भारती
कर्नाटक के इस आईएएस अधिकारी का ई-गवर्नेंस अन्य राज्यों की सरकार के लिए प्रेरणा

एक प्रसिद्ध कहावत है,”सरकार का काम भगवान का काम है।” लेकिन आखिरी बार यह कब हुआ जब आप किसी सरकारी कार्यालय में गए और उसके काम से संतुष्ट होकर बाहर निकले? एक विकासशील देश में ऐसे धर्मनिष्ठ उदाहरण या अनुभव मुश्किल से ही देखने को मिलते हैं।

देश की स्वाधीनता के वर्षों बाद तक अनुष्ठान द्वारा आम आदमी और उद्योगपतियों का जीवन मुश्किल बनाना असामान्य नहीं था। लाइंसेंस राज का बोल-बोला था। यह एक ऐसा आचरण था जिसे हम याद भी नहीं करना चाहते हैं।

लेकिन 1980 के दशक, कम से कम भारत में, तकनीक और शासन का संगम हुआ। दशक के उत्तरार्ध में कंप्यूटर का उपयोग करने वाले सरकारी अधिकारियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, हालाँकि कलम और फ़ाइल अभी भी भारतीय प्रशासनिक प्रक्रियाओं का केंद्र बने हुए हैं।

शुक्र है, तीन दशकों में हमने प्रशासन में प्रौद्योगिकी का अधिक से अधिक प्रसार देखा है। प्रौद्योगिकी के प्रसार ने सरकारी कार्यों की कुशलता बढ़ाने के साथ-साथ नागरिकों के लिए जीवन आसान बनाया है, भले ही दैवीय न बनाया हो। इसी कारण से सूचना प्रौद्योगिकी और सेवाओं के क्षेत्र में अग्रणी राज्य कर्नाटक ने ई-गवर्नेंस में भी काफी प्रगति की है।

सर्वेक्षण, निपटान एवं भूमि अभिलेख के आयुक्त मनीष मोदगिल के नेतृत्व में राज्य ने नागरिक सेवाओं के वितरण को परेशानी मुक्त और निर्बाध बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं।

हमें श्री मोदगिल का भी साक्षात्कार करने का मौका मिला। हमने वीडियो में उनकी कई उपलब्धियों (यहाँ देखें) पर चर्चा की, लेकिन यहाँ हम कुछ उल्लेखनीय सुधारों पर विस्तार से चर्चा करते हैं, जो उन्होंने अपनी सरकारी सेवा के दौरान किए हैं।

कर्नाटक फसल ऋण माफी योजना: किसान सशक्तीकरण

कर्नाटक सरकार द्वारा किसानों का ऋण माफ करने के लिए 2018 में एक वादा किया गया था, क्योंकि कृषि संकट चिंता का एक प्रमुख कारण था। फसल ऋण माफी योजना में दो भाग शामिल थे। एक वाणिज्यिक बैंक घटक और एक सहकारी क्षेत्र घटक।

हालाँकि, देखा गया कि बैंकों ने ऐसी सूची भेजी थी जिसमें कई लाभार्थियों ऋण माफी के योग्य नहीं थे। इसके बाद टीम मोदगिल ने ढाई महीने के रिकॉर्ड समय में फर्जी लाभार्थियों को बाहर निकालने के लिए एक व्यापक सॉफ्टवेयर अपने यहाँ ही विकसित किया।

फसल ऋण का सभी डाटा इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सीबीएस (कोर बैंकिंग सिस्टम) द्वारा निकाला गया, जिससे पाया गया कि 36 वाणिज्यिक बैंकों से कथित तौर पर 16.3 लाख ऋण लिए गए थे। साथ ही सहकारी क्षेत्र के बैंकों से 17.4 लाख ऋण लिए गए थे।

इन-हाउस सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हुए, प्रत्येक ऋण और किसान जानकारी को आधार कार्ड, राशन कार्ड और भूमि रिकॉर्ड के संयोजन का उपयोग करके इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रमाणित किया गया था।

इस तरह के एकीकृत प्रमाणीकरण के परिणामस्वरूप केवल उन ऋणों को ही माफ किया गया जिन्हें सॉफ्टवेयर में लगभग 13,000 शाखा प्रबंधकों/सहकारी सोसायटी सचिवों और परोक्ष रूप से सरकार के ऑडिटर्स द्वारा सत्यापित किया गया था। किसानों के बैंक खातों में नेशनल पेमेंट कॉर्पोर्शन ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) की मदद से ही पैसे डाले गए जिसके कारण बिचौलियों को हटाया जा सका।

