भारती
बेंगलुरु की झीलों को प्रदूषण से बचाने के लिए अपार्टमेंटों पर शिकंजा पूर्ण समाधान नहीं

बेंगलुरु की झीलें प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हैं जिन्हें बचाने के लिए कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (केएसपीसीबी) पिछले कुछ माहों से प्रयास कर रहा है। यह प्रयास है अपशिष्ट जल छोड़ने वाले अपार्टमेंटों पर शिकंजा कसने का।

दिसंबर 2019 और जनवरी 2020 के दो माहों में केएसपीसीबी ने बृहत बेंगलुरु महानगरपालिके (बीबीएमपी) के महादेवपुरा क्षेत्र में 495 अपार्टमेंटों पर कुल 291 करोड़ रुपये का जुर्माना ठोका। इस नोटिस में कहा गया था कि 15 दिनों में जुर्माना न भरने पर जल आपूर्ति की लाइन काट दी जाएगी।

हालाँकि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अपार्टमेंट संघों की याचिका पर किसी प्रकार की कटौती से अंतरिम राहत दे दी है। मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास और न्यायाधीश हमेंत चंदनगौदर की पीठ से महादेवपुरा, बेलंदुर और मारताहळी के कई अपार्टमेंटों को यह राहत दी गई है।

केएसपीसीबी ने कुछ अपार्टमेंटों के विरुद्ध कारण बताओ नोटिस जारी किया था कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) के आदेशानुसार मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) स्थापित न करने या मानकों पर खरा न उतरने के लिए बेंगलुरु बिजली आपूर्ति कंपनी लिमिटेड को उनकी बिजली काटने का निर्देश क्यों नहीं दिया जाए।

न्यायालय की पीठ ने कारण बताओ नोटिस में हस्तक्षेप नहीं किया है बल्कि बोर्ड को निर्देश दिया है कि याचकों की पूरी बात सुनने के बाद ही कारण बताओ नोटिस पर कोई कार्रवाई की जाए। साथ ही यह कहा गया है कि अंतिम नोटिस जारी करने के 15 दिन बाद ही बिजली काटी जाए।

बेंगलुरु अपार्टमेंट संघ (बीएएफ) के महासचिव विक्रम राय ने बताया कि अलग-अलग नोटिस प्रकारों के अनुसार कुल चार समूहों में अपार्टमेंटों ने न्यायालय का द्वार खटखटाया था। 34 में से 21 अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्सों को न्यायालय ने अंतरिम राहत दे दी है। अब इस मामले की सुनवाई 7 अप्रैल को होगी।

बीएएफ के एक कार्यक्रम का पोस्टर

नियम और उसकी समस्या

जनवरी 2016 में बीबीएमपी ने एसटीपी स्थापित करने के लिए कुछ दिशानिर्देश दिए थे जिसमें 20 इकाइयों से ज्यादा या 2,000 स्क्वायर मीटर से अधिक के क्षेत्रफल वाले आवासीय स्थानों या अपार्टमेंट के लिए स्वयं का एसटीपी अनिवार्य है। 2,000 स्क्वायर मीटर से अधिक के क्षेत्रफल वाले व्यावसायिक स्थानों के लिए भी एसटीपी अनिवार्य है। 5,000 स्क्वायर मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले शैक्षिक संस्थानों और 10 एकड़ से बड़े टाउनशिपों को भी एसटीपी स्थापित करना होगा।

बीएएफ ने इन नीतियों का विरोध किया था कि क्योंकि पुराने अपार्टमेंटों में एसटीपी स्थापित करने की जगह नहीं है और शून्य निस्तारण की नीति का भी पालन कर पाना उनके लिए कठिन था क्योंकि उपचारित मल जल का भी 100 प्रतिशत उपयोग नहीं किया जा सकता।

इसके बाद इन नियमों में थोड़ी ढील देकर यह कहा गया कि जनवरी 2016 के बाद बनने वाले सभी 20 से अधिक इकाई वाले अपार्टमेंटों में एसटीपी हो। लेकिन शून्य निस्तारण की समस्या उनके लिए बनी रही जो अपार्टमेंट बीबीएमपी के बाहरी क्षेत्रों में होने के कारण सीवर लाइन से जुड़े हुए नहीं हैं।

उपचारित जल का उपयोग सिंचाई और लैंडस्केपिंग वगैरह में किया जाता है लेकिन इसके बावजूद पूर्ण जल का उपयोग नहीं हो पाता। ऐसे में यह जल वर्षा जल वाले नाले में बहाया जाता है। इसके लिए बीएएफ के महसचिव श्रीकांत नरसिम्हन ने सुझाव दिया था कि ऐसी कोई प्रणाली बनाई जाए जो इस उपचारित जल को उद्योगों या अन्य उपयुक्त स्थानों पर पहुँचाया जा सके।

