भारती
चंद्रशेखर आज़ाद के प्रखर पुरुषार्थ ने उन्हें मृत्युपर्यंत भी आज़ाद ही रखा

प्रसंग- 23 जुलाई को चंद्रशेखर आज़ाद की 113वीं जयंती है। इस उपलक्ष्य पर पढ़ें इस वीर स्वतंत्रता सेनानी के विषय में।

“किसी समाज को समाप्त कर देने का सबसे प्रभावी साधन उस सभ्यता को उसके इतिहास से वंचित कर देना और उसके इतिहास को मिटा देना है।”- जॉर्ज ऑरवेल

हमारा कुछ इतिहास अंग्रेज़ों ने मिटा दिया और कुछ स्वतंत्रता के बाद की व्यक्तिपूजक राजनीति की बलि वेदी चढ़ गया। स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षों में व्यक्ति और परिवार विशेष के महिमा-मंडन में हम कुछ ऐसे लिप्त हुए कि हमारी चाटुकारिता की चाशनी में डूबी क़लम हमारे उन महानायकों को लील गई जिन्हें आज़ादी के बाद की राजनीति में कोई स्थान सिर्फ इस कारण नहीं मिला क्योंकि वे अपना सर्वस्व स्वराज्य के स्वप्न को सत्य करने भस्म कर गए।

बिस्मिल, अशफ़ाक़ और आज़ाद का नाम सिरे से पोंछ कर हमने गीत गाया- “दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढ़ाल”- और हमने उन क्रांतिवीरों को भुला दिया जिन्होंने खड्ग-तलवार का वीरतापूर्वक सामना किया और राष्ट्र सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। स्वर्गीय मन्मनाथ गुप्त लिखते हैं कि 1942 के भारत छोड़ो तक सत्याग्रह इतना दिशाहीन हो चुका था कि जब गांधी जी ने करो या मारो का स्वर दिया तो उनके पास इसका स्वरूप नहीं था कि करना क्या है।

जब हम अतीत के चेहरे से समय की धूल और उपेक्षा की भस्म पोछते हैं तो हमें आश्चर्य होता है कि हमारा स्वतंत्रता संघर्ष का इतिहास ऐसे महान व्यक्तित्वों से दैदीप्यमान है कि उन्हें भूल जाने पर अचरज भी होता है और लज्जा भी आती है। बिस्मिल, भगत सिंह और अशफ़ाक़ की इसी भूली हुई कड़ी में एक प्रखर नाम है चंद्रशेखर आज़ाद का जिन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल के बाद क्रांतिकारी दल की ज़िम्मेदारी संभाली। जहाँ एक रूसी समाजशास्त्री क्रांतिकारी की औसत जीवन अवधि दो वर्ष बताते हैं, यह आज़ाद का प्रखर पुरुषार्थ था कि अपने प्रण के अनुसार वे आज़ाद थे और मृत्युपर्यन्त आज़ाद रहे।

दुःख का विषय है कि जहाँ कांग्रेस के नेताओं ने इतिहास को ऐसा घेरा कि ग़ैर-कांग्रेसी नेताओं के लिए कोई स्थान ही रिक्त न रहा और आज यदि हम चंद्रशेखर आज़ाद जैसे मातृभूमि के सपूत महामानवों के विषय में जानना  हैं तो श्री एन के निगम की पुस्तक ‘बलिदान’, मन्मथनाथ गुप्त की “क्रांतिकारी आंदोलन का वैचारिक इतिहास”, कुछ नाटक जैसा गिना चुना साहित्य मिलता है। आश्चर्य नहीं कि चे गुएवारा की टी शर्ट पहनने वाला भारतीय युवा अपने महानायक आदर्शों से अपरिचित आदर्शों और नैतिक आदर्शों के अभाव में भटकने को बाध्य है।

चंद्रशेखर आज़ाद का जन्म 23 जुलाई 1909 को झाबुआ जिले के गाँव भावरा, तहसील अलीराजपुर में हुआ। उनके पिता पंडित सीताराम तिवारी का जीवन पत्नी जगरानी देवी के साथ सेवानिवृत्ति के पश्चात सरकारी बागों के संरक्षक के रूप में अलीराजपुर में ही बीता। इस मामले में यह भी धारणा है कि आज़ाद का जन्म उन्नाव जिले के बदरिका गाँव में हुआ था।  किंतु जब श्री निगम आज़ाद की माताजी के हवाले से कहते हैं की उनका जन्म मध्य प्रदेश के झाबुआ में हुआ था तो इसमें संदेह का स्थान नहीं रहता। उनके पिता अवश्य मूलतः उन्नाव से थे किन्तु श्री निगम स्वयं पंडितजी और माता जगरानी देवी के हवाले से कहते हैं की उनका जन्म भावरा में हुआ था।

