भारती
बीएचयू में मुस्लिम प्राध्यापक की नियुक्ति से उपजे विवाद का सत्य, असत्य और अर्धसत्य

अभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में शुल्क की बढ़ोत्तरी का मामला सधा ही था, कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में मुस्लिम प्राध्यापक का विवाद उठ खड़ा हुआ। वामपंथ तो वामपंथ, दक्षिणपंथी सनातनी भी आपसी तनातनी में दिख रहे हैं।

मैं इस विषय से बचता रहा क्योंकि यह अपने आप में विषय विवादित हुआ जा रहा था। अगर इतिहास और संदर्भ को हटा के देखें तो मेरा विचार यह था कि हिंदुओं ने धर्म का जैसा सत्यानाश किया है कि यदि मुझे गीता समझनी हो तो मैं पूर्वराष्ट्रपति कलाम से पढ़ना कपिल सिबल से समझने से अधिक सुरक्षित जानूँगा, यदि इतिहास समझना हो तो हिंदू सूरजभान से बेहतर मैं केके मुहम्मद को पढ़ना पसंद करूँगा।

परंतु जो बुद्धिजीवी सर्किट फिल्म इंस्टीट्यूट में गजेंद्र सिंह की नियुक्ति को अभिव्यक्ति का अधिकार समझता हो, यहाँ दाना-पानी लेकर हनुमान चालीसा के भजन के माध्यम से विरोध करने वाले छात्रों पर चढ़ जाए तो संदेह उत्पन्न हो जाता है। जो बुद्धिजीवी जेएनयु में लगभग मुफ्त हॉस्टल की माँग पर उप-कुलपति को घंटों बंधक बनाने वाले छात्रों के साथ खड़ा हो, वे यहाँ छात्रों के सैद्धांतिक विषय पर प्रदर्शन के विरोध में लंगोट कस ले तो मन को शंकित तो करता है।

दो दिनों के भेद में दोनों सम्मानित विश्वविद्यालयों में विपरीत भूमिका, जिसमें जेएनयू में मीडिया पर छात्र उग्र होते हैं पर मीडिया उनके समर्थन में दिखती है, वहीं बीएचयू छात्र शालीन पर मीडिया उग्र दिखती है। बड़े बड़े कवि प्रश्न ही नहीं उठाते हैं वरन उन छात्रों को लंपट-लुच्चा भी कह देते हैं जिन्हें उनके अनुसार सनातन का ‘स’ भी नहीं विदित है, मानों वे अपनी साहित्य सेवा और अपनी राजनीति सनातन  के पर खड़े हो कर करते रहे हों। फिर ग़ालिब का यह शेर याद हो आया – 

कहते हैं जब रही न मुझे ताक़त-ए -सुख़न,
जानूँ किसी के दिल की मैं क्यों कहे बगैर।

मेरा मानना यह है कि ग़ालिब साहब इस शेर में यह कहना चाहते हैं कि शब्दों की शक्ति का औचित्य ही तब है जब वह स्वरहीन को स्वर दे सके। बीएचयू के संदर्भ में छात्र वही स्वरहीन समूह दिख रहे हैं जिनपर वृहद् समाज धर्मनिरपेक्षता की आपातकाल में चलाई संवैधानिक रेल को चढ़ा देना चाहता है। आधे-अधूरे तथ्य बाँटकर सार्वजनिक मंचों से छात्रों को कलंक जैसे अपशब्द से अपमानित किया जा रहा है। कवि श्रेष्ठ से लेकर प्रेमचंद पुत्र तक मैदान में हैं और छात्र बेचारे ढोलकी लेकर विश्वविद्यालय के अंदर बजरंगबली के भजन गा रहे हैं। 

इस तमाम विवाद के तीन पक्ष हैं जिन्हें समझना होगा। एक नैतिक पक्ष, ऐतिहासिक पक्ष, तीसरा संवैधानिक पक्ष। नैतिक दृष्टि से मेरा जो विचार है मैं रख चुका हूँ। परंतु इसमें एक कठिनाई है- इतिहास एवं भविष्य का जो परिप्रे क्ष्य इस महान संस्थान के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय का था, वह न मेरे पास है, न ही स्वयं उनके वंशजों के पास है जो समझा जाता है कि महामना के विरोध में आ खड़े हुए हैं।

हालाँकि यूँ देखें तो वामपंथियों पर प्रतिबंध लगाने वाले नेहरू के विचार भी राष्ट्रविरोधी नारे लगाने वाले उन ही के वंशज राहुल गांधी से तो नहीं ही मिलेंगे। मैं राजनीति, साहित्य और बौद्धिकता के क्षेत्र में वंशवाद को सत्य का सूचक नहीं मानता चाहे वे जवाहरलाल नेहरू के वंशज हों या महामना मालवीय के। 

