भारती
चीनी घुसपैठ भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर में? कैसे रखा जाए ड्रैगन को बाहर

ब्रूकिंग्स इंडिया के एक अध्ययन ‘पैसे का अनुगमन’ के अनुसार 2014 से चीनी कंपनियाँ भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में निवेश करती आ रही हैं, विशेषकर उपकरणों और परियोजना-विशिष्ट मशीनों के माध्यम से।

अधिकांश निवेश वृत्ताकार दिशा में होते हैं इसलिए भारत में चीनी निवेशों का कुल परिमाण निकालना कठिन है। अध्ययन के अनुसार अब तक भारत में चीन के वर्तमान और नियोजित निवेश मिलाकर 26 अरब डॉलर को पार कर गए हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर में चीन की घुसपैठ

2000 के दशक से ही भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर परिदृश्य में चीनी उपकरण और मशीन कंपनियाँ अपनी जगह बना चुकी हैं। इनमें से कुछ हैं-

  • चांग्शा आधारित निर्माण कंपनी सानी, विश्व में भारी उपकरणों की छठी सबसे बड़ी विनिर्माता है। भारत में इसके कुल निवेश 8.6 करोड़ डॉलर (600 करोड़ रुपये) पार कर चुके हैं, इसके अलावा 14 करोड़ डॉलर (1,000 करोड़ रुपये) का और निवेश निर्धारित है।
  • लियुगॉन्ग विश्व की 10वीं सबसे बड़ी निर्माण उपकरण विनिर्माता है। इंदौर के निकट मध्य प्रदेश के पीतमपुरा में उसका संयंत्र 4.3 करोड़ डॉलर (300 करोड़) रुपये के निवेश से स्थापित किया गया है और अब 3.5 करोड़ डॉलर (250 करोड़ रुपये) के अतिरिक्त निवेश से इसका विस्तार किया जा रहा है।
  • चीन रेलवे रोलिंग स्टॉक कॉरपोरेशन (सीआरआरसी) एक राज्य के स्वामित्व वाला उद्यम है जो टीन के सड़क व रेलवे खिलाड़ियों में से प्रमुख है। सीआरआरसी ने नागपुर मेट्रो से कोच आपूर्ति का 10 वर्ष का अनुबंध पाया था। कोलकाता मेट्रो परियोजना में भी इसने एक अनुबंध जीता था।
  • ज़िनजिन्ग समूह एक इस्पात कंपनी है जिसका तीन भारतीय साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम है। कर्नाटक में 1.25 अरब डॉलर (8,735 करोड़ रुपये) के निवेश की इसकी योजना है।
  • एक और प्रमुख निवेश सिंगशैन होल्डिंग समूह से हैं। 1 अरब डॉलर के निवेश से गुजरात के धोलेरा में एक एकीकृत इस्पात संयंत्र की इसकी योजना है।

गलवान घाटी में भारत-चीन के आमने-सामने के बाद भारत में चीनी निवेशों के विरुद्ध कई प्रतिक्रियाएँ देखने को मिली हैं। पिछले सप्ताह की कुछ घटनाएँ-

  • दिल्ली-मेरठ रैपिड रेल परिवहन प्रणाली (आरआरटीएस) एशियन डवलपमेंट बैंक (एडीबी) द्वारा वित्तपोषित है। इसका एक अनुबंध शंघाई टनल इंजीनियरिंग को दिए जाने की बात सामने आई थी क्योंकि इसी कंपनी की बोली सबसे कम है। हालाँकि अनुबंध पर हस्ताक्षर नहीं किए गए हैं इसलिए केंद्र ने इस बात का खंडन कर दिया है। लेकिन एडीबी, वर्ल्ड बैंक जैसी वित्तपोषण संस्थाओं को अनुबंध निरस्त करने के लिए मना पाना कठिन होगा क्योंकि वे कंपनियों और देशों के आधार पर भेदभाव नहीं करते हैं।
  • भारतीय रेलवे ने जानकारी दी है कि बीजिंग राष्ट्रीय रेलवे शोध एवं डिज़ाइन संस्थान के सिग्नल एवं संचार समूह को दिए गए अनुबंध को प्रगति की धीमी गति के कारण निरस्त कर रहा है। पूर्वी समर्पित मालवाहक गलियारे की 400 किलोमीटर लंबी रेल लाइनों पर सिग्नलिंग प्रणाली लगाने के लिए 2016 में डीएफसीसीआईएल ने इसे अनुबंध दिया था।
  • दूरसंचार विभाग (डॉट) ने राज्य के स्वामित्व वाली भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) को निर्देश दिया है कि नेटवर्क को अद्यतित कर 4जी करने के लिए यह टेंजर पर पुनः कार्य करे। निर्देश में विशिष्ट रूप से कहा गया है कि बीएसएनएल चीन-निर्मित उपकरणों का उपयोग 4जी नेटवर्क सुविधाओं के अद्यतन में न करे। डॉट ने दूरसंचार खिलाड़ियों को भी चीनी उपकरणों और पुरजों पर निर्भरता कम करने के लिए कहा है।