यूँ उनकी स्मृति को अपना बना कर सम्मान देने के संदर्भ में उत्तर प्रदेश ने क्या कर लिया और मध्य प्रदेश ने क्या कर लिया, यह अपने आप में विचारणीय प्रश्न है। लगभग 13 वर्ष की अल्पायु में किशोर चंद्रशेखर की पिता के संरक्षण में आने वाले बाग़ आम चुराने को लेकर बहस हुई। पिता ने क्रुद्ध होकर आज़ाद को माली से क्षमा मांगने का निर्देश दिया और आज़ाद घर छोड़ के जो निकले तो सिर्फ वर्षों बाद एक बार ही 1928 में फिर वापस लौटे सो भी एक दिन को।

आज़ाद रात को 12 बजे तक घर के बाहर पिता के द्वारा बुलाये जाने की प्रतीक्षा करते रहे, फिर पास के गाँव चचेरे भाई के पास चले गए। वहाँ भाई-भाभी की वापस घर भेजने की योजना सुनकर चंद्रशेखर पैदल सड़क पर निकल पड़े। करीब 40 मील चल के वे दाहोद रेलवे स्टेशन पहुँचे जहाँ से उन्होंने मुंबई की ट्रैन पकड़ी और मुंबई पहुँच गए।

पाठक यदि रामप्रसाद बिस्मिल के जीवन से परिचित हों तो देखेंगे की बिस्मिल के जीवन में भी पिता के साथ ऐसा ही प्रसंग आर्य समाज न छोड़ने की ज़िद पर हुआ था। बिस्मिल कुछ दिन गाँव के पास जंगल में एक मंदिर में एक सन्यासी के साथ कुछ दिन रहे और बाद में पिता द्वारा मना के वापस ले जाए गए। संभवतः पीढ़ियों के मध्य का संघर्ष उस समय आज से अधिक था, संभवतः जिस समाज के जिस वर्ग से बिस्मिल और चंद्रशेखर आते थे, वहाँ पैतृक संसाधनों की आशा नेहरू के सामान कुलीन, धनाढ़्य परिवारों की अपेक्षा कम थी।

जहाँ जवाहरलाल नेहरू के जीवन में शिक्षा और व्यवसाय में परिवार का अपना महत्त्व था, बिस्मिल और आज़ाद के सामाजिक वर्ग में संघर्ष और सफलता या विफलता, दोनों व्यक्तिगत थे। समाज के आर्थिक पिछड़े वर्ग से आने वाले ये नेता स्वभाविक रूप से अधिक साहस और दृढ़ता रखते थे। ध्यान योग्य यह भी है कि मातृभूमि से इन का स्नेह लेन देन के सिद्धांत पर आधारित नहीं था, और लोभ मोह से इनकी निष्ठा इतर थी।

किशोर चंद्रशेखर ने कुछ समय होटल में मज़दूर का काम क्या और कुछ समय गोदी में भी काम किया। दो वर्ष मुंबई रहने के बाद पंडित जी 15 वर्ष की आयु में बनारस पहुंचे। यहाँ पहुँचकर उन्होंने संस्कृत की शिक्षा प्रारंभ की और अखाड़े में भर्ती हो कर शरीर निर्माण पर ध्यान दिया। यहाँ भी बिस्मिल और युवा चंद्रशेखर के जीवन में उल्लेखित समानता दिखती है। हालाँकि बिस्मिल ने संस्कृत के साथ उर्दू और अंग्रेज़ी का ज्ञान भी प्राप्त किया और पुस्तकें भी लिखी तथा अनुवादित की। मूल बात यह कि क्रूर निर्धनता में बीते बाल्यकाल ने न तो बिस्मिल का हौसला तोड़ा न चंद्रशेखर का।

