भारती / राजनीति
कृषि कानून-विरोधी आंदोलन की दूसरी लहर की चपेट में कैसे न आए केंद्र सरकार

बुधवार (21 अप्रैल) को पंजाब से सहस्रों किसान तीन स्थगति कृषि कानूनों का विरोध करने के लिए दिल्ली की ओर बढ़े। पिछले वर्ष नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा अध्यादेश के रूप में लाए गए तीन कृषि कानूनों का उद्देश्य कृषि क्षेत्र का उदारीकरण था जिसमें कृषि उपज बाज़ार समितियों (एपीएमसी) के बाहर भी बिचौलियों के बिना कृषि उत्पाद के व्यापार को अनुमति दी गई थी।

पिछले वर्ष नवंबर में शुरू हुए इस कृषि कानून-विरोधी आंदोलन में दिल्ली की सिंघु, टिकरी और गाज़ीपुर सीमाओं पर बड़ी संख्या में किसान एकत्रित हुए। यह आंदोलन गणतंत्र दिवस के अवसर पर हिंसक हो गया जब सहस्रों किसान अपने ट्रैक्टर और लॉरियों के साथ दिल्ली में घुस आए और लाल किला समेत राजधानी के कई क्षेत्रों में उत्पात मचाया।

गणतंत्र दिवस हिंसा के बाद मीडिया से कम मिलने वाले ध्यान और दिल्ली की गर्मी से परेशान कई किसान अपने गाँवों की ओर लौट गए एवं कुछ किसान ही सीमाओं पर टिके रहे। हालाँकि, भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्रहन) जैसे किसान संगठनों के नेतृत्व में किसान दिल्ली को जाने वाले राजमार्गों को पुनः घेरने के लिए तैयार हैं।

राजमार्ग बाधित

पंजाब सरकार और पंजाब के बिचौलिये, जिन्हें राज्य सरकार का समर्थन प्राप्त है, किनारे से इस युद्ध में सहयोग कर रहे हैं।

मार्च में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) पंजाब कार्यालय ने खाद्य, नागरिक आपूर्ति और ग्राहक मामलों के निदेशक को पत्र लिखकर किसानों के भूमि रिकॉर्ड की माँग की ताकि अगले खरीद मौसम में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) किसानों के खातों में किया जा सके।

गेहूँ खरीद के लिए भूमि रिकॉर्ड को अनिवार्य कर दिया गया है और 2021-22 में रबी खरीद मौसम से पहले इसे अपडेट करना है।

बिचौलियों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ संघो द्वारा छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शन किए गए, हालाँकि राज्य सरकार किसानों के खातों में सीधे लाभ हस्तांतरण के लिए तैयार हो गई है जिससे भुगतान प्रक्रिया से बिचौलियों को दूर रखा जा सकेगा जो ऋण वापसी के रूप में किसानों की आय का बड़ा हिस्सा ले लेते थे या उनके भुगतान में देरी करते थे।

नई भुगतान प्राली नरेंद्र मोदी सरकार और बिचौलियों के बीच विवाद की एक और वजह बन गई है। इस माह की शुरुआत में हमने समाचार देखा था कि राज्य के कई क्षेत्रों में बिचौलिये फसल की नीलामी करवाने के लिए किसानों से ब्लैंक चेक की माँग कर रहे थे। बिचौलिये चाहते थे कि जब किसानों के खाते में पैसे आ जाएँ, तब वे इस ब्लैंक चेक का उपयोग करें।

किसानों के हित को दरकिनार करते हुए राज्य की कांग्रेस सरकार भी बिचौलियों को भुगतान प्रक्रिया का एक अंग बनाने का प्रयास कर रही है। माह की शुरुआत में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने घोषणा की थी कि राज्य खाद्य विभाग खरीद सॉफ्टवेयर में परिवर्तन करके बिचौलियों को भुगतान प्रक्रिया में शामिल करेगा।

