भारती
चीनी नागरिकों, आपका शत्रु भारत नहीं बल्कि आपकी अपनी कम्युनिस्ट पार्टी

लद्दाख की गलवान घाटी में 20 भारतीय सैनिकों की हत्या के बाद भारत-चीन संबंधों पर जो प्रभाव पड़ा है, उसका असर 5,000 वर्षों के अविरल इतिहास वाली दो बड़ी सभ्यताओं के लोगों के आपसी संबंध पर भी दिखेगा। बॉट समेत कुछ चीनी नागरिकों समेत ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर भारत और भारतीयों के विरुद्ध उगला गया विष इसका साक्ष्य है।

इसकी आवश्यकता नहीं थी और चीन पर भारतीय मुद्रा को अच्छी तरह से समझने का प्रयास होना चाहिए। भारत चीन के लोगों या उसके निगमों के विरुद्ध नहीं है, भारत को विरोध चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के प्रति है।

जिस प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप के लोग जर्मन लोगों से नहीं लड़ रहे थे- हालाँकि युद्ध में लोगों और शासकों के बीच अंतर को मानसिक स्तर पर स्वीकार करना कठिन होता है- उसी प्रकार भारत को स्पष्ट कर देना चाहिए कि यह युद्ध चीनी लोगों के विरुद्ध नहीं है। भारत और चीन के बीच पूर्ण युद्ध संभवतः नहीं होगा लेकिन भारत का कर्तव्य है कि वह चीन के लोगों की नज़रों में सीपीसी को गिराए।

5,000 वर्षों के अविरल इतिहास में और हिमालय द्वारा भारत व चीन के मध्य प्राकृतिक सीमा होने के कारण दोनों के मध्य कभी युद्ध नहीं हुआ। सभी युद्ध पश्चिम के कारण हुए और आज भी ही सत्य है। केवल चीन के कम्युनिस्ट बनने के बाद ही हिमालय भी युद्ध को रोक न सके।

1962 का युद्ध संभवतः कभी होता ही नहीं यदि चीन पर चियांग काइ-शेक शसान कर रहे होते। दुर्भाग्यवश, द्वितीय वर्ष के कुछ समय बाद ही, बीजिंग की सत्ता कम्युनिस्टों के हाथों में चली गई और चियांग एक छोटे से द्वीप पर ही शासन कायम रख पाए जिसे आज ताइवान के नाम से जाना जाता है।

ताइवान चीन के लिए खतरा है, सैन्य शक्ति के कारण नहीं बल्कि इसलिए कि चीन उस स्वतंत्रता के विचार से भयभीत है जिसका प्रतिनिधित्व ताइवान (या हॉन्ग कॉन्ग) करता है।

कम्युनिस्ट लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते हैं, न ही किसी के साथ सत्ता की साझेदारी में, न अपने या बाहरी लोगों के साथ संचार की पारदर्शिता में। चीन के परमाणु शस्त्रागार को छोड़कर कम्युनिस्ट पार्टी के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो अडोल्फ हिटलर की नेशनल सोशलिस्ट पार्टी से भिन्न हो।

परमाणु शस्त्रागार और आंतरिक संचार पर पूर्ण नियंत्रण, यह सुनिश्चित करता हुआ कि बाहरी दुनिया पार्टी की प्रोपगैंडा मशीन के विरुद्ध चीनियों को सशक्त न कर सके। सीपीसी लोगों की शत्रु है, ऐसा हमने 1989 के तियानमेन चौक नरसंहार में भी देखा था- इसी वर्ष में सोवियत संघ बर्लिन की दीवार को गिरने से न रोक सका था और स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी सोवियत संघ में सत्ता खो चुकी थी।