बनारस में एक कन्या को एक बदमाश से छेड़छाड़ में बचाने के प्रसंग में चंद्रशेखर का नाम फैल गया और उन्हें आचार्य नरेंद्र देव ने अपने संरक्षण में ले लिया। आचार्य उन्हें काशी विद्यापीठ ले गए और हिंदी एवं संस्कृत अध्ययन में उन्हें लगा दिया। उसी समय असहयोग आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा और चंद्रशेखर महात्मा गांधी की जय का नारा लगाते हुए उसमे कूद पड़े।  गिरफ्तार हुए और आई सी एस खरेघाट के सामने प्रस्तुत किये गए। वहीं प्रसिद्ध प्रसंग हुआ जिसमे खरेघाट पूछते हैं –

नाम ?
आज़ाद
पिता का नाम ?
स्वाधीन।
घर ?
जेलखाना।

15 बेंतों की सज़ा सुनाई गई। 10 बेंतों तक वंदे मातरम का नारा लगा और फिर “महात्मा गांधी की जय” का जयकारा। जेलर सरदार गंडा सिंह इतने प्रभावित हुए कि सज़ा के बाद आज़ाद को घर ले गए और दूध पिलाया। (यह प्रसंग श्री निगम को सरदार जी ने स्वयं बताया जब निगम जी दिल्ही षड्यंत्र में कानपूर जेल में थे और सरदार जी जेल अधीक्षक। विद्यापीठ लौटने पर संपूर्णानंद जी ने चंद्रशेखर को आज़ाद नाम से ही संबोधित किया और उनका नाम चंद्रशेखर आज़ाद पड़ा।) कहना आवश्यक है, चंद्रशेखर आज़ाद नाम रखना आसान है, अर्जित करना कठिन।

अल्प वयस में आज़ाद में  गज़ब की वैचारिक परिपक्वता थी। मातृभूमि की सेवा में उचित मार्ग के विषय में उन्होंने आचार्य से चर्चा की और क्रांतिपथ पर चल पड़े। मन्मथनाथ गुप्त के माध्यम से आज़ाद 1922-23 में क्रांति दल से जुड़े। धन प्राप्त करने के उद्देश्य से किशोर आज़ाद को एक मठ में सर मुंडवाकर भेजा गया ताकि गुरु के मरने के बाद आज़ाद मठ का धन क्रांति के लिए प्राप्त कर सकें। किंतु कुछ समय पश्चात् आज़ाद ने बिस्मिल को लिखा “गुरु तो सूंड भुसुंड दिन दुगुना रात चौगुना बढ़ता ही जा रहा है और उसके मरने तक तो मैं ही वृद्ध हो जाऊँगा।” तब बिस्मिल ने उन्हें वापस बुला लिया और अन्य उपायों से हताश हो कर काकोरी डकैती की योजना बनाई गई।

9 अगस्त को काकोरी में रेल रोक कर सरकारी खज़ाना लूट लिया गया। पंडित जी और अशफ़ाक़ ने संदूक तोड़ा और धन लेकर रवाना हुए। 1919 के सत्याग्रह का हिंदू-मुस्लिम एक 1924 तक फिर टूट की कगार पर था। काकोरी के बाद युवा क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ने लगे।

पंडित जी और कुंदनलाल के अलावा काकोरी के सब क्रांतिकारी पकड़े गए। आज़ाद बनारस छोड़कर प्रयाग चले गए और वहाँ से झाँसी जाकर मास्टर रूद्र नारायण के यहाँ रहने लगे। पंडितजी हरिशंकर नाम से ड्राइवरी करने लगे और किराये पर पुलिस अधीक्षक की भी गाड़ी चलाते थे। कुछ समय ढीमरपुरा गाँव में पंडित हरिशंकर विद्यार्थी के नाम से रामायण पाठ करने लगे।

कुछ समय बाद वे कानपुर पहुँचे जहाँ उनकी भेंट भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त से हुई। दल पुनर्गठित हुआ “हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” के नाम से। 8 मई 1928 को भगत सिंह के कहने पर समाजवाद को दल के उद्देश्य में जोड़ा गया और दल का नाम “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक आर्मी” हुआ। पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं बंगाल प्रकोष्ठ को एकीकृत किया गया। सुखदेव पंजाब के, शिव वर्मा यूनाइटेड प्रोविंस के और फणीन्द्र घोष बिहार के कार्यभारी अध्यक्ष नियुक्त हुए।