इस खरीद सॉफ्टवेयर में एक प्रावधान होगा जिसमें किसानों को भुगतान की अनुमति बिचौलिया देगा। बिचौलिये कि अनुमति केबाद 48-72 घंटों में किसान के खाते में पैसे चले जाएँगे। पंजाब में 28,000 आढ़तिये या बिचौलिये हैं और प्रत्येक 20 से 200 किसानों तक का प्रतिनिधित्व करता है।

राज्य सरकार के अनुसार, इस प्रणाली से सुनिश्चित होगा कि किसान को मिले पैसे का सबसे पहले उपयोग ऋण चुकाने के लिए हो तथा वह इसे कहीं और खर्च न कर दे। हालाँकि सरकार को सीधे भुगतान तक ही नहीं रुकना चाहिए, बल्कि बिचौलियों पर भी प्रहार करना चाहिए जो राजधानी में कानून व्यवस्था के लिए एक बार फिर खतरा बन रहे हैं।

पहला, सभी प्रदर्शन स्थलों से पानी व इंटरनेट आपूर्ति बंद करनी चाहिए। जब राष्ट्रीय राजमार्ग कई महीनों से बंद हैं तो क्यों सरकार प्रदर्शनकारियों को बिजली, पानी या इंटरनेट आपूर्ति करे। किसी भी स्थाई निर्माण की अनुमति नहीं होनी चाहिए और जो हो गया है, उसे ध्वस्त कर दिया जाना चाहिए।

दूसरा, सरकार को प्रदर्शनकारी किसानों व संगठनों से कह देना चाहिए कि यदि प्रदर्शन जारी रहते हैं तो अगले खरीद मौसम में पंजाब से सरकारी खरीद नहीं होगी। यहाँ तक कि आंदोलन के उच्चतम शिखर पर भी केंद्र सरकार ने भारी मात्रा में पंजाब से खरीद की थी।

राज्यवार खरीद का एफसीआई डाटा

तीसरा, सरकार को राजमार्ग बाधित करने वाले प्रदर्शनकारियों से कानून के स्तर पर निपटना चाहिए। महामारी में और इस बीच ऑक्सीजन वाहनों जैसी महत्त्वपूर्ण आपूर्ति को बाधित नहीं किया जा सकता है, इस कारण सरकार को राजमार्ग ब्लॉक करने वालों पर कार्रवाई करनी चाहिए। प्रदर्शनकारियों को बंदी बनाना या हिरासत में लेना एक विकल्प हो सकता है।

चौथा, जब तक किसान गाँव वापस नहीं लौट जाते, तब तक सरकार को कोई वार्ता नहीं करनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कृषि कानूनों को स्थगित कर दिया है, इस बात का लाभ उठाते हुए सरकार को प्रदर्शनकारियों को वापस भेजना चाहिए। सरकार की सराहना होनी चाहिए कि उसने प्रदर्शनकारियों के हितों और सभी शंकाओं की चिंता की है लेकिन सहने की भी हद होती है।

अंततः, पिछली गलती को न दोहराते हुए सरकार को मतदाताओं व अन्य हितधारकों से बिना किसी देरी के बेहतर संवाद स्थापित करना चाहिए। पहले सरकार कृषि कानूनों पर नैरेटिव को अपने पक्ष में नहीं कर पाई थी और इसलिए अब सभी प्रकार के कुतर्कों व भ्रमों का खंडन होना चाहिए।

बिचौलिये और उनके संगठन ज़मीनी स्तर पर काफी राजनीतिक प्रभाव रखते हैं और 2022 के चुनावों की ओर बढ़ते हुए वे सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इसलिए भाजपा, जिसके पास पंजाब में खोने के लिए अधिक कुछ नहीं है, के अलावा कोई दल उनसे पंगा नहीं ले सकता है।

हालाँकि, भाजपा के लिए बेहतर होगा यदि वह बड़े दृश्य को देखे और भारतीय कृषि का उदारीकरण करे, विशेषकर पंजाब में जिसे पिछड़ी कृषि पद्धतियों और बिचौलियों ने जकड़ा हुआ है। सरकार को अंदोलन की दूसरी लहर के आगे कमज़ोर नहीं पड़ना है व कठोर कदम उठाने हैं।