भारती
मीडिया और विश्वविद्यालयों के माध्यम से भारत को खोखला करने का प्रयास करेगा चीन

आशुचित्र- चीन जानता है कि भारतीय मीडिया, भारतीय व्यापारों और भारतीय अकेडमिक्स में प्रभाव को कैसे खरीदा जाए।

मई में चीनी सैनिकों द्वारा पूर्वी लद्दाख के भारतीय भूभाग पर अतिक्रमण के प्रयास के विरुद्ध भारत की सैन्य और आर्थिक कार्रवाई ने चीन को हतोत्साहित किया है। गत सप्ताह में भी भारत ने चीन के प्रयासों को नाकाम करते हुए पैंगोंग सो झील के आसपास की कई चोटियों पर कब्ज़ा जमा लिया है।

भारत में प्रतिबंधित चीनी ऐपों की सूची भी हाल में लोकप्रिय वीडियो गेम पबजी समेत 118 ऐपों के प्रतिबंधित किए जाने के बाद लंबी हो गई है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में भारतीय कर प्राधिकरणों ने मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन को सफेद करना) की जानकारी के बाद चीनी कंपनियों पर छापा मारा है।

इन सबके बावजूद यदि हम सोच रहे हैं कि चीन को हम झुका देंगे तो हम गलत हो सकते हैं। चीन के शी जिनपिंग और उनकी सेना ने भारत-चीन सीमा पर सैन्य प्रबंधन सिर्फ इसलिए नहीं किया है कि जब कहा जाए तो वे पीछे हट जाएँ।

वे अब दूसरे स्थानों पर कार्रवाई करेंगे और सर्वाधिक संभावना है कि वे भारतीय मीडिया और कॉरपोरेट हितों का उपयोग करेंगे चीन के विरुद्ध खड़े होने के हमारे राष्ट्रीय संकल्प को दुर्बल करने के लिए। चीन जानता है कि भारतीय मीडिया, भारतीय व्यापारों और भारतीय अकेडमिक्स में प्रभाव को कैसे खरीदा जाए।

यूएस की खूफिया एजेंसियों ने अमेरिका के विश्वविद्यालयों के अकेडमिक्स को चीन के लुभाने की क्षमता पर पहले ही लाल बत्ती का संकेत दे दिया है। माना जा रहा है कि सौदों के माध्यम से इन शैक्षिक स्थलों को अपने ही देश की गुप्तचरी करने के लिए लुभाया जा सकता है।

इसके बाद कोई कारण नहीं बचता है कि यूएस से कम धनवान देश भारत में वे ऐसा न कर पाएँ, विशेषकर तब जब कम्युनिस्ट पार्टियाँ और टुकड़-टुकड़े गैंग चीन की निंदा करने से बचते दिखाई देते हैं। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी के भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से निकट संबंध हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने के लिए होने वाले सौदों की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता है।

भारतीय व्यापार के व्यापारिक हित बड़ी मात्रा में चीन में हैं, ऐसे में भारतीय व्यापार में रुचि रखने वाली चीनी कंपनियों में गुप्तचरों की भर्ती की संभावना अधिक है। लेकिन सर्वाधिक दृष्टि मीडिया पर रखने की आवश्यकता है क्योंकि अधिकांश मीडिया संस्थाएँ अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं।

पिछले सप्ताह मुझे आश्चर्य हुआ था देखकर कि कैसे सीएनबीसी टीवी-18 पर चीनी राजदूत सन वीदॉन्ग को कितनी आसानी से प्रसारण समय मिला और वह भी एक ऐसे साक्षात्कार के माध्यम से जो पूर्व-लिखित लग रहा था। ऐसा भी लगा कि राजदूत टेलीप्रॉन्पटर से पढ़कर अपने बयान दे रहे हैं।

पहले प्रश्न से ही लग गया कि राजदूत से सिर्फ सरल प्रश्न पूछे जाने हैं। पूछा गया, “भारत-चीन के संबंध एक मोड़ पर हैं। आप वर्तमान में चल रहे रीसेट पर क्या सोचते हैं और भविष्य में इसका साझेदारी पर क्या प्रभाव होगा?”