इस्लामिक आक्रमण के बाद जब फ़ारसी और उर्दू को आधिकारिक भाषा उस देश में बनाया गया जब उसे जानने वाले नहीं थे, और उसके बाद अंग्रेज़ी को वही स्थान आम भारतीयों की अनभिज्ञता के बावजूद दिया गया तो एक वर्ग को अनिवार्य और दूसरे को अप्रासंगिक बना दिया गया। मदरसों ने मुग़ल काल में वैदिक शिक्षा को अप्रासंगिक बनाया, और मिशनरी स्कूलों ने मदरसों को। शिक्षा का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिपेक्ष्य हम शायद भूल जाए, महामना इस तथ्य को समझते और मानते थे। 

आज के विवाद पर प्रेमचंद के प्रपौत्र और स्वयं महामना के पौत्र को मैदान में उतारकर मुट्ठी भर छात्रों को एक तरह से किनारे किया जा रहा है। यह भी संज्ञान लेने का विषय है की जेएनयू के छात्रों की भाँति यहाँ के छात्र प्रौढ़, परिपक्व, या राजनीति की भाषा में घाघ नेता नहीं हैं।

सो जो पत्रकार दिल्ली में मानते थे कि उप-कुलपति भला क्या जानते हैं, वही बनारस में कहते हैं कि उप-कुलपति सर्वज्ञ हैं। और उनकी नहीं सुनते तो ये उनके पोते हैं, वो इनके पोते हैं, इनकी सुनो। तुम्हारा कोई अभिजात्य इतिहास नहीं है, तो तुम कलंक हो।

यहाँ प्रश्न यह है कि मालवीय जी कोई छायावादी प्रगतिशील कवि नहीं थे कि उनके पौत्र या प्रपौत्र को बताना हो कि कवि क्या कहना चाहता है। महामना वह अधिवक्ता थे जो चौरी चौरा और जलियांवाला में सैंकड़ों भारतीयों को फाँसी से बचा लाये। वे जो कहना चाहते थे, बाक़ायदा स्वयं लिख गए।

बीएचयू की नीव पड़ी, 4 फरवरी 1914 को। 22 जनवरी 1903 को गोवर्धन मठ के परमहंस परिवज्रकाचार्य जगद्गुरु शंकराचार्य की अध्यक्षता में सनातन धर्म महासभा में पारित प्रस्ताव से विश्विद्यालय के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई थी।

इस प्रस्ताव के अनुसार तीन उद्देश्य तय हुए- सनातन धर्म की रक्षा एवं पुनरुत्थान के लिए शिक्षकों का वर्ग तैयार करना, संस्कृत भाषा और साहित्य का विस्तार, भारतीय भाषाओँ में वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा। इसके अंतर्गत भिन्न महाविद्यालयों की रूप रेखा तय की गई जिसमे प्रथम था- वैदिक महाविद्यालय जिसके विषय में महामना ने लिखा था-

वैदिक महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय के समस्त धार्मिक कार्य उन हिंदुओं के अधीन होंगे श्रुति, स्मृति एवं पुराणों द्वारा स्थापित सिद्धांतों को मानते हों एवं उनका अनुगमन करते हों। इस महाविद्यालय में दाखिला वर्णाश्रम के आधार पर होगा। 

आगे महामना इस प्रस्ताव में लिखते हैं – विश्वविद्यालय के अन्य सभी महाविद्यालय सभी धर्म एवं जातियों के लिए खुले होंगे। उन महाविद्यालयों में संस्कृत का धर्मनिरपेक्ष साहित्य बिना प्रतिबंध पढ़ाया जाएगा। इसे सचिव के तौर पर महामना ने स्वयं  12 मार्च 1903 को पारित किया था। मालवीय जी क्या चाहते थे यह जानने के लिए उनके परिवारजनों या साहित्यिक समीक्षकों से पूछने की आवश्यकता नहीं है। इस संविधान के अनुसार – 

“इस विश्वविद्यालय में होगा- 1. एक वैदिक महाविद्यालय जहाँ वेद, वेदांग, स्मृतियाँ, इतिहास एवं पुराण तथा संस्कृत साहित्य के अन्य अंग पढ़ाए जाएँगे। एक खगोलीय वेधशाला, वेदांग के ज्योतिष अंग के अंतर्गत इस महाविद्यालय का भाग होगा।

विशेष टिप्पणी- यह महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की समस्त धार्मिक गतिविधि उनके अधिकार में होगी जो श्रुति, स्मृति एवं पुराण में स्थापित सनातनधर्म में रखते हों एवं उनका पालन करते हों। यहाँ धर्म के शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाएगा। अन्य सभी महाविद्यालय सभी धर्म एवं वर्गों के लिए खुले होंगे।“

(स्त्रोत : बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी- 1905 से 1935, श्री वी ए सुंदरम (सदस्य एवं सभासद, कौंसिल, बीएचयू, प्रकाशित- 1936)