निवेश के वैकल्पिक रास्तों की खोज

कोविड-पश्चात आर्थिक मंदी से उभरने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर भारत के लिए कुंजी है। भविष्य के सभी अनुमानों में इस वित्तीय वर्ष के लिए जीडीपी अंकों में भारी गिरावट का अंदेशा है। अगर भारत को वी-आकार के सुधार का साक्षी बनना है तो इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश से ही आगे बढ़ा जा सकता है।

वी-आकार वक्र का उदाहरण

वित्तीय वर्ष 2020 से 2025 तक इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्रों में भारत में कुल 111 लाख करोड़ रुपये के कुल पूंजी व्यय की बात कही गई है। इस लागत को वित्तपोषित करना एक बड़ी चुनौती रहेगी क्योंकि जीडीपी के अनुमान  भी अनुकूल नहीं हैं।

द्विपक्षीय, बहुपक्षीय और संप्रभु फंड से बाहरी कोषों को आकर्षित करने से बात बन सकती है। वित्तपोषण के लिए आवश्यक कुछ स्रोत निम्न हो सकते हैं-

  1. इंफ्रा बैंकिंग को बल देना। समय आ गया है कि भारत एएआईबी की तरह अपना एक बैंक शुरू करे और लोकतांत्रिक देशों को इससे जोड़े। शुरुआत हम क्वाड देशों- यूएस, जापान और ऑस्ट्रेलिया से कर सकते हैं।
  2. एनआईआईएफ को दोगुना करें। भारत को अपने संरचनात्मक सुधारों को गहरा करना होगा और फिर वैश्विक संप्रभु संपत्ति कोषों को एनआईआईएफ में निवेश के लिए आमंत्रित करना होगा। जियो मंचों के साथ रिलायंस ने जो किया है, हम उससे सीख ले सकते हैं। रिलायंस ने वैश्विक संपत्ति कोषों और निजी इक्विटी साझेदारों को निवेश के लिए आमंत्रित किया है। इसी प्रकार एक मंच की तरह भारत को अपनी एनआईपी परियोजनाओं को प्रचारित करना होगा।
  3. द्विपक्षीय समझौते करें जिससे एडीबी, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक जैसी बहुपक्षीय एजेंसियों को दरकिनार किया जा सके ताकि देश विशिष्ट खंडों को जोड़कर हम किसी विशेष राष्ट्र को अनुबंध प्राप्त करने से रोक सकें। वर्तमान में जब भारत चीनी राज्य की कंपनी द्वारा कम बोली के आधार पर जीते गए अनुबंध को निरस्त करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, तब उसे इसका महत्त्व समझ आएगा।

भारत में सबसे कम बोली के आधार पर अनुबंध सौंपा जाता है। इससे सरकार और अधिकारी स्वयं को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त रख पाते हैं। इसी कारण कई चीनी कंपनियाँ अनेक अनुबंध जीत चुकी हैं। पिछले कुछ महीनों के अनुभव से अब हम समझ चुके हैं कि बोली के लिए अन्य देशों के लिए जो नियम हैं, वे सीधे चीन पर लागू नहीं किए जा सकते।

ऐसे में हमें दीर्घ अवधि के रणनीतिक हितों के विषय में सोचकर अपनी नीतियों में परिवर्तन करना होगा। हमारी संरचनाएँ नियम आधारित हैं लेकिन चीन के लिए हमें एक दूसरी संरचना निर्मित करनी होगी ताकि हम उसे अपनी अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने से रोक पाएँ।

कम मूल्य के आधार पर चीनी निवेश जो भारत में आ रहे हैं, यदि उन्हें रोकना है तो हमें एक वैकल्पिक मार्ग तैयार करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान पर भारतीय उपकरण निर्माताओं को चीनी निर्माताओं का स्थान लेने का प्रयास करना चाहिए।

इंफ्रा मूल्य शृंखला में वित्तपोषण एक महत्त्वपूर्ण कड़ी होती है। भारत को अपनी भू-राजनीतिक परिस्थिति का लाभ उठाना चाहिए और वैश्विक वित्त को भारत की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहिए।

यह लेख सुदीप श्रीवास्तवकरण भसीन के लेखों पर आधारित है। अनुवाद व संपादन निष्ठा अनुश्री द्वारा।