आज़ाद कानपुर में रामचंद्र मुसद्दी के घर छुपे थे और रात की पहरेदारी श्रीदेवी मुसद्दी, रामचंद्र मुसद्दी की पत्नी और मुन्नीदेवी, मन्नीलाल पाण्डे की पत्नी करती थीं। कांग्रेस नेता जैसे गणेश शंकर विद्यार्थी, हसरत मोहानी, प्यारेलाल अग्रवाल और हामिद खान भी क्रांतिकारी दल में थे। असेंबली में 8 अप्रैल 1926 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम और ज्ञापन फेंके। उस दिन असेंबली में औद्योगिक विवाद अधिनियम और सार्वजनिक सुरक्षा बिल पर बहस थी।

सॉण्डर्स हत्याकांड पर उन्हें फांसी की सजा हुई। गांधी इरविन समझौते पर बहस चल रही थी। इरविन ने हस्तक्षेप से मना करके फांसी कराची अधिवेशन के बाद टालने को कहा।  इस पर गांधी जी ने अधिवेशन से पहले ही सजा देने को कहा, ताकि अधिवेशन पर उसका जो भी प्रभाव होना हो, हो जाए।

यह संयोग था या साजिश कि 27 फरवरी 1931 को यशपाल और सुखदेव राज से मुलाकात के समय अल्फ्रेड पार्क के पास वीरभद्र तिवारी उन्हें दिखे। उसके बाद यशपाल वहाँ से निकल गए और पुलिस आ गई। रामचंद्र मुसद्दी के अनुसार जब वे एक बरात के साथ बनारस जा रहे थे, तब वीरभद्र तिवारी उन्हें कानपुर सेंट्रल पर दिखे। वीरभद्र उनके साथ निकले किंतु चुपचाप इलाहाबाद में उतर गए। इससे संदेह गहरा जाता है।

आज़ाद अंतिम सांस और अंतिम गोली तक लड़े और अपनी ही अंतिम गोली से हुतात्मा हुए। श्री शिव विनायक मिश्र, श्रीमती कमला नेहरू और श्री पुरुषोत्तम दास टंडन उनके अंतिम संस्कार में उपस्थित रहे। कांग्रेस ने हड़ताल और शोक सभा से स्वयं को अलग रखा इस ़लिए सारा आयोजन विद्यार्थी परिषद ने किया। श्री शचीन्द्र सान्याल की पत्नी ने शोक सभा को संबोधित करते हुए कहा- “जिस प्रकार खुदीराम बोस की भस्म को तावीज बना कर बच्चों को पहनाने के लिए उनकी अंत्येष्टि पर लोग एकत्रित हुए थे, उसी प्रकार मैं उसी भावना से भाई आज़ाद की भस्म की एक चुटकी लेने आई हूँ।”

आज़ादी के बाद आज़ाद कहीं गायब हो गए। किंतु जैसी राजनीति हम आज देखते हैं, उस परिपेक्ष्य में आज़ाद जैसे आदर्श का जीवित रहने अत्यंत आवश्यक है। आज़ाद और बिस्मिल जैसे व्यक्तित्व उस सोच का प्रतिनिधित्व करता है जो देश के लिए बलिदान देते हुआ, सौदे की बराबरी का विचार नहीं करता, जो मातृभूमि को इसलिए लज्जित नहीं करता क्योंकि मातृभूमि के पास उसे देने के लिए कम था।

अंत में 1961 में श्री बनारसी दास चतुर्वेदी बड़े दुःख के साथ लिखते हैं “जिस झोपड़ी में नररत्न चंद्रशेखर का जन्म हुआ वह जीर्ण अवस्था में ज्यों की त्यों खड़ी है। यही है हमारा स्वाधीनता प्रेम और यही है हमारी कृतज्ञता।” दुःख की बात यह है चंद्रशेखर आज़ाद नामक नाटक की प्रस्तावना में यह लिखने के बाद 2012 में जब शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा स्मारक के निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ तो कांग्रेस के नेताओं ने विरोध में चिदंबरम को पत्र लिखकर विरासत संरक्षण के नाम पर विरोध किया। 2016 में श्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री हुए जिन्होंने चंद्रशेखर आज़ाद के जन्मस्थान के दर्शन किए।