“आदर्श रूप से सरकार को इस जल को इकट्ठा करना चाहिए और उद्योगों से इसके लिए शुल्क वसूलना चाहिए। इससे उद्योगों को भी सस्ते शुल्क पर पानी मिलेगा और जल का उपचार करने वाले अपार्टमेंटों को भी वित्तीय लाभांश मिलेगा।”, नरसिम्हन ने कहा।

अपार्टमेंट संघों की शिकायत

एसटीपी के मानकों पर खरा न उतरने के लिए भी कई अपार्टमेंटों पर कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए शोभा कार्नेशन आवासीय समिति के एक अधिकारी उमाशंकर का सुझाव है कि मानकों पर खरा उतरने वाले अपार्टमेंटों को जल की आपूर्ति कम दर पर की जाए ताकि उन्हें प्रोत्साहन मिल सके।

वहीं कुछ और अपार्टमेंट संघ केपीएसबीसी की कार्रवाई में पारदर्शिता की कमी की शिकायत कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी जानकारी के बिना केपीसएसबीसी ने जाँच के लिए नमूने लिए। बीएएफ के अध्यक्ष नागराज राव ने केपीएसबीसी की रिपोर्टों और लिये गए नमूनों के प्रति अविश्वास व्यक्त किया।

दूसरी एक और बात उठ रही है कि अपार्टमेंट में रहने वाले रख-रखाव की पूरी राशि देते हैं फिर भी कारण बताओ नोटिस के कारण उन्हें ही समस्या का सामना करना पड़ रहा है जबकि असली गलती उन ठेकेदारों और कर्मचारियों की है जो एसटीपी का निर्माण करते हैं। एसटीपी के मानकों पर खरा न उतरने का कारण निर्माण की त्रुटियाँँ हैं जिसपर रहने वालों का कोई नियंत्रण नहीं होता।

बेंगलुरु की झीलें

बेलंदुर, अगरा और वर्तुर झीलों में प्रदूषण को रोक पाने में असमर्थ होने के कारण एनजीटी ने कर्नाटक सरकार पर दिसंबर 2018 में 500 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। कुछ लोगों का मानना है कि एनजीटी की सख्ती के बाद ही केपीएसबीसी ने ये कदम उठाए हैं लेकिन 2016 के नियम 2015 में बेलंदुर झील की आग के बाद बनाए गए थे।

अत्यधिक प्रदूषण के कारण बेलंदुर झील में बना झाग

बेंगलुरु की झीलों को प्रदूषण से बचाने के लिए मलजल को इसमें बहने से तो रोकना ही होगा लेकिन साथ ही यदि उपचार के बाद भी इसका निस्तारण किया जाना हो तो तृतीय स्तर के उपचार के बाद ही हो ताकि अन्य धातु झील में न जाएँ।

इस वर्ष के कर्नाटक बजट में भी झीलों की अवस्था में सुधार के लिए 100 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। शुभ्र बेंगलुरु योजना के अंतर्गत कुल 317 करोड़ रुपये की राशि को इस कार्य के लिए स्वीकृति दी गई है।

बेलंदुर झील में प्रतिदिन 25.6 करोड़ लीटर अपशिष्ट जल जाता है जिसे एनजीटी ने आपराधिक काम बताया है और साथ ही कहा है कि सितंबर 2020 तक एसटीपी स्थापित करने का कार्य पूरा किया जाना है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो प्रति एसटीपी के लिए प्रति माह 10 लाख रुपये का जुर्माना भरना होगा और इस राशि को ज़िम्मेदार अधिकारियों से भी वसूला जा सकता है।

जब तक एसटीपी नहीं बन जाता तब तक बेंगलुरु जल आपूर्ति और और सीवेज बोर्ड को यह देखने का दायित्व दिया गया है कि कोई भी अनुपाचिरत सीवेज झील में न जाए। ऐसा होने की स्थिति में प्रति आउटलेट प्रति माह 5 लाख रुपये का जुर्माना वसूला जाएगा। साथ ही केपीएसबीसी को जल गुणवत्ता की नियमित जाँच का निर्देश दिया गया है।

अपार्टमेंट संघों से स्वयं के एसटीपी की माँग करना एक तरह से सही है क्योंकि वे ऐसा करने में सक्षम हैं लेकिन जहाँ तक प्रश्न तकनीकी विशिष्टताओं का है तो केपीएसबीसी को सीधे जुर्माना ठोकने की बजाय अपार्टमेंट संघों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, तब ही लाभदायक परिणाम देखने को मिल सकेंगे।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।