भारती
कैसे विश्व का सबसे बड़ा चाय उत्पादक निर्यात बाज़ार में केन्या और श्रीलंका से पीछे है

आशुचित्र- क्यों भारत अधिक उत्पादन के बावजूद चाय निर्यात में केन्या और श्रीलंका से पीछे है?

1984 में 63.9 करोड़ किलोग्राम (केजी) से पिछले वर्ष 133 करोड़ केजी तक भारत का चाय उत्पादन दोगुना हो गया है। इन 35 वर्षों में चाय का निर्यात मात्र 17 प्रतिशत बढ़ा है, 21.7 करोड़ केजी से पिछले वर्ष तक 25.6 करोड़ केजी।

1961 में भारत की वैश्विक चाय बाज़ार में 37.18 प्रतिशत भागीदारी थी। अब यह गिरकर 12 प्रतिशत पर आ गई है। भारत थोक, इंस्टैंट पैकेट और टी बैग के रूप में चाय का निर्यात करता है। वहीं विश्व में काली चाय के सबसे बड़े निर्यातक केन्या ने अपने निर्यात को लगभग चौगुना कर लिया है, 12 करोड़ केजी से पिछले वर्ष तक 47.4 करोड़ केजी।

1965 में भारत को पहली बार काली चाय के निर्यात में पछाड़ने वाले पड़ोसी देश श्रीलंका ने इसी काल में अपने निर्यात को 15 करोड़ केजी से 28.23 करोड़ केजी तक लगभग दोगुना कर लिया है।

भारत विश्व में सबसे बड़ा काली चाय का उत्पादक है और खेती के क्षेत्रफल में विस्तार और उत्पादक क्षमता बढ़ने के साथ यह 133 करोड़ केजी चाय के उत्पादन तक पहुँच गया है। वहीं पिछले वर्ष केन्या ने 49.2 करोड़ केजी और श्रीलंका ने 30.4 करोड़ केजी काली चाय का उत्पादन किया था।

प्रति हेक्टेयर में 2,250 केजी क्षमता के साथ भारत अन्य देशों की तुलना में अधिक उत्पादन करता है। तो प्रश्न उठता है कि क्यों भारत निर्यात में केन्या और श्रीलंका से पीछे है जबकि इसका उत्पादन दोनों देशों के उत्पादन योग से दोगुना है।

चीन तीसरा सबसे बड़ा निर्यातक है लेकिन हम इसपर चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि यह हरी चाय का निर्यात करता है, वहीं भारत, केन्या व श्रीलंका काली चाय का।

सोवियत संघ के विभाजन, 1991 तक भारत ने निर्यात मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन किया था। तब तक यूएसएसआर ही भारत का प्रमुख ग्राहक था। इसने 1981 तक भारत के निर्यात को 24.1 करोड़ केजी तक बढ़ाने में सहायता की थी।

1992 में भारत का चाय निर्यात 12 वर्षों में पहली बार 20 करोड़ केजी के नीचे गया था। पुनः 20 करोड़ केजी के बाज़ार में लौटने के लिए हमें छह वर्ष लगे। तबसे ही भारत का चाय निर्यात ऊपर-नीचे होता रहा। हालाँकि पिछले दो वर्षों में यह 25 करोड़ केजी के पाल चला गया है।

25 करोड़ केजी के पार जाने का कारण वैश्विक उपभोग में वृद्धि रही है। हालाँकि केन्या और श्रीलंका की तुलना में भारत के चाय निर्यात की वृद्धि दर कम रही है। भारत की समस्या 1991 तक सोवियत पर इसकी निर्भरता रही है और अन्य विकल्पों को खोजने में समय लगा।

दूसरे विकल्पों को खोजते हुए भारत ने ईरान, ईराक़ और अन्य गल्फ देशों जैसे इस्लामी देशों पर ध्यान केंद्रित किया। भारत का ध्यान इन बाज़ारों पर इसलिए रहा क्योंकि वहाँ शराब पर प्रतिबंध है और चाय की लोकप्रियता के साथ यह एक बड़ा बाज़ार है। इसी दिशा में ईराक़ के साथ खाद्य के बदले तेल समझौता हुआ जहाँ बासमती चावल और दवाइयों के अलावा चाय को भी तेहरान के बाज़ारों में भेजा गया।

मूल्य की दृष्टि से भारतीय पारंपरिक चाय श्रीलंका की पारंपरिक चाय से सस्ती है और इसका क्रश्ड, टीयर व कर्ल (सीटीसी) रूप केन्या की सीटीसी चाय से सस्ता है। श्रीलंका वैश्विक पारंपरिक चाय बाज़ार में श्रेष्ठ है, वहीं केन्या सीटीसी बाज़ार में सर्वोपरि। पारंपरिक चाय से बेहतर स्वाद और शराब मिलते हैं, वहीं सीटीसी चाय में प्रति किलो अधिक चाय बन सकती है।