ऋण माफी पोर्टल का गृहपेज

स्वराज्य के पास उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार प्रारंभ में वाणिज्यिक बैंकों ने लगभग 36,000 करोड़ रुपये के कुल बकाया के साथ लगभग 22 लाख लेनदारों की सूची प्रस्तुत की थी, लेकिन कठोर प्रमाणीकरण प्रक्रियाओं से केवल 16.3 लाख वास्तविक ऋणधारक उभरकर आए। इसलिए कुल बकाया ऋण राशि 36,000 करोड़ रुपये से 9,000 करोड़ रुपये घटकर 27,000 करोड़ रुपये हो गई।

अधिकारियों द्वारा आगे के निरीक्षण में यह पाया गया कि कई किसान वाणिज्यिक बैंक और सहकारी बैंक दोनों से ऋण पर छूट का दावा कर रहे थे (जिसे बाद में अस्वीकृत कर दिया गया था)। अस्वीकृति के बाद सरकार की इससे लगभग 13,500 करोड़ रुपये की बचत हुई।

एक अतिरिक्त उपाय में सभी फसल ऋण माफी प्रमाणपत्र डिजिटल हस्ताक्षर के माध्यम से ऑनलाइन जारी किए गए थे। इससे कथित तौर पर सरकार और बैंक कार्यालयों के लिए अनावश्यक यात्राओं से किसानों के समय को अपव्यय होने से रोका जा सका।

मोदगिल के अनुसार, इस डिजिटलीकरण प्रक्रिया के माध्यम से कर्नाटक सरकार ने आधार और राशन कार्ड को भूमि रिकॉर्ड विवरण से एकीकृत करके हज़ारों करोड़ रुपये बचाए हैं।

त्वरित और आसान प्रमाण पत्र वितरण- ई-क्षण

इस सुधार को जाति, आय और निवास से संबंधित प्रमाणपत्रों को काउंटर की बजाय ऑनलाइन प्राप्त करने में सहायता करने के लिए संस्थागत किया गया। इस डिजिटल कार्यक्रम के तहत कर्नाटक में निवास करने वाले लगभग 6.1 करोड़ लोगों के जाति, आय और निवास का विवरण राजस्व विभाग के ग्राम लेखाकारों द्वारा घर-घर जाँच का उपयोग करके पूर्व-निर्मित किया गया और आवेदन पर डाटाबेस से तत्काल जारी कर दिया जाता है।

कर्नाटक सरकार के राजस्व विभाग का ई-क्षण डैशबोर्ड

इस कदम से लोगों तक मौलिक अधिकारों को पहुँचाने में सरकारी अधिकारियों की आवश्यकता को समाप्त किया जा सका। इस प्रयास की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह है कि कोई भी राज्य के कार्यालयों में लंबी कतारों में प्रतीक्षा की असहजता को अनुभव किए बिना अपने घर में या साइबर कैफे से आराम से ऐसे प्रमाण पत्र (जो डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित हैं) प्रिंट कर सकता है।

हालाँकि, जो लोग सोचते हैं कि वे इस तरह के प्रमाण-पत्र को जाली कर सकते हैं, वे यह जान लें कि एक अंतर्निहित कोड या अल्गोरिदम से जाली प्रमाण-पत्रों की पहचान की जा सकेगी। मोदगिल बताते हैं कि राजस्व अधिकारी एक नज़र में ही पहचान जाएँगे कि प्रमाण-पत्र असली है या नकली।

यह परियोजना ग्रामीण कर्नाटक में जीवित है और अच्छे से काम कर रही है, जबकि शहरी क्षेत्रों में इस योजना में 1 करोड़ को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

दिशांक- संपत्ति विवरण

एक वाक्यांश जो संपत्ति खरीदते समय अक्सर दोहराया जाता है, “देखकर खरीदें।” कई बार आम आदमी बिना जाने-समझे संपत्ति की खरीददारी का शिकार हो जाता है, यह सावधान करने वाली चेतावनी उन्हीं के लिए है।

आम ग्राहकों को एक प्रबुद्ध निर्णय लेने में मदद करने के लिए टीम मोदगिल ने एक ऐप लॉन्च की जो लोगों को अचल संपत्ति खरीदने और उसकी जानकारी देने में मदद करेगी। इससे ग्राहक आसानी से बिना फर्जीवाड़े में फँसे संपत्ति खरीद सकता है।

