया। इसके बाद उसे वापस भेज दिया गया।

देवगिरि पर हुए इस दूसरे हमले पर जियाउद्दीन बरनी के पास यह जानकारी है– “पहली बार मलिक काफूर हज़ार दीनारी को देवगिरि भेजा गया। वहाँ रामदेव ने विद्रोह शुरू कर दिया था। कई सालों से दिल्ली में सुलतान को कोई कर नहीं भेजा था।

मलिक काफूर ने देवगिरि पर हमला करके विध्वंस कर दिया। रामदेव और उसके बेटे बंदी बना लिए गए। उसका खजाना और 17 हाथी हाथ लगे। सेना को भी लूट में बेहिसाब दौलत मिली। देवगिरि से फतह की खबरें दिल्ली आईं तो मस्जिदों के मिंबर से पढ़ा गया।

मलिक नायब रामदेव और उसकी दौलत के साथ दिल्ली पहुँचा। जो कुछ लाया गया, उसे सुलतान के सामने पेश किया गया। सुलतान ने रामदेव को आदर-सम्मान दिया। उसे रायरायां की पदवी दी गई। लाव-लश्कर के साथ उसे और उसके बेेटों को देवगिरि वापस किया गया। उसके बाद रामदेव आजीवन आज्ञाकारी बना रहा। दिल्ली में बराबर खिराज और तोहफे भेजता रहा।

अलाउद्दीन खिलजी ने रामदेव की एक बेटी से शादी भी की, जिससे उसे एक बेटा हुआ। एसामी ने रामदेव की बेटी का नाम झिताई लिखा है। उनके बेटे का नाम उमर था। जब अलाउद्दीन खिलजा मरा तब उमर खां की उम्र छह साल से कुछ ही महीने ज्यादा थी।

ताकतवर मलिक काफूर ने इसी उमर को शहाबुद्दीन की उपाधि देकर सुलतान बना दिया था और खुद उसका नायब बना रहा। एक महीने में काफूर को भी कत्ल कर दिया गया। चंद महीनों बाद ही शहाबुद्दीन को फिर उसके ही सौतेले भाई कुतबुद्दीन ने मरवाया। जान से मारने के पहले उसकी उंगलियाँ काटकर पहले उसे ग्वालियर के किले में कैद किया गया था।

हम नहीं जानते कि राजा रामदेव की वह अभागी बेटी फिर कहाँ रही और कब तक जिंदा रही? बेटा छह साल का था तो उसकी उम्र भी 24-25 साल से ज्यादा तो नहीं ही होगी। हम आगे देखने वाले हैं कि अलाउद्दीन खिलजी की मौत और अपने सात साल के बेटे के कत्ल के समय उसके आसपास हर रोज सिर्फ कत्ल की ही खबरें थीं। हर कोई एक दूसरे को मार रहा था।

रामदेव की बेटी ने देवगिरि से यहाँ लाए जाने के पहले न तो ऐसा कभी देखा होगा और न ही राजपरिवार की उम्रदराज महिलाओं से ऐसा कभी सुना होगा। उस अजनबी लड़की के लिए दिल्ली में यह एक नई संस्कृति के दर्शन थे, जो एक नया हिंदुस्तान गढ़ रही थी। आजाद भारत के इतिहासकार दो संस्कृतियों के मेलजोल की कहानियाँ लिखने वाले थे। गंगा-जमनी संस्कृति!

1308 में सिवाना में शीतलदेव का कत्ल

राजस्थान में आज के बाड़मेर के पास। अमीर खुसरो ने सिवाना की दिल्ली से 100 फरसंग यानी 300 मील की दूरी बताई है। 3 जुलाई 1308 को दिल्ली से खिलजी के लुटेरों ने यहाँ का रुख किया। राणा शीतलदेव खिलजी के समय सिवाना के राजा थे। दो तरफ से इस प्रसिद्ध पहाड़ी किले को घेरा गया। उस समय युद्ध में इस्तेमाल किए जाने वाले सारे उपकरण लगाए गए-मंजनीक, पाशेब और गरगच। पाशेब के ऊँचे मचानों के जरिए खिलजी के लोग किले पर पहुँचे। खुसरो लिख रहा है

“पाशेब से सेना के लोग किले पर टूट पड़े लेकिन किले वाले भागे नहीं। उनके सिर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। जो भागे उनका पीछा किया गया। कुछ हिंदुओं ने जालौर की तरफ भागने की कोशिश की। उन्हें पकड़ लिया गया। 10 सितंबर 1308 की सुबह शीतलदेव का मृत शरीर पेश किया गया। इसके उपरांत सुलतान दिल्ली रवाना हो गया।

एसामी ने बताया है कि दिल्ली और कस्बों की तरफ से बेफिक्र होने के बाद सुलतान दिल्ली से निकला और सिवाना का किला घेरा। 40 दिन तक यहाँ लड़ाई चलती रही। लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद सुलतान ने किले के चारों ओर अपनी फौज के कई दल बनाए। सबने मिलकर सब हमला बोला तो हिंदू सफल नहीं हो सके। शीतलदेव हताश हो गया। खिलजी की फौज किले में दाखिल हो गई। शीतलदेव को पकड़ लिया गया। उसे कत्ल कर दिया गया।