“मोड़”, “रीसेट” और “साझेदारी” जैसे तटस्थ शब्दों का उपयोग आप सीमाओं पर चीनी आक्रामकता के कारण दोनों देशों के बीच खराब हुए संबंधों के लिए कैसे कर सकते हैं जबकि इस सैन्य तनाव के बीच दोनों पक्षों से दर्जनों सैनिक हताहत हुए हैं। राजदूत को इसी प्रश्न की प्रतीक्षा था, उन्होंने कहा,

आप सही हैं कि आपने भारत और चीन की साझेदारी की बात की। हमारे द्विपक्षीय संबंधों का यही आधार है। चीन-भारत के संबंधों पर चीन के मूल विचारों में कोई परिवर्तन नहीं आया है। चीन और भारत साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं और हमारे बीच खतरा नहीं अवसर हैं।

दोनों देशों के नेताओं की इसपर सहमति है और इसे जारी रखा जाना चाहिए। सालों से रहे एक निकट पड़ोसी को सिर्फ एक घटना से “शत्रु” और “खतरा” कहना गलत है। हमें एक दूसरे का सम्मान और सहयोग करना चाहिए। संदेहऔर गलतफहमी दूर करके एक-दूसरे के प्रति राजनीतिक विश्वास लाना चाहिए।

आश्चर्य होता है यह देखकर कि साक्षात्कार लेने वाले ने यह तक नहीं पूछा कि जब-तब विवादित भूभाग पर अपना कब्ज़ा जमा लेना कोई “एक” घटना नहीं है। वहीं दूसरी ओर चीन का मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स  धमकी दे रहा है कि यदि भारत चीन के आगे नहीं झुका तो “1962 से भी अधिक नुकसान होगा”।

समस्या यह नहीं है कि चीनी राजदूत भारतीय मीडिया में अपनी बात कह पा रहे हैं, समस्या यह है कि चीन नियंत्रित मीडिया के वातावरण में इसका उलट नहीं हो पाता।

हालाँकि चीन के आधिकारिक बयानों के कपट को हम अपने दो-मुँहे बयानों से काट सकते हैं जैसा विदेश मंत्री एस जयशंकर ने किया यह कहकर कि कूटनीति से मामला निपटाया जाएगा जबकि हमारे जवा पैंगोंग सो की चोटियों पर कब्ज़ा कर रहे हैं, लेकिन चीन दूसरे क्षेत्रों में आगे है। मीडिया का द्वार उसके लिए खुला है।

भारत को समझना चाहिए कि अप्रत्यक्ष स्रोतों से चीनी पैसा नई और पुरानी मीडिया कंपनियों में आएगा, विशेषकर उन कंपनियों में जो मोदी-विरोधी हैं या टुकड़े-टुकड़े गैंग की समर्थक। ये पैसा हवाला के माध्यम से या चीन पर अस्तित्व के लिए आश्रित भारतीय व्यापारों के माध्यम से आ सकता है।

चीन को भारत से किए गए निर्यात को अधिक दिखाकर यह आसानी से किया जा सकता है, अतिरिक्त रुपये को भारतीय मीडिया या शैक्षिक संस्थानों में दिया जा सकता है जो चीन के विरुद्ध एकजुट होकर खड़े होने के भारतीय प्रयास को क्षीण करेंगे।

सीधे कहा जाए तो भारतीय खूफिया एजेंसियों को निम्न वस्तुओं पर दृष्टि रखनी चाहिए-
पहला, चीन कई बार आने-जाने और वहाँ अधिक समय व्यतीत करने वाले पत्रकारों पर।

दूसरा, चीनी लेन-देन पर आधारित भारतीय व्यापारों पर जो अचानक भारतीय मीडिया में निवेश या शैक्षिक संस्थानों को दान देने के इच्छुक हो जाते हैं।

तीसरा, चीन में भारतीय कंपनियों के कर्मचारियों पर क्योंकि उन्हें जाल में फँसाकर गुप्तचरी के लिए कहा जा सकता है।

चौथा, चीनी कन्फ्यूशियस संस्थानों और चीन से फंड प्राप्त कर रहे भारतीय विश्वविद्यालयों पर। लगता है इन गतिविधियों के प्रति सुरक्षा एजेंसियाँ चौकन्नी भी हो चुकी हैं। भारतको अपनी रक्षा करनी होगी।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।