सीटीसी चाय बनाने की प्रक्रिया

2018 में कोलकाता की नीलामियों में पारंपरिक चाय 2.46 डॉलर प्रति केजी बिकी थी, वहीं श्रीलंका की चाय कोलंबो में 3.6 डॉलर प्रति केजी। कोच्चि नीलामी में सीटीसी चाय 1.81 डॉलर प्रति केजी पर बिकी, वहीं केन्या की मोम्बासा नीलामी में मूल्य 2.43 डॉलर प्रति केजी रहा।

मोम्बासा चाय नीलामी

वैश्विक बाज़ार में भारत कम मूल्य का भी लाभ नहीं उठा पाया क्योंकि पारंपरिक रूप से इसका प्रचार प्रयास कमज़ोर रहा है। अपनी चाय को बाज़ार में बेचने के लिए श्रीलंका हमेशा से आक्रामक रहा है और ओलंपिक समेत प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय खेल समारोहों में अपनी चाय को आधिकारिक पेय पदार्थ बनाने में सफल हुआ है।

केन्या विशेष प्रस्तावों से अपनी चाय बेच रहा है जैसे इसके बागानों में कीटनाशक या रसायनों का उपयोग नहीं होता है। और तो और इसकी चाय भारत समेत कुछ अन्य चायों के साथ मिश्रित की जाती है और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्वयं के मिश्रण के नाम से बेची जाती है।

केन्या और श्रीलंका बाज़ार में बिचौलियों के स्थानांतरण और दोहन के लिए भी प्रयास करते नज़र आ रहे हैं। इन सबके अलावा कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि केन्याई और श्रीलंकाई चायों का स्वाद कुछ भारतीय चायों से बेहतर होता है। केवल यह कहना ही पर्याप्त नहीं होगा कि भारत केवल कमज़ोर प्रचार के कारण पिछड़ा है।

लगभग 65 प्रतिशत भारतीय चाय पीते हैं। ये एक ऐसी वस्तु है जो मूल्य-निरपेक्ष है क्योंकि मूल्य बढ़ने का इसके उपभोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। भारत का चाय उपभोग वार्षिक रूप से 3 प्रतिशत की दर पर बढ़ रहा है।

एक डाटा के अनुसार भारत की 85 प्रतिशत गृहस्थियाँ 81 प्रतिशत चाय का उपभोग करती हैं। तो हमारे पास एक स्वस्थ घरेलु बाज़ार है। बढ़ता घरेलु उपभोग भी निर्यात को हानि पहुँचा सकता है लेकिन हमारे पास इसके प्रोत्साहन में कमी के अन्य कारण भी हैं।

दूसरे क्षेत्रों की तुलना में भारत के चाय उद्योग में- बढ़ते भत्ता और राशन व घर सुविधा जैसे कल्याण प्रयासों के कारण- लागत अधिक है। हालाँकि असम और बंगाल में दक्षिण भारत के भत्ते का दो-तिहाई दिया जाता है।

भारतीय चाय उद्योग को आयात पर 100 प्रतिशत कस्टम कर और 4 प्रतिशत प्रतिकारी कर का संरक्षण प्राप्त है। यह घरेलु बाज़ार में आयात की हुई चायों से वास्तविक प्रतिस्पर्धा से सुरक्षा देता है।

दूसरी ओर केन्या व श्रीलंका में अल्प घरेलु उपभोग है और इसलिए वे ऐसी स्थिति पर हैं कि उन्हें अपना उत्पाद निर्यात करना ही होगा। उदाहरण स्वरूप देखें कि कुल 49.2 करोड़ केजी उत्पादन में से केन्या ने 47.5 करोड़ केजी निर्यात किया। श्रीलंका ने 30.4 करोड़ उत्पाद में से 27.1 करोड़ केजी को सागर पार भेजा।

इन दोनों देशों के लिए चाय निर्यात विदेशी मुद्राका प्रमुख स्रोत हैं। चाय निर्यात से केन्या 120 करोड़ डॉलर और श्रीलंका 160 करोड़ डॉलर कमाता है, वहीं भारत 80 करोड़ डॉलर।

इसी कारण से केन्या और श्रीलंका निर्यात बाज़ार में भारत की तुलना में अधिका आक्रामक हैं। जिस प्रकार भारत बाज़ार की शक्तियों को वैश्विक चाय बाज़ार नियंत्रित करने दे रहा है, उससे यही लगता है कि आक्रामक केन्या व श्रीलंका के बीच चाय बाज़ार में भारत अप्रतिरोधी भूमिका ही निभाएगा।

हालाँकि यदि केंद्र भारतीय चाय उद्योग को नींद से जगाना चाहता है तो इसे दी गई सुरक्षा को कम कर सकता है। ऐसे कदम से न सिर्फ यह क्षेत्र और सक्रिय हो जाएगा बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं के लिए भी बेहतर गुणवत्ता की चाय सुनिश्चित की जा सकेगी।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani द्वारा ट्वीट करते हैं।