बर्लिन की दीवार के टूटने की घटना से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने विपरीत सीख ली- इसने दीवारों की अधिकता पर ज़ोर दिया, न कि कम करने पर। इसे दीवार की आवश्यकता थी, न सिर्फ बाहरी लोगों से अपनी रक्षा केलिए बल्कि अपने लोगों से भी। इसलिए इसने अपने लोगों को एक ऐसी दीवार में घेर दिया है, जैसा स्टेलिन भी नहीं कर सका था।

आश्चर्य की बात यह है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के युग में जब सूचना के प्रवाह को नियंत्रित कर पाना लगभग असंभव है, तब भी यह दीवार कितनी कारगर है। किसी जगह की सरकार ऐसा नहीं कर पाई है और अब इसी तथ्य को स्वीकार कर चुकी हैं कि सूचना का प्रवाह केवल ऊपर से नीचे नहीं बल्कि ऊपर से नीचे व किसी भी दिशा में हो सकता है।

लेकिन चीन के पास बॉट और सेन्सर की बड़ी सेना है, इतनी की कोई भी बाहरी सूचना अंदर नहीं पहुँच पाती। चीन के लोग वही देखते-सुनते-पढ़ते हैं जो उनकी सरकार चाहती है। चीन के पास दो सेनाएँ हैं- एक जो इसकी सीमाओं और सीपीसी की रक्षा कर रही है और दूसरी वह जो सूचना को नियंत्रित कर रही है ताकि वहाँ के लोगों तक ऐसी जानकारी न पहुँचे जो सीपीसी की सत्ता को चुनौती देती हो।

ऐसा नहीं है कि चीनी मूर्ख नागरिक हैं जिन्हें यही नहीं पता कि राष्ट्रवाद और पार्टी अनुशासन के नाम पर उनके साथ क्या हो रहा है। हालाँकि उनके और पार्टी के बीच में एक मौन स्वीकृति हो चुकी है- लोग पार्टी के पूर्ण नियंत्रण को स्वीकार करेंगे जब तक वे धनवान और समृद्ध होते रहेंगे।

यही सामाजिक सहमति है जिसे तोड़ा जाना चाहिए। यदि चीनी शासकों को बाहर का रास्ता दिखाया जाए तो विश्व सभी नागरिकों के लिए एक अधिक सुरक्षित स्थान बन सकेगा।

कम्युनिस्ट पार्टी को घुटनों पर झुकाने और अपने लोगों के प्रति उसे उत्तरदायी बनाने के लिए भारत से उठ रही व्यापार बहिष्कार की माँग इस तर्क का समर्थन करती हैं। यदि विश्व ऐसा करने का साहस दिखाए और चीनी उत्पादों एवं पुरजों पर निर्भरता कम कर सके तो सीपीसी अपने सामाजिक समझौते को पूरा नहीं कर पाएगी।

आश्चर्य की बात है कि यूएस छोटे ईरान या सिकुड़ रहे रूस पर प्रतिबंध लगाने को तैयार है लेकिन विश्व शांति के लिए चुनौती बन चुके डायनासौरी चीन पर नहीं। भारत यदि सोचे कि वह अकेले ऐसा कर पाएगा तो वह मूर्खता होगी। चीन को तब ही नियंत्रित किया जा सकता है जब एशिया और पश्चिम के लोकतंत्र इसके विरुद्ध अनौपचारिक (या औपचारिक) गठबंधन करें।

हमारे 20 वीर सैनिकों के बलिदान का बदला लेने के लिए हम सीमा पर जो करें, उसके अतिरिक्त हमारा ध्यान चीन के साथ व्यापार संबंधों में भारी कटौती पर होना चाहिए। साथ ही हम वैश्विक साझेदार बनाएँ जो हमारी इस योजना को बल दे।

जिस प्रकार हिटलर को एक वैश्विक गठबंधन से हराया जा सका था, उसी प्रकार शी जिनपिंग और उनकी ठग-समान पार्टी को चीन पर व्यापारिक व राजनीतिक प्रतिबंधों के माध्यम से एक वैश्विक गठबंधन हराए। चीनी लोग इससे बेहतर के अधिकारी हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।