अब तथ्य, इतिहास और परंपरा के बाद दूसरा कोण है संविधान का। सो इसपर संविधान समिति में भी बहस हुई थी, 7 दिसंबर 1948 को जिसमें शैक्षणिक संस्थानों में धर्म के विविध आयामों पर चिंतन हुआ। यहाँ केटी शाह ने विशेष रूप से बीएचयू में और अलीगढ़ हिंदू विश्वविद्यालय में धार्मिक शिक्षा और उसके नियमों पर प्रश्न उठाते हुए कहा था कि क्या धर्मनिरपेक्ष राज्य को इनकी व्यवस्था और नियमों में दखल दे कर इन्हें बंद नहीं कराना चाहिए।

उन्होंने इस संदर्भ में संशोधन संख्या 643 बहस के लिए प्रस्तुत किया था। उनकी इस मांग के उत्तर में डॉ अंबेडकर ने कहा था, और यह बहुत ध्यानपूर्वक विचारणीय पक्ष है-

“श्री शाह का कहना है कि यदि अपने अधीनस्थ किए संस्थान में सरकार धार्मिक शिक्षा चलने देती है तो एक प्रकार से सरकार उस संस्थान में धार्मिक शिक्षा दे रही है जिसकी ट्रस्टीशिप उसने स्वीकार की है। उनकी इस बात में तर्क नहीं है।

मैं समझता हूँ कि वे भी इस बात को मानेंगे कि इतिहास के पूर्ववर्ती भाग में कुछ संस्थान इसी उद्देश्य के स्थापित किए गए कि वहाँ धार्मिक शिक्षा दी जाएगी और कालांतर में उस संस्थान को चलाने में असमर्थता के कारण उनका सरकार द्वारा अधिग्रहण एक संरक्षक के रूप में किया गया।

अब यही तर्कसंगत है कि यदि आप एक ट्रस्ट को अधिग्रहित करते हैं तो उससे जुड़े विश्वास को भी स्वीकार करते हैं। यदि आपने ट्रस्ट का सरकार के नाते अधिग्रहण किया है तो आप यह नहीं कह सकते कि अब आप धार्मिक शिक्षा नहीं दे सकते। यह शासन को विश्वासघात के लिए न सिर्फ अनुमति देना वरन बलपूर्वक विश्वासघात के लिए प्रेरित करना होगा।”

शाह का संशोधन संविधान समिति ने अस्वीकृत किया और यह इस विषय में विश्वविद्यालय के संविधान के बाद, भारत के संविधान की स्थिति थी। महामना का विचार इस संदर्भ में स्पष्ट है और संविधान निर्माताओं का उस विचार स्वीकार करना भी स्पष्ट है।

अब नैतिकता का प्रश्न यह नहीं है कि प्रोफेसर फ़िरोज़ की नियुक्ति इस विभाग में क्यों की गई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शरीफ के अनुसार भी यह नियुक्ति उचित नहीं है। प्रश्न यहाँ प्रोफेसर फ़िरोज़ का नहीं है। अध्यापकों को अपशब्द कहने वाले जेएनयू छात्रों के विपरीत बीएचयू के छात्र प्रोफ़ेसर फ़िरोज़ की योग्यता पर प्रश्न नहीं उठा रहे हैं, प्रश्न सिर्फ यह है कि उन्हें उस विभाग में क्यों नहीं नियुक्त किया जाता है जहाँ धर्म की बाध्यता मालवीय जी ने संस्थापक के रूप में नहीं रखी थी।

प्रशासन अपने अहंकार में महामना के विचारों को पददलित कर रहा है, क्या वह नैतिक है, यह प्रश्न है। एक प्रश्न और है कि जो निर्णय संविधान समिति ने लिया था उसे किनारे करते हुए बीएचयू के संविधान में 1966 में संशोधन करना क्या नैतिक था। यही वह संशोधित संविधान है जिसपर लज्जित होने के स्थान पर लोग उसे पताका बनाए घूम रहे हैं।

वर्तमान संविधान के अनुसार छात्रों की माँग नैतिक भले हो, न्यायसंगत नहीं हैं, क्योंकि पिछले द्वार से लाया गया हो, पर संविधान आज यही है। नैतिकता का प्रश्न यही है कि 1966 में इस संविधान को बदलने वाले और दूसरी ओर महामना और संविधान समिति, दोनों में से हम किसे अधिक महत्त्व देंगे।

संविधान यदि एक बार बदला गया है, तो संस्थापक के सम्मान में पुनः पुराने रूप में भी क्या जा सकता है। महामना के विचार के अभाव में मेरा मानना यह है कि सनातन के समर्थन में सार्वजनिक शपथपत्र के साथ गैर सनातनी विद्वान् का हिंदू धर्म पढ़ाना गलत नहीं है। परंतु महामना थे, और क्योंकि वे थे आज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय है।

साकेत लेखक व ब्लॉगर हैं जो @saket71 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।