भारती
बिहार में बाढ़ के बाद सूखा- मुख्य कारण रहे अतिक्रमण किए हुए तालाब कब होंगे मुक्त

जलाशयों पर अतिक्रमण। नतीजा- बाढ़ और सूखा। वर्षा के जल को टिकने का कोई स्थान नहीं मिला, परिणामस्वरूप बाढ़ आई और वर्षा के रुकते ही फिर सूखा क्योंकि जो जल बरसा उसे संग्रहित करके न रखा जा सका। यही कहानी है बिहार की।

एक गूगल सर्च आपका साक्षात्कार कई ऐसी रिपोर्टों से कराएगा जो बिहार के जलाशयों के पतन की कहानी कहती हैं। 1980 के दशक में जहाँ बिहार में 2.5 लाख तालाब थे, वे मात्र 90,000 रह गए हैं। अधिकांश तालाबों पर भू-माफियाओं ने कब्ज़ा करके वहाँ निर्माण करवा दिया। अकेले राजधानी पटना में तालाबों का आँकड़ा 1960 के दशक में 1,000 से आज 200 पर आ गया है। अवैध अतिक्रमण एक ओर लेकिन एम्स-पटना और तारामंडल जैसे सरकार समर्थित भवन भी तालाब भरकर बनाए गए हैं।

हमेशा जल संपन्न रहने वाले उत्तर बिहार की आज की स्थिति पर स्वयं बिहार प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं, “हम कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि उत्तर बिहार में पानी का अभाव होगा लेकिन देखिए दरभंगा तक में पानी का अभाव है। जलाशयों की अकाल मृत्यु हो रही है।”

साल भर जीवंत रहने वाले तालाब सर्वाधिक मधुबनी में 902, पूर्वी चंपारण में 267 और दरभंगा में 250 हैं। एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की कांवर झील बेगूसराय की एक अमूल्य धरोहर रही है लेकिन पक्षी अभ्यारण्य घोषित किए जाने के बावजूद वह इस गर्मी में सूख गई। इसका मुख्य कारण है सरकार, जो झील का क्षेत्रफल कम करके यहाँ खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।

बिहार सरकार द्वारा पटना उच्च न्यायालय को 2017 में दिए गए एक आँकड़ों के अनुसार उत्तर बिहार में लगभग 35,000 तालाब थे, जिसमें से 2,000 से अधिक तालाबों पर अतिक्रमण हो चुका था। राज्य भर में तालाबों से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए जा चुके हैं लेकिन बावजूद इसके पटना, गया, दरभंगा, मोतिहारी, मुज़फ्फरपुर और भागलपुर में पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों तालाब अस्तित्वहीन हो गए हैं, नालंदा मुक्त विश्वविद्यालय के कृतेश्वर प्रसाद बताते हैं।

पग-पग पोखर कहे जाने वाले मिथलांचल के दरभंगा में तीन बड़े ऐतिहासिक तालाबों- हराही, दिग्घी और गंगा सागर तालाब- को भी लगातार भरने की कोशिश की जा रही है। साथ ही गाद जमा होने से भी इन तालाबों की जल-ग्रहण क्षमता घट रही है और फलस्वरूप भूमिगत जल का स्तर भी घट रहा है। जहाँ 30-40 फीट की खुदाई में ही पानी मिला जाता था, वहाँ के कई स्थानों पर 300 फीट तक की बोरिंग करवानी पड़ रही है।

उत्तर बिहार में एक विशेष जल संरचना को चौर कहा जाता है जहाँ नदियों का अतिरिक्त पानी जमा हो जाता है। ये उथले तालाब होते हैं जो वर्षा ऋतु में भर जाने के बाद गर्मियों में पुनः अपने जल को नदियों में छोड़ देते हैं। पानी के रुके रहने से भूमिगत जल की भी भराई हो जाती थी। 1980 के दशक से इन चौरों को सुखाए जाने के बाद इनमें खेती शुरू कर दी गई। नदियों और चौरों के बीच संयोजन को भी बाधित कर दिया गया।

आज इन चौरों पर खेती हो रही है, तालाबों को सूखाकर उस भूमि पर खेती हो रही है, झील को भरकर वहाँ भवन निर्माण हो रहा है और बिहार की जल समस्या के यही कारण हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि यह मान भी लें कि यह सब खेतीहर भूमि के विस्तार के लिए हुआ हो, फिर भी निम्न आँकड़े हमें निराश कर देंगे। चलिए 2014 से 2019 तक पाँच वर्षों की वर्षा और खरीफ बुआई की तुलना करते हैं।