गूगल प्ले पर उपलब्ध इस ऐप को राजस्व सर्वेक्षण मानचित्रों को डिजिटाइज़ और जिओ-रेफरेंस करके विकसित किया गया। इस ऐप को 5 लाख लोग डाउनलोड कर चुके हैं व यह एक भूमि क्रेता को स्थान, सीमा और स्वामित्व की वर्तमान जानकारी वैसे ही देती है जैसे जीपीएस के माध्यम से गूगल मैप्स हमें यह जानकारी देता है।

आपको बस यह करना है कि उस भूमि पर खड़े होकर यह ऐप खोलनी है। जहाँ आप खड़े होते हैं उस भूमि के निर्देशांक वह अपने आप ले लेगी और स्क्रीन पर उसके स्वामी का नाम दर्शाएगी। सिर्फ इतना ही नहीं, आप अन्य विवरणों के साथ स्वामित्व विवरण, भूमि की प्रकृति, न्यायालय के आदेश, और सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अलावा भूमि का सर्वेक्षण क्रमांक, गाँव, होबली, तालुक और जिले के नाम भी पता लगा सकते हैं।

कर्नाटक राज्य रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर द्वारा संचालित यह देश की पहली इस तरह की सुविधा है। राज्य के 1965 मानचित्र को संदर्भ के निर्णायक बिंदु के रूप में लिया गया है, जबकि इसमें अद्यतन होते रहते हैं।

नियंत्रण और निगरानी सेवा

मोदगिल ने एक डैशबोर्ड बनाया है जिसमें टीम यह देख सकती है कि नागरिक सेवाओं को कितनी जल्दी पहुँचाया जा रहा है और यह देरी और कर्मचारियों की कार्य कुशलता की भी निगरानी करता है।

डैशबोर्ड वास्तविक समय में नागरिक सेवा वितरण प्रणाली की दक्षता की निगरानी करता है और प्रत्येक कार्यालय और अधिकारी को प्रदर्शन के आधार पर अंक दिए जाते हैं। जानकारी ऑनलाइन और सार्वजनिक डोमेन में है। डैशबोर्ड की एक झलक इस प्रकार है और वेबसाइट लिंक यहाँ है।

यूपीओआर परियोजना- जहाँ सरकार गारंटर है

कभी आपने संपत्ति खरीदने या पंजीकृत करने के बाद एक उप-पंजीयक कार्यालय से बाहर निकलकर उपलब्धि, स्वामित्व या सुरक्षा का भाव महसूस किया है? तथ्य यह है कि सिर्फ इसलिए कि आपने अपनी संपत्ति को सरकार के साथ पंजीकृत किया है, इससे आपके स्वामित्व को गारंटी नहीं मिलती।

मोदगिल का कहना है कि पंजीकरण केवल एक संपत्ति की लेनदेन में ‘राज्य को साक्षी’ के रूप में रिकॉर्ड करता है। उप-पंजीयक कार्यालय में पंजीकरण के दौरान लेनदेन के लिए सरकार केवल एक आधिकारिक गवाह है। एक न्यायालय में विवाद के मामले में यह केवल एक लेन-देन का वैध प्रमाण है न कि वैध लेनदेन का प्रमाण है (अंतर पर ध्यान दें)।

पंजीकरण का उद्देश्य केवल उस विशेष दस्तावेज़ का आधिकारिक रिकॉर्ड बनाना और रखना है, जिसमें शामिल पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था और दस्तावेज़ की सामग्री की प्रामाणिकता का साक्षी नहीं है।

एक प्रसिद्ध कहावत है कि दो लोग विधान सौधा (विधानसभा) को एक दूसरे को बेचने के लिए लेन-देन प्रक्रिया में प्रवेश कर सकते हैं और कोई भी नियम उस लेनदेन को दर्ज करने से रजिस्ट्रार को रोक नहीं सकता। लेकिन क्या यह वैध है?