चित्तौड़ में आठ महीने यानी 240 दिन और सिवाना में लगातार 40 दिन लंबी लड़ाइयाँ! तब दिल्ली से देवगिरि का रास्ता भी करीब 40 दिन का था। फिर वहाँ भी महीनों तक पूरे इलाके को कई-कई बार रौंदा गया।

एक-एक दिन उन दुर्गम पहाड़ी किलों के भीतर क्या कुछ घटता होगा, सुबह से शाम तक उन हिंदुओं के दैनिक क्रियाकलाप क्या रहते होंगे जब चारों तरफ 20-30 हजार लुटेरे हमलावर घेरा डालकर पड़े रहते होंगे।

किले के भीतर मौजूद औरतों और बच्चों पर क्या बीतती होगी। जौहर में जल मरने से जो बच जाती होंगी, उनकी जिंदगी पलक झपकते ही किस नर्क में बदलती होगी। हफ्तों और महीनों के झपट्‌टे में कामयाब होने पर जब वे बहेलिए एक अराजक और उन्मादी भीड़ की शक्ल में कत्लेआम और लूट के इरादे से सदियों पुराने किलों और चमचमाते महलों में दाखिल होते होंगे तो किस बेरहमी से पेश आते होंगे! जिंदगी को किस जहालत में डाल दिया गया था।

कल्पना भी कितनी भयावह है। लेकिन वह हम सबकी एक भोगी हुई और भूली-बिसरी बेहद कड़वी हकीकत है। एक बार नहीं कई बार भोगा गया सच। एक जगह नहीं कई जगहों पर घटती रही कभी न थमने वाली एक त्रासदी। एक सदी में नहीं, हर सदी में हुआ कानों को फाड़ने वाला हो-हल्ला। सदियों तक पसरा रहा मातम।

एक ही समय में अलग-अलग इलाकों में सिर्फ 20 सालों के अंतराल में राजा रामदेव, राजा कर्ण, राणा हमीरदेव, राणा रतनसिंह, महलकदेव, राणा शीतलदेव, राजा रुद्रदेव अपने-अपने राज्यों में शासन कर रहे थे। इन सबने अपने इलाकों में बेशकीमती मंदिर, महल, तालाब और तीर्थ बनवाए थे। इनके राजवंशों ने हरेक ने पीढ़ियों से कुछ न कुछ नया जोड़ा था।

उन इलाकों में जाकर देखिए खंडहरों में खोई अपने समय की वह समृद्ध विरासत आज भी हमें हैरत में डाल देती है, जो उस समय की सांस्कृतिक और आर्थिक समृद्धि के ही शानदार सबूत हैं। लेकिन वे सब एक के बाद एक सिर्फ एक शातिर खिलजी की क्रूरता के शिकार बनते चले गए।

भारत का आसमान नाउम्मीदी की गहरी चादर से ढक गया था। कोई नहीं जानता था कि इस रात की सुबह कब होगी? होगी भी कि नहीं होगी? किसी ने कल्पना भी नहीं होगी कि आगे जाकर यह देश किस शक्ल में दुनिया के सामने आएगा?

तब सेक्युलर शब्द किसी ने नहीं सुना था। कौमी भाईचारा जैसे अल्फाजों की ईजाद होने में अभी कुछ और सदियाँ बाकी थीं। माइनॉरिटी नाम की चिड़िया अभी आकाश में उड़ी नहीं थी। वह किसी घोसले में भी नहीं थी। गंगा-जमनी राग उस समय के गायकों के ख्याल में भी कहीं नहीं था।

ये तो हम आज सुुनते हैं जब कहीं लिटरेचर फेस्टिवल की रौनकदार तकरीरों में मशहूर शायर जनाब जावेद अख्तर साहब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बड़े फख्र से फरमाते हैं कि इस मुल्क में हिंदू-मुसलमान सदियों से शांतिपूर्वक साथ रहते आए हैं साहब। मगर ये फिराकपरस्त ताकतें हमें बांटने पर तुली हैं। हमारे बीच ज़हर फैलाने की कोशिश कर रही हैं। लीजिए एक शेर सुन लीजिए…!

अगले हफ्ते हम दिल्ली में ठहरेंगे, जहाँ मुगलों का बड़ा हत्याकांड हुआ है और मारे गए मुगलों के कटे हुए सिरों की मीनार बंदायू दरवाजे पर बनवाई गई है। इनकी तादाद हजारों में है। यह मीनार अलाउद्दीन खिलजी की खूनी यादगार को लंबे अरसे तक ज़िंदा रखने वाली है।

पिछला भाग- “हिंदुओं का दमन कर अलाउद्दीन खिलजी ने बढ़ाई इस्लाम की इज़्ज़त”- जानकार (भाग 20)

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com