प्रायः खरीफ फसलों के लिए माना जाता है कि जितनी वर्षा उतने बड़े क्षेत्रफल में खेती। सबसे पहले वर्षा के आँकड़े को देखें जहाँ A का अर्थ है वास्तविक वर्षा, N का सामान्य वर्षा और D मतलब सामान्य वर्षा से वास्तविक वर्षा में अंतर। हमारी चर्चा का विषय बिहार है तो आखिरी पंक्ति में देखने पर आप पाएँगे कि पिछले पाँच वर्षों में इसी वर्ष सामान्य वर्षा और वास्तविक वर्षा में न्यूनतम अंतर है। साथ ही पाँच वर्षों में 2017 के बाद दूसरी सर्वाधिक वर्षा इसी वर्ष हुई है।

अब दूसरी टेबल की ओर देखें जो खरीफ बुआई के क्षेत्रफल को दर्शाती है। यहाँ तस्वीर बिल्कुल उलट है। पिछले पाँच वर्षों में बिहार में इस समय तक खरीफ की सबसे कम बुआई हुई है। जहाँ सामान्य रूप से 28.45 लाख हेक्टेयर फसल का क्षेत्रफल होना चाहिए था, वहाँ यह अब तक मात्र 21.51 लाख हेक्टेयर ही है यानी लगभग एक-चौथाई कम फसल बोई गई है।

इसका कारण बाढ़ और सूखे की दोहरी मार रही है। इसमें धान के बिचड़े नष्ट हो गए और असर हुआ फसल क्षेत्रफल। लेकिन इस विफलता में अकेले बिहार का दोष नहीं है, इसमें नेपाल का भी हाथ है। बिहार, विशेषकर उत्तर बिहार के अधिकांश जल निकाय नेपाल की धाराओं से जल पाते हैं। नेपाल में बढ़ रहे शहरीकरण, उत्खनन और पेड़ों की कटाई इस समस्या की जड़ हैं।

जलवायु परिवर्तन और हिमालय की तलहटी पर बसे होने के कारण नेपाल में अचानक अत्यधिक वर्षा हुई जिसे रोक पाने के लिए वहाँ पर्याप्त वृक्ष नहीं थे और सारा पानी बहकर बिहार में आ गया व बाढ़ का कारण बना। इसका एक और कारण कमज़ोर बांध हैं जो पानी को रोक पाने में असमर्थ हैं।

बाढ़ में स्वयंसेवक के रूप में काम करने वाली मिथिला छात्र संघ के महासचिव आदित्य मोहन ने स्वराज्य  को बताया, “बांध के निर्माण में ही खामी है। जैसे ही नेपाल से पानी का दबाव बनता है, बांध टूट जाते हैं।” दैनिक भास्कर  में छपी खबर के अनुसार पूर्वी-चंपारण, शिवहर, दरभंगा और मधुबनी में इस बार बांध टूटने के बाद ही बाढ़ की विभीषिका शुरू हुई थी।

सिर्फ बाढ़ ही नहीं सूखे में भी नेपाल की बराबर हिस्सेदारी है। पेड़ों की कटाई के कारण नदियों का जल-ग्रहण क्षेत्र कम हुआ है जो जल धारा को विरल करता है। साथ ही पेड़ों के अभाव में मिट्टी का कटाव भी हो रहा है जो नदियों में रेत को भरकर इन्हें उथला बना रहा है। जगह-जगह तटबंध के निर्माण से छोटी-छोटी नदियाँ सिंचाई और बाढ़ प्रबंधन में अपनी भूमिका निभाने में असमर्थ हैं।

इन विफलताओं में आम लोगों की अनदेखी और सरकार की उदासीनता प्रत्यक्ष है। विडंबना यह है कि खेती के विस्तार के लिए तालाब सुखाए जा रहे हैं लेकिन खेती का विस्तार नहीं हो पा रहा क्योंकि जल बिना कैसी खेती। इस समस्या से लड़ने के लिए सरकार को केवल कागज़ी रूप से नहीं ज़मीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे, साथ ही लोगों को इन जल निकायों को व्यर्थ पड़े भूभाग के स्थान पर सम्मान की दृष्टि से देखना होगा।

स्वराज्य के समाचार सहयोगी अविनीश मिश्र ने अनेक जानकारियाँ प्रदान की हैं।
निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree द्वारा ट्वीट करती हैं।