इसी संदर्भ में यूपीओआर (शहरी संपत्ति स्वामित्व रिकॉर्ड) कार्ड काम आता है जो भूमि राजस्व अधिनियम के तहत कानून द्वारा स्वीकृत है। कार्ड को बिक्री विलेख के विपरीत, आपकी संपत्ति की वैधता और संपत्ति के आपके स्वामित्व की वैधता की वैधानिक गारंटी के रूप में परिकल्पित किया गया है, वह एक नगरपालिका खाता (कुछ राज्यों में पट्टा) नहीं है जो उस विशेष संपत्ति पर भुगतान किए गए नगरपालिका करों की एक पावती मात्र है।

यूपीओआर परियोजना अचल संपत्तियों को मैप करने के लिए मापक के अनुसार जिओ-रेफरेंसिंग का उपयोग करती है। इसमें शिवमोग्गा से मंगलुरु तक की भूमि का संपूर्ण विवरण होता है जैसे गिरवी, धारण अधिकार और संपत्ति पर अन्य भार।

यह परियोजना महत्वपूर्ण रूप से उन ज़मीनों का नक्शा भी बनाएगी जो निजी पार्टियों या जो सरकार से संबंधित हैं, जैसे कि वन भूमि, राजकालुवे इत्यादि। यूपीओआर कार्ड के प्रभावी हो जाने के बाद, धोखाधड़ी कर बिक्री या फर्जीवाड़े की कोई गुंजाइश नहीं होगी।

संयोगवश शिवमोग्गा में लगभग 1.5 लाख संपत्तियों के लिए सर्वेक्षण कार्य पूरा हो चुका है और इस तरह अब तक यूपीओआर कार्ड का उपयोग करते हुए 10,000 से अधिक पंजीकरण किए गए हैं। इस प्रकार यह परियोजना शिवमोग्गा और मंगलुरु शहरों में सफलतापूर्वक चल रही है।

अब अक्टूबर 2019 तक इसका विस्तार मैसूरु में किया जाएगा। बेंगलुरु में ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण कार्य चल रहा है और एक साल के समय में पूरा किया जाएगा। उसके बाद इस परियोजना को वहाँ भी लागू कर दिया जाएगा।

अकार्बंध के साथ भ्रष्टाचार बंद

इस पहल के तहत आरटीसी (भूमि रिकॉर्ड) मालिक के नाम के बिना रजिस्टरों में कम्प्यूटरीकृत और रखरखाव किए जाते हैं। यह नकली आरटीसी के निर्माण और धोखाधड़ी सर्वेक्षण संख्या के आवंटन को रोकने के लिए है।

डिजिटलीकृत आरटीसी

यहाँ नक्शे और रेखाचित्र भी डिजिलाइज़ किए गए हैं ताकि नकली संपत्तियों को डाटा से बाहर किया जाए। समय के साथ अब तक लगभग 35 लाख फर्जी या अनियमित आरटीसी बनाए गए हैं। इनके पास संबंधित नक्शे या रेखाचित्र नहीं हैं और ये बेईमान एजेंटों के साथ मिलकर भ्रष्ट राजस्व अधिकारियों और यहाँ तक कि निर्दोष नागरिकों द्वारा बनाए गए हैं। इन्हें पक्की आरटीसी भी कहा जाता है। इससे ज़मीनों को बेचा, बैंक के साथ गिरवी रखा और अन्य उपयोगों के लिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।

ड्रोन से सर्वे

कर्नाटक सरकार द्वारा ड्रोन का उपयोग करके भूमि का मानचित्रण और पुन: सर्वेक्षण करने के लिए एक पायलट परियोजना शुरू की गई है। यह परियोजना तुमकुरु, हासन, रामनगर, उत्तर कन्नड़ और बेलागवी में चल रही है। सर्वे ऑफ इंडिया के साथ साझेदारी में आवासीय और कृषि कार्यों के लिए यह सर्वेक्षण कार्य किया जा रहा है।

इस परियोजना में भूमि के सभी पहलुओं जैसे विभाजन, भूमि की प्रकृति, माप आदि रिकॉर्ड करके डिजिलाइज़ किए जाएँगे। यह न केवल बेहतर भूमि प्रबंधन में मदद करेगा, बल्कि विवादों को कम करने में भी सहायक सिद्ध होगा।

राज्य की कैबिनेट की मंजूरी में ड्रोन प्रोजेक्ट को 125 करोड़ रुपये का परिव्यय दिया गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल क्रांति के लिए ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ और डिजिटल इंडिया, यूआईडीएआई, डिजिटल बैंकिंग के लिए भीम साइबर स्वच्छ केंद्र, ई-नाम और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) जैसे सुधारों का आह्वान किया है।

कर्नाटक राज्य विशेष रूप से कब्बन पार्क के किनारे स्थित राजस्व कार्यालय ई-शासन के लिए तैयार है। यह अन्य राज्यों और उसके विभागों के लिए एक रोल मॉडल के रूप में उभरा है।